शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

हिन्दी उपन्यास का विकास

हिंदी उपन्यास का आरम्भ श्रीनिवासदास के "परीक्षागुरु' (१८४३ ई.) से माना जाता है। हिंदी के आरम्भिक उपन्यास अधिकतर ऐयारी और तिलस्मी किस्म के थे। अनूदित उपन्यासों में पहला सामाजिक उपन्यास भारतेंदु हरिश्चंद्र का "पूर्णप्रकाश' और चंद्रप्रभा नामक मराठी उपन्यास का अनुवाद था। आरम्भ में हिंदी में कई उपन्यास बँगला, मराठी आदि से अनुवादित किए गए।

हिंदी में सामाजिक उपन्यासों का आधुनिक अर्थ में सूत्रपात प्रेमचंद (१८८०-१९३६) से हुआ। प्रेमचंद पहले उर्दू में लिखते थे, बाद में हिंदी की ओर मुड़े। आपके "सेवासदन', "रंगभूमि', "कायाकल्प', "गबन', "निर्मला', "गोदान', आदि प्रसिद्ध उपन्यास हैं, जिनमें ग्रामीण वातावरण का उत्तम चित्रण है। चरित्रचित्रण में प्रेमचंद गांधी जी के "हृदयपरिवर्तन' के सिद्धांत को मानते थे। बाद में उनकी रुझान समाजवाद की ओर भी हुई, ऐसा जान पड़ता है। कुल मिलाकर उनके उपन्यास हिंदी में आधुनिक सामाजिक सुधारवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जयशंकर प्रसाद के "कंकाल' और "तितली' उपन्यासों में भिन्न प्रकार के समाजों का चित्रण है, परंतु शैली अधिक काव्यात्मक है। प्रेमचंद की ही शैली में, उनके अनुकरण से विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक, सुदर्शन, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि अनेक लेखकों ने सामाजिक उपन्यास लिखे, जिनमें एक प्रकार का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद अधिक था। परंतु पांडेय बेचन शर्मा "उग्र', ऋषभचरण जैन, चतुरसेन शास्त्री आदि ने फरांसीसी ढंग का यथार्थवाद और प्रकृतवाद (नैचुरॉलिज़्म) अपनाया और समाज की बुराइयों का दंभस्फोट किया। इस शेली के उपन्यासकारों में सबसे सफल रहे "चित्रलेखा' के लेखक भगवतीचरण वर्मा, जिनके "टेढ़े मेढ़े रास्ते' और "भूले बिसरे चित्र' बहुत प्रसिद्ध हैं। उपेन्द्रनाथ अश्क की "गिरती दीवारें' का भी इस समाज की बुराइयों के चित्रणवाली रचनाओं में महत्वपूर्ण स्थान है। अमृतलाल नागर की "बूँद और समुद्र' इसी यथार्थवादी शैली में आगे बढ़कर आंचलिकता मिलानेवाला एक श्रेष्ठ उपन्यास है। सियारामशरण गुप्त की नारी' की अपनी अलग विशेषता है।

मनोवैज्ञानिक उपन्यास जैनेंद्रकुमार से शुरू हुए। "परख', "सुनीता', "कल्याणी' आदि से भी अधिक आप के "त्यागपत्र' ने हिंदी में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान दिया। जैनेंद्र जी दार्शनिक शब्दावली में अधिक उलझ गए। मनोविश्लेषण में स. ही. वात्स्यायन "अज्ञेय' ने अपने "शेखर : एक जीवनी', "नदी के द्वीप', "अपने अपने अजनबी' में उत्तरोत्तर गहराई और सूक्ष्मता उपन्यासकला में दिखाई। इस शैली में लिखनेवाली बहुत कम मिलते हैं। सामाजिक विकृतियों पर इलाचंद्र जोशी के "संन्यासी', "प्रेत और छाया', "जहाज का पंछी' आदि में अच्छा प्रकाश डाला गया है। इस शैली के उपन्यासकारों में धर्मवीर भारती का "सूरज का सातवाँ घोड़ा' और नरेश मेहता का "वह पथबंधु था' उत्तम उपलब्धियाँ हैं।

