शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

शिक्षा परम्परा उन्नति औऱ घर की सामाजिक स्थिति: एक सार्थक चर्चा

Pintu Shailendra Jaruhar:


 आज की युवा पीढ़ी को इस बात का थोड़ा भी अनुमान नहीं रहता है कि उसके माता-पिता इस तरह की तकलीफें एवं अपनी शौक की तिलांजलि दे कर उनका लालन-पालन कर रहे हैं।जब वे माता-पिता बनेंगे तभी उनको इसका इल्म होगा। अभी आप उन्हें कुछ भी कहे उन्हें समझ नहीं आएगा।


 Titu आत्म स्वरूप:


Nahi aayega na bhai .. Pidhiyan change ho gayee ab ham sound position me aa gaye


Titu आत्म स्वरूप:


Hamare dada kheti papa Govt job aur ham log better financial job and beta enterpreuner


Pintu Shailendra Jaruhar:


 यह सभी पर लागू नहीं होता।आप सौभाग्यशाली है।



Titu आत्म स्वरूप:


पीढियों के साथ उन्नति बढ़ती ही है इतिहास यही कहता है जो कल एक छोटा दुकान था आज साम्राज्य है        अगर नही बढ़ता तो विचारनिय है क्यूं की माँ बाप का संघर्ष व्यर्थ हो गया



Pintu Shailendra Jaruhar:


उन्नति का अभिप्राय विभिन्न पहलुओं पर विचार करने की जरूरत है। वित्तीय उन्नति की प्रतिफल में प्रसन्नता की एक सिमा हैं । मां बाप अपने बच्चों की इस सफलता पर इतराता नहीं अघाते। स्वाभाविक भी है। किंतु समाज में जो देखने सुनने को मिल रहा है उसको भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। अमेरिका, लंदन, कनाडा में बच्चें डालर कमाने की होड़ में मां बाप की संवेदना की किमत भी डालर से ही लगा बैठते हैं और उसकी किमत दुर्भाग्य से कम ही आंक पाते हैं।


आप सफल मां बाप है या नहीं उसे धन दौलत से नहीं आंक सकते।जब आप कमजोर,बिमार एवं असहाय हो तभी समझ में आएगा। ऐसे भगवान करे यह समझ किसी की जिंदगी में ना आए।


Titu आत्म स्वरूप:


 भाई हम मध्यम वर्गीय की बात करें, जब माँ बाप का सपना साकार कर रहे हो तो ये तो पता है कि हमारा वतन सब छूटेगा और संघर्ष का आलम ये है कि जब लोग घर मे पकवान खाते थे भाई तो हम भोजन को तरसते थे आज भी 8 शाम का भोजन सड़ा गला खाते है क्यों कि बेहतर आज और बेहतर कल हो अगर बाल बच्चे लायक नही हो और सर पे बोझ हो तो शायद बुढापा ज्यादा कष्टप्रद है रही बात श्रवण कुमार की तो ये प्रतियोगिता नही है प्यार दिखाने की नही महसूस करने की चीज है


Pintu Shailendra Jaruhar:


 इसे आज की युवा पीढ़ी नहीं समझती। यही तो मैं कह रहा हूं। और दिल की दिल ही समझे यही बेहतर है।


आत्म स्वरूप



: यही मेरा कहना है कि value based एजुकेशन और खुद example, हमने बचपन मे ये देखा कि मेरे पापा ने अपने पापा की सेवा की कभी जवाब नही दिया हमने क्या सीखा मेरे चार भाइयों ने आज तक पापा को पलट के जवाब नही दिया,बच्चों को केवल शिक्षा नही नैतिक शिक्षा भी देना चाहिए और निश्चित है कि अगर आम का पेड़ लगाया है तो 99.9% आम ही मिलेगा😃🙏


Pintu Shailendra Jaruhar:


आम तो आम ही देगा इसमें कोई संदेह नहीं।आम रसेदार एवं लजीज है कि नहीं यह उम्र के साथ बढ़ता हुआ तजुर्बा बताता है और इसे आम लगाने वाला ही बेहतर समझता है।



Titu आत्म स्वरूप:


