गुरुवार, 5 अगस्त 2021

अनामी शरण बबल / महेंद्र सिंह टिकैत

 टिकैत के साथ ही खामोश हो गयी किसानों की आवाज




अनामी शरण बबल



मई 1990 की बात है, मैं किसी रिपोर्ट के सिलसिले में मेरठ गया था। किसी पत्रकार ने ही मुझे बताया कि पिछले दो सप्ताह से किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत जिला अस्पताल में भर्ती है। कहीं गिर जाने से पैर की हड्डी टूट गयी थी। मामला थोड़ा टिकैत का है इस कारण अस्पताल में पत्रकारों को जाने की अनुमति नहीं है। मेरठ से काम निपटा कर मुझे रात मुजफ्फरनगर में काटनी थी और अगले दिन शाम तक सहारनपुर पहुंचना था। एकदम टाईट कार्यक्रम के बावजूद मुझे लगा कि जब मेरठ में हूं तो टिकैट से मिले बगैर जाना ठीक नहीं। इसका टिकैत जी पर भी ज्यादा प्रभाव पड़ेगा और अपन रिश्ता भी सरस सरल और स्नेहिल सा हो जाएगा।

 अभी मैं अस्पताल के गेट पर ही था कि तीन चार साथियों के साथ टिकैत पुत्र राकेश टिकैत पर मेरी नजर पड़ी। राकेश को देखते ही मेरा मन खिल गया और लगा कि अब टिकैत से मिलना तो हो ही जाएगा। चाय रस और समोसे खा रहे राकेश एंड पार्टी के पास पहुंचते ही मैने सीधे पूछा कि बाबूजी अब कैसे है एकाएक मेरे को गौर से राकेश देखने लगा। मैने तुरंत कहा यही तो दिक्कत है राकेश जी कि लिखना याद करना और रखना भी हम पत्रकारों के ही जिम्मे है क्या? दिल्ली और शामली में दो तीन बार मिला था। मेरी बाते सुनकर राकेश खुशी से चहकते हुए कहा हां हां बाबूजी के साथ आपको कई बार देखा था। मैने तुरंत कहा कि कल शाम को ही मुझे दिल्ली में पता लगा कि बाबूजी बीमार हैं तो सोचा कि एकबार मिल आना चाहिए। मेरी बात सुनते ही राकेश मुझसे लिपट गए और हैरानी से कहा केवल बाबूजी को देखने आए हो आप ?   हंसते हुए मैने कहा राकेश जी बिहारी हूं लिहाजा यह भी नहीं कह सकता कि मेरठ कोई अपना ससुराल है। हंसी मजाक के बीच उनलोग के साथ चाय पी और राकेश के साथ सीधे महेन्द्र सिंह टिकैत के आरामदायक कमरे में ले जाया गया। दर्जनों लोगों की भीड़ कमरे के बाहर खड़ी थी तो घर की तीन चार महिलाएं बेड के आस पास में खड़ी थी।

टिकैत को नमस्कार करके एक कुर्सी पर बैठते ही उनके एक हाथ को लेकर हाल चाल पूछा। अपनी याद्दाश्त पर जोर देते हुए टिकैट ने कहा इधर भी आ गया छोरा ( महेन्द्र सिंह टिकैट से जब मैं पहली बार मिला था उस समय मेरी उम्र 22 साल की थी और वे तभी से वे मुझे नाम लेने की बजाय केवल छोरा ही कहते रहे)। राकेश टिकैत ने अपने बाबूजी को बताया कि ई केवल आपसे मिलने आए है, इनको दिल्ली में कल ही पता चला कि आप अस्पताल में हो। उठने बैठने से लाचार होने के बाद भी अपने बेटे से मेरे बारे में इन बातों को सुनकर वे गदगद हो गए। उनकी आंखे सजल हो गयी और मन ही मन मैं अपना दांव एकदम सही बैठने पर खुश हो रहा था। इनकी झलक पाने के लिए सैकड़ो लोग अंदर बाहर खड़े थे। मगर मैं अंदर एक घंटे तक बैठे बैठे इनके उदय से लेकर भावी दशा दिशा रणनीति से लेकर किसानों के स्थायी लाभ आदि पर बहुत सारी बातें की। भारतीय किसान यूनियन के भीतरघात पर भी कुछ हाल सवाल करता रहा। चूंकि मैं लिख नहीं रहा था लिहाजा बहुतों को इंटरव्यू सा नहीं लगा. और मैं ढाई तीन घंटे तक अस्पताल में रहते हुए थोकभाव से मौजूद किसान नेताओं से बाते करके भावी कार्यक्रमों पर जानकारी ले ली।

अस्पताल से बाहर निकला तो लगभग चार बज गए थे। मुझे अब सहारनपुर या मुजफ्फरनगर जाने से ज्यादा उचित दिल्ली लौटना ही लगने लगा, ताकि इस इंटरव्यू को कल दोपहर तक देकर अगले दिन बाजार में आने वाले अंक में इंटरव्यू छप जाए। बस में बैठा में इंटरव्यू की रूपरेखा बना ली और रात में दिल्ली लौटते ही मैने पूरे एक पेज के लंबे इंटरव्यू को देर रात तक जागकर रात में ही लिख डाला। अगले दिन शुक्रवार को सुबह सुबह दफ्तर में जाकर इंटरव्यू डेस्क पर दे पटका। इंटरव्यू देखकर हमारे संपादक श्री सुधेन्दु पटेल और मुख्य समाचार संपादक श्री कृष्ण कल्कि की आंखों में चमक आ गयी। अगले दिव मैं सहारनपुर हरिद्वार के लिए निकल गया। जबकि मेरे अनुरोद पर चौथी दुनिया की एक सौ प्रति खास तौर पर टिकैतों के लिए मेरठ भिजवा दी गयी। करीब चार दिन में इधर उधर हर जगह का हाल खबर लेकर वाया मुजफ्परनगर होते मेरठ लौटा। कई पुलिस अधिकारकियों से बातचीत के बाद मैं एक बार फिर मेरठ अस्पताल चला गया, तो इस बार यहां का नजारा ही बदला हुआ था। चौथी दुनिया साप्ताहिक अखबार की धूम थी। मेरठ होते दिल्ली से भी सैकड़ों कॉपी मंगवाकर अपनी जरूरतें पूरी की। राकेश से मुलाकात तो नहीं हो सकी मगर मैं दो पल में ही टिकैत के सामने था। मुझे देखते ही वे सीनियर टिकैत चीख पड़े अरे छोरा बिना लिखे ही कागज पर तूने तो मेरी सारी बात लिख डाली। हंसते हुए उन्होने कहा केवल मुझै ही नहीं सबौ को तेरा लिखा बहुत पसंद आया है । किसी से कहकर टिकैत ने मुझे अपने घर के दो जमीनी नंबर (लैंड लाईन नंबर) लिखकर देते हुए कहा कि जब तुम्हें आना हो तो फोन कर देना तो शामली से आने की व्यवस्था करा दी जाएगी।


