शनिवार, 9 अक्तूबर 2021

शिक्षा परम्परा उन्नति औऱ घर की सामाजिक स्थिति: एक सार्थक चर्चा

Pintu Shailendra Jaruhar:


 आज की युवा पीढ़ी को इस बात का थोड़ा भी अनुमान नहीं रहता है कि उसके माता-पिता इस तरह की तकलीफें एवं अपनी शौक की तिलांजलि दे कर उनका लालन-पालन कर रहे हैं।जब वे माता-पिता बनेंगे तभी उनको इसका इल्म होगा। अभी आप उन्हें कुछ भी कहे उन्हें समझ नहीं आएगा।


 Titu आत्म स्वरूप:


Nahi aayega na bhai .. Pidhiyan change ho gayee ab ham sound position me aa gaye


Titu आत्म स्वरूप:


Hamare dada kheti papa Govt job aur ham log better financial job and beta enterpreuner


Pintu Shailendra Jaruhar:


 यह सभी पर लागू नहीं होता।आप सौभाग्यशाली है।



Titu आत्म स्वरूप:


पीढियों के साथ उन्नति बढ़ती ही है इतिहास यही कहता है जो कल एक छोटा दुकान था आज साम्राज्य है        अगर नही बढ़ता तो विचारनिय है क्यूं की माँ बाप का संघर्ष व्यर्थ हो गया



Pintu Shailendra Jaruhar:


उन्नति का अभिप्राय विभिन्न पहलुओं पर विचार करने की जरूरत है। वित्तीय उन्नति की प्रतिफल में प्रसन्नता की एक सिमा हैं । मां बाप अपने बच्चों की इस सफलता पर इतराता नहीं अघाते। स्वाभाविक भी है। किंतु समाज में जो देखने सुनने को मिल रहा है उसको भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता। अमेरिका, लंदन, कनाडा में बच्चें डालर कमाने की होड़ में मां बाप की संवेदना की किमत भी डालर से ही लगा बैठते हैं और उसकी किमत दुर्भाग्य से कम ही आंक पाते हैं।


आप सफल मां बाप है या नहीं उसे धन दौलत से नहीं आंक सकते।जब आप कमजोर,बिमार एवं असहाय हो तभी समझ में आएगा। ऐसे भगवान करे यह समझ किसी की जिंदगी में ना आए।


Titu आत्म स्वरूप:


 भाई हम मध्यम वर्गीय की बात करें, जब माँ बाप का सपना साकार कर रहे हो तो ये तो पता है कि हमारा वतन सब छूटेगा और संघर्ष का आलम ये है कि जब लोग घर मे पकवान खाते थे भाई तो हम भोजन को तरसते थे आज भी 8 शाम का भोजन सड़ा गला खाते है क्यों कि बेहतर आज और बेहतर कल हो अगर बाल बच्चे लायक नही हो और सर पे बोझ हो तो शायद बुढापा ज्यादा कष्टप्रद है रही बात श्रवण कुमार की तो ये प्रतियोगिता नही है प्यार दिखाने की नही महसूस करने की चीज है


Pintu Shailendra Jaruhar:


 इसे आज की युवा पीढ़ी नहीं समझती। यही तो मैं कह रहा हूं। और दिल की दिल ही समझे यही बेहतर है।


आत्म स्वरूप



: यही मेरा कहना है कि value based एजुकेशन और खुद example, हमने बचपन मे ये देखा कि मेरे पापा ने अपने पापा की सेवा की कभी जवाब नही दिया हमने क्या सीखा मेरे चार भाइयों ने आज तक पापा को पलट के जवाब नही दिया,बच्चों को केवल शिक्षा नही नैतिक शिक्षा भी देना चाहिए और निश्चित है कि अगर आम का पेड़ लगाया है तो 99.9% आम ही मिलेगा😃🙏


Pintu Shailendra Jaruhar:


आम तो आम ही देगा इसमें कोई संदेह नहीं।आम रसेदार एवं लजीज है कि नहीं यह उम्र के साथ बढ़ता हुआ तजुर्बा बताता है और इसे आम लगाने वाला ही बेहतर समझता है।



Titu आत्म स्वरूप:


न भाई इतनी समझ सबको है लंबे तीर मत चलाइये


[93342 12078: Very nice  👌


👌👌✌🏼✌🏼👍🙃

मंगलवार, 5 अक्तूबर 2021

क्रोध औऱ सिद्धि / कृष्ण मेहता

 *दुर्वासा ऋषि बहुत क्रोधी स्वभाव के थे लेकिन फिर वह इतने सिद्ध पुरुष कैसे थे?*

"ऋषि दुर्वासा का नाम सुनते ही मन में श्राप का भय पैदा हो जाता है की कंही हमको कोई श्राप न दे दे उनका खौफ्फ़ तो देवो में भी रहता है तो हम तो साधारण इंसान है. जाने "


"दुर्वासा" नाम तो सुना ही होगा? इसका अर्थ है जिसके साथ न रहा जा सके, वैसे भी क्रोधी व्यक्ति से लोग दूर ही रहते है लेकिन दुर्वासा ऋषि के तो हजारो शिष्य थे जो साथ ही रहते थे. कब जन्मे कैसे पले बढ़े और अब कहा है दुर्वासा ऋषि ये तो आपको बिलकुल भी पता नहीं होगा.

सबसे पहले जाने दुर्वासा के जन्म और नामकरण की कथा, ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार एक बार शिव और पारवती में तीखी बहस हुई. गुस्से में आई पारवती ने शिव जी से कह दिया की आप का ये क्रोधी स्वाभाव आपको साथ न रहने लायक बनाता है, तब शिव ने अपने क्रोध को अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूया के गर्भ में स्थापित कर दिया.

इसी के चलते अत्रि और अनुसूया के पुत्र दुर्वासा का नामकरण भी पारवती के साथ न रहने लायक कहने के चलते दुर्वासा ही रखा गया. इसके पहले अनुसूया के त्रिदेवो को बालक बनाकर पुत्र रूप में मांगने की कथा तो आपने सुन ही रखी होगी अब जाने आगे की कहानी.


दुर्वासा ऋषि की शिक्षा पिता के सानिध्य में ही हुई थी लेकिन जल्द ही वो तपस्पि स्वाभाव के होने के चलते माता पिता को छोड़ वन में विचरने लगे थे. तब उनके पास एक ऋषि अपनी बेटी के साथ दुर्वासा के पास आये और उनसे अपनी बेटी का पाणिग्रहण करवा दिया. ऋषि ने दुर्वासा से अपनी बेटी के सब गुण कहे पर साथ में बताया उसका एक अवगुण जो सबपे भारी था.


ऋषि की लड़की का नाम था कंडली और उसमे एक ही अवगुण था की वो कलहकारिणी थी, दुर्वासा के उग्र स्वाभाव को जान ऋषि ने दुर्वासा से उसके सभी अपराध माफ़ करने की अपील की. ऐसे में दुर्वासा ने कहा की मैं अपनी पत्नी के 100 अपराध क्षमा करूँगा उसके बाद नहीं.


दोनों की शादी हो गई और ब्रह्मचारी दुर्वासा गृहस्थी में पड़ गए, लेकिन अपने स्वाभाव के चलते कंदली बात बात पर पति से कलह करती और अपने वरदान के चलते दुर्वासा को क्रोध सहना पड़ा.


जिन दुर्वासा के क्रोध से सृष्टि के जिव कांपते थे वो ही तब अपनी पत्नी के क्रोध से कांपते थे, कांपते इसलिए थे की उन्होंने वरदान दे दिया था और वो कुछ नहीं कर सकते थे. आलम ये था की दुर्वासा ने 100 से ज्यादा गलतिया (पत्नी की) माफ़ की लेकिन एक दिन उनका पारा असहनीय हो गया और उन्होंने तब अपनी ही पत्नी कंदली को भस्म कर दिया.


तभी उनके ससुर आ पहुंचे और दुर्वासा की ये करनी देख उन्होंने उन्हें श्राप दे दिया और कहा की तुमसे सहन नहीं हुई तो उसका त्याग कर देना चाहिए था इसे मारा क्यों. इसी गलती के चलते दुर्वासा को अमरीश जी से बेइज्जत होना पड़ा था, अन्यथा रुद्रावतार का सुदर्शन क्या कर सकता था.


उस घटना के दिन से ही कंदली की राख कंदली जाती बन गई और आज भी वो जाती मौजूद है....... इसके आलावा श्री कृष्ण की वो बहिन (यशोदा की बेटी) जिसे कंस ने मारना चाहा था बाद में वासुदेव देवकी ने पाला और दुर्वासा से ही उनका तब विवाह हुआ था. उसका नाम था एकविंशा है न अद्भुद कथा...


कर्ण से प्रेरित दुर्योधन ने योजनाबद्ध तरीके से दुर्वासा ऋषि और उनके हजारो शिष्यों को वनवासी पांडवो के पास तब भेजा जब वो भोजन कर चुके थे. हालाँकि पांडवो के पास अक्षय पात्र था लेकिन जब तक द्रौपदी न खाली तब तक ही उसमे भोजन रहता था और द्रौपदी तब खा चुकी थी.


ऐसे में दुर्वासा पहुँच गए और स्नान के लिए नदी किनारे गए तो द्रौपदी ने श्री कृष्ण को याद किया, श्री कृष्ण उस समय भोजन की थाली पर बैठे थे और थाली छोड़ कर अपनी परम भक्त की मदद को पहुँच गए. श्री कृष्ण ने तब अक्षय पात्र में बचे तिनके को खाकर अपनी और समस्त संसार की भूख शांत कर दी जिसमे दुर्वासा जी भी शामिल थे.

लेकिन दुर्वासा जान गए थे श्री कृष्ण की ये करनी, तब दुर्वासा जी ने श्री कृष्ण से कहा की शास्त्रों का लेख है की परोसी हुई थाली नहीं छोड़नी चाहिए और किसी का झूठा नहीं खाना चाहिए. आपने ऐसा किया है इसलिए आप को मेरा श्राप है की भोजन केलिए लड़ते हुए ही आपका वंश नाश हो जायेगा और ऐसा ही हुआ था.

