| टूट श्रद्धा और विशवास का केंद्र - देव का सूर्य मंदिर 06/11/2008 |
| पुरातत्वविदइस मंदिर का निर्माणकालआठवींशताब्दीके आसपास बताते हैं, लेकिन मंदिर की अभूतपूर्व स्थापत्य कला, शिल्प, कलात्मक भव्यता और धार्मिक महत्ता के कारण ही जानमानसमें यह किंवदतीप्रसिद्ध है कि इसका निर्माण देवशिल्पीभगवान विश्वकर्मा ने स्वयं अपने हाथों से किया है। देव स्थित भगवान भास्कर का विशाल मंदिर अपने अप्रतिम सौंदर्य और शिल्प के कारण सदियों से श्रद्धालुओं, वैज्ञानिकों, मूर्ति चोरों व तस्करों व आमजनोंके लिए आकर्षण का केंद्र है। काले और भूरे पत्थरों की अतिसुंदरकृति जिस तरह उडीसा प्रदेश के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर का शिल्प है, ठीक उसी से मिलता-जुलता शिल्प देव के प्राचीन सूर्य मंदिर का भी है। मंदिर के निर्माणकालके संबंध में उसके बाहर ब्राह्मीलिपि में लिखित और संस्कृत में अनुवादित एक श्लोक जडा है, जिसके अनुसार 12लाख 16हजार वर्ष त्रेतायुग के बीत जाने के बाद इलापुत्रपुरुरवाऐलने देव सूर्य मंदिर का निर्माण आरंभ करवाया। शिलालेख से पता चलता है कि सन 2008ईस्वी में इस पौराणिक मंदिर के निर्माण काल का एक लाख पचास हजार आठ वर्ष पूरा हो गया है। देव मंदिर में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों दयाचलप्रात:सूर्य, मध्याचलमध्य सूर्य और अस्ताचल अस्त सूर्य के रूप में विद्यमान है। पूरे देश में देव का मंदिर ही एक मात्र ऐसा सूर्य मंदिर है, जो पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुखहै। करीब एक सौ फीट ऊंचा यह सूर्य मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। बिना सीमेंट या चूना गारा का प्रयोग किए आयताकार, वर्गाकार, अर्द्धवृत्ताकार, गोलाकार, त्रिभुजाकार आदि कई रूपों और आकारों में काटे गए पत्थरों को जोडकर बनाया गया यह मंदिर अत्यंत आकर्षक व विस्मयकारी है। जनश्रुतियोंके आधार पर इस मंदिर के निर्माण के संबंध में कई किंवदतियांप्रसिद्ध हैं, जिससे मंदिर के अति प्राचीन होने का स्पष्ट पता तो चलता है। लेकिन इसके निर्माण के संबंध में अभी भी भ्रामक स्थिति बनी हुई है। निर्माण के मुद्दे को लेकर इतिहासकारों और पुरातत्व विशेषज्ञों के बीच चली बहस से भी इस संबंध में ठोस परिणाम प्राप्त नहींहोसका है। सूर्य पुराण से सर्वाधिक प्रचारित जनश्रुतिके अनुसार ऐलएक राजा थे, जो किसी ऋषि के श्राप वश श्वेत कुष्ठ से पीडित थे। एक बार वह शिकार करने देव के वनप्रांत में पहुंचने के बाद राह भटक गए। राह भटकते भूखे-प्यासे राजा को एक छोटा सा सरोवर दिखाई पडा, जिसके किनारे वे पानी पीने गए और अंजुरीमें भरकर पानी पिया। पानी पीने के क्रम में वे यह देखकर आश्चर्य में पड गए कि उनके शरीर के जिन जगहों पर पानी का स्पर्श हुआ, उन जगहों के श्वेत कुष्ठ के दाग जाते रहे। इससे अति प्रसन्न और आश्चर्यचकित राजा अपने वस्त्रों की परवाह नहीं करते हुए सरोवर के गंदे पानी में लेट गए और इससे उनका श्वेत कुष्ठ पूरी तरह जाता रहा। अपने शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन देख प्रसन्नचितराजा ऐलने इसी वन प्रांत में रात्रि विश्राम करने का निर्णय लिया और रात्रि में राजा को स्वप्न आया कि उसी सरोवर में भगवान भास्कर की प्रतिमा दबी पडी है। प्रतिमा को निकालकर वही मंदिर बनवाने और उसमेप्रतिष्ठित करने का निर्देश उन्हें स्वप्न में प्राप्त हुआ। कहा जाता है कि राजा ऐलने इसी निर्देश के मुताबिक सरोवर से दबी मूर्ति को निकालकर मंदिर में स्थापित कराने का काम किया और सूर्य कुंड का निर्माण कराया लेकिन मंदिर यथावत रहने के बावजूद उस मूर्ति का आज तक पता नहींहैं।अभी जो वर्तमान मूर्ति है वह प्राचीन अवश्य है, लेकिन खंडित तथा जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। मंदिर निर्माण के संबंध मेएक कहानी यह भी प्रचलित है कि इसका निर्माण एक ही रात में देवशिल्पीभगवान विश्वकर्मा ने अपने हाथों किया था और कहा जाता है कि इतना सुंदर मंदिर कोई साधारण शिल्पी बना ही नहींसकता।