मेरठ में स्वास्थ्य लाभ कर रहे टिकैत पर मेरा यह उल्लेख थोड़ा लंबा हो गया है मगर इसी एक घटने के बाद मैं महेन्द्र सिंह टिकैत से अपने संबंधों समेत उनके स्वभाव और कारिंदों पर भी पर बात करूंगा। मैं भारतीय जनसंचार संस्थान नयी दिल्ली 1987 में आने से पहले तक टिकैत का केवल नाम भर ही सुना था। मगर 1987 में दिल्ली वोट क्लब पर चक्का जाम करके संसद से लेकर नयी दिल्ली को पूरी तरह ठप्प कर दिया। मेरठ मुजफ्परनगर बागपत समेत पूरे पश्चिमी यूपी में किसान हितों को मुद्दा बनाकर लखनऊ तक को हिला डाला। और 1987 से 1990 के तीन सालों मे भारतीय किसान यूनियन ने लगभग एक दर्जन शहरों में किसान आंदोलन धरना प्रदर्शन करके देश भर में छा गए। 1987 से लेकर 2011 कर इनसे मेरी कमसे कम दो दर्जन बार मुलाकात हुई होगी। ज्यादातर मुलाकात तो संसद मार्ग थाना नयी दिल्ली के सामने बैरिक्रेटस के पास होती थी । इतनी भीड़ में भी हाल चाल नमस्ते के बाद दो चार बातें इनसे जरूर हो जाती थी।

समय सूत्रधार पाक्षिक मैग्जीन के लिए मुझे टिकैट के गांव सिसौली 1992 में जाना पड़ा। रह रहकर हंगामा मचा देना या यों कहे कि जब पेपर में लोग बाग नाम भूलने लगे तो टिकैत एंड कंपनी द्वारा फिर कहीं कोई हंगामा मचा दिया जाता। एक तरह से महेन्द्र टिकैट को लोग जाति से जाट की बजाय जाम टिकैट नेता हंगामेदार नेता औरकबी कभी दूसरों के कहने पर चलने वाले मूर्ख नेता का भी तगमा दे डालते। पुलिस प्रशासन बी इनसे थोड़ा कांपती थी। म्रठ के एकवरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने कहा कि टिकैत थोड़ा सनकी है अगर एक बार सनक गए तो इनको मनाना सरल नहीं ।


बागपत्त सहारनपुर के रास्ते शामली तक तो मैं आ गया मगर राकेश टिकैत से बात नहीं होने का खामियाजा मुझे चिलचिलाती धूप में कई किलोमीटर तक पैदल चल कर चुकाना पड़ा। गांव सिसौली थाना भौरांकला पड़ता है। बीच रास्ते में यहां के थानेदार अपनी मोटर साईकिल पर सवार मिल गए। रास्ते में गुजर रहे थानेदार को मैने हाथ देकर रूकवाया तो दरियादिल सिपहिया रूक गया। जब मैने बताया कि मुझे टिकैत के यहां गांव सिसौली जाना है तो एकदम पूरे अदब के साथ लिफ्ट देते हुए सीधे महेन्द्र सिंह टिकैट की कोठी के बाहर तक न केवल पहुंचाया बल्कि मुझे लेकर सीधे एक हॉल में ले गया जहां पर 50-60 किसानों का एक दलबल गप्प शप्प के साथ हुक्के गुड़गुड़ा रहा था। मुझे देखते ही टिकैत ने बिन फोन किए आने पर हैरानी प्रकट की। मैने शिकायती लहजे में कहा कि फोन है या कटवा दी आपने। दो दिन से घंटी बजाते बजाते मेरे हाथ थक गए।  मेरी बात सुनते ही वे दूरभाष विभाग को भला बुरा कहने हुए बताया कि दो सप्ताह से दोनो फोन काम नहीं कर रहे है।

मैने सोचा यही मौका है जरा इनको गरम पानी में  उबाला जाए. मैने हंसते हुए कहा मैं समझ गया दद्दा अब सत्ता और ई फोनवा वालो को अब आपसे डर लगना बंद हो गया है। कहां तो लखनऊ हिलाते थे और अब आपके गांव का ही कोई कर्मचारी भय नहीं खाता। ई सब आपको परख रहे है कि गरमी बाकी है या....?????
 मेरी बात सुनते ही दर्जनों जाट आपस में ही हां हां करने लगे। कहां मर गयौ कहते हुए हाल में बैठे कुछ नौजवान जाट पुत्रो ने अपनी मोटरसाईकिल से निकाल कर गांव में तलाशी चालू कर दी। मैं थानेदार के साथ हाल में बैठा रहा। इस बीच छाछ का सेवन किया गया।
यहां पर एक रोचक प्रसंग लिखना मुझे जरूरी लग रहा है। थानेदार ने मुझे बाहर चलने का संकेत किया। उसके साथ मैं भी बाहर बरामदे में था। थानेदार ने टिकैत के साथ मेरे मेलजोल वाले रिश्ते को देखकर बिनती की। बकौल थानेदार यार लखनऊ का हूं और चार साल से यहीं पर टंगा हूं। केवल टिकैत जी के नहीं चाहने से मेरा तबादला रूका पड़ा है। हमारे कप्तान (एसएसपी) ने कह रखा है कि तेरा केस स्पेशल है, टिकैट चाहते हैं कि तबादला ना हो। उसने कहा कि यार बड़ी मेहरबानी होगी मेरे लिए आप सिफारिश कर दो न। हम दोनों को कानाफूसी करते देख टिकैत ने मुझे हांक मारी इधर आ जा आजा। मुस्कुराते हुए टिकैत ने मुझसे पूछा अपने बदली (ट्रांसफर) का पौव्वा लगवा रहा है न। टिकैट ने कहा कि यह सबों को एकदम घर सा मान देता है और कितना भला है यह तुम देख ही रहे हो। मगर यह भागना चाहता है यहां से। मैने थानेदार का पक्ष लेते हुए कहा कि इसको गौशाला में बांध कर रखा करे। एकदम फालतू होकर पालतू बन गया है। मेरी बात सुनकर टिकैत चौंक से गए कि बोले ? मैने थानेदार का ही पक्ष रखा इसको पुलिसिया ही बने रहने दो दद्दा डांगर ना बनाओ । इसके भी बाल बच्चे और मेहरारू है। आप समझ रहे हो न ? एक तरफ मेरी बाते सुनकर कई जाटों में भी थानेदार के प्रति सहानुभूति जाग गयी। थानेदार ने मेरे प्रति आभार जताया कि बस मैं अब अपना काम करवा लूंगा?