लेकिन श्री कृष्ण सशरीर ही गोलोक गए थे हालाँकि कई जगह उन्हें देह त्याग की भी बात लिखी गई है, इसलिए परोसी हुई थाली न छोड़े और किसी का जूठा भी न खाये.

गुरुवार, 23 सितंबर 2021

बुध का कुंडली मे प्रभाव/ सिन्हा आत्म स्वरूप

 


बुध ग्रह ज्योतिषशास्त्र में एक तटस्थ ग्रह माना जाता है। वैसे तो बुध (Mercury) जातक की कुंड़ली में स्थिति व प्रभाव के अनुसार परिणाम देता है। कुंडली में कुल बारह भाव होते हैं। ज्योतिष के मुताबिक ग्रह इन भावों के अनुसार ही परिणाम देते हैं। बुध ग्रह पर भी यह नियम लागू होता है। इस लेख में हम बुध ग्रह के ज्योतिषीय व पौराणिक तथा खगोलीय महत्व के साथ ही बुध का हमारे जीवन पर कैसे व क्या असर डाल सकते हैं। बुध मंत्र, यंत्र, रत्न, मूल तथा उपाय के बारे में जानेंगे। तो आइये जानते हैं बुध ग्रह के बारे में –


बुध ग्रह

बुध ग्रह का ज्योतिष में अपना ही आयाम है। बुध को ज्योतिष शास्त्र में वाणी का कारक माना जाता है। जिस जातक की कुंडली में बुध कमजोर होता है। वह संकोची होता है। अपनी बात रखने में उसे परेशानी होती है। इसके साथ ही वह जातक अपने वाणी पर नियंत्रण नहीं रख पाता वाणी के कारण उनके कार्य बिगड़ जाते हैं। खगोलीय दृष्टि से बुध मुख्यतः सौर वायुमंडल से आये परमाणुओं से बना है। बुध बहुत गर्म है जिससे ये परमाणु उड़कर अंतरिक्ष में चले जाते हैं। बुध ग्रह पृथ्वी और शुक्र के विपरीत है जिसका वातावरण स्थायी है, बुध (Mercury) का वातावरण लगातार बदलता रहता है।

 


 ज्योतिष में बुध ग्रह का महत्व

ज्योतिष में बुध ग्रह, हमारी जन्म कुंडली में स्थित 12 भावों पर अलग-अलग तरह से प्रभाव डालता है। इन प्रभावों का असर हमारे प्रत्यक्ष जीवन पर पड़ता है। ज्योतिष में बुध ग्रह को एक शुभाशुभ ग्रह माना गया है अर्थात ग्रहों की संगति के अनुरूप ही यह फल देता है। यदि बुध ग्रह शुभ ग्रहों के साथ युति में हैं तो यह शुभ फल और क्रूर ग्रहों की संगति में अशुभ फल देते हैं। ज्योतिष में बुध ग्रह को मिथुन और कन्या राशि के स्वामी के तौर पर मान्यता प्राप्त है। कन्या बुध (Mercury) की उच्च राशि भी है जबकि मीन इसकी नीच राशि मानी जाती है। वैदिक ज्योतिष में उपस्थित मान्य 27 नक्षत्रों में से बुध को अश्लेषा, ज्येष्ठा और रेवती नक्षत्र का स्वामित्व प्राप्त है। जिनमें जन्में जातक बुध से काफी प्रभावित रहते हैं।

 


बुध का मानव जीवन पर प्रभाव

हिन्दू ज्योतिष में बुध ग्रह को बुद्धि, तर्क और मित्र का कारक माना जाता है। वैदिक ज्योतिष में बुध को वाणी का भी कारक माना जाता है। ज्योतिष के मुताबिक सूर्य और शुक्र, बुध के मित्र हैं जबकि चंद्रमा और मंगल इसके शत्रु ग्रह हैं।

 

यदि शारीरिक संरचना पर बुध (Mercury) का प्रभाव देखा जाए तो जिस जातक की जन्म कुंडली में बुध ग्रह लग्न भाव में स्थित हो, वह व्यक्ति शारीरिक रूप से सुंदर होता है। जातक अपनी वास्तविक उम्र से काफी कम उम्र का दिखयी देता है तथा उसकी आँखें चमकदार होती हैं। ज्योतिष के मुताबिक जातक की कुंडली में लग्न में बुध हो तो जातक स्वभाव से  तर्कसंगत और  बौद्धिक रूप से धनी तथा कुशल वक्ता बनाता है।


किसी जातक की कुंडली में बुध ग्रह प्रभावी है तो जातक की संवाद शैली कुशल होती है। वह हाज़िर जवाबी होता है। जातक अपनी बातों व तर्कों से सबको मोह लेता है। बली बुध के कारण जातक कुशाग्र बुद्धि वाला होता है। ऐसे जातक वाणिज्य और कारोबार में सफल होते हैं। इसके साथ ही ये जातक संवाद और संचार के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाते हैं।

 

यदि जातक की जन्म कुंडली में बुध ग्रह किसी क्रूर अथवा पापी ग्रहों से पीड़ित हैं तो ये जातक के लिए सही नहीं हैं। ऐसा होने से जातक को शारीरिक और मानसिक रूप से समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। जिसके कारण जातक अपने विचारों को स्पष्टता से नहीं रख पाता है। पीड़ित बुध के प्रभाव से व्यक्ति को कारोबार में हानि सामना करना पड़ता है।

 


बुध की पौराणिक मान्यता

पौराणिक मान्यता के अनुसार बुध (Mercury) की माता तारा हैं और पिता चंद्रमा, परंतु हिंदू पौराणिक कथा में तारा को देव गुरू बृहस्पति की धर्म पत्नी के रूप में दर्शाया गया है। लेकिन बुध तारा व चंद्रमा के पुत्र हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि एक पौराणिक कथा के मुताबिक चंद्रमा के उन्हें सम्मोहित कर अपने वश में कर लिया था इसके बाद तारा व चंद्रमा के शहवास के कारण बुध का जन्म हुआ। ब्रह्मा जी ने तारा व चंद्रमा के पुत्र का नाम बुध रखा। बुध ग्रह भगवान नारायण का भी प्रतिनिधित्व करते हैं। हिंदू धर्म में बुध को देव की उपाधि प्राप्त है। सप्ताह में बुधवार का दिन बुध को समर्पित है।


यंत्र – बुध यंत्र

मंत्र - ओम ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः

रत्न - पन्ना

रंग  - हरा

उपाय – यदि बुध कमजोर हैं तो आपको उनके रत्न पन्ना को धारण करना चाहिए। इसके साथ ही बुध यंत्र का उपयोग करें। दान करने से भी आपको राहत मिल सकता है।

सोमवार, 20 सितंबर 2021

प्रयाराज का भ्र्म

 वृंदावन की मालकिन श्रीमति राधारानी....


ऐसा माना जाता है, कि सभी तीर्थों का राजा "प्रयागराज" है।


एक बार "प्रयागराज" के मन में ऐसा विचार आया, कि सभी तीर्थ मेरे पास आते है, केवल वृन्दावन मेरे पास नही आता....


प्रयागराज वैकुण्ठ में गए और प्रभु से पूछा....


प्रभु, आपने मुझे तीर्थों का राजा बनाया, लेकिन वृंदावन मुझे टैक्स देने नहीं आते ??


भगवान बहुत हंसे और हंसकर बोले.... 

हे "प्रयाग" मैंने तुझे केवल तीर्थो का राजा बनाया, मेरे घर का राजा नहीं बनाया। 

ब्रज वृन्दावन कोई तीर्थ नही है,वो मेरा घर है.... और घर का कोई मालिक नही होता.... घर की मालकिन होती है !!!!


वृन्दावन की अधीश्वरी श्रीमती राधारानी है और राधारानी की कृपा के बिना ब्रज में प्रवेश नहीं हो सकता....


कर्म के कारण हम शरीर से ब्रज में नहीं जा सकते, लेकिन मन ही मन में हम सब ब्रज वृन्दावन में वास कर सकते है.... 


भगवान कहते है.... शरीर से ब्रज में जाना.... इससे वह करोड़ों गुना बेहतर है, कि मन से ब्रज वृन्दावन में वास करना🙏


इसीलिए भगवान कहते है....


राधे मेरी स्वामनी,

मै राधे को दास

जन्म जन्म मोहे दीजियो श्री बृंदावन वास, 

श्री चरणो में वास !


,🌹🙏🌹 राधारानी की जय 🌹🙏🌹

शनिवार, 18 सितंबर 2021

शनि पर्वत, मुरैना / कृष्ण मेहता

हनुमान जी ने लंका से फेंका तो यहां गिरे शनिदेव, मौजूद हैं गिरने के निशान


हनुमान जी ने लंका से फेंका तो यहां गिरे शनिदेव, मौजूद हैं गिरने के निशान – मध्य प्रदेश में ग्वालियर के नजदीकी एंती गांव में शनिदेव मंदिर का देश में विशेष महत्व है। देश के सबसे प्राचीन त्रेतायुगीन शनि मंदिर में प्रतिष्ठत शनिदेव की प्रतिमा भी विशेष है। 


माना जाता है कि ये प्रतिमा आसमान से टूट कर गिरे एक उल्कापिंड से निर्मित है। ज्योतिषी व खगोलविद मानते है कि शनि पर्वत पर निर्जन वन में स्थापित होने के कारण यह स्थान विशेष प्रभावशाली है। महाराष्ट्र के सिगनापुर शनि मंदिर में प्रतिष्ठित शनि शिला भी इसी शनि पर्वत से ले जाई गई है।


त्रेतायुग में आकर विराजे थे शनिदेव माना जाता है कि शनिश्चरा स्थित श्री शनि देव मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने करवाया था। सिंधिया शासकों द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया। रियातसकालीन दस्तावेजों के मुताबिक 1808 में ग्वालियर के तत्कालीन महाराज दौलतराव सिंधिया ने मंदिर की व्यवस्था के लिए जागीर लगवाई। 


तत्कालीन शासक जीवाजी राव सिंधिया ने 1945 में जागीर को जप्त कर यह देवस्थान औकाफ बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज ग्वालियर के प्रबंधन में सौंप दिया तबसे इस देवस्थान का प्रबंधन औकाफ बोर्ड (मध्य प्रदेश सरकार के अंतर्गत) के प्रबंधन में है। वर्तमान में इसका प्रबंधन जिला प्रशासन मुरैना द्वारा किया जाता है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                  

