रविवार, 6 जून 2021

ऑपरेशन ब्लूस्टार की 37 वीं बरसी पर / रेहान फ़ज़ल

 कैसे थे जरनैल सिंह भिंडरावाले की ज़िदगी के आख़िरी पल / रेहान फ़ज़ल 


अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले भिंडरावाले ने तीन पत्रकारों से बात की थी. एक थे बीबीसी के मार्क टली. दूसरे टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सुभाष किरपेकर और तीसरे मशहूर फ़ोटोग्राफ़र रघु राय. सीआरपीएफ़ ने ऑप्रेशन ब्लूस्टार शुरू होने से चार दिन पहले यानि 1 जून को स्वर्ण मंदिर पर फ़ायरिंग शुरू कर दी थी. 2 जून को मार्क टली की भिंडरावाले से आखिरी मुलाकात हुई थी. वो अकाल तख़्त में बैठे हुए थे. मार्क टली और सतीश जैकब अपनी किताब ‘अम़ृतसर मिसेज़ गाँधीज़ लास्ट बैटिल’ में लिखते हैं, ‘जब मैंने भिडरावाले से फ़ायरिंग के बारे में पूछा तो उन्होंने जवाब दिया. फ़ायरिंग बताती है कि सरकार स्वर्ण मंदिर का अपमान करने पर तुली हुई है और सिखों और उनके रहने के तरीके को बर्दाश्त नहीं कर सकती है. अगर सरकार ने मंदिर में घुसने की कोशिश की तो उसका  माकूल जवाब दिया जाएगा. लेकिन उस दिन भिंडरावाले सहज नहीं दिख रहे थे. ज़ाहिर है वो तनाव में थे. आमतौर से वो अपनेआप को फ़िल्म किया जाना पसंद करते थे लेकिन उस दिन उन्होंने उख़ड़ कर कहा था, आप लोग जल्दी कीजिए. मुझे और भी ज़रूरी काम करने हैं.’

भिंडरावाले को विश्वास था कि सेना अंदर नहीं आएगी

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सुभाष किरपेकर अकेले पत्रकार थे जो सेना द्वारा स्वर्ण मंदिर को घेर लिए जाने के बाद जरनैल सिंह भिंडरावाले से मिले थे. तब भी जरनैल सिंह का मानना था कि सेना मंदिर के अंदर नहीं घुसेगी. किरपेकर ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद छपी किताब ‘द पंजाब स्टोरी’ में लिखते हैं, ‘मैंने  भिंडरावाले से पूछा क्या सेना के सामने आपके लड़ाके कम नहीं पड़ जाएंगे ? उनके पास बेहतर हथियार भी हैं. भिंडरावाले ने तुरंत जवाब दिया था, ‘भेड़ें हमेशा शेरों से ज़्यादा संख्या में होती हैं. लेकिन एक शेर हज़ार भेड़ो का सामना कर सकता है. जब शेर सोता है तो चिड़ियाँ चहचहाती हैं. लेकिन जब वो उठता है तो चिडियाँ उड़ जाती हैं.’ जब मैंने उनसे पूछा कि आपको मौत से डर नहीं लगता तो उनका जवाब था ‘कोई सिख अगर मौत से डरे तो वो सच्चा सिख नहीं है.’  भिंडरावाले के बगल में स्वर्ण मंदिर की सुरक्षा की योजना बनाने वाले मेजर जनरल शहबेग सिंह भी खड़े थे. जब मैंने उनसे पूछा कि आपको क्या उम्मीद है, एक्शन कब शूरू होगा ? तो उन्होंने जवाब दिया शायद ‘आज रात ही.’’


मशहूर फ़ोटेग्राफ़र रघु राय ने मुझे बताया था कि वो भिडरावाले से उनकी मौत से एक दिन पहले मिले थे. ‘उन्होंने मुझसे पूछा तू यहाँ क्यों आया है ? मैंने कहा पाजी मैं आपसे मिलने आया हूँ. मैं तो आता ही रहता हूँ. उन्होंने फिर ‘पूछा  अब क्यों आया है तू ?’  मैंने जवाब दिया ‘देखने के लिए कि आप कैसे हैं.’ मैं देख सकता था कि उनकी आँखे लाल सुर्ख़ थीं.  मैं उनमें गुस्सा और डर दोनों पढ़ पा रहा था.’