करीब एक घंटे में तीन फोन कर्मचारियों को अपने साथ धर पकड़ कर जाट युवकों का दल कमरे में दाखिल हुआ। टिकैत की फटकार के बाद देखते ही देखते दो सप्ताह से बेकार पड़े फोन मेरे आते ही घनघनाने लगे। इस खुशी में किसी ने सबों को खाने के लिए लड्डू देना चालू कर दिया। फोन के जिंदा होने पर टिकैत खुश हो गए छोरा तू तो बड़ा मस्त है जब आता है तभी मन में एक छाप दे जावै (जाता है)।

दिल्ली और लखनऊ के नेता अक्सर सिसौली में आकर टिकैत को अपने पाले में रखते थे, मगर बहुजन समाजवादी पार्टी की बहिन जी मायावती से इनकी भिंडत  कांटे की रही। आरोप लगा कि टिकैत ने बहिनजी को जातिसूचक गाली दी थी। जिससे खफा होकर सिसौली गांव को छावनी में बदल दिया गया। टिकैत की गिरप्तारी के आदेश पर आदेश जारी हो रहे है तो दूसरी तरफ हजारों जाट किसान गोताखोर की तरह दलबल और बंदूकों के साथ पुलिसिया कार्रवाई की छिपकर प्रतीक्षा करते रहे। चारो तरफ तनाव ही तनाव और कुछ भी होने की आशंका देर सबेर गिरफ्तारी करके हेलीकॉप्टर से टिकैत को ले जाने की तमाम योजनाओं को पूरा करने के लिए तैयार यूपी पुलिस फौज की तैनाती के बाद भी मुख्यमंत्री मायावती को अपनी जिद्द और दंभ त्यागना पड़ा। सरकार इसके लिए हिम्मत नहीं जुटा सकी। और खून खराबा के एक हिसंक काले अध्याय की पटकथा अधूरी रह गयी। यूपी में 2012 विधानसभा चुनाव में एकाएक बसपा के मतदाता इस तरह उखड़े कि बहिनजी का भी हाल खराब हो गया। 2017 विधानसभा चुनाव सामने है और बसपा के जनाधार की भी अग्निपरीक्षा बाकी है कि अब टिकैत के बिना बसपा का क्या  होगा ?  


भूमि अधिग्रहण गन्ना किसानों का अरबों का बकाया और भुगतान के लिए चीनी मील मालिको की नमक हरामी भी टिकैट के सामने नहीं चली। लंबित भुगतान बैंकों के उत्पीडन किसान खुदकुशी अकाल बिजली बिल पानी की सही आर्पूर्ति और कर्ज माफी आदि दर्जनों मामले इस तरह के थे कि भारतीय किसान यूनियन को चैन की वंशी बजाने का कभी मौका नहीं मिला। इन तमाम समस्याओं को हवा देकर टिकैत सरकार और नौकरशाहों के लिए एक चुनौती बन गए। जिसे नाथ पाना किसी के बूते में नहीं था। एक आह्रवान पर चार छह घंटे में एक लाख से भी अधिख जाटों या किसानो को बुलाकर अपनी बात मनवा लेना ही टिकैत का तिलिस्मी जादू था। जो 2011 मे उनके निधन के साथ ही यह चमत्कार भी लुप्त हो गया या यों कहे कि इनकी मौत के साथ ही किसानों की आवाज भी सदा सदा के लिए खामोश हो गयी। टिकैत से बगावत करके और भाकियू को कई फाड़ कर कर के टिकैत सा ही धारदार बनने के लिए लालयित कई नेताओं में से किसी एक ने भी आगे बढने का कोई प्रयास तक नहीं किया। एक दो दिन में लाखों करोड़ो रूपये खर्च करने वाले यूपी के जाटों की माली हालत अब करोड़ों की हो गयी है मगर आधुनिकता की मार कहें या फैशनपरस्ती  कि  इन किसानों के हल कुदाल और पाटा की तरह ही किसानों की नयी नस्लें धरना प्रदर्शन आंदोलनों की धार के साथ ही किसान नेता महेन्द्रसिंह टिकैत को भी भूल से गए।














