न भाई इतनी समझ सबको है लंबे तीर मत चलाइये


[93342 12078: Very nice  👌


👌👌✌🏼✌🏼👍🙃

मंगलवार, 5 अक्तूबर 2021

क्रोध औऱ सिद्धि / कृष्ण मेहता

 *दुर्वासा ऋषि बहुत क्रोधी स्वभाव के थे लेकिन फिर वह इतने सिद्ध पुरुष कैसे थे?*

"ऋषि दुर्वासा का नाम सुनते ही मन में श्राप का भय पैदा हो जाता है की कंही हमको कोई श्राप न दे दे उनका खौफ्फ़ तो देवो में भी रहता है तो हम तो साधारण इंसान है. जाने "


"दुर्वासा" नाम तो सुना ही होगा? इसका अर्थ है जिसके साथ न रहा जा सके, वैसे भी क्रोधी व्यक्ति से लोग दूर ही रहते है लेकिन दुर्वासा ऋषि के तो हजारो शिष्य थे जो साथ ही रहते थे. कब जन्मे कैसे पले बढ़े और अब कहा है दुर्वासा ऋषि ये तो आपको बिलकुल भी पता नहीं होगा.

सबसे पहले जाने दुर्वासा के जन्म और नामकरण की कथा, ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार एक बार शिव और पारवती में तीखी बहस हुई. गुस्से में आई पारवती ने शिव जी से कह दिया की आप का ये क्रोधी स्वाभाव आपको साथ न रहने लायक बनाता है, तब शिव ने अपने क्रोध को अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूया के गर्भ में स्थापित कर दिया.

इसी के चलते अत्रि और अनुसूया के पुत्र दुर्वासा का नामकरण भी पारवती के साथ न रहने लायक कहने के चलते दुर्वासा ही रखा गया. इसके पहले अनुसूया के त्रिदेवो को बालक बनाकर पुत्र रूप में मांगने की कथा तो आपने सुन ही रखी होगी अब जाने आगे की कहानी.


दुर्वासा ऋषि की शिक्षा पिता के सानिध्य में ही हुई थी लेकिन जल्द ही वो तपस्पि स्वाभाव के होने के चलते माता पिता को छोड़ वन में विचरने लगे थे. तब उनके पास एक ऋषि अपनी बेटी के साथ दुर्वासा के पास आये और उनसे अपनी बेटी का पाणिग्रहण करवा दिया. ऋषि ने दुर्वासा से अपनी बेटी के सब गुण कहे पर साथ में बताया उसका एक अवगुण जो सबपे भारी था.


ऋषि की लड़की का नाम था कंडली और उसमे एक ही अवगुण था की वो कलहकारिणी थी, दुर्वासा के उग्र स्वाभाव को जान ऋषि ने दुर्वासा से उसके सभी अपराध माफ़ करने की अपील की. ऐसे में दुर्वासा ने कहा की मैं अपनी पत्नी के 100 अपराध क्षमा करूँगा उसके बाद नहीं.


दोनों की शादी हो गई और ब्रह्मचारी दुर्वासा गृहस्थी में पड़ गए, लेकिन अपने स्वाभाव के चलते कंदली बात बात पर पति से कलह करती और अपने वरदान के चलते दुर्वासा को क्रोध सहना पड़ा.


जिन दुर्वासा के क्रोध से सृष्टि के जिव कांपते थे वो ही तब अपनी पत्नी के क्रोध से कांपते थे, कांपते इसलिए थे की उन्होंने वरदान दे दिया था और वो कुछ नहीं कर सकते थे. आलम ये था की दुर्वासा ने 100 से ज्यादा गलतिया (पत्नी की) माफ़ की लेकिन एक दिन उनका पारा असहनीय हो गया और उन्होंने तब अपनी ही पत्नी कंदली को भस्म कर दिया.


तभी उनके ससुर आ पहुंचे और दुर्वासा की ये करनी देख उन्होंने उन्हें श्राप दे दिया और कहा की तुमसे सहन नहीं हुई तो उसका त्याग कर देना चाहिए था इसे मारा क्यों. इसी गलती के चलते दुर्वासा को अमरीश जी से बेइज्जत होना पड़ा था, अन्यथा रुद्रावतार का सुदर्शन क्या कर सकता था.


उस घटना के दिन से ही कंदली की राख कंदली जाती बन गई और आज भी वो जाती मौजूद है....... इसके आलावा श्री कृष्ण की वो बहिन (यशोदा की बेटी) जिसे कंस ने मारना चाहा था बाद में वासुदेव देवकी ने पाला और दुर्वासा से ही उनका तब विवाह हुआ था. उसका नाम था एकविंशा है न अद्भुद कथा...