6 जून को दोपहर चार बजे से लाउडस्पीकर से लगातार घोषणाएं की जा रही थीं कि जो चरमपंथी अभी भी कमरों या तयख़ानों में हैं, बाहर आकर आत्मसमर्पण कर सकते हैं.  लेकिन तब तक  भिडरावाले का कोई पता नहीं था. ऑप्रेशन ब्लूस्टार के कमाँडर लेफ़्टिनेंट जनरल बुलबुल बरार अपनी किताब  ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार द ट्रू स्टोरी’ में लिखते हैं, ‘जब 26 मद्रास के जवान अकालतख़्त में घुसे तो उन्होंने दो चरमपंथियों को भागने की कोशिश करते पाया. उन्होंने उनपर गोली चलाई. उनमें से एक व्यक्ति तो मारा गया लेकिन दूसरे शख़्स को उन्होंने पकड़ लिया. उससे जब सवाल किए गए तो उसने सबसे पहले बताया कि भिंडरावाले अब इस दुनिया में नहीं हैं. फिर वो हमारे सैनिकों को उस जगह ले गया जहाँ भिंडरावाले और उनके 40 अनुयायियों की लाशें पड़ी हुई थीं. थोड़ी देर बाद हमें तयख़ाने में जनरल शहबेग सिंह की भी लाश मिली. उनके हाथ में अभी भी उनकी कारबाइन थी और उनके शरीर के बगल में उनका वॉकीटॉकी पड़ा हुआ था.’ बाद में जब मैंने जनरल बरार से बात की तो उन्होंने मुझे बताया, ‘अचानक तीस चालीस लोगों बाहर निकलने के लिए ने दौड़ लगाई. तभी मुझे लग गया कि भिडरावाले नहीं रहे, क्योंकि तभी अंदर से फ़ायर आना भी बंद हो गया. तब हमने अपने जवानों से कहा कि अंदर जा कर तलाशी लो. तब जा कर हमें उनकी मृत्यु का पता लगा. उसके बाद उनके शव को  उत्तरी विंग के बरामदे में ला कर रखा गया जहाँ पुलिस, इंटेलिजेंस ब्यूरो और हमारी हिरासत में आए चरमपंथियों ने उनकी शिनाख़्त की.’


ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद प्रकाशित हुई किताब ‘द पंजाब स्टोरी’ में शेखर गुप्ता लिखते हैं, ‘अफ़सरों ने मुझे बताया कि जब वो लोग अकाल तख़्त के अंदर घुसे तो पूरे इलाके में बारूद की गंध भरी हुई थी और दो इंच तक फ़र्श इस्तेमाल हो चुके कारतूसों से अटा पड़ा था. कुछ अफ़सर तो इस बात को लेकर अंचंभे में थे कि चरमपंथी इतनी ज़्यादा फ़ायरिंग कैसे कर पाए. ऑटोमेटिक फ़ायरिंग आप लगातार नहीं कर सकते, क्योंकि आपके हथियार में समस्या उठ खड़ी होती है और अगर आप बीच में अंतराल न रखे तो कभी कभी तो उसकी नाल भी गर्म और कभी कभी पिघल भी जाती है. अगर भारतीय सेना के जवान इस तरह की भीषण फ़ायरिंग करते तो उन्हें कारतूस बरबाद करने के लिए अपने अफ़सरों की डाँट खानी पड़ सकती थी. भारतीय सेना के अफ़सरों ने मुझे बताया कि कई चरमपंथियों के कंधों पर नीले निशान थे जो बताता था कि उनमें तर्कसंगत होने की कमी भले ही हो लेकिन उनके जोश में कोई कमी नहीं निकाली जा सकती थी.’


भिडरावाले के आखिरी क्षणों का वर्णन दो जगह मिलता है. अकाल तख़्त के तत्कालीन जत्थेदार किरपाल सिंह ने अपनी किताब ‘आई विटनेस अकाउंट  ऑफ़ ऑपरेशन ब्लूस्टार’ में  अकाल तख़्त के प्रमुख ग्रंथी ज्ञानी प्रीतम सिंह को कहते हुए बताया हैं, ‘मैं तीन सेवादारों के साथ अकाल तख़्त के उत्तरी किनारे  में बैठा हुआ था. करीब 8 बजे फ़ायरिंग थोड़ी कम हुई तो मैंने संत जरनैल सिंह भिडरावाले को अपने कमरे के पास शौचालय की तरफ़ से आते देखा. उन्होंने नल में अपने हाथ धोए और वापस अकाल तख़्त की तरफ़ लौट गए. करीब साढ़े आठ बजे भाई अमरीक सिंह ने अपने हाथ धोए और हम सब को सलाह दी कि हम सब लोग निकल जाएं. जब हमने उनसे उनकी योजना के बारे में पूछा. उन्होंने मुझे बताया कि संत तयख़ाने में हैं. पहले उन्होंने 7 बजे शहीद होना तय किया था लेकिन फिर उन्होंने उसे साढ़े नौ बजे तक स्थगित कर दिया था. फिर मैंने संत के  लोगों से लोहे के दरवाज़े की चाबी ली और फिर मैं अपने 12 साथियों के साथ बोहार वाली गली में निकल आया और दरबार साहब के एक दूसरे सेवादार भाई बलबीर सिंह के घर में शरण ली.’

एक और किताब ‘द गैलेंट डिफ़ेडर’ में ए आर दरशी अकाल तख़्त के सेवादार हरि सिंह को कहते बताते हैं, ‘मैं 30 लोगों के साथ कोठा साहब में छिपा हुआ था.  6 जून को करीब साढ़े सात बजे  भाई अमरीक सिंह वहाँ आए और हमसे कहा कि हम कोठा साहब छोड़ दें क्योंकि अब सेना द्वारा लाए गए टैंकों का मुकाबला नहीं किया जा सकता. कुछ मिनटों बाद संत भिडरावाले अपने 40 समर्थकों के साथ कमरे में दाखिल हुए. उन्होंने गुरुग्रंथ साहब के सामने बैठ कर प्रार्थना की और अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा जो लोग शहादत लेना चाहते हैं, मेरे साथ रुक सकते हैं. बाकी लोग अकालतख़्त छोड़ दें.’