अनामी शरण बबल / विजय गोयल

 विजय गोयल के पाले में गेंद


अनामी शरण बबल


उम्र के 62 बसंत में भी दिल्ली के सबसे तेजतर्रार और आप के लिए खिलाफ सबसे बड़े योद्धा साबित हुए भाजपा नेता विजय गोयल को अंतत:मोदी सरकार में शामिल कर ही लिया गया। दिल्ली में खुश होने वाले से कहीं ज्यादा बड़े जन समुदाय को यह रास नहीं आया होगा। हालांकि आप के खिलाफ भाजपा के विद्रोही तेवर के चलते का ही इनको यह पुरस्कार मिला है। वाजपेयी आडवाणी कैंप के हनुमान होने के कारण ही गोयल को मोदी कैंप में अपनी जगह बनाने में काफी समय लगा। मगर गोयल की निष्ठा पर किसी को संदेह नहीं। मोदी के बारे में श्री गोयल का यह बयान काफी लोकप्रिय रहा जब मोदी को भी महात्मा गांधी की तरह ही सावरमती का संत घोषित कर डाला। इसकी बड़ी चर्चा हुई। मगर मोदी जी को यह टिप्पणी जरूर रास आयी होगी। इसी तरह दिल्ली से पार्टी का एक आक्रामक चेहरे को प्रमोट करके श्री गोयल के काम को मोदी ने नवाजा है।
दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष रहे चरती लाल गोयल के पुत्र विजय गोयल को भले ही राजनीति विरासत में मिली हो मगर उन्होने अपने संघर्ष और योद्धापन के चलते ही लंबे सफर के राही बने। 1995-96 दिल्ली की राजनीति में एक साथ तीन नेताओं का उदय हुआ। कांग्रेस खेमे से महाबल मिस्र ( पार्षद और सांसद) और रमाकांत गोस्वमी (हिन्दुस्तान अखबार के चीफ रिपोर्टर से कांग्रेस विधायक और मंत्री) तथा भाजपा खेमे से विजय गोयल ।
लॉटरी (बाजी) टिकट की बिक्री के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले युवा नेता ( 40-42की उम्र होगी) विजय गोयल की सफलता की कहानी को सामने रखना तो और भी जरूरी है । और देश में लॉटरी का धंधा चौपट हो गया तो इसके पीछे भी गोयल की ही भूमिका रही है। महज 10 साल के भीतर लॉटरी नेता से सांसद और कैबिनेट मंत्री तक बनने वाले विजय गोयल की परियों जैसी सफलता की कहानी के पीछे दिवंगत नेता प्रमोद महाजन की हर प्रकार की भूमिका रही है। दिवंगत प्रमोद महाजन की वजह से भी आसमानी सफलता हासिल करने वाले गोयल कभी दिल्ली विवि डीयू के तेजतर्रार नेता भी रहे हैं।
अखबार के दफ्तरों में अपने प्रेस नोट्स लेकर ठीक से छापने के लिए अक्सर अनुनय विनय और प्रार्थना करने वाले गोयल का रिश्ता हम पत्रकारों से सांसद बनने तक तो ठीक रहा । वे हम पत्रकारों के संपर्क में भी लगातार रहे, मगर पीएम अटल बिहारी वाजपेयी कैबिनेट में मंत्री बनते ही गोयल भाजपा के वरिष्ठ मंत्री बनकर हम पत्रकारों से ही परहेज करने लगे। शायद वे यह भूल गए कि हम पत्रकार तो चींटी की तरह होते है काम भला हो या बुरा हर जगह बेरोकटोक चींटी आ ही जाता है। चींटी किसी का सगा नहीं होता।
मंत्री पद से उतर जाने के करीब 12 साल तक श्री गोयल ने दिल्ली में की सड़कों पर धमाल चौकड़ी की, तब कहीं जाकर वे प्रधानमंत्री के गुडबुक में दाखिल हुए। दो एक बार श्री गोयल को इस बात को लेकर मुझसे बड़ी आपति हुई कि क्यों मैं उनके बारे मे बार बार कहीं कभी कुछ लिखा तो लॉटरीनेता जरूर जोड़ा। जब मेरी उनसे तकरर सी होते होते बची यह कहने पर कि सहारा आज भी 2000 से 20 हजर करोड़ की संपति का उल्लेख क्यों करती है ताकि इससे लोगों के दिमाग में मैप उभरे कि किस छोटे से आरंभ सफऱ किस तरह बड़ी मंजिल तक गयी है। यदि मैं चरती लल गोयल के बेटे को फोकस करूंगा तो लोग बाग यही समझेंगे कि यह बाप बेटे का पुश्तैनी खेल है। मग मैं लॉटती नेता लिखकर तो तुम्हारी ही छवि में चांद लगा देता हूं । अब चांद को चार चांद बनाना लगाना साबित करना विजय गोयल का काम है। और रही बात चीखने चिल्लाने की तो एक पत्रकार ही तो आईना दिखाता है। हमलोग तो एक रेलवे प्लेटफॉर्म की तरह होते है । जो भी जितन भी बड़ा हुआ है और बड़ी दूर तक गया तो भी वो सब पत्रकारों के घुटने के नीचे होकर ही। मेरी बात सुनकर गोयल शांत हुए और बात खत्म हो गयी। एक लंबे अंतराल के बाद केंद्रीय मंत्री बने गोयल के सामने यह एक नायाब मौका है कि वो दूसरों से बेहतर साहित करे, क्योंकि जिन उम्मीदों के साथ मोदी ने दिल्ली के सांसदों को मंत्री बनाया था उसमें कोई भी दो साल में जनता के साथ साथ मोदी की कसौटी पर भी खऱे नहीं उतरे है। चतुर प्रधानमंत्री ने श्री गोयल के पाले में गेंद डाल दी है। अब देखना यह है कि वे किस तरह खुद को औरों से बेहतर साबित करते हैं या....