इसके काले पत्थरों की नक्काशी अप्रतिम है और देश में जहां भी सूर्य मंदिर है, उनका मुंह पूरब की ओर है, लेकिन यही एक मंदिर है जो सूर्य मंदिर होते हुए भी ऊषाकालीनसूर्य की रश्मियोंका अभिषेक नहीं कर पाता वरन् अस्ताचलगामीसूर्य की किरणें ही मंदिर का अभिषेक करती हैं। जनश्रुतिहै कि एक बार बर्बर लुटेरा काला पहाड मूिर्त्रयोंव मंदिरों को तोडता हुआ यहां पहुंचा तो देव मंदिर के पुजारियों ने उससे काफी विनती की कि इस मंदिर को कृपया न तोडे क्योंकि यहां के भगवान का बहुत बडा महात्म्यहै। इस पर वह हंसा और बोला यदि सचमुच में तुम्हारे भगवान में कोई शक्ति है तो मै रातभर का समय देता हूं तथा यदि इसका मुंह पूरब से पश्चिम हो जाए तो मैं इसे नहीं तोडूगा। पुजारियों ने सिर झुकाकर इसे स्वीकार कर लिया और वे रात भर भगवान से प्रार्थना करते रहे। सवेरे उठते ही हर किसी ने देखा कि सचमुच मंदिर का मुंह पूरब से पश्चिम की ओर हो गया था और तब से इस मंदिर का मुंह पश्चिम की ओर ही है। कहा जाता है कि एक बार एक चोर मंदिर में आठ मन वजनी स्वर्ण कलश को चुराने आया। वह मंदिर के ऊपर चढ ही रहा था कि उसे कही से गडगडाहट की आवाज सुनाई दी और वह वही पत्थर बनकर सट गया। आज लोग अपने बच्चों को सटे चोर की ओर अंगुली दिखाकर बताते हैं। इस संबंध में पूर्व सांसद, प्रख्यात साहित्यकार व देव के बगल के ही गांव भवानीपुरके रहने वाले स्व. शंकर दयाल सिंह का मानना था कि इसके दो कारण हो सकते हैं। उनमें एक यह कि कोई सोना चुराने नहींआए,इसलिए यह किंवदंती प्रसिद्धि में आई और दूसरी बात यह कि जिसे चोर की संज्ञा दी जाती है वह देखने पर बुद्ध की मूर्ति नजर आती है। उधर, विरोधी रुख रखने वालों में पंडित राहुल सांकृत्यायनप्रमुख हैं जिनके अनुसार यह प्राचीनकाल में बुद्ध मंदिर था, जिसे विधर्मियोंसे भयाक्रांत भक्तजनों ने इसे मिट्टी से पाट दिया था। कहा जाता है कि सनातन धर्म के संरक्षक और संस्कारक शंकराचार्य जब इधर आए तो संशोधित और सुसंस्कृत कर यहां मूर्ति प्रतिष्ठित की। पुरातत्व से जुडे डा. केकेदत्त और पंडित विश्वनाथ शास्त्री ने भी इसकी अति प्राचीनताका प्रबल समर्थन किया है। इस मंदिर के निर्माण से संबंध विवाद चाहे जो भी हो, कोई साफ अवधारणा भले ही नहीं बन पाई हो, लेकिन इस मंदिर की महिमा को लेकर लोगों के मन में अटूट श्रद्धा व आस्था है। यही कारण है कि हर साल चैत्र और कार्तिक के छठ मेले में लाखों लोग विभिन्न स्थानों से यहां आकर भगवान भास्कर की आराधना करते हैं। भगवान भास्कर का यह त्रेतायुगीनमंदिर सदियों से लोगों को मनोवांछित फल देने वाला पवित्र धर्मस्थल रहा है। यूं तो साल भर देश के विभिन्न जगहों से लोग यहां पधारकर मनौतियां मांगने और सूर्यदेव द्वारा उनकी पूर्ति होने पर अर्घ्यदेने आते हैं, लेकिन लोगों का विश्वास है कि कार्तिक व चैती छठ व्रत के पुनीत अवसर पर सूर्य देव की साक्षात उपस्थिति की रोमांचक अनुभूति होती है। |
गुरुवार, 16 जून 2011
बुधवार, 15 जून 2011
बुंदेलखंड-- वादों का मारा बुंदेलखंड
बुंदेलखंड में चित्रकूट के घाट पर न तो संतों की भीड़ है और न चंदन घिसने के लिए तुलसीदास जी हैं. हां, बुंदेलखंड की व्यथा सुनने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ज़रूर बांदा आए. उन्होंने पानी की सुविधा के लिए दो सौ करोड़ रुपये देने का वादा करके आंसू पोंछने की कोशिश की है, लेकिन यहां की जनता के दु:ख-दर्द दूर होते नज़र नहीं आ रहे हैं. रो-रोकर अपना हाल बताने वालों में भूख एवं क़र्ज़ से मरे हुए किसानों के परिवारीजन थे, पेंशन एवं राशन के लिए भटक रहे वृद्ध थे. रोज़गार गारंटी से धोखा खाए श्रमिक थे और दबंगों-दलालों की लाठी-बंदूक़ों के साये में जीने वाले ऐसे युवक भी थे, जिन्हें अपने और समाज के हक़ के लिए लिखापढ़ी करने के गुनाह में असरदारों ने पुलिस से साठगांठ कर जेल भिजवाया था. खेती ने पैसा तो सोख लिया, लेकिन खाने के लिए अनाज पैदा नहीं हो पाया. घर में भुखमरी की स्थिति बन गई. आजीविका के लिए साहूकारों से क़र्ज़ लेना पड़ा. पति चिंता में भूखे सोते थे. बच्चे भूख से तड़पते तो वे दु:खी होकर रात-रात भर रोते रह जाते थे. आत्महत्या मुक्ति का मार्ग बन गई. आंकड़े बताते हैं कि बीते वर्षों में आत्महत्या करने वाले लोगों में अधिकतर किसान ही थे, लेकिन सरकारी अधिकारी हमेशा झूठ बोलते रहे. बुंदेलखंड में ग़रीबी के कारण लोगों का जीना दुश्वार है. सूखा इस क्षेत्र की नियति बन गया है. पिछले पांच वर्षों से लगातार सूखे से जूझ रहे लोगों की हालत से लगता है कि परिस्थितियां धीरे-धीरे 19वीं सदी के भयंकर अकाल जैसी बनती जा रही हैं. मानसून ने बुंदेलखंड में अपने पिछले सभी रिकार्ड तोड़ दिए हैं. ज़्यादातर किसान सूखे की मार झेल रहे हैं और सरकार मरहम लगाने के बजाय चाबुक चला रही है. सरकार जब तक जमीनी हक़ीक़त नहीं देखेगी, तब तक पानी का टोटा रहेगा. यहां के चेक डेम राजनेताओं की जेबें भर रहे हैं. इसीलिए करोड़ों रुपये ख़र्च करने के बाद भी बुंदेलखंड में सूखा है और यहां का किसान भूखा है.