जब भिंडरावाले मलबे पर पैर रखते हुए अकाल तख़्त के सामने की तरफ़ गए तो उनके पीछे उनके 30 अनुयायी भी थे. जैसे ही वो आँगन में निकले उनका स्वागत गोलियों से किया गया. मार्क टली और सतीश जैकब अपनी किताब ‘अमृतसर मिसेज़ गाँधीज़ लास्ट बैटिल’ में लिखते हैं, ‘बाहर निकलते ही अमरीक सिंह को गोली लगी लेकिन कुछ लोग आगे दौड़ते ही चले गए. फिर फ़ायर का एक और बर्स्ट आया जिससे भिंडरावाले के 12 या 13 साथी धराशाई हो गए. मुख्य ग्रंथी प्रीतम सिंह भी उस कमरे में छिपे हुए थे. अचानक कुछ लोगों ने अंदर आ कर कहा कि  अमरीक सिंह शहीद हो गए हैं. जब उनसे संत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने उन्हें मरते हुए नहीं देखा है. मार्क टली और सतीश जैकब लिखते हैं,  ‘राष्ट्पति ज्ञानी ज़ैल सिंह के सलाहकार रहे त्रिलोचन सिंह को अकाल तख़्त के एक ग्रंथी ने बताया था कि जब भिंडरावाले बाहर आए थे तो उनकी जाँघ में गोली लगी थी. फिर उनको दोबारा भवन के अंदर ले जाया गया. लेकिन किसी ने भी भिंडरावाले को अपनी आँखों के सामने मरते हुए नहीं देखा.’


एक और ग्रंथी ज्ञानी पूरन सिंह को सैनिकों ने बताया था कि  उन्हें भिडरावाले और अमरीक  सिंह के शव सात तारीख की सुबह अकाल तख़्त के आँगन में मिले थे. स्वर्ण मंदिर के बरामदे में इन तीनों के शव की तस्वीरे हैं. लेकिन एक तस्वीर में ये साफ़ दिखाई देता है कि शहबेग  सिंह  की बाँह में रस्सी बँधी हुई है जिससे पता चलता है कि उनके शव को अकाल तख़्त से खींच कर बाहर लाया गया था. ये भी हो सकता है कि  वो सैनिक सिर्फ़ ये बताना चाह रहे हों कि उन्होंने शवों को अकाल तख़्त के सामने देखा था और उनको ये पता ही न हो कि शव पहले कहाँ पाए गए थे.


 भिंडरावाले की मौत 6 जून को ही हो गई थी. मार्क टली और सतीश जैकब अपनी किताब ‘अमृतसर मिसेज़ गाँधीज़ लास्ट बैटिल’ में लिखते हैं, ‘जब एक अफ़सर ने बरार को सूचना दी कि भिंडरावाले का किला ढ़ह गया है तो उन्होंने एक गार्ड की ड्यूटी वहाँ लगा दी. उन्होंने प्राँगड़ की तलाशी लेने के लिए सुबह होने का इंतेज़ार किया. 7 जून की सुबह तलाशी के दौरान भिंडरावाले, शहबेग सिंग और अमरीक सिंह के शव तयखाने में पाए गए.  ब्रिगेडियर ओंकार एस गोराया भी अपनी किताब  ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार एंड आफ़्टर एन आईविटनेस अकाउंट’ में लिखा हैं,  ‘भिंडरावाले के शव की सबसे पहले शिनाख़्त डीएसपी अपर सिंह बाजवा की. मैं भी बर्फ़ की सिल्ली पर लेटे हुए जरनैल सिंह भंडरावाले के शव को पहचान सकता था, हाँलाकि पहले मैंने उन्हें कभी जीवित नहीं देखा था. उनका जूड़ा खुला हुआ था और उनके एक पैर की हड्डी टूटी हुई थी. उनके जिस्म पर गोली के कई निशान थे.’


भिडरावाले के शव का अंतिम संस्कार 7 जून की शाम को साढ़े सात बजे किया गया. मार्क टली लिखते हैं, ‘उस समय मंदिर के आसपास करीब दस हज़ार लोग जमा हो गए थे लेकिन सेना ने उनको आगे नहीं बढ़ने दिया. भिंडरावाले, अमरीक सिंह और दमदमी टकसाल के उप प्रमुख थारा सिंह के शव को  मंदिर के पास चिता पर रखा गया. चार पुलिस अधिकारियों ने भिंडरावाले के शव को लॉरी से उठाया और सम्मानपूर्वक चिता तक लाए. एक अधिकारी ने मुझे बताया कि वहाँ मौजूद बहुत से पुलिसकर्मियों की आँखों में आँसू थे.’