पापा की तस्वीर


अनामी शरण बबल / ग्राहक बनकर कमरे में बैठा रहा

 जब ग्राहक बनकर कमरे में बैठा रहा / अनामी शरण बबल




 यह अपने बिंदासपन और एक पत्रकार होने के कारण ही मैंने नगर सुदंरियों के हाव भाव और जीवन को जानने की ललक की आपबीती लिखी। अभी तक छह किस्तों में अपने मेलजोल की लीला को मस्त तबीयत के साथ बखान भी किया । यदि मैं पत्रकार नहीं होता तो निसंदेह एक सामन्य नागरिक की तरह ही मैं भी अपनी इमेज और इज्जत (?) बचाने की जुगत में ही 24 घंटे लगा रहता। यदि मैं इन सुदंरियों और कोठे का दीवाना भी रहा होता तो भी अपनी इस बहादुरी पर पूरी बेशर्मी से ही पर्दा डालकर शराफत का नकाब पहने रहता। मगर किसी भी अपने सच को लंबे समय तक छिपाना मेरे लिए असंभव है। यह अलग बात हैं कि मेरे भीतर मेरे बहुत सारे दोस्तों के जीवन का काला सच छिपा है। मेरे उपर भरोसा करने वाले इन तमाम लोगों या परिचितों का मैं शुक्रगुजार हूं कि बातूनी स्वभाव के बाद भी मेरे उपर यकीन किय। और मैं भी जानता हूं कि इनका सच भी मेरे शव के साथ ही लोप हो जाएगा। अपने इन मित्रों ( जिनमें कई अब कहां हैं यह भी नहीं जानता) मेरे दो टूक बोल देने या साफगोई के कारण ही कोई महिला मित्र मेरे को नसीब नहीं हुई। और जो मेरी जीवनसाथी है वो भी अक्सर मेरी इसी साफगोई से ही तंग परेशान रहती है।
यहां पर मैं चाहता तो सुदंरियों की एक और किस्त बढा सकता था जिसमें दिल्ली के उन इलाकों की खबर ली जाती, जिसमें लड़किया औरतें ही खुलेआम सड़कों पर यारों की तलाश करती है। मगर इन इलाकों में मैं पिछले काफी समय से गुजरा नहीं हूं लिहाजा जमाना बदलने के साथ साथ और क्या क्या नफासत और ट्रेंड बदला या जुड़ा है इसकी अप टू ड़ेट रपट नहीं दी जा सकती थी। लिहाजा इसे कभी श्रृंखला 8 के लिए रख छोड़ते है। आज श्रृंखला सात में मैं खुद को ही नंगा कर रहा हूं। दूसरों को तो नंगा या बेनकाब करना तो सरल होता हैं मगर खुद को बेनकाब करना आसान नहीं होता। वेश्याओं के बारे में जब मैने जमकर रसीली बातें की हैं तो जरा अपना भी तो रस निकले। इस खबर कहें या रपट कहें या जो नाम दें जिसको मैं आज लिख रह हूं तो इसी के साथ मेरे मां पापा मेरी पत्नी बेटी सहित मेरे सभी छोटे भाईयों और इनकी पत्नी सहित बच्चों को भी पता चलेगा कि बड़े पापा क्या वाकई आदर इज्जत और सम्मान के लायक है ?  मेरे परिवार के सभी मेरे बड़े पापा चाचा मामा मामी  मेरे बड़े भैय्या भाभी और बच्चों समेत मेरी सास मां सहित मेरे भरे पूरे परिवार में भी मेरे  इस नंगई  का पर्दाफाश होगा कि पत्रकारिता का यह कौन सा चेहरा है ?अपने पाठकों सहित सभी चाहने वालों से यह उम्मीद करता हूं कि वे अपनी नाराजगी ही सही मगर अपने आक्रोश को जरूर जाहिर करे ताकि अगली बार इसी तरह की कोई रिपोर्ट करने के खतरे को भांपकर मैं ठहर जाउं। खुद को रोक लूं या अपने उपर काबू कर सकू कि हर हिम्मत सामाजिक तौर पर सही नही  होता। मैं अपने समस्त परिचितों से क्षमा मांगते हुए श्रृंखला सात को प्रस्तुत कर रहा हूं। आप चाहें तो कोई टिप्पणी नहीं भी कर सकते हैं क्योंकि कोई भी बहादुरी या सूरमा बनने के लिए जब किसी की सहमति अनुमति नहीं ली हैं तो फिर कमेंट्स के लिए प्रार्थना क्यों  ? 

यह घटना 2003 की है। वेश्याओं पर इतनी और बहुत सारे कोण से खबर करने और उनके दुख सुख नियति पीड़ा और दुर्भाग्य को जानने के बाद भी मुझे लगा कि अभी भी इन पर एक कोण से रपट नहीं किया जा सका है, और इसके बगैर इन लिखी गयी किसी भी बात का शब्दार्थ नहीं है। तभी मुझे लगा कि एक ग्राहक बनकर अकेले में उसके हाव भाव लीला को जाने बिना तमाम किस्तें बेमनी और केवल शब्दों की रासलीला में अपनी चमक दमक दिखाने से ज्यादा कुछ नहीं है। सूरमा बनकर तो बहुतों से बात की और रसीली नशीली बातें करके तो  मैं इन कोठेवालियों को भी मुग्ध कर डाला, मगर अपनी असली परीक्षा अब होने वाली थी। बहुत सारे कोठे और वेश्याओं और उनके घर को जानने के बाद भी ग्राहक बन कर कहां चला जाए ?इस समस्या के समाधान के लिए मैंने शाहदरा के एक पोलिटिकल मित्र को साथ चलने के ले राजी किया। इस किस्त को लिखने को लिखने से पहले मैं खास तौर पर शाहदरा में जाकर उसे मिला और नाम लिखने को बाबत पूछा।एक पल में ही सहर्ष राजी होते हुए उसने कहा अरे अनामी भाई जब तुम अपना नाम दे रहे हो तो कहीं पर भी मेरा नाम डाल सकते हो। उसके इस प्रोत्साहन पर मैं एकदम नत मस्तक हो गया तो हंसते हुए मेरा मित्र दर्शनलाल ने कहा कि मेरी पत्नी को मुझसे ज्यादा तुम पर भरोसा है कि जब अनामी भैय्या होंगे तो मैं चाहकर भी बहक नहीं सकता। 