कर्ण से प्रेरित दुर्योधन ने योजनाबद्ध तरीके से दुर्वासा ऋषि और उनके हजारो शिष्यों को वनवासी पांडवो के पास तब भेजा जब वो भोजन कर चुके थे. हालाँकि पांडवो के पास अक्षय पात्र था लेकिन जब तक द्रौपदी न खाली तब तक ही उसमे भोजन रहता था और द्रौपदी तब खा चुकी थी.


ऐसे में दुर्वासा पहुँच गए और स्नान के लिए नदी किनारे गए तो द्रौपदी ने श्री कृष्ण को याद किया, श्री कृष्ण उस समय भोजन की थाली पर बैठे थे और थाली छोड़ कर अपनी परम भक्त की मदद को पहुँच गए. श्री कृष्ण ने तब अक्षय पात्र में बचे तिनके को खाकर अपनी और समस्त संसार की भूख शांत कर दी जिसमे दुर्वासा जी भी शामिल थे.

लेकिन दुर्वासा जान गए थे श्री कृष्ण की ये करनी, तब दुर्वासा जी ने श्री कृष्ण से कहा की शास्त्रों का लेख है की परोसी हुई थाली नहीं छोड़नी चाहिए और किसी का झूठा नहीं खाना चाहिए. आपने ऐसा किया है इसलिए आप को मेरा श्राप है की भोजन केलिए लड़ते हुए ही आपका वंश नाश हो जायेगा और ऐसा ही हुआ था.

लेकिन श्री कृष्ण सशरीर ही गोलोक गए थे हालाँकि कई जगह उन्हें देह त्याग की भी बात लिखी गई है, इसलिए परोसी हुई थाली न छोड़े और किसी का जूठा भी न खाये.

गुरुवार, 23 सितंबर 2021

बुध का कुंडली मे प्रभाव/ सिन्हा आत्म स्वरूप

 


बुध ग्रह ज्योतिषशास्त्र में एक तटस्थ ग्रह माना जाता है। वैसे तो बुध (Mercury) जातक की कुंड़ली में स्थिति व प्रभाव के अनुसार परिणाम देता है। कुंडली में कुल बारह भाव होते हैं। ज्योतिष के मुताबिक ग्रह इन भावों के अनुसार ही परिणाम देते हैं। बुध ग्रह पर भी यह नियम लागू होता है। इस लेख में हम बुध ग्रह के ज्योतिषीय व पौराणिक तथा खगोलीय महत्व के साथ ही बुध का हमारे जीवन पर कैसे व क्या असर डाल सकते हैं। बुध मंत्र, यंत्र, रत्न, मूल तथा उपाय के बारे में जानेंगे। तो आइये जानते हैं बुध ग्रह के बारे में –


बुध ग्रह

बुध ग्रह का ज्योतिष में अपना ही आयाम है। बुध को ज्योतिष शास्त्र में वाणी का कारक माना जाता है। जिस जातक की कुंडली में बुध कमजोर होता है। वह संकोची होता है। अपनी बात रखने में उसे परेशानी होती है। इसके साथ ही वह जातक अपने वाणी पर नियंत्रण नहीं रख पाता वाणी के कारण उनके कार्य बिगड़ जाते हैं। खगोलीय दृष्टि से बुध मुख्यतः सौर वायुमंडल से आये परमाणुओं से बना है। बुध बहुत गर्म है जिससे ये परमाणु उड़कर अंतरिक्ष में चले जाते हैं। बुध ग्रह पृथ्वी और शुक्र के विपरीत है जिसका वातावरण स्थायी है, बुध (Mercury) का वातावरण लगातार बदलता रहता है।

 


 ज्योतिष में बुध ग्रह का महत्व

ज्योतिष में बुध ग्रह, हमारी जन्म कुंडली में स्थित 12 भावों पर अलग-अलग तरह से प्रभाव डालता है। इन प्रभावों का असर हमारे प्रत्यक्ष जीवन पर पड़ता है। ज्योतिष में बुध ग्रह को एक शुभाशुभ ग्रह माना गया है अर्थात ग्रहों की संगति के अनुरूप ही यह फल देता है। यदि बुध ग्रह शुभ ग्रहों के साथ युति में हैं तो यह शुभ फल और क्रूर ग्रहों की संगति में अशुभ फल देते हैं। ज्योतिष में बुध ग्रह को मिथुन और कन्या राशि के स्वामी के तौर पर मान्यता प्राप्त है। कन्या बुध (Mercury) की उच्च राशि भी है जबकि मीन इसकी नीच राशि मानी जाती है। वैदिक ज्योतिष में उपस्थित मान्य 27 नक्षत्रों में से बुध को अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र का स्वामित्व प्राप्त है। जिनमें जन्में जातक बुध से काफी प्रभावित रहते हैं।