जनरल शहबेग सिंह का शव भी अकाल तख्त के तहख़ाने में पाया गया था.  संभव है कि वो 5 या 6 जून की रात को ही घायल हो गए हों. जब शहबेग सिंह के बेटे प्रबपाल सिंह  ने पंजाब के राज्यपाल को फ़ोन कर  अपने पिता के अतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति माँगी तो राज्यपाल ने कहा हज़ारों और लोग भी अंतिम संस्कार में शामिल होने का अनुरोध कर रहे हैं. अगर उन्होंने शहबेग सिंह के बेटे को ये अनुमति दी तो उन्हें अन्य लोगों को भी अनुमति देनी पड़ेगी. जब प्रबपाल सिंह ने कहा कि क्या उन्हें उनकी अस्थियाँ मिल सकती हैं तो राज्यपाल का जवाब था, उन्हें भारत की पवित्र नदियों में प्रवाहित कर दिया जाएगा.  शहबेग सिंह के अंतिम संस्कार का कोई आधिकारिक रिकार्ड नहीं मिलता.

भिंडरावाले का अंतिम संस्कार हो जाने के बावजूद कई दिनों तक ये अफवाह फैली रही कि वो जीवित हैं. जनरल बरार ने मुझे बताया, ‘अगले ही दिन कहानियाँ शुरू हो गई कि भिंडरावाले उस दिन सुरक्षित निकल गए थे और पाकिस्तान पहुंच गए थे. पाकिस्तान का टेलिविजन अनाउंस कर रहा था कि भिंडरावाले हमारे पास हैं और 30 जून को हम उन्हें टेलिविजन पर दिखाएंगे. मेरे पास सूचना और प्रसारण मंत्री मंत्री एच के एल भगत और विदेश सचिव एमके रस्गोत्रा के फ़ोन आये कि आप तो कह रहे हैं कि भिंडरावाले की मौत हो गई है लेकिन पाकिस्तान कह रहा है कि वो उनके यहाँ हैं. मैंने उन्हें बताया उनके शव की पहचान हो गई है. उनका शव उनके परिवार को दे दिया गया है और उनके समर्थकों ने आ कर उनके पैर छुए हैं.’ पंजाब के गाँवों में रहने वाले लोगों ने 30 जून का बहुत बेसब्री से इंतेज़ार किया.  उन्हें उम्मीद थी कि वो अपने हीरो को टीवी पर साक्षात देख पाएंगे लेकिन उनकी ये मुराद पूरी नहीं हुई.  जनरल बरार अपनी किताब ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार द ट्रू स्टोरी’ में स्वीकार करते हैं, ‘मैंने भी कौतुहलवश उस रात अपना टेलिविजन सेट खोला क्योंकि इस तरह की अफवाहें थीं भिंडरावाले की शक्ल से मिलते जुलते किसी शख़्स को प्लास्टिक सर्जरी कर पाकिस्तानी टीवी पर दिखाया जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.’

बुधवार, 19 मई 2021

अपनी निरख परख करते रहें / कृष्ण मेहता

 "वही उन्नति करता है जो स्वयं अपने को उपदेश देता है।"/ कृष्ण  मेहता 

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हम दो भागों में बंटे हैं एक वह जो सुखीदुखी होता है,दूसरा वह जो सुखद दुखद है।इसमें हमारी भूमिका सुखीदुखी की है।हम यह तो भूल ही जाते हैं कि जो सुखद दुखद है वह हमारा ही हिस्सा है।इसे हम पहचानें और ठीक करें यह जरूरत हमेशा बनी रहती है।यह पहचान नहीं है तो हम बाहरी जगत को सुखद दुखद मानेंगे और उसे ठीक करने में लगेंगे।सारा संघर्ष इसी बात का है।वास्तविकता भिन्न है-

"व्यक्ति को हानि,पीडा और चिंताएं उसकी किसी आंतरिक दुर्बलता के कारण होती है।उस दुर्बलता को दूर करके कामयाबी मिल सकती है।"

हम ही हैं हानिकारक, पीडादायक,चिंताजनक।अपने इस रुप को उपदेश देने से काम नहीं चलता।यह चित्त है और हमही चित्त हैं।इसे दुश्मन की तरह देखना भी बाधक है।हमें जानना होगा किस तरह हम कष्टप्रद हैं बिना स्वयं से दूर भागे। आत्मपलायन और आत्मबल विपरीत बातें हैं यद्यपि सीधे आत्मबल आता नहीं।आत्मपलायन को समाप्त करना होता है।इसके लिये हम कष्टप्रद हैं तो अपने इस रुप के साथ रहना और उसे सहना पडता है।सारी समस्या स्वयं को न सह पाने के कारण ही हैं।लगता है बाहर हैं व्यक्ति, घटना,परिस्थिति उन्हें हम सह नहीं पाते।

एक बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिये कि बाहर असहनीय कुछ भी नहीं है,हम ही हैं असहनीय और जीना तो अपने आपमें है।जिसे अपने आपमें जीना आगया उसे सब आगया।

यह बडा किमती सूत्र है।

यह है स्वयं के साथ घुलमिलकर रहना ताकि उसके साथ एक हुआ जा सके,वही हुआ जा सके।हम "स्वयं" हो जाएं(सेल्फ)।

"Be yourself,and nothing more."