अब समस्या थी कि जाए तो कहां जाए ?मेरे मित्र अपने कुछ रंगीन दोस्तों से सलाह मशविरा करने लगा। कईयों ने हम दोनों की खिल्ली भी उड़ाई कि अब कोठा पर जाने का जमाना कहां रह गय है। जब चाहो और  जहां चाहों किसी भी जगह कॉलगर्ल आ जाएगी। मैने कहा कि कॉलगर्ल कहां मिलेगी क्या इसकी जानकारी केवल उसी को हैं मगर हमें कोठे पर ही जाना है वेश्याओं कहो या रंड़ियों के पास। हाई फाई मौजी लड़कियों पर कभी काम किया तो बाद में मगर अभी केवल कोठा पर जाना है। मेरे मित्र दर्शनलाल ने कई दिनों के होमवर्क के बाद जीबीरोड के कुछ कोठे का हाल चाल पता लगा लिया। इस पर मैंने उन दो चार कोठे पर नहीं जाने के लिए कहा जहां पर कुछ  वेश्याओं नें मुझे गर्भवती बताकर ले गयी थी। दर्शनलाल ने यह कह रखा था कि कमरे में केवल तुम्हें जाना हैं, मैं बाहर बैठकर तब तक आंटियों और खाली लड़कियों को कुछ खिलाउंगा ।  छत पर जाने के साथ ही एक आंटी सामने थी।  मेरे मित्र ने कह कि यह मेरा दोस्त हैं और पहली बार यहां आया हैं सो इसकी हिम्मत नहीं हो रही थी तो मैं केवल साथ भर हूं। आंटी निराश सी हो गयी तो मेरे मित्र ने कहा तू उदास क्यों हो रही हैं कीमत से ज्यादा मैं खर्च मैं तुमलोग के साथ चाय पानी पर करूंगा।  मेरे समने हर तरह की करीब 10 वेश्याएं आकर खड़ी हो गयी। कुछ तो वाकई बहुत सुदंर चपल चंचल तेज और मर्दमार सी ही दिख रही थी। मगर इन्ही भीड़ में ही एक सबसे सामान्य संवली नाटी और किसी भी मामले में अपनी साथिनों के बीच नहीं ठहरने वाली मायूस और मासूम सी उदास लड़की दिखी।  मैने उसकी तरफ अंगूली कर दी, तो सारी लड़कियं एक साथ ठठाकर हंस पड़ी।  दो एक उस लड़की पर कटाक्ष किया अरे वंदना तू भी किसी की पसंद बन सकती है। आंटी मेरी तरफ देखने लगी और बोली हो जाता है हो जाता है तू चाहे तो फिर किसी को पसंद कर ले। मैने फौरन कहा क्यों ?  क्या कमी है इसमें । इसमें जितना सौंदर्य और आकर्षण हैं यहां पर खड़ी और किसी में कहॉ ?  सब आंख नाक मुंह और छाती उठाकर अपने को बिकाउ होने का बाजा बजा रही थी। मगर यहां पर यही तो केवल एक इस तरह की मिली जो एकदम शांत और अपने शारीरिक मानसिक सुदंरता का बाजार नहीं लगा रही थी।  आंटी ने 30 मिनट का समय और ढाई सौ रूपये कीमत का ऐलान किया। मेरे दोस्त नें पांच सौ रुपये का एक नोट निकाला और आंटी की गोद में यह कहते हुए डाल दिया कि बाकी रूपये का तुमलोग चाय पानी पी सकती हो। इस पर आंटी तुरंत मुझसे बोल पड़ी कि तू चाहे तो और ज्यादा समय तक भी अंदर रह सकता है। मैं और दर्शनलाल ने एक दूसरे को देखा और मैं अंदर जाने के लिए तैयार हो गया। मेरी पसंद वाली लड़की का उदास चेहरा एकदम खिल सा गया था, और एकदम चहकती हुई मेरा हाथ पकड़कर मेरे साथ एक कमरे में घुस गयी। कमरे में एक सिंगल बेड लगा था,और दीवारों पर कई उतेजक कैलेण्डरों के बीच भगवान शंकर और हनुमान जी के कैलेण्डर टंगे हुए थे। कमरे के बाहर ही मैं अपने जूते उतार दिए थे। कमरे का मुआयना करते हुए मैने कहा कि यहां पर इन भगवानों के कैलेण्डर क्यों टांग रखी हो ?इस पर वो खिलखिला पड़ी और चहकते हुए बोली कि यहां के हर कमरे में किसी न किसी भगवान का कैलेण्डर जरूर मिलेगा। मैं भी इस भक्ति पर हंस पडा कमाल है तुमलोग ने तो भगवान को भी अपने गुट के साथ शामिल कर ऱखी हो। छोटे से कमरे मे घुसते ही मैं चौकी पर जा बैठा। कमरे में हल्की खुश्बू और रौशनी थी, मगर मेरे बैठने पर वो चौंक सी गयी। अपने हाथ उठाकर कपड़े उतरने के लिए तैयार सी थी। मैने फट से कहा अरे अरे अभी रुको जरा।  मुझे कोई जल्दी नहीं है। अभी बैठो तो सही मैंने तो अभी तुमको ठीक से देखा तक नहीं है कि तुम उतावली सी होने लगी। मेरी बात सुनते ही वो हंस पड़ी। अऱे कमरे के भीतर बात नहीं मुलाकात की जाती है। लोग तो साले कमरे के बाहर ही हाथ डाल देते हैं और तुम यहां पर आकर भी सिद्धांत मार रहा है। अरे यार और लोग कैसे होते हैं यह तो मैं नहीं जानता मगर मैं वैसा ही पागल रहूं यह कोई जरूरी है क्या ?वो हंसने लगी तू क्या सोचता हैं कि यहां पर कोई आदमी आता है सारे सिरफिरे बेईमन और पागल ही हम रंडियों को गले लगाने आते है। फौरन मैं बोल पडा जैसा कि मैं भी तो एक पागल बेईमान, मूर्ख सिरफिरा और चरित्रहीन एय्याश यहं पर आया हूं। मेरी बातों को काटते हे वह बोल पड़ी नहीं रे तू ऐसा नहीं लगता हैं नहीं तो मुझे कभी पंसद नहीं करता। मेरे को माह दो माह में ही कोई तुम्हरी तरह का पागल ही पसंद करता है या जिसकी जेब में रूपए कम होते है। मगर तेरे साथ तो ऐसा कुछ नहीं है फिर भी मुझे क्यों चुना ?मैं उन नौटंकीबाज नखरेवालियों को जानता हूं मगर तू एकदम शांत बेभाव खड़ी थी तो लगा कि तुम अलग हो। बात करते करते करीब 15 मिनट गुजर गए थे। वो एकाएक व्यग्र सी हो उठी। अब उठो तो बतियाते बतियते ही समय खत्म हो जाएगी। तो हो जाने दो न फिर कभी आ जाउंगा। मेरी बात सुनकर वो भड़क उठी। साले मैं सुदंर नहीं हूं इस कारण तेरा मन नहीं कर रहा हैं तो तू हमें उल्लू बना रहा है । इस पर मैं हंसते हुए बोला तू पागल है । अब वो पहले से ज्यादा उग्र होकर बोली तो तू कौन सा सही है। तू भी तो पागल ही है कि पैसा खर्च करके रंडी की पूजा करने आया है। मैने कहा कि तू चाहे जितना बक बक कर ले मै 30 मिनट के बाद ही यहां से निकलूंगा। तो 30 मिनट क्यों अभी निकल और दो चार गंदी गंदी गालियों के साथ नपुंसक हिजडा छक्का आदि आदि मुझे तगमा देने लगी। दो चार मिनट तक शांत भाव से गालियां खाने के बाद मैं फिर बोल पड़ा कहां गयी तेरी गालियां। बस खत्म हो गया स्टॉक। मैने कहा चल मेरे साथ गाली बकने की बाजी लगा एक सांस में एक सौ गाली देकर ही ठहरूंगा। मेरी बाते सुनकर वो हंसने ली। मेरे मूड को देखकर वो अपने कपड़े ठीक कर ली। मैने अपने बैग से नमकीन और बिस्कुट  के पैकेट निकालकर दिए कि चल खा मेरे साथ। इन सामानो को देखकर वो फिर बमक गयी।  साला बच्चा समझता है कि पटाने के लिए ई सब थैला में रखकर घूमता है। ये छैला टाईप के लौंडिया बाज लोग ही करते हैं कि जहां देखे वहीं पटाने या मेल जोल बढने में लग गए। उसकी बाते सुनकर मैं खिलखिला पड़ा अरे यार तूने तो मेरी आंखे ही खोल दी मैं तो अपने बैग में जरूर कुछ न कुछ सामान अमूमन रखता हूं। इस पर वो हंसते हुए बोली तो तू कौन सा बड़ा ईमानदर है। मैने कहा कि ये लो जी आरोप लगाने लगी। फिर बौखलाते हुए बोली कि साला यहां पर आकर अपने आप को पाक दिखाने की कोशिश करना सबसे बड़ी कुत्तागिरी होती है। मैं बाहर जा रही हूं तेरे वश में कुछ नहीं है हरामखोर और रोते हुए कमरे से बाहर निकल गयी। उसके जाने बाद मैं भी बिस्तर पर पालथी मारकर बैठे आसन से उठा और दोनों हाथ उपर करके अपने बदन को सीधा किया। दरवाजे पर ही खडा होकर जूता पहनकर हॉल की तपऱ बढ गया। मेरे को देखते ही आंटी बोली भाग गयी क्या फिर बुलाउं ? मैने तुरंत कहा नहीं नहीं नहीं नहीं । आंटी भौंचक सी होकर मेरी तरफ देखने लगी। मेरा मित्र भी थोडा अचकचासा रहा था। मैने कहा कि तुमलोग चाय पी लिए क्या ?आंटी ने कहा हां जी बेटा इधर आते रहना। मैने भी आंटी को हाथ जोड़कर नमस्ते की और अपने दोस्त दर्शनलाल के साथ कोठे से बाहर जाने लगा।                 