                                                                                                                                                                 

महाबली हनुमान ने यहां भेजा था शनिदेव को


प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि कई दूसरे देवताओं के साथ रावण ने शनिदेव को भी कैद कर रखा था। जब हनुमान जी लंका जलाने की जुगत में थे तो शनि देव ने इशारा कर आग्रह किया कि उन्हें आजाद कर दें तो रावण का नाश करने में मददगार होंगे। 


बजरंगबली ने शनिदेव को रावण की कैद से छुड़ाया तो उस वक्त दुर्बल हो चुके शनिदेव ने उनसे दोबारा ताकत पाने के लिए सुरक्षित स्थान दिलाने का अनुरोध किया। हनुमान जी ने उन्हें लंका से प्रक्षेपित किया तो शनिदेव इस क्षेत्र में आकर प्रतिष्ठित हो गए। तब से यह क्षेत्र शनिक्षेत्र के नाम से विख्यात हो गया। 


देश भर से श्रद्धालु न्याय के देवता से इंसाफ की गुहार लगाने हर शनिश्चरी अमावस्या को यहां आते हैं। कहा जाता है कि लंका से प्रस्थान करते हुए शनिदेव की तिरछी नजरों के वार ने न सिर्फ सोने की लंका को हनुमान जी के द्वारा खाक में मिलवा दिया, साथ ही रावण का कुल के साथ विनाश करा कर शनि न्याय को प्रतिस्थापित किया।



शनिदेव के लंका से आकर गिरने से बना गड्ढा



आज भी मौजूद हैं उल्कापात के निशान जब हनुमान जी के प्रक्षेपित शनिदेव यहां आ कर गिरे तो उल्कापास सा हुआ। शिला के रूप में वहां शनिदेव के प्रतिष्ठत होने से एक बड़ा गड्ढा बन गया, जैसा कि उल्का गिरने से होता है। ये गड्ढा आज भी मौजूद है।


शनि मंदिर में उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़


शनिदेव के आगमन से क्षेत्र बन गया था लौह प्रधान शनि क्षेत्र के तौर पर मशहूर इस इलाके में उस वक्त लौह अयस्क प्रचुर मात्रा में पाया जाता था। इतिहास में प्रमाण मिले है कि ग्वालियर के आसपास लोहे का धातुकर्म बड़े पैमाने पर होता रहा था। आज भी यहां के भू-गर्भ में लौह-अयस्क की प्रधानता है।


भगवान शनिदेव के दस कल्याणकारी नामो का निरन्तर जाप करने से मनुष्य का कल्याण होता है .ज्सोतिष शास्त्रो के अनुसार शनि शुभ होने पर अपार सुख और समृद्धि देते है,


 शनि के पवित्र कल्याणकारी नाम :--

१- कोणस्थ

२- पिंगल

३- कृष्ण

४- बभ्रु

५- रौद्रान्तक

६- यम

७- सौरी

८- शनैश्चर

९- मन्द

१०- पिप्पलाश्रय.


ऊँ शं शनैश्चराय नमः

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

सुश्री राधा जन्म कथा / साक्षी भल्ला

 राधा अष्टमी..


आज से पांच हजार दो सौ वर्ष पूर्व मथुरा जिले के गोकुल-महावन कस्बे के निकट "रावल गांव" में वृषभानु एवं कीर्ति देवी की पुत्री के रूप में "राधा रानी " ने जन्म लिया था। राधा रानी के जन्म के संबंध में यह

कहा जाता है कि राधा जी माता के पेट से पैदा नहीं हुई थी, उनकी माता ने अपने गंर्भ में "वायु" को धारण कर रखा था। उसने योग माया कि प्रेरणा से वायु को ही जन्म दिया। परन्तु वहाँ स्वेच्छा से श्री राधा प्रकट हो गई।


श्री राधा रानी जी कलिंदजाकूलवर्ती

निकुंज प्रदेश के एक सुन्दर मंदिर में

अवतीर्ण हुई। उस समय भाद्रपद का महीना, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि, अनुराधा नक्षत्र, मध्यान्ह काल १२ बजे और सोमवार का दिन था। उस समय राधा जी के जन्म पर

नदियों का जल पवित्र हो गया। सम्पूर्ण दिशाए प्रसन्न निर्मल हो उठी। वृषभानु और कीर्ति देवी ने पुत्री के कल्याण की कामना से आनंददायिनी दो लाख उत्तम गौए ब्राह्मणों को दान में दी।


 ऐसा भी कहा जाता है कि एक दिन जब वृषभानु जी जब एक सरोवर के पास से गुजर रहे थे, तब उन्हें एक बालिका "कमल के फूल" पर तैरती हुई मिली, जिसे उन्होंने पुत्री के रूप में अपना लिया।


श्री राधा रानी जी आयु में श्री कृष्ण जी से ग्यारह माह बडी थीं। लेकिन श्री वृषभानु जी और कीर्ति देवी को ये बात जल्द ही पता चल गई कि श्री किशोरी जी ने अपने प्राकट्य से ही अपनी आँखे नहीं खोली है। इस बात से उन्हें बड़ा दुःख हुआ।


कुछ समय पश्चात जब नन्द महाराज की पत्नी यशोदा जी गोकुल से अपने लाडले के साथ वृषभानु जी के घर आती है तब वृषभानु जी और कीर्ति जी उनका स्वागत करती है। यशोदा जी कान्हा को गोद में लिए

राधा जी के पास आती है और जैसे

ही श्री कृष्ण और राधा आमने-सामने आते है तब राधा जी पहली बार अपनी आँखे खोलती हैं। अपने प्राण प्रिय श्री कृष्ण को देखने के लिए वे एक टक कृष्ण जी को देखती है। अपनी प्राण प्रिय को अपने सामने एक सुन्दर-सी बालिका के रूप में देखकर श्री कृष्ण जी स्वयं बहुत आनंदित होते है।

जिनके दर्शन बड़े बड़े देवताओ के लिए भी दुर्लभ है। तत्वज्ञ मनुष्य सैकड़ो जन्मो तक तप करने पर भी जिनकी झाँकी नहीं पाते, वे

ही श्री राधिका जी जब वृषभानु के यहाँ साकार रूप से प्रकट हुई और गोप ललनाएँ जब उनका पालन करने लगी, स्वर्ण जडित और सुन्दर रत्नों से रचित चंदनचर्चित पालने में ।


जय जय श्री राधे ❤️🙏

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

एकअनोखा मुकदमा

🙏🏼🙏🏼न्यायालय  में एक मुकद्दमा आया ,जिसने सभी को झकझोर दिया अदालतों में प्रॉपर्टी विवाद व अन्य पारिवारिक विवाद के केस आते ही रहते हैं। मगर ये मामला बहुत ही अलग किस्म का था।


 एक 60 साल के व्यक्ति ने अपने 75 साल के बूढ़े भाई पर मुकद्दमा किया था।


मुकदमा कुछ यूं था कि "मेरा 75 साल का बड़ा भाई ,अब बूढ़ा हो चला है ,इसलिए वह खुद अपना ख्याल भी ठीक से नहीं रख सकता मगर मेरे मना करने पर भी वह हमारी 95 साल की मां की देखभाल कर रहा है।


     मैं अभी ठीक हूं, सक्षम हू इसलिए अब मुझे मां की सेवा करने का मौका दिया जाय और मां को मुझे सौंप दिया जाय"।

        

न्यायाधीश महोदय का दिमाग घूम गया और मुक़दमा भी चर्चा में आ गया। न्यायाधीश महोदय ने दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की कि आप लोग 15-15 दिन रख लो।


    मगर कोई टस से मस नहीं हुआ,बड़े भाई का कहना था कि मैं अपने  स्वर्ग को खुद से दूर क्यों होने दूँ अगर मां कह दे कि उसको मेरे पास कोई परेशानी  है या मैं  उसकी देखभाल ठीक से नहीं करता, तो अवश्य छोटे भाई को दे दो।


      छोटा भाई कहता कि पिछले 35 साल से,जब से मै नौकरी मे बाहर हू  अकेले ये सेवा किये जा रहा है, आखिर मैं अपना  कर्तव्य कब पूरा करूँगा।जबकि आज मै स्थायी हूं,बेटा बहू सब है,तो मां भी चाहिए।


          परेशान  न्यायाधीश महोदय ने  सभी प्रयास कर लिये ,मगर कोई हल नहीं निकला।


       आखिर उन्होंने मां की राय जानने के लिए उसको बुलवाया और पूंछा कि वह किसके साथ रहना चाहती है।


      मां कुल 30-35 किलो की बेहद कमजोर सी औरत थी उसने दुखी दिल से कहा कि मेरे लिए दोनों संतान बराबर हैं। मैं किसी एक के  पक्ष में फैसला सुनाकर दूसरे का दिल नहीं दुखा सकती।


 आप न्यायाधीश हैं निर्णय करना आपका काम है जो  आपका निर्णय होगा मैं उसको ही मान लूंगी।


             आखिर न्यायाधीश महोदय ने भारी मन से निर्णय दिया कि न्यायालय छोटे भाई की भावनाओं से सहमत है कि बड़ा भाई वाकई बूढ़ा और कमजोर है। ऐसे में मां की सेवा की जिम्मेदारी छोटे भाई को दी जाती है।

  

 फैसला सुनकर बड़े भाई ने छोटे को गले लगाकर रोने लगा यह सब देख अदालत में मौजूद  न्यायाधीश समेत सभी के आंसू छलक पडे।


        कहने का  तात्पर्य यह है कि अगर भाई बहनों में वाद विवाद हो ,तो इस स्तर का हो।


   ये क्या बात है कि 'माँ तेरी है' की लड़ाई हो,और पता चले कि माता पिता ओल्ड एज होम में रह रहे हैं यह पाप है।

   धन दौलत गाडी बंगला सब होकर भी यदि मा बाप सुखी नही तो आप से बडा कोई जीरो (0) नही।

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ABC To XYZ

*अंग्रेजी वर्ण हमें सिखाते हैं...*

*A B C....*

*Avoid Boring Company*

*मायूस संगत से दूर रहो*


*D E F...*

*Don't Entertain Fools*

*मूर्खों पर समय व्यर्थ मत करो*


*G H I....*

*Go For High Ideas*

*ऊंचे विचार रखो*


*J K L M....*

*Just Keep a friend like Me*

*मेरे जैसा मित्र रखो*


*N O P...*

*Never Overlook the Poor n Suffering*

*गरीबों व पीडितों को कभी अनदेखा मत करो*


*Q R S.*.