 


बुध का मानव जीवन पर प्रभाव

हिन्दू ज्योतिष में बुध ग्रह को बुद्धि, तर्क और मित्र का कारक माना जाता है। वैदिक ज्योतिष में बुध को वाणी का भी कारक माना जाता है। ज्योतिष के मुताबिक सूर्य और शुक्र, बुध के मित्र हैं जबकि चंद्रमा और मंगल इसके शत्रु ग्रह हैं।

 

यदि शारीरिक संरचना पर बुध (Mercury) का प्रभाव देखा जाए तो जिस जातक की जन्म कुंडली में बुध ग्रह लग्न भाव में स्थित हो, वह व्यक्ति शारीरिक रूप से सुंदर होता है। जातक अपनी वास्तविक उम्र से काफी कम उम्र का दिखयी देता है तथा उसकी आँखें चमकदार होती हैं। ज्योतिष के मुताबिक जातक की कुंडली में लग्न में बुध हो तो जातक स्वभाव से  तर्कसंगत और  बौद्धिक रूप से धनी तथा कुशल वक्ता बनाता है।


किसी जातक की कुंडली में बुध ग्रह प्रभावी है तो जातक की संवाद शैली कुशल होती है। वह हाज़िर जवाबी होता है। जातक अपनी बातों व तर्कों से सबको मोह लेता है। बली बुध के कारण जातक कुशाग्र बुद्धि वाला होता है। ऐसे जातक वाणिज्य और कारोबार में सफल होते हैं। इसके साथ ही ये जातक संवाद और संचार के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाते हैं।

 

यदि जातक की जन्म कुंडली में बुध ग्रह किसी क्रूर अथवा पापी ग्रहों से पीड़ित हैं तो ये जातक के लिए सही नहीं हैं। ऐसा होने से जातक को शारीरिक और मानसिक रूप से समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जिसके कारण जातक अपने विचारों को स्पष्टता से नहीं रख पाता है। पीड़ित बुध के प्रभाव से व्यक्ति को कारोबार में हानि सामना करना पड़ता है।

 


बुध की पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यता के अनुसार बुध (Mercury) की माता तारा हैं और पिता चंद्रमा, परंतु हिंदू पौराणिक कथा में तारा को देव गुरू बृहस्पति की धर्म पत्नी के रूप में दर्शाया गया है। लेकिन बुध तारा व चंद्रमा के पुत्र हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एक पौराणिक कथा के मुताबिक चंद्रमा के उन्हें सम्मोहित कर अपने वश में कर लिया था इसके बाद तारा व चंद्रमा के शहवास के कारण बुध का जन्म हुआ। ब्रह्मा जी ने तारा व चंद्रमा के पुत्र का नाम बुध रखा। बुध ग्रह भगवान नारायण का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। हिंदू धर्म में बुध को देव की उपाधि प्राप्त है। सप्ताह में बुधवार का दिन बुध को समर्पित है।


यंत्र – बुध यंत्र

मंत्र - ओम ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः

रत्न - पन्ना

रंग  - हरा

उपाय – यदि बुध कमजोर हैं तो आपको उनके रत्न पन्ना को धारण करना चाहिए। इसके साथ ही बुध यंत्र का उपयोग करें। दान करने से भी आपको राहत मिल सकता है।

सोमवार, 20 सितंबर 2021

प्रयाराज का भ्र्म

 वृंदावन की मालकिन श्रीमति राधारानी....


ऐसा माना जाता है, कि सभी तीर्थों का राजा "प्रयागराज" है।


एक बार "प्रयागराज" के मन में ऐसा विचार आया, कि सभी तीर्थ मेरे पास आते है, केवल वृन्दावन मेरे पास नही आता....


प्रयागराज वैकुण्ठ में गए और प्रभु से पूछा....


प्रभु, आपने मुझे तीर्थों का राजा बनाया, लेकिन वृंदावन मुझे टैक्स देने नहीं आते ??


भगवान बहुत हंसे और हंसकर बोले.... 