स्व में रहना,स्व से घुलमिलकर रहना एक ही बात है।अभी हम "पर" से घुलेमिले हैं रागद्वेष पूर्वक।

प्रेम से भी सबके साथ घुलमिलकर रह सकते हैं।सेवा भी यही है।

आज समाचार सुने बिहार सरकार सामूदायिक रसोईघर खोल रही है सभी जिलों में।अच्छा लगा।सवाल यह नहीं कि सरकार किस पार्टी की है।यह बडी बचकानी बात है।अभी यह राजनीति करने का समय नहीं।

अभी जरूरत है इस बात की कि सरकार और प्रजा मिलकर काम करे।होता यह है कि कुछ काम सरकार के भरोसे छोड दिये जाते हैं,कुछ प्रजा के भरोसे।प्रजा हर चीज सरकार पर छोड देती है।ऐसे में सरकार अपना ध्यान महामारी पर लगाती है,भोजन व्यवस्था प्रजा पर छोड देती है लेकिन जब सरकार इसकी भी जिम्मेदारी लेती है तो जनता में नयी चेतना का संचार होता है।जनता को तो सुखदुख में अनुकूल सरकार ही चाहिये।

अभी यह स्थिति है कि भोजनसमस्या कहीं भी आ सकती है।इस समस्या का हल सरकार और प्रजा दोनों को साथ मिलकर निकालना चाहिये।एक काम सरकार करे,दूसरा काम लोग करें या दोनों काम दोनों मिलकर करें।

कुछ लोग और संस्थाएं हैं जो अपने स्तर पर यह पुनीत कार्य कर रहे हैं फिर भी उनके और सरकार के मिलकर कार्य करने से बहुत फर्क पडता है।बहुत बल मिलता है एक दूसरे से एक दूसरे को।

सरकार यदि महामारी में ही लगी रहे,भोजनव्यवस्था से ध्यान हटा ले तो जनता अकेली पड जाती है।

अभी किसीको भी जरासा भी अकेला नहीं पडना चाहिये न सरकार को,न जनता को।दोनों एक दूसरे की मांगों को देखें,समझें और एक दूसरे को पूरा सहयोग करें इसकी अनिवार्यता है।

यह आध्यात्मिक आवश्यकता है कि आदमी स्वयं अपने आपके साथ घुलमिलकर रहे।

इसमें दोनों बातें हैं।आदमी अपने सुखरुप के साथ मिलकर रह सकता है,दुखरुप के साथ नहीं।अपने कष्टप्रद रुप के साथ रहने के लिये बडा धैर्य, बडी गहरी समझ चाहिये वर्ना खुद के साथ मिलकर रहना आसान नहीं।

दूसरी बात बाहरी व्यक्ति, घटना,परिस्थिति को मूल कारण न समझे अपनी समस्या का इसीलिए कहा-खोजें तो अपनी हर समस्या के मूल में अपनी ही कोई आंतरिक दुर्बलता मिल जायेगी।

इसी संसार में ऐसी महान आत्माएं हुई हैं जिन्होंने अपनी कोई फिक्र नहीं करके दुखी,पीडित लोगों की मदद की है।परहित सरिस धर्म नहीं भाई।कहा भी है-जो दृढ राखे धर्म को तेहीं राखे करतार।

ऐसा व्यक्ति आश्चर्यजनक रुप से निर्भय,निश्चिंत हो जाता है।

जिसे चिंता सताती हो उसके लिये तो सेवाधर्म महान औषधि की तरह है चिंतारोग से मुक्ति पाने की।

यह करतार की तरह है जो उसे संभाल लेती है।मूल बात तो यही है क्योंकि सब उसीका है।इस की अवज्ञा करके हम केवल अपने ही स्वार्थ को महत्व दें तो कर्तापन के अभिमान के साथ चिंताभय की पीडा आ ही जाती है।जो सबके साथ मिलकर रहता है,सामूहिक समाधान खोजता है वह सकारात्मक होता है।

स्वयं के साथ मिलकर रहना आध्यात्मिक आवश्यकता है।इसे स्वार्थी नहीं कहा जा सकता।सच बात यह है कि अपने हृदय में अपने आपके साथ घुलमिलकर रहने से अपने सभी मानसिक विभाजन,अपने पराये की मान्यताएं लुप्त हो जाती हैं।ऐसा व्यक्ति जो व्यक्तिगत रुप से अखंड है सामूहिक दृष्टि से सबके साथ रह सकता है,सबको सहयोग कर सकता है।