*Quit Reacting to Silly tales*

*मूर्खों की बातों पर प्रतिक्रिया मत दो*


*T U V....*

*Tune Urself for ur Victory*

*खुद की जीत सुनिश्चित करो*


*W X Y Z...*.

*We Xpect You to Zoom ahead in life*

*हम आपसे जीवन मे आगे देखने की आशा करते हैं !!*


*यदि आपने चाँद को देखा, तो आपने ईश्वर की सुन्दरता देखी। यदि आपने सूर्य को देखा, तो आपने ईश्वर का बल देखा,और यदि आपने आइना देखा तो आपने ईश्वर की सबसे सुंदर रचना देखी। इसलिए आप सभी स्वयं पर विश्वास रखो !!*

जय श्री कृष्णा राधे राधे ||

आप सभी का दिन शुभ रहे। 🙏🏻🙏

बुधवार, 8 सितंबर 2021

सरकारी स्कूलों की छवि बदलने की पहल

 सरकारी नहीं, ‘असर-कारी’ होंगे सीएम राइज स्कूल/ मनोज कुमार


राज्य के आखिरी छोर पर बसे किसी गांव के बच्चे के लिए किसी महंगे प्रायवेट स्कूल में पढऩे की लालसा एक अधूरे सपने की तरह है. दिल्ली दूर है कि तर्ज पर वह अपनी शिक्षा उस खंडहरनुमा भवन में पूरा करने के लिए मजबूर था जिसे सरकारी स्कूल कह कर बुलाया जाता था. बच्चों के इन सपनों की बुनियाद पर प्रायवेट स्कूलों का मकडज़ाल बुना गया और सुनियोजित ढंग से सरकारी स्कूलों के खिलाफ माहौल बनाया गया. शिक्षा की गुणवत्ता को ताक पर रखकर भौतिक सुविधाओं के मोहपाश में बांध कर ऊंची बड़ी इमारतों को पब्लिक स्कूल कहा गया. सरकारें भी आती-जाती रही लेकिन सरकारी स्कूल उनकी प्राथमिकता में नहीं रहा. परिवर्तन के इस दौर में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने राज्य में ऐसे स्कूलों की कल्पना की जो प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से कमतर ना हों. मुख्यमंत्री चौहान की इस सोच में प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से अलग अपने बच्चों के सपनों को जमीन पर उतारने के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है. इसी सोच और भरोसे की बांहें थामे मध्यप्रदेश के सुदूर गांवों से लेकर जनपदीय क्षेत्र में ‘सीएम राइज स्कूल’ की कल्पना साकार होने जा रही है. अनादिकाल से गुरुकुल भारतीय शिक्षा का आधार रहा है लेकिन समय के साथ परिवर्तन भी प्रकृति का नियम है. इन दिनों शिक्षा की गुणवत्ता पर चिंता करते हुए गुरुकुल शिक्षा पद्धति का हवाला दिया जाता है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में गुरुकुल नए संदर्भ और नयी दृष्टि के साथ आकार ले रहा है. सरकारी शब्द के साथ ही हमारी सोच बदल जाती है और हम निजी व्यवस्था पर भरोसा करते हैं. हमें लगता है कि सरकारी कभी असर-कारी नहीं होता है. इस धारणा को तोड़ते हुए मध्यप्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता के साथ नवाचार करने के लिए ‘सीएम राइज स्कूल’ सरकारी से ‘असरकारी’ होने की कल्पना के जल्द ही वास्तविकता की जमीन पर खड़ा होगा.

वर्तमान में राज्य के स्कूलों पर नजर डालें तो एक बात स्पष्ट होती है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने असंतोष को दूर करने के लिए स्कूलों की भीड़ लगा दी. किसी स्कूल में दो बच्चे तो किसी स्कूल में पांच और कहीं-कहीं तो महीनों से ताला डला है. कागज पर स्कूल चल रहे हैं लेकिन हकीकत में इन स्कूलों पर केवल बजट खर्च हो रहा है. ऐसे में एक बड़ी सोच के साथ शिवराजसिंह सरकार ने एक सर्वे करा कर यह तय किया कि फिलहाल एक लाख से ऊपर ऐसे स्कूलों को एकजाई कर ‘सीएम राइज स्कूल’ शुरू किया जाए. योजना के मुताबिक अभी 9200 ‘सीएम राइज स्कूल’ शुरू होंगे. 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में संचालित होने वाले इन स्कूलों में शिक्षा का माध्यम हिन्दी और अंग्रेजी दोनों होगा. आवागमन की सुविधा के लिए सरकार बस और वैन की सुविधा भी दे रही है. बच्चों, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को अकल्पनीय सुविधायें इस स्कूल में होगी. मसलन स्वीमिंग पूल, बैंकिंग काउंटर, डिजिटल स्टूडियो, कैफेटेरिया, जिम, थिंकिंग एरिया होगी जो अभी तक प्रायवेट पब्लिक स्कूल में भी ठीक से नहीं है.  प्री-नर्सरी से हायर सेकंडरी की कक्षा वाले ‘सीएम राइज स्कूल’ आने वाले 2023 तक पूरे राज्य में शुरू हो चुके होंगे.


उल्लेखनीय है कि प्रदेश के बच्चे पढ़ाई के मामले में सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के बच्चों से मुकाबला कर सकें, इसलिए सरकार प्रत्येक स्कूल पर 20 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करेगी. योजना के अनुरूप स्कूल चार स्तर (संकुल से नीचे, संकुल, ब्लॉक और जिला) पर तैयार होंगे। इन स्कूलों में बच्चों को ड्रेस कोड भी निजी स्कूलों जैसा रखने की योजना है.मध्यप्रदेश में अक्टूबर से अस्तित्व में आ रहे सीएम राइज स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को लिखित और मौखिक परीक्षा देनी होगी। इसमें पढ़ाने के प्रति उनकी रुचि, पढ़ाने का तरीका और विषय पर पकड़ देखी जाएगी। वर्तमान में सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों में से ही सीएम राइज स्कूलों के लिए शिक्षकों का चयन होगा, पर उन्हें लंबी चयन परीक्षा से गुजरना पड़ेगा. लिखित और मौखिक परीक्षा के अलावा जिस कक्षा के लिए उनका चयन होना है, उसमें पढ़ाकर भी दिखाना होगा ताकिसुनिश्चित किया जा सके कि योग्य शिक्षक का चयन हुआ है. उन्हें विधिवत नियुक्ति दी जाएगी. इन स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को परीक्षा देनी होगी और उन्हें नियमित शिक्षकों की तुलना में ज्यादा वेतन दिया जाएगा. शिक्षकों को स्कूल परिसर में ही मकान भी मिलेगा, ताकि उनके अप-डाउन में उलझने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो. सीएम राइज योजना के लिए चयनित स्कूलों में अक्टूबर से पढ़ाई का तरीका बदल जाएगा। जैसे ही ये स्कूल खुलेंगे, सरकारी स्कूलों की परंपरागत पढ़ाई से इतर नए तरीके से पढ़ाई कराई जाएगी.

स्कूल शिक्षा विभाग के मानक के अनुरूप निजी स्कूलों की तरह व्यवस्थित भवन और अन्य जरूरी सुविधाएं, हर विद्यार्थी के लिए परिवहन सुविधा, नर्सरी एवं केजी कक्षाएं, शिक्षकों एवं अन्य स्टाफ के सौ फीसद पद भरे जाएंगे, स्मार्ट क्लास एवं डिजिटल लर्निंग, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, व्यावसायिक शिक्षा के साथ नए भवनों में स्वीमिंग पूल, खेल सुविधाएं, संगीत कक्षाएं भी रहेंगी. सीएम राइस स्कूल योजना के प्रथम चरण में 259 स्कूल खोले जाएंगे. इनमें से 253 स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा और 96 स्कूल आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा खोले जाएंगे. सी.एम. राइज स्कूल की संरचना के अनुरूप जिला स्तर पर प्रत्येक जिले में एक अर्थात कुल 52 सी.एम. राइज स्कूल होंगे, जिसमें प्रति स्कूल 2000 से 3000 विद्यार्थी होंगे. विकास खंड स्तरीय 261 स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 1500 से 2000 विद्यार्थी होंगे. इसी प्रकार संकुल स्तरीय 3200 स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 100 से 1500 विद्यार्थी होंगे. ग्रामों के समूह स्तर पर 5687 सी.एम.राइस स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 800 से 1000 विद्यार्थी होंगे. कैबिनेट ने इस योजना के प्रथम चरण के लिए 6952 करोड़ की मंजूरी दे दी है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के मानक के अनुरूप सीएम राइज स्कूल में कौशल विकास को प्राथमिकता दी जाएगी. डिग्री के स्थान पर बच्चों को रोजगारपरक शिक्षा देेने पर जोर होगा. नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें भारतीयता से जोड़ा जाएगा. स्वयं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह के अनुसार इन स्कूलों का मुख्य उद्देश्य बच्चों को ज्ञान, कौशल और नागरिकता के संस्कार देना है। साथ ही, भारतीय संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा देना है। स्कूली शिक्षा में बहुविध गतिविधियों के सूर्योदय की उम्मीद के साथ सीएम राइज स्कूल जमीनी तौर पर जल्द ही काम करने लगेंगे.


सती सुलोचना की कथा!!!!!!