जनपद चित्रकूट मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर पहाड़ के किनारे बसा-तरांव गांव मूलभूत सुविधाओं से कोसों दूर है. वर्षा पर निर्भर होने के कारण कृषि व्यवस्था चौपट है. गांव में 50 प्रतिशत आबादी दलितों की है, जिनमें अधिकांश भूमिहीन हैं. जिनके पास भूमि है, वह भी ज़्यादा से ज़्यादा बीघा-दो बीघा. कंकरीली-पथरीली भूमि होने से कृषि कार्य ठीक से हो नहीं पाता. रोजगार के अवसर न होने के कारण प्रति वर्ष बड़ी संख्या में लोग पलायन करते हैं. वर्तमान में 55 परिवारों में से 100 लोग पलायन कर चुके हैं. तरांव की श्रीमती तुलसा, राजरानी, चिरइया, कुंवरसुती, उर्मिला, हीरामनी, कमला, सत्यनारायण, देबा एवं राममिलन आदि कहते हैं कि जब तक काम मिलता है, तब तक ही चूल्हा जलता है. अगर काम नहीं तो भोजन नहीं. हम लोगों ने सुना था कि रोज़गार गारंटी योजना के तहत सौ दिनों का काम मिलेगा और मज़दूरी का भुगतान एक सप्ताह या 15 दिनों के भीतर हो जाएगा, लेकिन हमारे गांव में तो इसका उल्टा हो रहा है. रोज़गार गारंटी योजना के तहत हम लोग भी काम करने गए तो प्रधान ने हमें खदेड़ दिया और कहा कि तुम्हें जहां जाना हो जाओ, मेरे पास तुम्हारे लिए काम नहीं है. जब हमने कहा कि हमारे पास जॉबकार्ड है तो उन्होंने कहा कि जॉबकार्ड तो पूरे गांव के बने हैं, मैं सभी को काम पर नहीं लगा सकता. काम करना है तो राजस्थान, पंजाब और सूरत चले जाओ, यहां काम नहीं है. सत्य नारायण ने कहा कि रोज़गार गारंटी योजना के तहत तालाब के भीट पर वृक्षारोपण कार्य हेतु प्रधान ने गड्ढे खुदवाए, लेकिन आधा दर्जन मज़दूरों को पैसा अभी तक नहीं मिला. प्रधान एवं सचिव कहते हैं कि अभी पैसा नहीं आया है. अब हम लोग भूखों मरने के कगार पर खड़े हैं और क़र्ज़ लेकर बाहर पलायन कर जाएंगे. समाजसेवी गोपाल भाई कहते हैं कि बुंदेलखंड की बदहाली के मूल कारणों पर ध्यान दिए बिना कोई भी राहत यहां स्थायी बदलाव नहीं ला सकती. भारतीय किसान यूनियन के मंडल अध्यक्ष हरदत्त पांडेय कहते हैं कि 2004 से लगातार सूखा और दैवीय आपदाओं के चलते किसान बर्बाद हो चुका है. हाड़ तोड़ मेहनत के बावजूद बीज तक वापस नहीं हो पा रहा है. सिंचाई के अभाव में फसलें सूख गईं, वहीं ओलावृष्टि ने और कमर तोड़ दी. इसलिए बैंकों की वसूली पर रोक लगाई जाए. ओलावृष्टि से नष्ट हुई फसलों का मुआवज़ा पंद्रह हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर हर किसान को दिलाया जाए. रघुवीर सिंह ने मांग की कि क्षेत्र के तालाब अतिशीघ्र भरे जाएं.