भीतर भेद हो बाहर समूह को लेकर विचार हो तो उसकी कृति परोपदेश तक सीमित रह जाती है।इस वजह से आत्मोपदेश की महत्ता बताई।पहले स्वयं समझे ,स्वयं करता हो और ऐसा हर एक आदमी हो अर्थात् हर आदमी स्वयं अपनी जिम्मेदारी का अहसास करे फिर सब ठीक है।फिर जो भी समस्या आये सामूहिक रुप से मिलकर उसका मुकाबला किया जा सकता है।आदमी अकेला नहीं पडता।

अभी भी सरकार और जनता का भेद बना हुआ है।जनता,सरकार की ओर देख रही है।कर्फ्यू, लोकडाउन की बाध्यता झेल रही है।यह भेद समाप्त हो सकता है अगर दोनों मिलकर कार्य करें।

सरकार भी अलग कहां है?प्रजातंत्र में सरकार,प्रजा का ही तो हिस्सा है प्रजा की देखभाल के लिये,उसकी सेवा,सुरक्षा के लिये।

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

हिन्दी उपन्यास का विकास

हिंदी उपन्यास का आरम्भ श्रीनिवासदास के "परीक्षागुरु' (१८४३ ई.) से माना जाता है। हिंदी के आरम्भिक उपन्यास अधिकतर ऐयारी और तिलस्मी किस्म के थे। अनूदित उपन्यासों में पहला सामाजिक उपन्यास भारतेंदु हरिश्चंद्र का "पूर्णप्रकाश' और चंद्रप्रभा नामक मराठी उपन्यास का अनुवाद था। आरम्भ में हिंदी में कई उपन्यास बँगला, मराठी आदि से अनुवादित किए गए।

हिंदी में सामाजिक उपन्यासों का आधुनिक अर्थ में सूत्रपात प्रेमचंद (१८८०-१९३६) से हुआ। प्रेमचंद पहले उर्दू में लिखते थे, बाद में हिंदी की ओर मुड़े। आपके "सेवासदन', "रंगभूमि', "कायाकल्प', "गबन', "निर्मला', "गोदान', आदि प्रसिद्ध उपन्यास हैं, जिनमें ग्रामीण वातावरण का उत्तम चित्रण है। चरित्रचित्रण में प्रेमचंद गांधी जी के "हृदयपरिवर्तन' के सिद्धांत को मानते थे। बाद में उनकी रुझान समाजवाद की ओर भी हुई, ऐसा जान पड़ता है। कुल मिलाकर उनके उपन्यास हिंदी में आधुनिक सामाजिक सुधारवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जयशंकर प्रसाद के "कंकाल' और "तितली' उपन्यासों में भिन्न प्रकार के समाजों का चित्रण है, परंतु शैली अधिक काव्यात्मक है। प्रेमचंद की ही शैली में, उनके अनुकरण से विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक, सुदर्शन, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि अनेक लेखकों ने सामाजिक उपन्यास लिखे, जिनमें एक प्रकार का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद अधिक था। परंतु पांडेय बेचन शर्मा "उग्र', ऋषभचरण जैन, चतुरसेन शास्त्री आदि ने फरांसीसी ढंग का यथार्थवाद और प्रकृतवाद (नैचुरॉलिज़्म) अपनाया और समाज की बुराइयों का दंभस्फोट किया। इस शेली के उपन्यासकारों में सबसे सफल रहे "चित्रलेखा' के लेखक भगवतीचरण वर्मा, जिनके "टेढ़े मेढ़े रास्ते' और "भूले बिसरे चित्र' बहुत प्रसिद्ध हैं। उपेन्द्रनाथ अश्क की "गिरती दीवारें' का भी इस समाज की बुराइयों के चित्रणवाली रचनाओं में महत्वपूर्ण स्थान है। अमृतलाल नागर की "बूँद और समुद्र' इसी यथार्थवादी शैली में आगे बढ़कर आंचलिकता मिलानेवाला एक श्रेष्ठ उपन्यास है। सियारामशरण गुप्त की नारी' की अपनी अलग विशेषता है।

मनोवैज्ञानिक उपन्यास जैनेंद्रकुमार से शुरू हुए। "परख', "सुनीता', "कल्याणी' आदि से भी अधिक आप के "त्यागपत्र' ने हिंदी में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान दिया। जैनेंद्र जी दार्शनिक शब्दावली में अधिक उलझ गए। मनोविश्लेषण में स. ही. वात्स्यायन "अज्ञेय' ने अपने "शेखर : एक जीवनी', "नदी के द्वीप', "अपने अपने अजनबी' में उत्तरोत्तर गहराई और सूक्ष्मता उपन्यासकला में दिखाई। इस शैली में लिखनेवाली बहुत कम मिलते हैं। सामाजिक विकृतियों पर इलाचंद्र जोशी के "संन्यासी', "प्रेत और छाया', "जहाज का पंछी' आदि में अच्छा प्रकाश डाला गया है। इस शैली के उपन्यासकारों में धर्मवीर भारती का "सूरज का सातवाँ घोड़ा' और नरेश मेहता का "वह पथबंधु था' उत्तम उपलब्धियाँ हैं।