 प्रस्तुति -  रेणु दत्ता / आशा सिन्हा 


सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उसके कटे हुए शीश को भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया था।


 अपने पती की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जाकर पति का शीश लाने की प्रार्थना की। किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये। क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।


रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं- "लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदह नहीं है।


 परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एकनारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है।


 ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सेना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।


मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यक्ति की हो।


 ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा- "यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृत्तांत लिख दे। भुजा में दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया- "प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है।


 युद्ध भूमि में श्रीराम के भाई लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कई वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वे तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।


पति की भुजा-लिखित पंक्तियां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावणने आकर कहा- 'शोक न कर पुत्री। 


प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा। करुण चीत्कार करती हुई बोली- "पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के आभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे। सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।'


 किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- "देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। 


जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"


सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले- "देवी, तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे; किंतु विधी की लिखी को कौन बदल सकता है ?आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी। 


श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा- "देवी, मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतीत्व से तो विश्व भी थर्राता है। अपने स्वयं यहाँ आने का कारण बताओ, बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ? 


सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली- "राघवेन्द्र, मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आई हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।


पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा- "सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना की मेघनाथ का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी। 


यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ति रखने वाली उनकी अनन्य उपासिका हूँ। पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।


सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है। 


जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुई कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है। सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया- "मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुई मेरे पास चली गयी थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया। 


व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे- "निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा- "व्यर्थ बातें मत करो मित्र। पतिव्रता के महात्म्य को तुम नहीं जानते। यदि वह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।


श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा- "यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा। 


यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- "भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ। 


अत: आज युद्ध बंद रहे। श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गयी । लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई।


     🌼🥀!जय सियाराम जय जय हनुमान!🥀🌼


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प्रेम*

 एक बार एक पुत्र अपने पिता से रूठ कर घर छोड़ कर दूर चला गया और फिर इधर उधर यूँही भटकता रहा। दिन बीते, महीने बीते और साल बीत गए | 

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एक दिन वह बीमार पड़ गया | *अपनी झोपडी में अकेले पड़े उसे अपने पिता के प्रेम की याद आई कि कैसे उसके पिता उसके बीमार होने पर उसकी सेवा किया करते थे |* उसे बीमारी में इतना प्रेम मिलता था कि वो स्वयं ही शीघ्र अति शीघ्र ठीक हो जाता था | उसे फिर एहसास हुआ कि उसने घर छोड़ कर बहुत बड़ी गलती की है, वो रात के अँधेरे में ही घर की और हो लिया।

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जब घर के नजदीक गया तो उसने देखा आधी रात के बाद भी दरवाज़ा खुला हुआ है | अनहोनी के डर से वो तुरंत भाग कर अंदर गया तो उसने पाया की आंगन में उसके पिता लेटे हुए हैं | उसे देखते ही उन्होंने उसका बांहे फैला कर स्वागत किया | पुत्र की आँखों में आंसू आ गए | 

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उसने पिता से पूछा "ये घर का दरवाज़ा खुला है, क्या आपको आभास था कि मैं आऊंगा?" पिता ने उत्तर दिया *"अरे पगले ये दरवाजा उस दिन से बंद ही नहीं हुआ जिस दिन से तू गया है, मैं सोचता था कि पता नहीं तू कब आ जाये और कंही ऐसा न हो कि दरवाज़ा बंद देख कर तू वापिस लौट जाये |"*

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ठीक यही स्थिति उस परमपिता परमात्मा की है | उसने भी प्रेमवश अपने भक्तो के लिए द्वार खुले रख छोड़े हैं कि पता नहीं कब भटकी हुई कोई संतान उसकी और लौट आए।i

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हमेंभी आवश्यकता है सिर्फ इतनी कि उसके प्रेम को समझे और उसकी और बढ़ चलें।



बुधवार, 1 सितंबर 2021

बाली सुग्रीव

कथा का आरंभ तब का है ,,


जब बाली को ब्रम्हा जी से ये वरदान प्राप्त हुआ,,

की जो भी उससे युद्ध करने उसके सामने आएगा,,

उसकी आधी ताक़त बाली के शरीर मे चली जायेगी,,


और इससे बाली हर युद्ध मे अजेय रहेगा,,


सुग्रीव, बाली दोनों ब्रम्हा के औरस ( वरदान द्वारा प्राप्त ) पुत्र हैं,,


और ब्रम्हा जी की कृपा बाली पर सदैव बनी रहती है,,


बाली को अपने बल पर बड़ा घमंड था,,

उसका घमंड तब ओर भी बढ़ गया,,

जब उसने करीब करीब तीनों लोकों पर विजय पाए हुए रावण से युद्ध किया और रावण को अपनी पूँछ से बांध कर छह महीने तक पूरी दुनिया घूमी,,


रावण जैसे योद्धा को इस प्रकार हरा कर बाली के घमंड का कोई सीमा न रहा,,


अब वो अपने आपको संसार का सबसे बड़ा योद्धा समझने लगा था,,


और यही उसकी सबसे बड़ी भूल हुई,,


अपने ताकत के मद में चूर एक दिन एक जंगल मे पेड़ पौधों को तिनके के समान उखाड़ फेंक रहा था,,


हरे भरे वृक्षों को तहस नहस कर दे रहा था,,


अमृत समान जल के सरोवरों को मिट्टी से मिला कर कीचड़ कर दे रहा था,,


एक तरह से अपने ताक़त के नशे में बाली पूरे जंगल को उजाड़ कर रख देना चाहता था,,


और बार बार अपने से युद्ध करने की चेतावनी दे रहा था- है कोई जो बाली से युद्ध करने की हिम्मत रखता हो,,

है कोई जो अपने माँ का दूध पिया हो,,

जो बाली से युद्ध करके बाली को हरा दे,,


इस तरह की गर्जना करते हुए बाली उस जंगल को तहस नहस कर रहा था,,


संयोग वश उसी जंगल के बीच मे हनुमान जी,, राम नाम का जाप करते हुए तपस्या में बैठे थे,,


बाली की इस हरकत से हनुमान जी को राम नाम का जप करने में विघ्न लगा,,


और हनुमान जी बाली के सामने जाकर बोले- हे वीरों के वीर,, हे ब्रम्ह अंश,, हे राजकुमार बाली,,

( तब बाली किष्किंधा के युवराज थे) क्यों इस शांत जंगल को अपने बल की बलि दे रहे हो,,


हरे भरे पेड़ों को उखाड़ फेंक रहे हो,

फलों से लदे वृक्षों को मसल दे रहे हो,,

अमृत समान सरोवरों को दूषित मलिन मिट्टी से मिला कर उन्हें नष्ट कर रहे हो,,

इससे तुम्हे क्या मिलेगा,,


तुम्हारे औरस पिता ब्रम्हा के वरदान स्वरूप कोई तुहे युद्ध मे नही हरा सकता,,


क्योंकि जो कोई तुमसे युद्ध करने आएगा,,

उसकी आधी शक्ति तुममे समाहित हो जाएगी,,


इसलिए हे कपि राजकुमार अपने बल के घमंड को शांत कर,,


और राम नाम का जाप कर,,

इससे तेरे मन में अपने बल का भान नही होगा,,

और राम नाम का जाप करने से ये लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाएंगे,,


इतना सुनते ही बाली अपने बल के मद चूर हनुमान जी से बोला- ए तुच्छ वानर,, तू हमें शिक्षा दे रहा है, राजकुमार बाली को,,

जिसने विश्व के सभी योद्धाओं को धूल चटाई है,,


और जिसके एक हुंकार से बड़े से बड़ा पर्वत भी खंड खंड हो जाता है,,


जा तुच्छ वानर, जा और तू ही भक्ति कर अपने राम वाम के,,


और जिस राम की तू बात कर रहा है,

वो है कौन,


और केवल तू ही जानता है राम के बारे में,


मैंने आजतक किसी के मुँह से ये नाम नही सुना,


और तू मुझे राम नाम जपने की शिक्षा दे रहा है,,


हनुमान जी ने कहा- प्रभु श्री राम, तीनो लोकों के स्वामी है,,

उनकी महिमा अपरंपार है,

ये वो सागर है जिसकी एक बूंद भी जिसे मिले वो भवसागर को पार कर जाए,,


बाली- इतना ही महान है राम तो बुला ज़रा,,

मैं भी तो देखूं कितना बल है उसकी भुजाओं में,,


बाली को भगवान राम के विरुद्ध ऐसे कटु वचन हनुमान जो को क्रोध दिलाने के लिए पर्याप्त थे,,


हनुमान- ए बल के मद में चूर बाली,,

तू क्या प्रभु राम को युद्ध मे हराएगा,,

पहले उनके इस तुच्छ सेवक को युद्ध में हरा कर दिखा,,


बाली-  तब ठीक है कल     के कल नगर के बीचों बीच तेरा और मेरा युद्ध होगा,,


हनुमान जी ने बाली की बात मान ली,,


बाली ने नगर में जाकर घोषणा करवा दिया कि कल नगर के बीच हनुमान और बाली का युद्ध होगा,,


अगले दिन तय समय पर जब हनुमान जी बाली से युद्ध करने अपने घर से निकलने वाले थे,,

तभी उनके सामने ब्रम्हा जी प्रकट हुए,,


हनुमान जी ने ब्रम्हा जी को प्रणाम किया और बोले- हे जगत पिता आज मुझ जैसे एक वानर के घर आपका पधारने का कारण अवश्य ही कुछ विशेष होगा,,


ब्रम्हा जी बोले- हे अंजनीसुत, हे शिवांश, हे पवनपुत्र, हे राम भक्त हनुमान,,

मेरे पुत्र बाली को उसकी उद्दंडता के लिए क्षमा कर दो,,


और युद्ध के लिए न जाओ,


हनुमान जी ने कहा- हे प्रभु,,

बाली ने मेरे बारे में कहा होता तो मैं उसे क्षमा कर देता,,

परन्तु उसने मेरे आराध्य श्री राम के बारे में कहा है जिसे मैं सहन नही कर सकता,,

और मुझे युद्ध के लिए चुनौती दिया है,,

जिसे मुझे स्वीकार करना ही होगा,,

अन्यथा सारी विश्व मे ये बात कही जाएगी कि हनुमान कायर है जो ललकारने पर युद्ध करने इसलिए नही जाता है क्योंकि एक बलवान योद्धा उसे ललकार रहा है,,