हे "प्रयाग" मैंने तुझे केवल तीर्थो का राजा बनाया, मेरे घर का राजा नहीं बनाया। 

ब्रज वृन्दावन कोई तीर्थ नही है,वो मेरा घर है.... और घर का कोई मालिक नही होता.... घर की मालकिन होती है !!!!


वृन्दावन की अधीश्वरी श्रीमती राधारानी है और राधारानी की कृपा के बिना ब्रज में प्रवेश नहीं हो सकता....


कर्म के कारण हम शरीर से ब्रज में नहीं जा सकते, लेकिन मन ही मन में हम सब ब्रज वृन्दावन में वास कर सकते है.... 


भगवान कहते है.... शरीर से ब्रज में जाना.... इससे वह करोड़ों गुना बेहतर है, कि मन से ब्रज वृन्दावन में वास करना🙏


इसीलिए भगवान कहते है....


राधे मेरी स्वामनी,

मै राधे को दास

जन्म जन्म मोहे दीजियो श्री बृंदावन वास, 

श्री चरणो में वास !


,🌹🙏🌹 राधारानी की जय 🌹🙏🌹

शनिवार, 18 सितंबर 2021

शनि पर्वत, मुरैना / कृष्ण मेहता

हनुमान जी ने लंका से फेंका तो यहां गिरे शनिदेव, मौजूद हैं गिरने के निशान


हनुमान जी ने लंका से फेंका तो यहां गिरे शनिदेव, मौजूद हैं गिरने के निशान – मध्य प्रदेश में ग्वालियर के नजदीकी एंती गांव में शनिदेव मंदिर का देश में विशेष महत्व है। देश के सबसे प्राचीन त्रेतायुगीन शनि मंदिर में प्रतिष्ठत शनिदेव की प्रतिमा भी विशेष है। 


माना जाता है कि ये प्रतिमा आसमान से टूट कर गिरे एक उल्कापिंड से निर्मित है। ज्योतिषी व खगोलविद मानते है कि शनि पर्वत पर निर्जन वन में स्थापित होने के कारण यह स्थान विशेष प्रभावशाली है। महाराष्ट्र के सिगनापुर शनि मंदिर में प्रतिष्ठित शनि शिला भी इसी शनि पर्वत से ले जाई गई है।


त्रेतायुग में आकर विराजे थे शनिदेव माना जाता है कि शनिश्चरा स्थित श्री शनि देव मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने करवाया था। सिंधिया शासकों द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया। रियातसकालीन दस्तावेजों के मुताबिक 1808 में ग्वालियर के तत्कालीन महाराज दौलतराव सिंधिया ने मंदिर की व्यवस्था के लिए जागीर लगवाई। 


तत्कालीन शासक जीवाजी राव सिंधिया ने 1945 में जागीर को जप्त कर यह देवस्थान औकाफ बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज ग्वालियर के प्रबंधन में सौंप दिया तबसे इस देवस्थान का प्रबंधन औकाफ बोर्ड (मध्य प्रदेश सरकार के अंतर्गत) के प्रबंधन में है। वर्तमान में इसका प्रबंधन जिला प्रशासन मुरैना द्वारा किया जाता है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                  

                                                                                                                                                                 

महाबली हनुमान ने यहां भेजा था शनिदेव को


प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि कई दूसरे देवताओं के साथ रावण ने शनिदेव को भी कैद कर रखा था। जब हनुमान जी लंका जलाने की जुगत में थे तो शनि देव ने इशारा कर आग्रह किया कि उन्हें आजाद कर दें तो रावण का नाश करने में मददगार होंगे। 


बजरंगबली ने शनिदेव को रावण की कैद से छुड़ाया तो उस वक्त दुर्बल हो चुके शनिदेव ने उनसे दोबारा ताकत पाने के लिए सुरक्षित स्थान दिलाने का अनुरोध किया। हनुमान जी ने उन्हें लंका से प्रक्षेपित किया तो शनिदेव इस क्षेत्र में आकर प्रतिष्ठित हो गए। तब से यह क्षेत्र शनिक्षेत्र के नाम से विख्यात हो गया। 


देश भर से श्रद्धालु न्याय के देवता से इंसाफ की गुहार लगाने हर शनिश्चरी अमावस्या को यहां आते हैं। कहा जाता है कि लंका से प्रस्थान करते हुए शनिदेव की तिरछी नजरों के वार ने न सिर्फ सोने की लंका को हनुमान जी के द्वारा खाक में मिलवा दिया, साथ ही रावण का कुल के साथ विनाश करा कर शनि न्याय को प्रतिस्थापित किया।