ऐतिहासिक उपन्यासों में हजारीप्रसाद द्विवेदी का "बाणभट्ट की आत्मकथा' एक बहुत मनोरंजक कथाप्रयोग है जिसमें प्राचीन काल के भारत को मूर्त किया गया है। वृंदावनलाल वर्मा के "महारानी लक्ष्मी बाई', "मृगनयनी' आदि में ऐतिहासिकता तो बहुत है, रोचकता भी है, परंतु काव्यमयता द्विवेदी जी जैसी नहीं है। राहुल सांकृत्यायन (१८९५-१९६३), रांगेय राघव (१९२२-१९६३) आदि ने भी कुछ संस्मरणीय ऐतिहासिक उपन्यास दिए हैं।

यथार्थवादी शैली सामाजिक यथार्थवाद की ओर मुड़ी और "दिव्या' और "झूठा सच' के लेखक भूतपूर्व क्रांतिकारी यशपाल और "बलचनमा' के लेखक नागार्जुन इस धारा के उत्तम प्रतिनिधि हैं। कहीं कहीं इनकी रचनाओं में प्रचार का आग्रह बढ़ गया है। हिंदी की नवीनतम विधा आंचलिक उपन्यासों की है, जो शुरु होती है फणीश्वरनाथ "रेणु' के "मैला आँचल' से और उसमें अब कई लेखक हाथ आजमा रहे हैं, जैसे राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, शैलेश मटियानी, राजेंद्र अवस्थी, मनहर चौहान, शिवानी इत्यादि।

रविवार, 4 अप्रैल 2021

संघर्ष ks जादू

 तस्वीर में आप एक टमाटर के पौधे को देख रहे होंगे, शायद किसी यात्री ने टमाटर के बीज को ट्रेन से फेंक दिया होगा। ये पौधा मिट्टी की छाती फाड़कर नही बल्कि पत्थरों को चीरकर बाहर आया है।


जब ये ओर भी नन्हा सा होगा, तब शताब्दी ओर राजधानी जैसे तूफान से भी तेज दौड़ती ट्रेनों के बिल्कुल पास से गुजरते हुए भी इसने सिर्फ बढ़ना सीखा ओर बढ़ते बढ़ते आखिर कार इसने एक टमाटर को जन्म दे ही दिया।


इस पौधे के न हाथ है, न पांव, न ही दिमाग है, ओर तो ओर इसको जीवित रहने के लिए कम से कम मिट्टी और पानी तो मिलना चाहिए ही था, जो इसका हक भी था।


लेकिन इस पौधे ने बिना जल, बिना मिट्टी के, बिना की सुविधा के अपने आपको बड़ा किया और फला फूला, ओर जो इस पौधे के जीवन का उद्देश्य एक ओर फल को देना था, वो उद्देश्य इसने पूरा किया।


हम इंसानों के पास तो हाथ है, पांव है, दिमाग है, उसके बाद भी यदि हम जीवन मे अपने आपको कमजोर मानकर, जीवन को सही प्रकार से, जो हमारे जीवन का उद्देश्य है, इस प्रकार से नही जीते है तो इस जीवन मे आने का कोई औचित्य बचता ही नही है।


जिन लोगो को लगता है कि जीवन मे हम तो असफल हो गए हम तो जीवन मे कुछ कर ही नही सकते, हम तो बस अब बरबाद हो ही चुके है, तो उन्हें इस टमाटर के पौधे से कुछ सीख लेनी चाहिए। असली जीवन का नाम ही लगातार संघर्षों की कहानी है।

#Copied...