तब कुछ सोंच कर ब्रम्हा जी ने कहा- ठीक है हनुमान जी,,

पर आप अपने साथ अपनी समस्त सक्तियों को साथ न लेकर जाएं,,

केवल दसवां भाग का बल लेकर जाएं,,

बाकी बल को योग द्वारा अपने आराध्य के चरणों में रख दे,,

युद्ध से आने के उपरांत फिर से उन्हें ग्रहण कर लें,,


हनुमान जी ने ब्रम्हा जी का मान रखते हुए वैसे ही किया और बाली से युद्ध करने घर से निकले,,


उधर बाली नगर के बीच मे एक जगह को अखाड़े में बदल दिया था,,


और हनुमान जी से युद्ध करने को व्याकुल होकर बार बार हनुमान जी को ललकार रहा था,,


पूरा नगर इस अदभुत और दो महायोद्धाओं के युद्ध को देखने के लिए जमा था,,


हनुमान जी जैसे ही युद्ध स्थल पर पहुँचे,,

बाली ने हनुमान को अखाड़े में आने के लिए ललकारा,,


ललकार सुन कर जैसे ही हनुमान जी ने एक पावँ अखाड़े में रखा,,


उनकी आधी शक्ति बाली में चली गई,,


बाली में जैसे ही हनुमान जी की आधी शक्ति समाई,,


बाली के शरीर मे बदलाव आने लगे,

उसके शरीर मे ताकत का सैलाब आ गया,

बाली का शरीर बल के प्रभाव में फूलने लगा,,

उसके शरीर फट कर खून निकलने लगा,,


बाली को कुछ समझ नही आ रहा था,,


तभी ब्रम्हा जी बाली के पास प्रकट हुए और बाली को कहा- पुत्र जितना जल्दी हो सके यहां से दूर अति दूर चले जाओ,


बाली को इस समय कुछ समझ नही आ रहा रहा,,

वो सिर्फ ब्रम्हा जी की बात को सुना और सरपट दौड़ लगा दिया,,


सौ मील से ज्यादा दौड़ने के बाद बाली थक कर गिर गया,,


कुछ देर बाद जब होश आया तो अपने सामने ब्रम्हा जी को देख कर बोला- ये सब क्या है,


हनुमान से युद्ध करने से पहले मेरा शरीर का फटने की हद तक फूलना,,

फिर आपका वहां अचानक आना और ये कहना कि वहां से जितना दूर हो सके चले जाओ,


मुझे कुछ समझ नही आया,,


ब्रम्हा जी बोले-, पुत्र जब तुम्हारे सामने हनुमान जी आये, तो उनका आधा बल तममे समा गया, तब तुम्हे कैसा लगा,,


बाली- मुझे ऐसा लग जैसे मेरे शरीर में शक्ति की सागर लहरें ले रही है,,

ऐसे लगा जैसे इस समस्त संसार मे मेरे तेज़ का सामना कोई नही कर सकता,,

पर साथ ही साथ ऐसा लग रहा था जैसे मेरा शरीर अभी फट पड़ेगा,,,


ब्रम्हा जो बोले- हे बाली,


मैंने हनुमान जी को उनके बल का केवल दसवां भाग ही लेकर तुमसे युद्ध करने को कहा,,

पर तुम तो उनके दसवें भाग के आधे बल को भी नही संभाल सके,,


सोचो, यदि हनुमान जी अपने समस्त बल के साथ तुमसे युद्ध करने आते तो उनके आधे बल से तुम उसी समय फट जाते जब वो तुमसे युद्ध करने को घर से निकलते,,


इतना सुन कर बाली पसीना पसीना हो गया,,


और कुछ देर सोच कर बोला- प्रभु, यदि हनुमान जी के पास इतनी शक्तियां है तो वो इसका उपयोग कहाँ करेंगे,,


ब्रम्हा- हनुमान जी कभी भी अपने पूरे बल का प्रयोग नही कर पाएंगे,,

क्योंकि ये पूरी सृष्टि भी उनके बल के दसवें भाग को नही सह सकती,,


ये सुन कर बाली ने वही हनुमान जी को दंडवत प्रणाम किया और बोला,, जो हनुमान जी जिनके पास अथाह बल होते हुए भी शांत और रामभजन गाते रहते है और एक मैं हूँ जो उनके एक बाल के बराबर भी नही हूँ और उनको ललकार रहा था,,

मुझे क्षमा करें,,


और आत्मग्लानि से भर कर बाली ने राम भगवान का तप किया और अपने मोक्ष का मार्ग उन्ही से प्राप्त किया,,


तो बोलो,

पवनपुत्र हनुमान की जय,

जय श्री राम जय श्री राम,,


कृपया ये कथा जन जन तक पहुचाएं,

और पुण्य के भागी बने,,

जय श्री राम जय हनुमान

🌹🙏🙏🌹 राधे राधे जी....

सोमवार, 30 अगस्त 2021

उपहार ( लोक कथा )

पुराने जमाने की बात है। एक राजा ने दूसरे राजा के पास एक पत्र और साथ में सुरमे की एक छोटी सी डिबिया का उपहार भेजी। 

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पत्र में लिखा था कि जो सुरमा भिजवा रहा हूं, वह अत्यंत मूल्यवान है। 

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इसे लगाने से अंधापन दूर हो जाता है। 

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राजा सोच में पड़ गया। वह समझ नहीं पा रहा था कि इसे किस-किस को दे।

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उसके राज्य में नेत्रहीनों की संख्या अच्छी-खासी थी, 

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पर सुरमे की मात्रा बस इतनी  थी जिससे दो आंखों की रोशनी लौट सके। 

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राजा इसे अपने किसी अत्यंत प्रिय व्यक्ति को देना चाहता था।

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तभी राजा को अचानक अपने एक वृद्ध मंत्री की स्मृति हो आई। 

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वह मंत्री बहुत ही बुद्धिमान था, मगर आंखों की रोशनी चले जाने के कारण उसने राजकीय कामकाज से छुट्टी ले ली थी और घर पर ही रहता था।

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राजा ने सोचा कि अगर उसकी आंखों की ज्योति वापस आ गई तो उसे उस योग्य मंत्री की सेवाएं फिर से मिलने लगेंगी।

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राजा ने मंत्री को बुलवा भेजा और उसे सुरमे की डिबिया देते हुए कहा, ‘इस सुरमे को आंखों में डालें। 

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आप पुन: देखने लग जाएंगे।

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ध्यान रहे यह केवल 2 आंखों के लिए है।’ 

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मंत्री ने एक आंख में सुरमा डाला। 

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उसकी रोशनी आ गई। उस आंख से मंत्री को सब कुछ दिखने लगा। 

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फिर उसने बचा- खुचा सुरमा अपनी जीभ पर डाल लिया। 

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यह देखकर राजा चकित रह गया। 

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उसने पूछा, ‘यह आपने क्या किया? 

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अब तो आपकी एक ही आंख में रोशनी आ पाएगी।

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लोग आपको काना कहेंगे।’

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मंत्री ने जवाब दिया, ‘राजन, चिंता न करें। 

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मैं काना नहीं रहूंगा। मैं आंख वाला बनकर हजारों नेत्रहीनों को रोशनी दूंगा। 

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मैंने चखकर यह जान लिया है कि सुरमा किस चीज से बना है। 

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मैं अब स्वयं सुरमा बनाकर नेत्रहीनों को बांटूंगा।’ 

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राजा ने मंत्री को गले लगा लिया और कहा, 

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‘यह हमारा सौभाग्य है कि मुझे आप जैसा मंत्री मिला। 

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अगर हर राज्य के मंत्री आप जैसे हो जाएं तो किसी को कोई दुख नहीं होगा।

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 ((((((( जय जय श्री राधे )))))))

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बुधवार, 25 अगस्त 2021

*🕉वामन अवतार🕉*

वामन अवतार हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु के दस अवतारों में से पाँचवें अवतार हैं जो भाद्रपद में शुक्ल पक्ष की द्वादशी को अवतरित हुए।*


*🌻आचार्य शुक्र ने अपनी संजीवनी विद्या से बलि तथा दूसरे असुरों को भी जीवित एवं स्वस्थ कर दिया था। राजा बलि ने आचार्य की कृपा से जीवन प्राप्त किया था। वे सच्चे हृदय से आचार्य की सेवा में लग गये।*


 *🌻शुक्राचार्य प्रसन्न हुए। उन्होंने यज्ञ कराया। अग्नि से दिव्य रथ, अक्षय त्रोण, अभेद्य कवच प्रकट हुए। आसुरी सेना अमरावती पर चढ़ दौड़ी। इन्द्र ने देखते ही समझ लिया कि इस बार देवता इस सेना का सामना नहीं कर सकेंगे। बलि ब्रह्मतेज से पोषित थे। देवगुरु के आदेश से देवता स्वर्ग छोड़कर भाग गये।* 


*🌻अमर-धाम असुर-राजधानी बना। शुक्राचार्य ने बलि का इन्द्रत्व स्थिर करने के लिये अश्वमेध यज्ञ कराना प्रारम्भ किया। सौ अश्वमेध करके बलि नियम सम्मत इन्द्र बन जायँगे। फिर उन्हें कौन हटा सकता है। यह देख कर देवमाता अदिति अत्यन्त दुखी थीं। उन्होंने अपने पति महर्षि कश्यप से उन्होंने प्रार्थना की। महर्षि तो एक ही उपाय जानते हैं- भगवान की शरण, आराधना। अदिति ने भगवान की आराधना की। प्रभु प्रकट हुए।* 


*🌻अदिति को वरदान मिला। उन्हीं के गर्भ से भगवान प्रकट हुए। तत्काल वामन ब्रह्मचारी बन गये। महर्षि कश्यप ने ऋषियों के साथ उनका उपनयन संस्कार सम्पन्न किया। भगवान वामन पिता से आज्ञा लेकर बलि के यहाँ चले। नर्मदा के उत्तर-तट पर असुरेन्द्र बलि अश्वमेध-यज्ञ में दीक्षित थे। यह उनका अन्तिम अश्वमेध था। छत्र, पलाश, दण्ड तथा कमण्डलु लिये, जटाधारी, अग्नि के समान तेजस्वी वामन ब्रह्मचारी वहाँ पधारे। बलि, शुक्राचार्य, ऋषिगण, सभी उस तेज से अभिभूत अपनी अग्नियों के साथ उठ खड़े हुए। बलि ने उनके चरण धोये, पूजन किया और प्रार्थना की कि जो भी इच्छा हो, वे माँग लें। मुझे अपने पैरों से तीन पद भूमि चाहिये! बलि के कुल की शूरता, उदारता आदि की प्रशंसा करके वामन ने माँगा। बलि ने बहुत आग्रह किया कि और कुछ माँगा जाय पर वामन ने जो माँगना था, वही माँगा था।* 