शनिदेव के लंका से आकर गिरने से बना गड्ढा



आज भी मौजूद हैं उल्कापात के निशान जब हनुमान जी के प्रक्षेपित शनिदेव यहां आ कर गिरे तो उल्कापास सा हुआ। शिला के रूप में वहां शनिदेव के प्रतिष्ठत होने से एक बड़ा गड्ढा बन गया, जैसा कि उल्का गिरने से होता है। ये गड्ढा आज भी मौजूद है।


शनि मंदिर में उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़


शनिदेव के आगमन से क्षेत्र बन गया था लौह प्रधान शनि क्षेत्र के तौर पर मशहूर इस इलाके में उस वक्त लौह अयस्क प्रचुर मात्रा में पाया जाता था। इतिहास में प्रमाण मिले है कि ग्वालियर के आसपास लोहे का धातुकर्म बड़े पैमाने पर होता रहा था। आज भी यहां के भू-गर्भ में लौह-अयस्क की प्रधानता है।


भगवान शनिदेव के दस कल्याणकारी नामो का निरन्तर जाप करने से मनुष्य का कल्याण होता है .ज्सोतिष शास्त्रो के अनुसार शनि शुभ होने पर अपार सुख और समृद्धि देते है,


 शनि के पवित्र कल्याणकारी नाम :--

१- कोणस्थ

२- पिंगल

३- कृष्ण

४- बभ्रु

५- रौद्रान्तक

६- यम

७- सौरी

८- शनैश्चर

९- मन्द

१०- पिप्पलाश्रय.


ऊँ शं शनैश्चराय नमः

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

सुश्री राधा जन्म कथा / साक्षी भल्ला

 राधा अष्टमी..


आज से पांच हजार दो सौ वर्ष पूर्व मथुरा जिले के गोकुल-महावन कस्बे के निकट "रावल गांव" में वृषभानु एवं कीर्ति देवी की पुत्री के रूप में "राधा रानी " ने जन्म लिया था। राधा रानी के जन्म के संबंध में यह

कहा जाता है कि राधा जी माता के पेट से पैदा नहीं हुई थी, उनकी माता ने अपने गंर्भ में "वायु" को धारण कर रखा था। उसने योग माया कि प्रेरणा से वायु को ही जन्म दिया। परन्तु वहाँ स्वेच्छा से श्री राधा प्रकट हो गई।


श्री राधा रानी जी कलिंदजाकूलवर्ती

निकुंज प्रदेश के एक सुन्दर मंदिर में

अवतीर्ण हुई। उस समय भाद्रपद का महीना, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि, अनुराधा नक्षत्र, मध्यान्ह काल १२ बजे और सोमवार का दिन था। उस समय राधा जी के जन्म पर

नदियों का जल पवित्र हो गया। सम्पूर्ण दिशाए प्रसन्न निर्मल हो उठी। वृषभानु और कीर्ति देवी ने पुत्री के कल्याण की कामना से आनंददायिनी दो लाख उत्तम गौए ब्राह्मणों को दान में दी।


 ऐसा भी कहा जाता है कि एक दिन जब वृषभानु जी जब एक सरोवर के पास से गुजर रहे थे, तब उन्हें एक बालिका "कमल के फूल" पर तैरती हुई मिली, जिसे उन्होंने पुत्री के रूप में अपना लिया।


श्री राधा रानी जी आयु में श्री कृष्ण जी से ग्यारह माह बडी थीं। लेकिन श्री वृषभानु जी और कीर्ति देवी को ये बात जल्द ही पता चल गई कि श्री किशोरी जी ने अपने प्राकट्य से ही अपनी आँखे नहीं खोली है। इस बात से उन्हें बड़ा दुःख हुआ।


कुछ समय पश्चात जब नन्द महाराज की पत्नी यशोदा जी गोकुल से अपने लाडले के साथ वृषभानु जी के घर आती है तब वृषभानु जी और कीर्ति जी उनका स्वागत करती है। यशोदा जी कान्हा को गोद में लिए