ओमप्रकाश का सच

 A man had a fullsome meal in a modest restaurant in Bombay and when the waiter presented the bill he went straight to the manager and admitted honestly that he had no money. He added  that he hadn't eaten for the past two days and was terribly hungry so was forced to do this. The manager heard his story patiently as the man promised that the day he gets a job the first thing he would do was to settle the bill. The manager smiled and told him to leave wishing him luck. The waiter who stood watching the drama was aghast. He questioned the manager "Saab why did you let him go". The manager replied, "Go and do your work". Few months later the same man came to the restaurant and settled his pending bill to the utter dismay of the waiter. The man thanked the manager and told him that he had bagged an acting offer. The manager visibly happy offered him a cup of tea and a  friendship bloomed between the two. The actor soon became a known face and did multiple films at a time. Later he owned a bungalow and a chaufer driven car. Times had changed but everytime he passed by that area he made it a point to visit the restaurant for a cup of tea with the manager who has shown incredible sympathy years ago. Faith at times does wonders. Had the manager thrashed and humiliated the hungry man that day maybe the industry wouldn't have got a talented and natural actor called Om Prakash. Remembering the veteran actor on his birth anniversary 🙏


Born 19 - 12 -1919


Death  21- 02 -1998

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आज़ाद हिंद फ़ौज से सिनेमा जगत तक नाज़िर हुसैन का सफ़र

आज़ाद हिंद फ़ौज से सिनेमा जगत तक नाज़िर हुसैन का सफ़र



नाज़िर हुसैन का जन्म 15 मई 1922 को उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले के उसिया नामक गाँव में हुआ था। हिंदी सिनेमा में अपने भावात्मक किरदारों के कारण आंसुओं का कनस्तर नाम से मशहूर नाज़िर हुसैन के पिता रेलवे में गार्ड की नौकरी करते थे और उन्होने ख़ुद भी बतौर फायरमैन रेलवे में काम किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में नाज़िर ब्रिटिश आर्मी में शामिल हुए जहाँ इन्हें मलेशिया और सिंगापुर में तैनात किया गया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस से काफ़ी प्रभावित होने के कारण वे आज़ाद हिंद फौज में शामिल हो गए।



देश की आज़ादी के बाद नाज़िर ने थियेटर का रुख़ किया,कलकत्ता में इन्होंने रंगमंच पर बहुत से नाटक किये जहाँ उनकी मुलाकात बिमल रॉय से हुई। बिमल रॉय ने नाज़िर के आज़ाद हिंद फौज के अनुभवों पर आधारित फिल्म बनाने का फैसला किया और पहला आदमी नामक फ़िल्म बनी जिसमे नाज़िर ने ना केवल एक्टिंग की बल्कि बतौर स्क्रीन राइटर और डायलॉग राइटर का भी काम किया। इस फ़िल्म की सफलता के बाद उन्होंने बिमल रॉय के साथ और भी कई फिल्में की जैसे दो बीघा जमीन और देवदास। उन्होंने हिंदी सिनेमा में 500 से अधिक फिल्मों में बतौर चरित्र अभिनेता का काम किया।



नाज़िर के सिनेमा जगत का सफ़र केवल इतना न था,जब नाज़िर की मुलाकात देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद से हुई तब उन्होने नाज़िर से क्षेत्रीय भाषाओं में सिनेमा बनाने के बारे में अपनी इच्छा ज़ाहिर की। डाॅक्टर राजेन्द्र प्रसाद के इस सुझाव के बाद उन्होंने भोजपुरी फ़िल्म की नींव रखी और पहली भोजपुरी फ़िल्म “गंगा मैया तोहे पियरी चढइबो” बनकर तैयार हुई।इसी वजह से उन्हें भोजपुरी सिनेमा के पितामह के रूप में भी जाना जाता है।

इस फ़िल्म की पटकथा नाज़िर हुसैन ने लिखी और इस फिल्म मे उन्होने अभिनय भी किया। बिहार के विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी इस फिल्म के निर्माता बनने को राज़ी हो गये और इस फिल्म का निर्देशन कुंदन कुमार ने किया। वहीं फिल्म में संगीत दिया था चित्रगुप्त ने, शैलेन्द्र ने गीत लिखे और मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की गायकी ने धूम मचा दी थी।

इसके बाद उन्होंने फ़िल्म “बलम परदेसिया” का निर्देशन किया जिसने भोजपुरी सिनेमा को एक नए आयाम पर पहुँचा दिया।