वादों का मारा बुंदेलखंड |
झांसी में बैंक का क़र्ज़ चुकता न कर पाने के सदमे में एक किसान ने ट्रेन से कटकर आत्महत्या कर ली. ख़बर पाकर ज़िला प्रशासन सक्रिय हुआ और अधिकारियों ने मृतक की पत्नी को आर्थिक मदद प्रदान की. थाना बड़ागांव क्षेत्र के ग्राम छपरा निवासी मातादीन अहिरवार का दत्तक पुत्र रामबाबू (42) किसान था. गढ़मऊ रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूर उसने ट्रेन के सामने आकर आत्महत्या कर ली.झांसी में बैंक का क़र्ज़ चुकता न कर पाने के सदमे में एक किसान ने ट्रेन से कटकर आत्महत्या कर ली. ख़बर पाकर ज़िला प्रशासन सक्रिय हुआ और अधिकारियों ने मृतक की पत्नी को आर्थिक मदद प्रदान की. थाना बड़ागांव क्षेत्र के ग्राम छपरा निवासी मातादीन अहिरवार का दत्तक पुत्र रामबाबू (42) किसान था. गढ़मऊ रेलवे स्टेशन से कुछ ही दूर उसने ट्रेन के सामने आकर आत्महत्या कर ली. उसके भाई हरिमोहन ने बताया कि रामबाबू के पास 5 एकड़ कृषि भूमि थी, जिसे रहन रखकर उसने स्टेट बैंक से क़रीब 6 लाख रुपये का क़र्ज़ लाया था. इस बार उसने खेत में गेहूं बोया था, लेकिन पानी न मिलने के कारण अधिकांश फसल बर्बाद हो गई. वह दो-तीन महीने से सदमे में था. उसे बैंक के क़र्ज़ की चिंता सता रही थी. जबकि बांदा जनपद के नहरी गांव में ग़रीबी और क़र्ज़ के चलते हुई दो मौतों के संबंध में ज़िला प्रशासन का कहना है कि उन मामलों में आत्महत्या की वजह बीमारी और घरेलू कलह थी. मालूम हो कि 27 अप्रैल को नरैनी क्षेत्र के ग्राम नहरी निवासी जग प्रसाद ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. वहीं 29 अप्रैल को हीरामन पुत्र मनीराम की मौत हो गई. चित्रकूट से सटे बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश भाग के सतना ज़िले के ग्राम इटमा तीर में एक वृद्धा की भूख से मौत हो गई. सरपंच ओंकार प्रसाद शुक्ला ने वृद्धा केसकली की मौत भूख से होना बताया. केसकली निराश्रित थी और विगत चार महीनों से वृद्धावस्था पेंशन न मिलने से परेशान थी. चार-पांच दिनों से उसे भोजन नसीब नहीं हुआ था. जालौन जनपद के हिम्मतपुर गांव के 65 वर्षीय अरविंद सिंह की कहानी किसी को भी द्रवित कर सकती है. अरविंद सिंह की दशा पहले इतनी दीन-हीन नहीं थी. दूसरों का भला करने के जुनून में वह इस हद तक आगे बढ़ गए कि उन्होंने क़र्ज़ लेने से भी परहेज नहीं किया. सूदखोरों के चंगुल में फंसकर वह अपनी पूरी आठ बीघा ज़मीन गंवा बैठे. उनके पास न राशनकार्ड है और न उन्हें वृद्धावस्था पेंशन मिलती है.
किस विकास के खुल गए, यारों आज किवाड़
डरे-डरे हतप्रभ खड़े जंगल, नदी, पहाड़
अशोक अंजुम का उक्त दोहा बुंदेली धरा पर अक्षरश: चरितार्थ हो रहा है. सूखे कुएं, खाली तालाब और आधे-अधूरे बांध देखकर यहां के किसान बदहवास घूमते हैं. कुदरत के कहर और शासन की उपेक्षा ने उन्हें इस कदर बेबस कर दिया है कि वे जान से प्यारी अपनी भूमि को राम भरोसे छोड़कर दो जून की रोटी की तलाश में पलायन कर रहे हैं. जो कहीं नहीं जाना चाहते, उन्हें जीने के लिए रोज जंग लड़नी पड़ रही है. उन्हीं में चित्रकूट जनपद के विकास खंड मानिकपुर के बगरहा गांव निवासी कोल आदिवासी महिला केसकली है, जो विकलांग है और राशनकार्ड, पेंशन एवं आवास आदि सुविधाओं से वंचित है. 20 वर्ष पूर्व अपना पति खो चुकी केसकली के जीवन में दु:खों का पहाड़ टूट पड़ा है. 14 माह पूर्व बड़े पुत्र झुल्ली को डाकू बताकर पुलिस ने मार गिराया. छोटा पुत्र पुलिस के डर से भाग गया है. डेढ़ बीघा भूमि लगातार चार वर्षों के सूखे के बाद बंजर पड़ी है. गांव में भीख मांगकर वह कब तक जिंदा रहेगी, कहना कठिन है. इसी जनपद में मइयादीन पुत्र महावीर ग्राम बनाड़ी का बाशिंदा है. भूख और क़र्ज़ की चिंता में भाई राम सुमेर की मृत्यु हो गई. इसके बाद उसकी भूमि की तीन बार नीलामी हुई. 24 अप्रैल, 2006 को 22 बीघा 5 बिस्वा ज़मीन की बोली मात्र 2 लाख 90 हज़ार रुपये लगाई गई. दूसरी बार 20 बीघा ज़मीन की बोली 7 लाख 56 हज़ार रुपये और फिर तीसरी बार 9 बीघा 9 बिस्वा की बोली 3 लाख 90 हज़ार रुपये लगी और वह नीलाम हो गई. मइयादीन ने बताया कि उसी दिन तहसीलदार कर्वी ने उसे ज़बरदस्ती 2 घंटे लॉकअप में बंद रखा. भूमि नीलाम होने के बावजूद बैंक से लगातार नोटिसें आती रहीं.