सोमवार, 2 अगस्त 2021

कायस्थ समाज*

 एक बुद्धिमान समाज*


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*यह वाक्या, बात उस समय का है जब बादशाह अकबर थे, एक दिन उन्होंने वीरबल से पूँछा, वीरबल हिंदुस्तान में सबसे बुद्धिमान समाज कौन सा है।*

*वीरबल :- हुजूर "कायस्थ" सबसे बुद्धिमान समाज है।*

*अकबर तो हर बात का प्रमाण चाहते थे*

*अकबर:- हमे इसका दीदार (प्रैक्टिकल) रूबरू कराओ*

*वीरबल ने सभी समाज और जातियों के दो दो लोगो की लाल किले में बुलाया, जब सब लोग लाल किले के दीवाने आम में आये तो दोनों कायस्थ भाई सबसे आगे थे, जो अकबर के बिल्कुल नजदीक (अगर कभी मिले तो अकबर पहचान लें)*

*अब वीरबल ने अकबर का फरमान सबको सुनाया*

*वीरबल :- आप सभी लोग अपनी अपनी मूँछे बादशाह की भेंट करें। यह सुन दोनो कायस्थ भाई धीरे धीरे लाइन मे सबसे पीछे चले गए।*

*सब लोग आते गए और उनकी मूँछे कटती गई और अंत मे दोनो कायस्थ भाई ही रह गए और अब उनका ही नंबर था।*

*तब कायस्थ भाई बोले कि हम मूँछे तो कटवा ले "पर" एक बात है।*

*वीरबल ने अकबर के कान में कहा कि देखिए अब इनके "पर" निकलने शुरू हो गए।*

*अकबर:- बोले क्या बात है।*

*कायस्थ भाई:- हमारे हिन्दू समाज मे मूँछे तब कटती है जब पिता का स्वर्गवास हो जाता है और बड़े होने पर जब हमारी मूँछे निकलती है तब तक कम से कम 10,000 दीनारों का खर्चा आ जाता है। तब अकबर के आदेश पर 10,000 दीनार की थैली दी गई, कायस्थ भाइयों ने थैली को तुरंत पकड़ लिया और बोले कि हुजूर इसकी क्या जरूरत है। अकबर ने कहा कि भुगतान पूरा हुआ अब यह शाही मूँछे हो गई है दोनो कायस्थ भाइयों ने इसकी सहमति दी।*

*जब शाही हज्जाम ने उनकी मूंछों पर पानी लगाना शुरू किया, तभी शाही हज्जाम पर दो झापड़ रसीद किये हज्जाम चिल्लाया हुजूर मुझे मारा, अकबर के पूछने पर कायस्थ भाई ने कहा कि यह इन शाही मूंछो पर बेअदबी से पानी लगा रहा है इसको बोलो की आदाब और तमीज से पानी लगाए, अकबर भी हज्जाम से बोले कि आदाब से पानी लगाओ।*

 *अब जैसे ही शाही हज्जाम ने कायस्थ भाई की मूँछो पर उस्तरा लगाया, तभी उस हज्जाम को चार झापड़ और रसीद किये।*

*अब शहंशाह अकबर आए और बोले कि हमारे हज्जाम को क्यों मारा। तब कायस्थ भाई से कहा कि हुजूर हमारे बुजुर्गो ने हमे यही शिक्षा दी है कि बादशाह सलामत की इज्जत के लिये अपना सिर कटवा देना पर उनकी मूँछे झुकने भी नही देना। आपने इनका भुगतान कर दिया है अब यह शाही मूँछे आपकी  हो गई है हमारे रहते हुये यह आपकी मूँछे कैसे कोई काट सकता है।*