*🌻एक पग में पृथ्वी, एक में स्वर्गादि लोक तथा शरीर से समस्त नभ व्याप्त कर लिया उन्होंने।*


*🌻उनका वाम पद ब्रह्मलोक से ऊपर तक गया। उसके अंगुष्ठ-नख से ब्रह्माण्ड का आवरण तनिक टूट गया। ब्रह्मद्रव वहाँ से ब्रह्माण्ड में प्रविष्ट हुआ। ब्रह्मा जी ने भगवान का चरण धोया और चरणोदक के साथ उस ब्रह्मद्रव को अपने कमण्डलु में ले लिया। वही ब्रह्मद्रव गंगा जी बना। तीसरा पद रखने को स्थान कहाँ है? भगवान ने बलि को नरक का भय दिखाया। संकल्प करके दान न करने पर तो नरक होगा।*


*🌻इसे मेरे मस्तक पर रख ले! बलि ने मस्तक झुकाया। प्रभु ने वहाँ चरण रखा। बलि गरुड़ द्वारा बाँध लिये गये।*


*🌻तुम अगले मन्वन्तर में इन्द्र बनोगे! तब तक सुतल में निवास करो। मैं नित्य तुम्हारे द्वार पर गदापाणि उपस्थित रहूँगा। दयामय द्रवित हुए। प्रह्लाद के साथ बलि सब असुरों को लेकर स्वर्गाधिक ऐश्वर्यसम्पन्न सुतल लोक में पधारे। शुक्राचार्य ने भगवान के आदेश से यज्ञ पूरा किया।*


*🙏जय श्री हरि🙏*

शुक्रवार, 20 अगस्त 2021

अनामी शरण बबल की रिपोर्ताज कहानियों पर DEI आगरा की डीन सुश्री शर्मिंला सक्सेना की टिप्पणी

i: आपकी कहनियां वक्त के साथ मुठभेड़ करती,अपने को पहचान कर जीवन के नवीन अर्थ को खोजती प्रतीत होती हैं।


i

: संस्कृति समन्वय संघर्ष एवं स्त्री विमर्श इन कहानियों की अंतर्धारा हैl 


आपकी भावपूर्ण एवं प्रभावपूर्ण रचनाएँ कभी मंद मंद मंथर गति से बहती सी प्रतीत होती हैं तो कभी एक वेगवान नदी की तरह  समस्त कूल किनारों को तोड़ बहने को आतुर प्रतीत होती हैं।जीवन की सच्चाई ,साफगोई इनमे साफ नज़र आती है 



i: पठनीयता व रोचकता कूट कूट कर भरी है,एक बार आरम्भ करने के बाद समय का भान ही नही रहता।कब शुरू हुई और कब खतम समय का पता ही नही चलता ।


इसे अश्लीलता नही कहते ,साफगोई कहते हैं।सच्चाई कहते हैं।निश्चित रूप से भाषा प्रवाहपूर्ण व भावपूर्ण होने के साथ कुछ नवीनता लिए हुए हैl


i: ऐसा कुछ भी नही है आपकी रचनाएँ कुछ नया कहती है और नवीनता पुराने मानकों को तोड़कर  अपनी राह स्वयं बना लेती है


पुराने मानक टूट रहे हैं तभी तो कुछ नया साहित्य को पाथेय में मिलेगा


 इतने सुन्दर लेखन व नवीन कथानकों के विन्यास द्वारा आप निश्चित रूप से साहित्य को समृद्धि प्रदान करेंगे ।


आपका काम निश्चित रूप से बहुत महत्वपूर्ण है


: अद्भुत विषय चयन ,सटीक भाषा,चुभते हुए प्रश्न, निश्चित रूप से आप एक श्रेष्ठ यायावर हैं


: अपने आप को केवल पत्रकार मत कहिये आप अपने ज्वलंत प्रश्नों की प्रश्नाकुलता से व्यथतित एक उभरते हुए युवा पत्रकार साहित्यकार हैं.


i: (दयालबाग DEI  आगरा ) की डीन  सुश्री शर्मिला सक्सेना  जी की मेरी  रिपोर्ताजनुमा संस्मरणात्मक  कहानियों  रपटों पर सरसरी टिप्पणी।)


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बुधवार, 18 अगस्त 2021

चीरहरण

उसके चहेरे पर सरकती पसीने की बूंद भी इंजीनियर बाबू को ओस-सी लगती थी। अगर कभी पास से गुज़र जाती तो एक सौंधी-सी महक आसपास कई क्षणों तक मंडराती रहती।

मिट्टी की टोकरी सिर पर उठाए जब वह ऊबड़-खाबड़ सड़क पर चलती तो उसके नितम्ब किसी महान गायक के आलाप की चढ़ती-उतराती स्वर लहरियों से उद्वेलित होते।

"ए...मधबनिया...!! जरा इंजीनियर बाबू को चाय तो देके आ... " पच्चीसों आदिवासी मजदूरों में ठेकेदार की रसना भी मधबनिया  नाम के उच्चारण में ही चरम सुख पाती।

इंजीनियर बाबू की नज़रें मधबनिया के उभारों को महसूस करती और उंगलियाँ चाय की प्याली के बहाने उसकी मिट्टी से सनी छुअन को पाने के लिए लालायित रहती।

मधबनिया खनकती हँसी बिखेरते हुए मैली उंगलियाँ साफ उंगलियों के चंगुल से छुड़वाती और मिट्टी का एक दाग उन कोरी उंगलियों पर छोड़ जाती।

मगर आज वहीं ठहरकर, बड़े ही मनुहार से मधबनिया बोल पड़ी " बाबू ..!! ठेकेदार को पगार खातिर बोल देते तो बड़ी किरपा होती...वरना शनिचर का पीर कर देता है जालिम।"

इंजीनियर बाबू ने खुद को संयत करते हुए ज़रा नरमी से कहा,

"वह प्राइवेट ठेकेदार है और मैं सरकारी मुलाज़िम, मैं उससे मजदूरों के वेतन के बारे में कुछ नही कह सकता....समझी?"

मधबनिया थोड़ा इठलाती-सी इंजीनियर बाबू के नजदीक आकर अपना होंठ दांतों में दबाते हुए बोली

"अरे सरकारी बाबू! ..ऐसा कौनो काम है भला.. जो तुम न कर सको हो?"

इंजीनियर बाबू ने तुरंत गर्दन दाँए-बाँए घूमाकर आस-पास का जायजा लिया और

कोई देख नही रहा इस बात की तस्दीक होते ही एक आँख दबाकर खिंसियानी हँसी हँसते हुए बोल उठा,

"जा बोल दूँगा....अच्छा सुन,... रात को क्वार्टर पर आ जाना।"

मधबनिया पल्लू को मुँह में दबाये मादक मुस्कान फेंकती, सड़क किनारे पड़े हुए गिट्टी के टीले की ओर चंचल हिरनी-सी चल पड़ी। 

मधबनिया के टोकरी उठाते ही कुछ मजदूरों ने काम छोड़कर उसे घेर लिया लेकिन ठेकेदार की रौबदार आवाज सुनते ही क्षणभर में वे वापस अपने काम पर लग गए।

इंजीनियर बाबू ने ठेकेदार को वेतन बाँटने का आदेश तो दे दिया लेकिन मजदूरों की मधबनिया को घेरने वाली हरकत देखकर 

उसे कुछ गड़बड़ का अंदेशा हो चला था। अब तो उसे रात को मधबनिया के क्वार्टर पर आने में भी संशय होने लगा क्योंकि उसे लग रहा था कि शायद मधबनिया के पति और साथी मजदूरों ने उसकी नियत को भांप लिया है।

वैसे तो इंजीनियर बाबू शराब के आदी नहीं थे लेकिन रात की ठंडक और मधबनिया के आने की उम्मीद ने अलमारी में रखी विदेशी शराब की बोतल को टेबल पर लेकर आने के लिए मजबूर कर ही दिया।

गांव में वैसे भी सूरज ढलते ही रात हो जाती है। सात बजते ही झींगुर बोलने लगते हैं और रास्ते सुनसान हो जाते हैं।

 इंजीनियर बाबू ने हलक के अंदर उतारने के लिए कांच के गिलास में शराब डाली ही थी कि दरवाजे पार बरामदे से आदिवासी नवयौवना के गहनों की झंकार उसके मन मस्तिष्क को भरमाने लगी।

उसने शराब से भरा गिलास टेबल पर रखा और तत्काल प्रभाव से दरवाजे की ओर लपका।

मधबनिया दरवाजे पर दस्तक देती उससे पहले ही इंजीनियर बाबू ने झट से दरवाजा खोल दिया।

"बड़े बेसबर हो बाबू....पहिले ऊ..सराब तो पी लेते।" मधबनिया की नज़र सामने टेबल पर रखे गिलास की ओर उठी।

"वो..वो.. मैं....मैने सोचा तुम्हे बाहर ठंड में इंतजार न करना पड़े..आओ... जल्दी से आओ..अंद..र" बाबू ने बड़ी मुश्किल से थूक निगलते हुए अपने शब्दों को ठीक किया।

जब मधबनिया कमरे के अंदर दाखिल हो रही थी तब बाबू की नजरें उसके बदन की लचक और नितंबों की लहरियाँ तलाश रही थी लेकिन आश्चर्य कि सुबह की मदमस्त नदिया मधबनिया, रात को किसी झील की तरह एकदम शांत थी। 

"ठेकेदार ने वेतन तो दे दिया न ?" इंजीनियर बाबू ने दरवाजे की चिटकनी चढ़ाते हुए पूछा।

मधबनिया को उसके प्रश्न ने नही बल्कि चिटकनी की कर्कश आवाज ने मुड़ने पर मजबूर किया।

"न..न..बाबू... चिटकनी चढ़ाने की कौनो जरूरत नाही।"

इंजीनियर बाबू को कुछ पल के लिए लगा जैसे मधबनिया अकेली नही आई है बल्कि उसका पति और साथी मजदूर बाहर खड़े बस उसके चिल्लाने का ही इंतजार कर रहे हैं।

"क्या हुआ था सुबह?....तुम्हारे पति या उसके साथियों ने तुमसे कुछ पूछा था क्या?"