जनपद चित्रकूट मुख्यालय से 16 किलोमीटर दूर पहाड़ के किनारे बसा-तरांव गांव मूलभूत सुविधाओं से कोसों दूर है. वर्षा पर निर्भर होने के कारण कृषि व्यवस्था चौपट है. गांव में 50 प्रतिशत आबादी दलितों की है, जिनमें अधिकांश भूमिहीन हैं. जिनके पास भूमि है, वह भी ज़्यादा से ज़्यादा बीघा-दो बीघा. कंकरीली-पथरीली भूमि होने से कृषि कार्य ठीक से हो नहीं पाता. रोजगार के अवसर न होने के कारण प्रति वर्ष बड़ी संख्या में लोग पलायन करते हैं. वर्तमान में 55 परिवारों में से 100 लोग पलायन कर चुके हैं. तरांव की श्रीमती तुलसा, राजरानी, चिरइया, कुंवरसुती, उर्मिला, हीरामनी, कमला, सत्यनारायण, देबा एवं राममिलन आदि कहते हैं कि जब तक काम मिलता है, तब तक ही चूल्हा जलता है. अगर काम नहीं तो भोजन नहीं. हम लोगों ने सुना था कि रोज़गार गारंटी योजना के तहत सौ दिनों का काम मिलेगा और मज़दूरी का भुगतान एक सप्ताह या 15 दिनों के भीतर हो जाएगा, लेकिन हमारे गांव में तो इसका उल्टा हो रहा है. रोज़गार गारंटी योजना के तहत हम लोग भी काम करने गए तो प्रधान ने हमें खदेड़ दिया और कहा कि तुम्हें जहां जाना हो जाओ, मेरे पास तुम्हारे लिए काम नहीं है. जब हमने कहा कि हमारे पास जॉबकार्ड है तो उन्होंने कहा कि जॉबकार्ड तो पूरे गांव के बने हैं, मैं सभी को काम पर नहीं लगा सकता. काम करना है तो राजस्थान, पंजाब और सूरत चले जाओ, यहां काम नहीं है. सत्य नारायण ने कहा कि रोज़गार गारंटी योजना के तहत तालाब के भीट पर वृक्षारोपण कार्य हेतु प्रधान ने गड्ढे खुदवाए, लेकिन आधा दर्जन मज़दूरों को पैसा अभी तक नहीं मिला. प्रधान एवं सचिव कहते हैं कि अभी पैसा नहीं आया है. अब हम लोग भूखों मरने के कगार पर खड़े हैं और क़र्ज़ लेकर बाहर पलायन कर जाएंगे. समाजसेवी गोपाल भाई कहते हैं कि बुंदेलखंड की बदहाली के मूल कारणों पर ध्यान दिए बिना कोई भी राहत यहां स्थायी बदलाव नहीं ला सकती. भारतीय किसान यूनियन के मंडल अध्यक्ष हरदत्त पांडेय कहते हैं कि 2004 से लगातार सूखा और दैवीय आपदाओं के चलते किसान बर्बाद हो चुका है. हाड़ तोड़ मेहनत के बावजूद बीज तक वापस नहीं हो पा रहा है. सिंचाई के अभाव में फसलें सूख गईं, वहीं ओलावृष्टि ने और कमर तोड़ दी. इसलिए बैंकों की वसूली पर रोक लगाई जाए. ओलावृष्टि से नष्ट हुई फसलों का मुआवज़ा पंद्रह हज़ार रुपये प्रति हेक्टेयर हर किसान को दिलाया जाए. रघुवीर सिंह ने मांग की कि क्षेत्र के तालाब अतिशीघ्र भरे जाएं.
मंगलवार, 31 मई 2011
Tuesday, May 31, 2011
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गुरुवार, 26 मई 2011
अनामी भाषा
अनामी भाषा
वियतनामी भाषा वियतनाम की राजभाषा है। जब वियतनाम फ्रांस का उपनिवेश था तब इसे अन्नामी (Annamese) कहा जाता था। वियतनाम के ८६% लोगों की यह मातृभाषा है तथा लगभग ३० लाख वियतनामी बोलने वाले यूएसए में रहते हैं। यह आस्ट्रेलियायी-एशियायी परिवार की भाषा है।
वियतनामी भाषा की अधिकांश शब्दराशि चीनी भाषा से ली गयी है। यह वैसे ही है जैसे यूरोपीय भाषाएं लैटिन एवं यूनानी भाषा से शब्द ग्रहण की हैं उसी प्रकार वियतनामी भाषा ने चीनी भाषा से मुख्यत: अमूर्त विचारों को व्यक्त करने वाले शब्द उधार लिये हैं। वियतनामी भाषा पहले चीनी लिपि में ही लिखी जाती थी (परिवर्धित रूप की चीनी लिपि में) किन्तु वर्तमान में वियतनामी लेखन पद्धति में लैटिन वर्णमाला को परिवर्तित (adapt) करके तथा कुछ डायाक्रिटिक्स (diacritics) का प्रयोग करके लिया जाता है।
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शुक्रवार, 20 मई 2011
प्रेमचंद की मूर्ति हटा देंगे
Monday, February 8, 2010
प्रेमचंद की मूर्ति हटा देंगे
लखनऊ, फरवरी। वाराणसी से मुंशी प्रेमचंद की मूर्ति हटाकर उनके गांव लमही भेजे जाने का भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने विरोध किया है। इस सिलसिले में भाकपा के प्रदेश सचिव डाक्टर गिरीश ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को एक पत्र लिखकर दखल देने की मांग की है।