भोजपुरी और हिंदी सिनेमा जगत में अपने रचनात्मक योगदान के लिए नाज़िर हुसैन हमेशा याद किए जाएंगे।

हास्य अभिनेता 'महमूद अली '

 हास्य अभिनेता 'महमूद अली 'की पुण्य तिथि (23 जुलाई 2004) पर विशेष


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उस समय महमूद की मांग का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है वे तत्कालीन हीरो और विलेन से ज़्यादा फ़ीस लिया करते थे। फ़िल्म 'मैं सुंदर हूँ' में लीड एक्टर थे विश्वजीत।...... इस फ़िल्म में काम करने के लिए विश्वजीत ने 2 लाख रुपए लिए जबकि महमूद ने 8 लाख लिए। ....वैसे ही फ़िल्म 'हमजोली' के लिए उन्हें जितेंद्र से ज़्यादा पैसे मिले। ....अब जब उनके पास एक से एक महंगी कारे थे और महमूद एक बड़े स्टार बन गए थे उनके पास किसी चीज़ की कमी नहीं थी लेकिन बावजूद इसके बचपन में घटी इस घटना ने महमूद के जीवन में ऐसा गहरा प्रभाव डाला था वो उस साईकल वाली घटना को ताउम्र नहीं भूले ........अपने संघर्ष के दिनों में माली हालत ठीक करने के लिए महमूद ने मलाड से विरार के बीच चलने वाली लोकल में टॉफ़ियां तक ​​बेचीं। ड्राइवर बन कर लोगो की गाड़ी चलाई इसलिए वो गरीबी का दर्द समझते थे ...


महमूद ने कईयों का कॅरियर संवारा उसमें से एक पंचम भी हैं। पंचम यानी राहुल देव बर्मन, जिन्हें आर डी कहते हैं। इन्हें महमूद ने फ़िल्म 'छोटे नवाब' में बतौर संगीतकार लिया। अमिताभ बच्चन को अपनी फिल्म 'बॉम्बे तो गोवा ' के लिए महमूद ने उस वक्त साईन किया जब लोग उन्हें पहचानते भी नहीं थे .....


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पवन मेहरा ✒


#ब्लॉग_सुहानी_यादें_बीते_सुनहरे_दौर_की


बुधवार, 31 मार्च 2021

कातिल मुस्कान ही थी शशि की पहचान

 शशिकला.... खुबसूरत और  तुफानी  मुसकराहट की मालकिन...! 


शशिकला का जन्म ता.4.8.1932  के रोज  सोलापुर में एक महाराष्ट़ियन फेमीली में हुआ था.. उनके पिता जी अनंत राव जावलकर  कपडे़ के वयापारी थे.. धनवान शिक्षीत और गौरव गौरव शाली फेमीली था... पर न जाने कया हुआ....!  जावलकर फेमीली के  बुरे दिन आये..! परिवार गरीब हो गया और  बडे परिवार को निभाने का फर्ज शशिकला को अदा करना पडा...! 


शशिकला के भाई को चारटर एकाउंटेंट बनाने के लिए इंग्लैंड भेजा गया था.. आशा थी कि  वह परिवार की देखभाल करेगा.... पर अफ़सोस..! वह वापिस आया ही नहीं... परिवार को गरीबी में छोड़ कर वह इंग्लैंड में ही सेटल हो गया!. 


शशिकला को बचपन से ही अभीनय का शौक था.


शशिकला के पिता जी के एक मित्र ने शशिकला को फिल्मों में नशीब आजमाने की नशिहत दी.. 


शशिकला और उनके पिताजी ने फिल्म स्टुडियो के चककर काटना शुरू किया... 


एक बार उस समय की  जानी मानी अभीनेत्री नूरजहां ने शशिकला को देखा और उसे फिल्म जीन्नत के लिए पसन्द करली...! इस तरह जीन्नत  शशिकला की पहेली फिल्म थी.


शशिकला  इस फिल्म में एक कव्वाली  आहे न भरी शिकवे न किये कुछ भी न जुबां से काम लीया..पे परदे पर दिखाई दी.. मेरा खयाल हे.. शायद अभीनेत्री शयामा भी इसी फिल्म में इसी कव्वाली में परदे पर दिखाई दी थी...! 