ऐतिहासिक उपन्यासों में हजारीप्रसाद द्विवेदी का "बाणभट्ट की आत्मकथा' एक बहुत मनोरंजक कथाप्रयोग है जिसमें प्राचीन काल के भारत को मूर्त किया गया है। वृंदावनलाल वर्मा के "महारानी लक्ष्मी बाई', "मृगनयनी' आदि में ऐतिहासिकता तो बहुत है, रोचकता भी है, परंतु काव्यमयता द्विवेदी जी जैसी नहीं है। राहुल सांकृत्यायन (१८९५-१९६३), रांगेय राघव (१९२२-१९६३) आदि ने भी कुछ संस्मरणीय ऐतिहासिक उपन्यास दिए हैं।

यथार्थवादी शैली सामाजिक यथार्थवाद की ओर मुड़ी और "दिव्या' और "झूठा सच' के लेखक भूतपूर्व क्रांतिकारी यशपाल और "बलचनमा' के लेखक नागार्जुन इस धारा के उत्तम प्रतिनिधि हैं। कहीं कहीं इनकी रचनाओं में प्रचार का आग्रह बढ़ गया है। हिंदी की नवीनतम विधा आंचलिक उपन्यासों की है, जो शुरु होती है फणीश्वरनाथ "रेणु' के "मैला आँचल' से और उसमें अब कई लेखक हाथ आजमा रहे हैं, जैसे राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, शैलेश मटियानी, राजेंद्र अवस्थी, मनहर चौहान, शिवानी इत्यादि।

रविवार, 4 अप्रैल 2021

संघर्ष ks जादू

 तस्वीर में आप एक टमाटर के पौधे को देख रहे होंगे, शायद किसी यात्री ने टमाटर के बीज को ट्रेन से फेंक दिया होगा। ये पौधा मिट्टी की छाती फाड़कर नही बल्कि पत्थरों को चीरकर बाहर आया है।


जब ये ओर भी नन्हा सा होगा, तब शताब्दी ओर राजधानी जैसे तूफान से भी तेज दौड़ती ट्रेनों के बिल्कुल पास से गुजरते हुए भी इसने सिर्फ बढ़ना सीखा ओर बढ़ते बढ़ते आखिर कार इसने एक टमाटर को जन्म दे ही दिया।


इस पौधे के न हाथ है, न पांव, न ही दिमाग है, ओर तो ओर इसको जीवित रहने के लिए कम से कम मिट्टी और पानी तो मिलना चाहिए ही था, जो इसका हक भी था।


लेकिन इस पौधे ने बिना जल, बिना मिट्टी के, बिना की सुविधा के अपने आपको बड़ा किया और फला फूला, ओर जो इस पौधे के जीवन का उद्देश्य एक ओर फल को देना था, वो उद्देश्य इसने पूरा किया।


हम इंसानों के पास तो हाथ है, पांव है, दिमाग है, उसके बाद भी यदि हम जीवन मे अपने आपको कमजोर मानकर, जीवन को सही प्रकार से, जो हमारे जीवन का उद्देश्य है, इस प्रकार से नही जीते है तो इस जीवन मे आने का कोई औचित्य बचता ही नही है।


जिन लोगो को लगता है कि जीवन मे हम तो असफल हो गए हम तो जीवन मे कुछ कर ही नही सकते, हम तो बस अब बरबाद हो ही चुके है, तो उन्हें इस टमाटर के पौधे से कुछ सीख लेनी चाहिए। असली जीवन का नाम ही लगातार संघर्षों की कहानी है।

#Copied...

ओमप्रकाश का सच

 A man had a fullsome meal in a modest restaurant in Bombay and when the waiter presented the bill he went straight to the manager and admitted honestly that he had no money. He added  that he hadn't eaten for the past two days and was terribly hungry so was forced to do this. The manager heard his story patiently as the man promised that the day he gets a job the first thing he would do was to settle the bill. The manager smiled and told him to leave wishing him luck. The waiter who stood watching the drama was aghast. He questioned the manager "Saab why did you let him go". The manager replied, "Go and do your work". Few months later the same man came to the restaurant and settled his pending bill to the utter dismay of the waiter. The man thanked the manager and told him that he had bagged an acting offer. The manager visibly happy offered him a cup of tea and a  friendship bloomed between the two. The actor soon became a known face and did multiple films at a time. Later he owned a bungalow and a chaufer driven car. Times had changed but everytime he passed by that area he made it a point to visit the restaurant for a cup of tea with the manager who has shown incredible sympathy years ago. Faith at times does wonders. Had the manager thrashed and humiliated the hungry man that day maybe the industry wouldn't have got a talented and natural actor called Om Prakash. Remembering the veteran actor on his birth anniversary 🙏