वाराणसी में मुंशी प्रेमचंद की मूर्ति पांडेपुर चौराहे पर लगी है। इस जगह पर प्रेमचंद की मूर्ति इसलिए लगवाई गई थी क्योंकि वे इसी चौराहे से होकर अपने गांव लमही आते-जाते थे। अब यह चौराहा निर्माणाधीन फ्लाईओवर ब्रिज के नीचे आ रहा है। जिसके चलते जिला प्रशासन उनकी मूर्ति वहां से हटाकर लमही भेजने के प्रयास में है। दूसरी तरफ साहित्यकार और बुद्धिजीवी वर्ग चाहता है कि प्रेमचंद की मूर्ति वाराणसी में ही किसी दूसरी जगह पर स्थापित की जए। प्रेमचंद का वाराणसी से गहरा रिश्ता रहा है। ऐसे में उनकी मूर्ति को लमही भेजना उचित नहीं होगा। भाकपा नेता गिरीश ने कहा-प्रेमचंद की मूर्ति हटाकर लमही ले जाना ठीक नहीं है। वाराणसी से उनका रिश्ता रहा है जिसको देखते हुए शहर के किसी भी चौराहे या पार्क में उनकी मूर्ति स्थापित की ज सकती है। राम कटोरा पार्क में भी यह मूर्ति लगाई ज सकती है जहां प्रेमचंद की मृत्यु हुई थी।
गिरीश ने मुख्यमंत्री मायावती को लिखे पत्र में मांग की है कि वे कहानी सम्राट और प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक अध्यक्ष मुंशी प्रेमचंद की अवमानना करने की कार्रवाई को फौरन रोकें। साथ ही राज्य सरकार की घोषणा के मुताबिक लमही में प्रस्तावित प्रेमचंद शोध संस्थान के लिए तीन एकड़ जमीन जल्द उपलब्ध कराएं ताकि उसका निर्माण जल्द से जल्द पूरा हो सके। गौरतलब है कि इससे निर्माण के लिए नोडल एजंसी बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को दो करोड़ रूपए की धनराशि उपलब्धि करा दी गई। लेकिन राज्य सरकार अभी तक तीन एकड़ जमीन उपलब्ध नहीं करा पाई है। अब तक १.९७ एकड़ जमीन अधिग्रहीत की गई है जिसका हस्तांतरण भी नहीं हो पाया है। इस हालत में मुख्यमंत्री मायावती को फौरन दखल देना चाहिए। प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों और कहानियों में दलित, वंचित और शोषित तबके के सरोकारों को न केवल चित्रित किया बल्कि अपनी लेखनी के माध्यम से उनकी जीवन दशा सुधारने के लिए लगातार आवाज उठाई। इसलिए सरकार को वाराणसी में ही उनकी मूर्ति स्थापित करानी चाहिए।
जेएनयू में 'प्रेमचंद स्मृति व्याख्यान'
September 15, 2010
जेएनयू में 'प्रेमचंद स्मृति व्याख्यान'-- मीता सोलंकी
9 सितंबर, 2010 को भारतीय भाषा केन्द्र, जेएनयू की ओर से तीसरे 'प्रेमचंद स्मृति व्याख्यान' का आयोजन किया गया जिसमें मुख्य वक्तव्य इग्नू के प्रो. जवरीमल पारख और सेंट्रल वक्फ काउंसिल के सचिव डॉ. कैसर शमीम ने दिया और कार्यक्रम की अध्यक्षता हिन्दी के वरिष्ठ कवि प्रो. केदारनाथ सिंह ने की.कार्यक्रम के आरंभ में भारतीय भाषा केन्द्र के अध्यक्ष प्रो. कृष्णस्वामी नचिमुथु ने स्वागत भाषण देते हुए कहा कि ग्लोबलाइजेशन के इस जमाने में जेएनयू ही वो जगह हो सकती है जहां भारतीय भाषाएं अपनी सहयोगी भारतीय भाषाओं और विदेशी भाषाओं से संवाद कर विकास कर सकती हैं और नई जरूरतों के मुताबिक उपयुक्त दिशा हेतु पहल कर सकती हैं. उन्होंने आगे कहा कि 'प्रेमचंद स्मृति व्याख्यान' की तर्ज पर तमिल कवि 'सुब्रह्मण्यम भारती' और उर्दू शायर फैज अहमद फैज पर व्याख्यान और सेमिनार आयोजित करने की योजना है. एक सेमिनार अनुवाद और कल्चरल एक्सचेंज पर करना है. यह हिन्दी के कई बडे रचनाकारों (केदारनाथ अग्रवाल, अज्ञेय, शमशेर, नागार्जुन आदि) का जन्मशताब्दी वर्ष है. इस उपलक्ष्य में भी एक बडा सेमिनार करने की योजना है. प्रो. नचिमुथु ने गोष्ठी के विषय (जब मैंने पहली बार प्रेमचंद को पढा) पर बात करते हुए कहा कि 'गोदान' तथा प्रेमचंद की कहानियों में मुझे वह सब कुछ मिला जो मैंने अपने गांव में अपनी आंखों के सामने घटित होते देखा था. प्रेमचंद के लेखन के इस तरह के संदर्भ ही पाठकों को आकर्षित करते हैं और उन्हें एक बडा लेखक बनाते हैं.
प्रो. जवरीमल पारख ने अपनी पृष्ठभूमि के बारे में बताते हुए बताया कि एक शहरी व्यक्ति होने के बावजूद प्रेमचंद की वजह से उन्हें गांव को समझने का मौका मिला तथा समाज में घटित होने वाले शोषण के विभिन्न प्रकारों की तरफ उनका ध्यान आकर्षित हुआ. उन्होंने प्रेमचंद के लेखन को समाज को बदलने वाली खामोश प्रक्रिया कहा.