उसके बाद 1947 में नुरजहा दिलीप कुमार की फिल्म जुगनू आइ.. इस फिल्म में गायिका रोशन आरा बेगम का गाया हुआ   देश की पुरफेंक दिलकश हवा ओ मे रंगी.. गीत शशिकला पर फिलमाया गया... उस वक्त शशिकला बेहद खुबसूरत लगती थी तो उस गीत मे शशिकला के  बहोत सारे कलोज अप परदे पर दिखाये गये... फिल्म की हिरोइन नुरजहा से भी ज्यादा...! 


उसके बाद  1950 मे दिलीप कुमार कामीनी कौशल की फिल्म आरजू में भी शशिकला कमला के रोल में दिखाई दी.


शशिकला  बहोत ही प़तीभाशाली और खुबसूरत होते हुए भी उसे हिरोइन की भुमिकाए जयादा मिली नहीं.और जीस फिल्म में वह हिरोइन थी वह फिलमें फलोप हो गई..! 1953 में शममीकपुर के साथ शशिकला की एक  फिल्म जिवन जयोती आइ थी.इस फिल्म में शशिकला हिरोइन थी.शायद शममी कपुर की भी शुरूआत की फिल्म थी. फिल्म खास चली नहीं


शशिकला को हिरोइन के रोल न मिले तो उसने जो भी फिलमें मिले वह लेना शुरू कर दिया.. केरेक्टर रोल करने लगी.. घर जो चलाना था..! पैसे की बहोत जरूरत थी..! 


1962 में ताराचंद बडजातया की फिल्म आरती आइ. अशोक कुमार  मीना कुमारी और प़दिप कुमार भी थे इस फिल्म में.. एक मराठी नाटक पर आधारित थी इस फिल्म.शशिकला को फिल्म में झगडालू और कमिनी भाभी का रोल ओफर किया गया.. शशिकला के फेमीली वालों ने उस रोल को स्विकार लेने को दुराग्रह किया.. शशिकला ने रोल किया.. शशिकला के अभीनय की बहुत प़संसा हुइ..  फिल्म आरती के लिए शशिकला को सन 1962 का बेस्ट  सपोर्टिंग एकट़ेश का फिल्म फेर एवोर्ड भी मिला था..! 


फिर कया...! शशिकला को बहोत सारी फिलमें मिलने लगी.. जयादा तर वेंप के रोल मिलते थे...! फिल्म फूल और पतथर और अनुपमा के रोल के लिए  नोमीनेशन मिला पर फिल्म फेर एवोर्ड न मिलने से निराश भी हुई.....! पर  फिल्मों से पैसे मिलने से फेमीली को सेट कर शकी... 


1970 के दशक का पूर्वांध शशिकला के जीवन का सबसे खराब समय रहा... फिल्मों में काम मिलना कम हो रहा था.. शशिकला  व्यवसायीक और  पारावारिक समस्याओं से दुखी हो गई...! वह ईगतपुर चली गई.. ! 


कइ साल योगासन और ध्यानासन में गुजारे.. मधर टेरेसा के साथ रहे कर  दुखी लोगों की सेवा भी की. और मन की शांति  पाइ.. शशिकला की एक बेटी केंसर ग़सित होकर परलोक सिधार  ग इ.... लेकिन शशिकला ने अपने आप को संभाला...! 


उसके बाद... 


आठ साल के बाद  शशिकला ने फिल्म और  टीवी के छोटे परदे पर  फिर से पुरना गमन  किया... 


कूछ टीवी सीरीयलो और महाराजा.. लहुके दो रंग.. सलमा पे दिल आ गया जैसी फिलमों में भी काम किया... सावन कुमार ने कहा था.. मीना कुमारी के लिये जो रोल लिखा था वह शशिकला ने अदा किया...! 


शशिकला ने फिल्म आरती.. गुमराह.. हरियाली और रास्ता.. अनपढ़.. जंगली.. यह रास्ते हे प्यार के.. वक्त जैसी कई फिलमों में काम किया.. 