Born 19 - 12 -1919


Death  21- 02 -1998

#copied

आज़ाद हिंद फ़ौज से सिनेमा जगत तक नाज़िर हुसैन का सफ़र

आज़ाद हिंद फ़ौज से सिनेमा जगत तक नाज़िर हुसैन का सफ़र



नाज़िर हुसैन का जन्म 15 मई 1922 को उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले के उसिया नामक गाँव में हुआ था। हिंदी सिनेमा में अपने भावात्मक किरदारों के कारण आंसुओं का कनस्तर नाम से मशहूर नाज़िर हुसैन के पिता रेलवे में गार्ड की नौकरी करते थे और उन्होने ख़ुद भी बतौर फायरमैन रेलवे में काम किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में नाज़िर ब्रिटिश आर्मी में शामिल हुए जहाँ इन्हें मलेशिया और सिंगापुर में तैनात किया गया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस से काफ़ी प्रभावित होने के कारण वे आज़ाद हिंद फौज में शामिल हो गए।



देश की आज़ादी के बाद नाज़िर ने थियेटर का रुख़ किया,कलकत्ता में इन्होंने रंगमंच पर बहुत से नाटक किये जहाँ उनकी मुलाकात बिमल रॉय से हुई। बिमल रॉय ने नाज़िर के आज़ाद हिंद फौज के अनुभवों पर आधारित फिल्म बनाने का फैसला किया और पहला आदमी नामक फ़िल्म बनी जिसमे नाज़िर ने ना केवल एक्टिंग की बल्कि बतौर स्क्रीन राइटर और डायलॉग राइटर का भी काम किया। इस फ़िल्म की सफलता के बाद उन्होंने बिमल रॉय के साथ और भी कई फिल्में की जैसे दो बीघा जमीन और देवदास। उन्होंने हिंदी सिनेमा में 500 से अधिक फिल्मों में बतौर चरित्र अभिनेता का काम किया।



नाज़िर के सिनेमा जगत का सफ़र केवल इतना न था,जब नाज़िर की मुलाकात देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद से हुई तब उन्होने नाज़िर से क्षेत्रीय भाषाओं में सिनेमा बनाने के बारे में अपनी इच्छा ज़ाहिर की। डाॅक्टर राजेन्द्र प्रसाद के इस सुझाव के बाद उन्होंने भोजपुरी फ़िल्म की नींव रखी और पहली भोजपुरी फ़िल्म “गंगा मैया तोहे पियरी चढइबो” बनकर तैयार हुई।इसी वजह से उन्हें भोजपुरी सिनेमा के पितामह के रूप में भी जाना जाता है।

इस फ़िल्म की पटकथा नाज़िर हुसैन ने लिखी और इस फिल्म मे उन्होने अभिनय भी किया। बिहार के विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी इस फिल्म के निर्माता बनने को राज़ी हो गये और इस फिल्म का निर्देशन कुंदन कुमार ने किया। वहीं फिल्म में संगीत दिया था चित्रगुप्त ने, शैलेन्द्र ने गीत लिखे और मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की गायकी ने धूम मचा दी थी।

इसके बाद उन्होंने फ़िल्म “बलम परदेसिया” का निर्देशन किया जिसने भोजपुरी सिनेमा को एक नए आयाम पर पहुँचा दिया।

भोजपुरी और हिंदी सिनेमा जगत में अपने रचनात्मक योगदान के लिए नाज़िर हुसैन हमेशा याद किए जाएंगे।

हास्य अभिनेता 'महमूद अली '

 हास्य अभिनेता 'महमूद अली 'की पुण्य तिथि (23 जुलाई 2004) पर विशेष


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उस समय महमूद की मांग का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है वे तत्कालीन हीरो और विलेन से ज़्यादा फ़ीस लिया करते थे। फ़िल्म 'मैं सुंदर हूँ' में लीड एक्टर थे विश्वजीत।...... इस फ़िल्म में काम करने के लिए विश्वजीत ने 2 लाख रुपए लिए जबकि महमूद ने 8 लाख लिए। ....वैसे ही फ़िल्म 'हमजोली' के लिए उन्हें जितेंद्र से ज़्यादा पैसे मिले। ....अब जब उनके पास एक से एक महंगी कारे थे और महमूद एक बड़े स्टार बन गए थे उनके पास किसी चीज़ की कमी नहीं थी लेकिन बावजूद इसके बचपन में घटी इस घटना ने महमूद के जीवन में ऐसा गहरा प्रभाव डाला था वो उस साईकल वाली घटना को ताउम्र नहीं भूले ........अपने संघर्ष के दिनों में माली हालत ठीक करने के लिए महमूद ने मलाड से विरार के बीच चलने वाली लोकल में टॉफ़ियां तक ​​बेचीं। ड्राइवर बन कर लोगो की गाड़ी चलाई इसलिए वो गरीबी का दर्द समझते थे ...


महमूद ने कईयों का कॅरियर संवारा उसमें से एक पंचम भी हैं। पंचम यानी राहुल देव बर्मन, जिन्हें आर डी कहते हैं। इन्हें महमूद ने फ़िल्म 'छोटे नवाब' में बतौर संगीतकार लिया। अमिताभ बच्चन को अपनी फिल्म 'बॉम्बे तो गोवा ' के लिए महमूद ने उस वक्त साईन किया जब लोग उन्हें पहचानते भी नहीं थे .....


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पवन मेहरा ✒


#ब्लॉग_सुहानी_यादें_बीते_सुनहरे_दौर_की