डॉ. कैसर शमीम ने कहा कि प्रेमचंद अन्य भाषाओं के साहित्य के परिप्रेक्ष्य में भी देखना चाहिए. प्रेमचंद के लेखन में व्यक्त उर्दू तथा मुसलमानों के प्रति व्यक्त दृष्टिकोण की उन्होंने प्रशंसा की. जिस समय भाषा तथा सांप्रदायिकता के विवाद जारों पर थे, उस समय प्रेमचंद ने एक समतावादी नजरिया पेश किया तथा हिन्दुस्तानी गांव को उर्दू फिक्शन में दिखाया. डा. शमीम ने प्रेमचंद की समाज व साम्राज्यवाद के प्रति सोच की प्रशंसा की.
कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. केदारनाथ सिंह ने अपने कुछ निजी अनुभवों को साझा करते हुए प्रेमचंद को ऐसे साहित्यकार के रूप में याद किया जिन्हें बार-बार पढा जा सकता है. उन्होंने कहा कि जाने हुए को फिर से जानने और बताने की कला प्रेमचंद में थी. प्रो. सिंह ने कहा कि हिन्दी में प्रेमचंद ने साहित्य के सौन्दर्यशास्त्र को बदलने की शुरूआत की. इस संदर्भ में उन्होंने प्रेमचंद की ईदगाह कहानी का जिक्र किया. उन्होंने 'मंत्र' कहानी के संदर्भ में कहा कि प्रेमचंद ने सारे अर्जित ज्ञान के समानांतर एक सहज बोध की अंतर्दृष्टि को ज्यादा महत्व दिया.कार्यक्रम के संयोजक प्रो. रामबक्ष ने प्रेमचंद साहित्य के साथ अपने पहले अनुभव को याद करते हुए बताया कि बालमन में एक लेखक नहीं, बल्कि कहानी के पात्र याद रहते हैं- 'बूढी काकी', 'दो बैलों की कथा', 'बडे भाई साहब' आदि कहानियों के पात्र याद आते हैं. लेखक के रूप में सबसे पहले कर्मभूमि याद आता है, जो मैंने 11वीं क्लास में पढा था. उस समय मुझे ये कहानी काल्पनिक और झूठ लगी थी. बाद में जब मैंने अपना गांव देखा, पडौस देखा, अपना घर देखा, तब मुझे गांव की गरीबी और प्रेमचंद का महत्व समझ में आया. उन्होंने आगे कहा कि प्रेमचंद के लेखन ने गांव को समझने में मदद की और गांव की परिस्थितियों ने प्रेमचंद को समझने में मदद की. प्रो. रामबक्ष ने आगे कहा कि आज प्रेमचंद को पढना और समझना जितना जरूरी है, उतना ही प्रेमचंद से मुक्त होना भी जरूरी है.
भारतीय भाषा केन्द्र के प्राध्यापक गंगा सहाय मीणा ने कहा कि प्रेमचंद को पढने का अनुभव तीन स्तरों पर है- पहला, जब चौथी-पांचवीं क्लास में 'ईदगाह' कहानी पढी और लगा कि यह हमार लोक की, हमारे आसपास की ही कथा है, दूसरा, जब एम.ए. में प्रेमचंद का विशेष अध्ययन करने के दौरान उनकी कहानियों से प्रेरणा लेकर स्वयं उसी तर्ज पर कहानी लिखना शुरू किया और तीसरा, अध्यापन के दौरान प्रेमचंद की सहजता एक बडी चुनौती के रूप में सामने आती है.
भाषा, साहित्य और संस्कृति अध्ययन संस्थान के डीन प्रो. शंकर बसु ने प्रेमचंद साहित्य की रूसी साहित्य से तुलना करते हुए कहा कि जैसे रूसी साहित्य में टॉलस्टॉय और गोर्की ने यथार्थवाद की शुरूआत की, उसी तरह भारतीय साहित्य में यथार्थवाद लाने वाले प्रेमचंद आरंभिक साहित्यकार थे.कार्यक्रम में प्रो. चमनलाल ने धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि वे गांधी और प्रेमचंद की 'हिन्दुस्तानी' वाली परंपरा के हिमायती हैं. उसी परंपरा को आगे बढाने के लिए भारतीय भाषा केन्द्र में 'प्रेमचंद स्मृति व्याख्यान की शुरूआत की गई है. कार्यक्रम में प्रो. शाहिद हुसैन, प्रो. वीर भारत तलवार, डॉ. रणजीत कुमार साहा, डॉ. देवेन्द्र चौबे, डॉ. उल्फत मुहिबा, डा. एन. चंद्रशेखरन सहित बडी संख्या में विद्यार्थी मौजूद थे.