फिल्म पदमश्री लालू प्रसाद यादव में शायद शशिकला को आखिरी बार देखा था.


फिल्म वक्त 1965 की रानी साहेबा.. जिस के गले में से राजा(राजकुमार) हार चुराता हे.. और फिल्म फूल और पतथर का वह मशहूर गाना शिशे से पी या पैमाने से पी.. या मेरी आंखों के मैखाने से पी... वाले शशिकला के रोल आज भी नजर के सामने घुमते हे..! 


और...! फिल्म गुमराह की असली हिरोइन तो शशिकला ही थी..! कैसी हसीन लगती थी वोह..! Killer smile  के साथ उंगली में  चेइन हिलाते चलना.. फिल्म गुमराह में उनकी लाक्षणिक अदा थी..! फिल्म गुमराह में शशिकला का अभीनय जानदार था और उसके लिए शशिकला को सन 1964 में बेस्ट सपोर्टिंग एकट़ेस का फिल्म फेर एवोर्ड भी मिला था..! 


शशिकला ने ओम प्रकाश सयगल से शादी की हे.


शशिकला मेरी फेवरिट अदाकारा हे..  कल 4 अगस्त उनकी  birth date हे.... Happy birthday shashikala ji in advance...!!

सोमवार, 22 मार्च 2021

प्राण या अभिनय के प्राण

 अभिनय के प्राण  👍 जब #प्राण ने #बॉबी फ़िल्म के लिए मात्र 1 रुपये ली फीस 💐💐


प्राण उसूलों वाले एक्‍टर थे। उनके लिए पर्दे पर चमकने से ज्‍यादा महत्‍व उनके जिंदगी के कायदे थे। यही कारण है कि प्राण ने एक्टर और डायरेक्टर #राजकपूर की फिल्म ‘बॉबी’ के लिए महज एक रुपये की फीस ली थी। दरअसल, राजकपूर ने अपनी सारी पूंजी फिल्म ‘#मेरा_नाम #जोकर’ पर लगा दी थी 

और वो फिल्म #बॉक्स_ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप हो गई थी। #आर्थिक दिक्‍कतों से जूझ रहे राजकपूर के लिए यह प्राण की दोस्‍ती थी, जो काम के आड़े नहीं आ सकती थी ..

प्राण ने खलनायकी को नया मुकाम दिया। जब वो पर्दे पर आते थे तो दर्शकों की आंखे बस उनपर ही टिक जाती थी।

प्राण (12 फ़रवरी 1920 - 12 जुलाई 2013) 

हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रमुख चरित्र अभिनेता थे । इस भारतीय #अभिनेता ने हिन्दी सिनेमा में 1940 से 1990 के दशक तक दमदार खलनायक और नायक का अभिनय किया।

 उन्होंने 350 से अधिक फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने खानदान (1942), और #हलाकू (1956) जैसी फ़िल्मों में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभायी। उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय मधुमती (1958), जिस देश में गंगा बहती है (1960), उपकार (1967), शहीद (1965), आँसू बन गये फूल (1969), जॉनी मेरा नाम (1970), विक्टोरिया नम्बर २०३ (1972), बे-ईमान (1972), ज़ंजीर (1973), डॉन (1978) और दुनिया (1984) फ़िल्मों में माना जाता है।


प्राण ने अपने कैरियर के दौरान विभिन्न #पुरस्कार और #सम्मान अपने नाम किये। उन्होंने 1967, 1969 और 1972 में फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार और 1997 में #फिल्मफेयर लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड जीता। उन्हें सन् 2000 में स्टारडस्ट द्वारा 'मिलेनियम के #खलनायक' द्वारा पुरस्कृत किया गया। 2001 में भारत सरकार ने उन्हें #पद्म_भूषण से सम्मानित किया और भारतीय सिनेमा में योगदान के लिये 2013 में #दादा_साहब_फाल्के सम्मान से नवाजा गया।


#AND

#PRAN....💐💐

जन्मदिन पर विशेष 🌹