राधा जी के पास आती है और जैसे

ही श्री कृष्ण और राधा आमने-सामने आते है तब राधा जी पहली बार अपनी आँखे खोलती हैं। अपने प्राण प्रिय श्री कृष्ण को देखने के लिए वे एक टक कृष्ण जी को देखती है। अपनी प्राण प्रिय को अपने सामने एक सुन्दर-सी बालिका के रूप में देखकर श्री कृष्ण जी स्वयं बहुत आनंदित होते है।

जिनके दर्शन बड़े बड़े देवताओ के लिए भी दुर्लभ है। तत्वज्ञ मनुष्य सैकड़ो जन्मो तक तप करने पर भी जिनकी झाँकी नहीं पाते, वे

ही श्री राधिका जी जब वृषभानु के यहाँ साकार रूप से प्रकट हुई और गोप ललनाएँ जब उनका पालन करने लगी, स्वर्ण जडित और सुन्दर रत्नों से रचित चंदनचर्चित पालने में ।


जय जय श्री राधे ❤️🙏

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

एकअनोखा मुकदमा

🙏🏼🙏🏼न्यायालय  में एक मुकद्दमा आया ,जिसने सभी को झकझोर दिया अदालतों में प्रॉपर्टी विवाद व अन्य पारिवारिक विवाद के केस आते ही रहते हैं। मगर ये मामला बहुत ही अलग किस्म का था।


 एक 60 साल के व्यक्ति ने अपने 75 साल के बूढ़े भाई पर मुकद्दमा किया था।


मुकदमा कुछ यूं था कि "मेरा 75 साल का बड़ा भाई ,अब बूढ़ा हो चला है ,इसलिए वह खुद अपना ख्याल भी ठीक से नहीं रख सकता मगर मेरे मना करने पर भी वह हमारी 95 साल की मां की देखभाल कर रहा है।


     मैं अभी ठीक हूं, सक्षम हू इसलिए अब मुझे मां की सेवा करने का मौका दिया जाय और मां को मुझे सौंप दिया जाय"।

        

न्यायाधीश महोदय का दिमाग घूम गया और मुक़दमा भी चर्चा में आ गया। न्यायाधीश महोदय ने दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की कि आप लोग 15-15 दिन रख लो।


    मगर कोई टस से मस नहीं हुआ,बड़े भाई का कहना था कि मैं अपने  स्वर्ग को खुद से दूर क्यों होने दूँ अगर मां कह दे कि उसको मेरे पास कोई परेशानी  है या मैं  उसकी देखभाल ठीक से नहीं करता, तो अवश्य छोटे भाई को दे दो।


      छोटा भाई कहता कि पिछले 35 साल से,जब से मै नौकरी मे बाहर हू  अकेले ये सेवा किये जा रहा है, आखिर मैं अपना  कर्तव्य कब पूरा करूँगा।जबकि आज मै स्थायी हूं,बेटा बहू सब है,तो मां भी चाहिए।


          परेशान  न्यायाधीश महोदय ने  सभी प्रयास कर लिये ,मगर कोई हल नहीं निकला।


       आखिर उन्होंने मां की राय जानने के लिए उसको बुलवाया और पूंछा कि वह किसके साथ रहना चाहती है।


      मां कुल 30-35 किलो की बेहद कमजोर सी औरत थी उसने दुखी दिल से कहा कि मेरे लिए दोनों संतान बराबर हैं। मैं किसी एक के  पक्ष में फैसला सुनाकर दूसरे का दिल नहीं दुखा सकती।


 आप न्यायाधीश हैं निर्णय करना आपका काम है जो  आपका निर्णय होगा मैं उसको ही मान लूंगी।


             आखिर न्यायाधीश महोदय ने भारी मन से निर्णय दिया कि न्यायालय छोटे भाई की भावनाओं से सहमत है कि बड़ा भाई वाकई बूढ़ा और कमजोर है। ऐसे में मां की सेवा की जिम्मेदारी छोटे भाई को दी जाती है।

  

 फैसला सुनकर बड़े भाई ने छोटे को गले लगाकर रोने लगा यह सब देख अदालत में मौजूद  न्यायाधीश समेत सभी के आंसू छलक पडे।


        कहने का  तात्पर्य यह है कि अगर भाई बहनों में वाद विवाद हो ,तो इस स्तर का हो।


   ये क्या बात है कि 'माँ तेरी है' की लड़ाई हो,और पता चले कि माता पिता ओल्ड एज होम में रह रहे हैं यह पाप है।

   धन दौलत गाडी बंगला सब होकर भी यदि मा बाप सुखी नही तो आप से बडा कोई जीरो (0) नही।

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