-- मीता सोलंकी, शोधार्थी, भारतीय भाषा केन्द्र, जेएनयू
गुरुवार, 19 मई 2011
लघु समाचार पत्र एवं पत्रकारिता को बचाने के लिए साथ आएं
लघु समाचार पत्र एवं पत्रकारिता को बचाने के लिए साथ आएं
साथियों अब समय आ गया है कि मीडिया के अस्तित्व को सरकारी नियमों के जाल में उलझने से बचाने की लड़ाई को लड़ा जाये। मेरे मन में गत एक वर्ष से मंथन चल रहा था। प्रेस मान्यता से लेकर विज्ञापन मान्यता में इतने अड़ंगे कि शायद ही कोई सच्चा पत्रकार इनसे पार पा सके। पत्रकारिता को मैंने और शायद हर सच्चे पत्रकार ने मिशन से जोड़ा है। समाज के अंतिम व्यक्ति की लड़ाई को लड़ने का संकल्प लेकर कम वेतन के बाबजूद पूरी शिद्दत से 24 घंटे कड़ी मशक्कत करने वाले पत्रकारों को सेवानिवृत्ति में क्या मिलता है। इसकी जानकारी हम सभी को है।
किसी बड़े नामचीन बैनर में काम करने वाले पत्रकार भी शायद मेरी बात से सहमत होंगे कि तमाम पत्रकार यूनियनों ने पत्रकारिता में सच की स्थापना के लिए कोई संघर्ष नहीं किया। जिस मान्यता को मीडिया के पास चलकर आना चाहिए था। उसे लेने के लिए पत्रकारों को दर दर की ठोंकरे खानी पड़ती हैं। कोई स्ट्रिंगर कहलाता है तो कोई संवादसूत्र। पत्रकारिता के लिए सरकारी सुविधाएं या तो पूर्णतयाः बंद होनी चाहिए, या उसका लाभ इस मिशन से जुड़े हर व्यक्ति को मिलना चाहिए। शायद ही कोई पत्रकार मेरी इस बात से असहमति रखता होगा।
नामचीन बैनर के अखबारों के मालिकों को पत्रकार या सम्पादक का दर्जा देना शायद ही उचित रहेगा, क्योंकि शायद ही उनकी कलम अखबार की रिर्पोटिंग के लिए उठती हो। डीएवीपी एवं तमाम राज्यों के सूचना जनसम्पर्क विभागों की नीतियों का अवलोकन करने के बाद कम से कम मुझे यह लगता है कि हमें एक ऐसे संगठन की जरूरत है, जो प्रेस मान्यता एवं विज्ञापन मान्यता में नियमों के जाल को काटने के लिए सरकार को विवश कर सके। अकेला चना भाड़ नहीं झोंक सकता, लेकिन इतना जरूर है जब चनों की बोरी एकत्र होगी तो जरूर बदलाव आयेगा।
इस एक फरवरी को मुरादाबाद मंडल के लघु समाचार पत्रों के स्वामियों/सम्पादकों के साथ चर्चा कर हमनें लघु समाचार पत्र हित रक्षक समिति के गठन का निर्णय लिया है। समिति की सदस्यता सभी पत्रकारों के लिए खुली रहेगी। हमारे संगठन के बिंदु निम्न हैं। फरवरी में ही समिति इन मुद्दों को लेकर देशभर के मीडिया जगत में जागरूकता लाने के साथ डीएवीपी एवं सूचना प्रसारण मंत्रालय की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन करेगा। हमारा आपसे अनुरोध है कि इस मुहिम में आप साथ आयें और कारपोरेट बनती जा रही मीडिया को फिर से मिशन के रूप में स्थापित करने में अपना योगदान दें। आप मेरी ईमेल आईडी genxmbd1@gmail.comThis e-mail address is being protected from spambots. You need JavaScript enabled to view it पर अपने विचार, सम्पर्क सूत्र भेज सकते हैं। हमारी प्रमुख मांगें होंगी-
1- लघु समाचार पत्रों के लिए पत्र के आकार की न्यूनतम सीमा को सामाप्त किया जाये।
2- विज्ञापन मान्यता के लिए प्रसार संख्या को आधार न बनाया जाये।
3- 100-1000 अखबारों का प्रकाशन करने वाले लघु समाचार पत्रों को विज्ञापन मान्यता प्रदान की जाये।
4- आरएनआई से समाचार पत्र का रजिस्ट्रेशन मिलने के साथ ही शासकीय विज्ञापन एवं प्रेस मान्यता प्रदान की जाये।
5- डिस्प्ले विज्ञापन का 80 फीसदी हिस्सा लघु समाचार पत्रों एवं 20 फीसदी हिस्सा बड़े समाचार पत्रों को दिया जाये।
6- लघु समाचार पत्र के सम्पादक हेतु शैक्षिक योग्यता एवं रिर्पोटिंग का अनुभव अनिवार्य हो।
7- जिला, राज्य, समूचे देश में कार्यरत पत्रकारों को सूचीबद्ध किया जाये।
8- लघु समाचार पत्रों पर न्यूज एजेंसियों की बाध्यता को खत्म किया जाये।
9- समाचार पत्र की समीक्षा उसके क्षेत्रीय समाचारों के आधार पर की जाये।
10- प्रेस मान्यता के जिला स्तर पर सूचना विभाग द्वारा कार्यरत पत्रकारों का पंजीकरण किया जाये। एक वर्ष के कार्यानुभव के आधार पर स्वतः ही जिलाधिकारी स्तर से प्रेस मान्यता सम्बन्धित संस्थान के पत्रकार को प्रदान की जाये।
11- लघु दैनिक, साप्ताहिक एवं अन्य प्रकाशनों के सम्पादकों एवं छायाकारों को आरएनआई पंजीकरण एवं नियमितता के आधार पर वार्षिक प्रेस मान्यता प्रदान की जाये।
12- लघु दैनिक, साप्ताहिक एवं अन्य प्रकाशनों के सम्पादकों को शासन की ओर से प्रतिमाह 20000/ मानदेय प्रदान किया जाये।
लेखक मोहित कुमार शर्मा मुदाराबाद से प्रकाशित दैनिक न्यूज ऑफ जेनरेशन एक्स के संपादक
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