*बात बादशाह अकबर की समझ मे आई और शाही हज्जाम पर चिल्ला कर बोले कि यह शाही मूँछे है यह नही काटी जाएगी। जब दोनों कायस्थ भाई वहाँ से विदा लेकर चले गए तब वीरबल ने बादशाह से कहा कि दोनों कायस्थ भाई 10,000 दीनार की रकम ले गए, आपके शाही हज्जाम को 4, 6 झापड़ मार गए और अपनी मूँछे भी सही सलामत ले गए अब आप ही फैसला करे कि कौन सी जाति बुद्धिमान है।*

*बादशाह अकबर ने कहा वीरबल तुम सही कह रहे हो वास्तव में "कायस्थ समाज का बुद्धिमानी में कोई  जबाब ही नही है।"*

*चित्रगुप्त भगवान की जय*

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*धन्यवाद*

रविवार, 11 जुलाई 2021

आज की शबरी

 *#कलयुग कि #शबरी #आज की #तस्वीर में जो बुजुर्ग महिला बैठी हुई है। इनके #दर्शन करना बड़े #सौभाग्य की बात है क्योंकि यह पिछले 46 सालों से राधा रमन जी के प्रांगण में ही बैठी रहती है। और कभी राधा रमन जी की गलियां और राधा रमन जी का मंदिर छोड़कर   इधर उधर वृंदावन में कहीं नहीं गई। इन   बुजुर्ग महिला की उमर 81 साल हो चुकी है। जब यह  35 बरस की थी । तब यह  जगन्नाथ पुरी से चलकर अकेली वृंदावन के लिए आई थी। वृंदावन पहुंचकर इन्होंने किसी बृजवासी से वृंदावन का रास्ता पूछा ।उस ब्रजवासी ने इनको राधा रमन जी का मंदिर दिखा दिया। आज से 46 साल पहले कल्पना कीजिए वृंदावन कैसा होगा। यह अकेली जवान औरत सब कुछ छोड़ कर केवल भगवान के भरोसे वृंदावन आ गई। और किसी बृजवासी ने जब इनको राधा रमन जी का मंदिर दिखा   कर यह कह दिया यही वृंदावन है। तब से लेकर आज तक इनको 46 बरस हो गए यह राधा रमन जी का मंदिर छोड़कर कहीं नहीं गई। यह मंदिर के प्रांगण में बैठकर 46 साल से भजन गाती है। मंगला आरती के दर्शन करती हैं। कभी-कभी गोपी गीत गाती हैं। जब इनको कोई भक्त यह कहता है। माताजी वृंदावन घुम  आओ। तो यह कहती है। मैं कैसे जाऊं? लोग बोलते हैं। बस से या ऑटो से चली जाओ। तो यह कहती है जब मुझे किसी बृजवासी ने यह बोल दिया  यही वृंदावन है। तो मेरे बिहारी जी तो मुझे यही मिलेंगे। मेरे लिए तो सारा वृंदावन इसी राधा रमन मंदिर में  ही है। देखिए प्रेम और समर्पण की कैसी प्रकाष्ठा है। आज   के दौर में संत हो या आम जन सब धन -दौलत, रिश्ते- नातों के पीछे भाग रहे है । तो आज भी संसार में ऐसे दुर्लभ भक्त हैं जो केवल और केवल भगवान के पीछे भागते हैं। यह देखने में   बहुत निर्धन   दिखते हैं। परंतु इनका परम धन इनके भगवान 🙏राधा रमन🙏 जी है।* *हम संसार के लोग थोड़ी सी भक्ति करते हैं। और अपने आप को भकत समझ बैठते हैं। और थोड़ी सी भी परेशानी आई   या तो भगवान को कोसने लगते हैं। या उस भगवान को छोड़कर किसी अन्य देवी- देवता की पूजा करने लग जाते हैं। हमारे अंदर समर्पण तो है ही नहीं। आज   संसार के अधिकतर लोग अपनी परेशानियों से परेशान होकर कभी एक बाबा से दूसरे बाबा पर दूसरे बाबा से तीसरे बाबा पर भाग रहे हैं। ओर तो ओर हमारा ना अपने गुरु पर विश्वास है। ना किसी एक देवता को अपना इषट मानते है।  अधिकतर लोग भगवान को अगर प्यार भी करते हैं। तो किसी ना किसी भौतिक जरूरत के लिए करते हैं। परंतु इन दुर्लभ संत  महिला को को देखिये।जो सब कुछ त्याग कर केवल भगवान के भरोसे 46 साल से राधा रमन जी के प्रांगण में बैठी lऐसे संतो के चरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम*🙏🙏🌹

*Զเधे कृष्ण जी*

🙏🌹🌹🙏

सीता की आग्नेय दृष्टि

 🌹आज का भगवद चिंतन - 864🌹

एक बार अयोध्या के राज भवन में भोजन परोसा जा रहा था।

माता कौशल्या बड़े प्रेम से भोजन खिला रही थी।


माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया सभी ने अपनी अपनी पत्तलें सम्भाली सीता जी बड़े गौर से सब देख रही थी...


ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया जिसे माँ सीता जी ने देख लिया... 


लेकिन अब खीर में हाथ कैसे डालें ये प्रश्न आ गया माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर देखा वो जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया सीता जी ने सोचा अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा...


लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी के इस चमत्कार को देख रहे थे फिर भी दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष पहुँचकर माँ सीता जी को बुलवाया...


फिर उन्होंने सीताजी से कहा कि मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था...


आप साक्षात जगत जननी स्वरूपा हैं, लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना...


आपने जिस नजर से आज उस तिनके को देखा था उस नजर से आप अपने शत्रु को भी कभी मत देखना...


इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थीं...


तृण धर ओट कहत वैदेही...

सुमिरि अवधपति परम् सनेही...


यही है...उस तिनके का रहस्य...


इसलिये माता सीता जी चाहती तो रावण को उस जगह पर ही राख़ कर सकती थी लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन एवं भगवान श्रीराम को रावण-वध का श्रेय दिलाने हेतु वो शांत रही...

ऐसी विशालहृदया थीं हमारी जानकी माता...


-प्रेरक / भक्ति कथायें

🙏❤️🌹जय श्री कृष्णा🌹❤️🙏

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