मधबनिया उस कमरे में अपने लिए जगह तलाशने लगी। 

करीने से सजे उस कमरे में शराब की बोतल, शराब से भरा गिलास रखी टेबल और कुर्सी के अलावा एक शानदार पलंग था, जिसके पास जाते ही किसी विदेशी इत्र की सुगंध नथुनों में भर जाती बिना किसी शुब्हा के मधबनिया को यकीन था कि यह इत्र उसकी आमद के कुछ समय पहले ही पलंग पर छिड़का गया है। "हा...हा...वाह.. बाबू!! तैयारी तो तुम पूरी करके रखे हो पर तनिक सोचो इस आदिवासी मजदूरन को खुश न कर पाए तो का होगा?"

कहकहा लगाती मधबनिया बेधड़क कुर्सी पर बैठ गई।

सरकारी बाबू इस सवाल से हतप्रभ रह गया।

"क्क ...क्या होगा?"

मधबनिया की बेतकल्लुफी देख उसे शब्द न सूझे।

"बाबू... हम आदिवासियों में, नर मादा को नही चुनता बल्कि मादा चुनती है कि उसे कौन सा नर पसंद है, एहीलिए तो हमारे आदिवासी समाज में बलात्कार नाही होत।

बाबू अगर तुम मुझे खुश नही कर पाए न तो आदिवासी समाज के पुरुष तुमपर नही हंसेंगे काहेकि उन लोगन के लिए तुम दया के पात्र होंगे। चच्च्च.. बेचारे!! लेकिन कल सुबह तुमपर मेरी सारी आदिवासी मजदूर बहिने जरूर हँसेंगी।"

इंजीनियर बाबू को तो जैसे काठ मार गया था।

"मतलब.. मतलब...उन्हें सब पता है?"

"उन सबकी पगार खातिर ही तो आई थी तोहार पास और जब ऊ सब लोग मुझे घेरकर खड़े हो गये थे न, तभी मैने खुशखबरी सुनाई कि इंजीनर बाबू हमको टाइम पर पगार जरूर दिला देंगे।"

"और और ...तुम्हारे पति ने तुम्हे मेरे पास भेज भी दिया ?"

"ऊ कौन होत है मुझे भेजने वाला? मैंने तुम्हे चुना है एहीलिये अकेले आई हूँ। मर्जी नही होती तो मेरी मजदूर बहिनें आती और मजदूर लोगन के हाथ तो तुम जानत ही हो कितने सख्त होते हैं।"

मधबनिया का चहेरा किसी मुर्दा जिस्म के मानिंद सर्द था ।

"बाबू! तुम नही जानत आदिवासी मजदूरों का दर्द , जब वक्त पर पगार नही मिलती न तो हमरी सीधी-सरल कौम के भूखों मरने की नौबत आ जात है।

कौनो गांव शहर का दुकानदार हमें उधार नही देत। जो लाला हमें पैसा उधार देत है ऊ हमसे तगड़ा सूद वसूलत है।

तुम या ऊ ठेकेदार हमारी पगार दबा लेत हो और हम आदिवासी औरतों पर बुरी नजर डालत हो। अब हम भी अपनी ताकत जानत हैं एहीलिए अब हम इस बुरी नजर को अपने हक में इस्तेमाल करत हैं। 

बाबू जी! असभ्य हम नाही, तुम लोग हो क्योंकि तुम्हारे लिए औरत और मजदूर सिर्फ शोषण के वास्ते पैदा होत हैं।" मधबनिया का आत्मविश्वास अपने उरूज पर था।

"जब सुबह वापिस जाओगी तो तुमसे तुम्हारी कौम तुम्हारी इज्जत के बाबत कोई सवाल नही पूछेगी?"

इंजीनियर बाबू की सारी खुमारी हवा हो चुकी थी ।

मधबनिया ने जवाब देने की जगह शराब से भरा गिलास उठा लिया और एक साँस में खाली कर दिया।

"तुम मरद लोग जब वेश्या गमन करके आवत हो तो तुम्हरी कौम तुम्हरी इज्जत के बारे में कौनो सवाल पूछती है क्या?"

इंजीनियर बाबू अस्तव्यस्त पलंग पर सिर झुकाए बैठा था और द्रोपदी दुशासन का चीरहरण कर उसकी पूरी जात को नग्न करके जा चुकी थी। 


#Anil_Makariya

Jalgaon (Maharashtra)

बुद्धिमान बुढ़िया

 रात में एक चोर घर में घुसl । कमरे का दरवाजा खोला तो बरामदे पर एक बूढ़ी औरत सो रही थी।

खटपट से उसकी आंख खुल गई। चोर ने घबरा कर देखा

तो वह लेटे लेटे बोली

'' बेटा, तुम देखने से किसी अच्छे घर के लगते हो, लगता है किसी परेशानी से मजबूर होकर इस रास्ते पर लग गए हो। चलो कोई बात नहीं। अलमारी के तीसरे बक्से में एक तिजोरी

है ।

इसमें का सारा माल तुम चुपचाप ले जाना। मगर

पहले मेरे पास आकर बैठो, मैंने अभी-अभी एक ख्वाब

देखा है । वह सुनकर जरा मुझे इसका मतलब तो बता

दो।"

चोर उस बूढ़ी औरत की रहमदिली से बड़ा अभिभूत हुआ और चुपचाप उसके पास जाकर बैठ गया।

बुढ़िया ने अपना सपना सुनाना शुरु किया

''बेटा, मैंने देखा कि मैं एक रेगिस्तान में खो गइ हूँ। ऐसे

में एक चील मेरे पास आई और उसने 3 बार जोर जोर

से बोला अभिलाष! अभिलाष! अभिलाष !!!

बस फिर ख्वाब खत्म हो गया और मेरी आंख खुल गई। जरा बताओ तो इसका क्या मतलब हुई? ''

चोर सोच में पड़ गया। इतने में बराबर वाले कमरे से

बुढ़िया का नौजवान बेटा अभिलाष अपना नाम

ज़ोर ज़ोर से सुनकर उठ गया और अंदर आकर चोर की

जमकर धुनाई कर दी।

बुढ़िया बोली ''बस करो अब

यह अपने किए की सजा भुगत चुका।"

चोर बोला, "नहीं- नहीं ! मुझे और कूटो , सालों!....

ताकि मुझे आगे याद रहे कि मैं चोर हूँ , सपनों का सौदागर नहीं। '' 😖😖😩😩

(((( मोहन के गोपाल ))))

 प्रस्तुति - रेणु दत्ता / आशा सिन्हा 

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छोटे-से गांव में एक दरिद्र विधवा ब्राह्मणी रहती थी। छह वर्षीय बालक मोहन के अतिरिक्त उसका और कोई नहीं था। 

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वह दो-चार भले घरों से भिक्षा मांगकर अपना तथा बच्चे का पेट भर लेती और भगवान का भजन करती थी। भीख पूरी न मिलती तो बालक को खिलाकर स्वयं उपवास कर लेती। यह कम चलता रहा। 

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ब्राह्मणी को लगा कि ब्राह्मण के बालक को दो अक्षर न आए यह ठीक नहीं है। गांव में पड़ाने की व्यवस्था नहीं थी। गाँव से दो कोस पर एक पाठशाला थी। 

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ब्राह्मणी अपने बेटे को लेकर वहा गई। उसकी दरिद्रता तथा रोने पर दया करके वहा के अध्यापक ने बच्चे को पढ़ाना स्वीकार कर लिया।

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वहां पढने वाले छात्र गुरु के घर में रहते थे किंतु ब्राह्मणी का पुत्र मोहन अभी बहुत छोटा था और ब्राह्मणी को भी अपने पुत्र को देखे विना चैन नहीं पड़ता था अत: मोहन नित्य पढ़ने जाता और सायंकाल घर लौट आता।

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उसको विद्या प्राप्ति के लिए प्रतिदिन चार कोस चलना पड़ता। मार्ग में कुछ दूर जंगल था। शाम को लौटने में अंधेरा होने लगता था। उस जंगल में मोहन को डर लगता था। 

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एक दिन गुरुजी के यहा कोई उत्सव था। मोहन को अधिक देर हो गई और जब वह घर लौटने लगा रात्रि हो गई थी। अंधेरी रात जंगली जानवरों की आवाजों से बालक मोहन भय से थर-थर कांपने लगा। 

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ब्राह्मणी भी देर होने के कारण बच्चे को ढूंढने निकली थी। किसी प्रकार अपने पुत्र को वह घर ले आई। 

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मोहन ने सरलता से कहा : ”मां ! दूसरे लड़को को साथ ले जाने तो उनके नौकर आते हैं। मुझे जंगल में आज बहुत डर लगा। तू मेरे लिए भी एक नौकर रख दे।” बेचारी ब्राह्मणी रोने लगी। उसके पास इतना पैसा कहा कि नौकर रख सके। 

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माता को रोते देख मोहन ने कहा : ”मां ! तू रो मत ! क्या हमारा और कोई नहीं है ?” अब ब्राह्मणी क्या उत्तर दे ? उसका हृदय व्यथा से भर गया।

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उसने कहा : ”बेटा ! गोपाल को छोड़कर और कोई हमारा नहीं है।” बच्चे की समझ में इतनी ही बात आई कि कोई गोपाल उसका है। 

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उसने पूछा : ”गोपाल कौन ? वे क्या लगते हैं मेरे और कहा रहते हैं ?”

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ब्राह्मणी ने सरल भाव से कह दिया : ”वे तुम्हारे भाई लगते हैं। सभी जगह रहते हैं परंतु आसानी से नहीं दिखते। संसार में ऐसा कौन सा स्थान है जहां वे नहीं रहते। लेकिन उनको तो देखा था ध्रुव ने, प्रहलाद ने ओर गोकुल के गोपों ने।”

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बालक को तो अपने गोपाल भाई को जानना था। वह पूछने लगा : गोपाल मुझसे छोटे हैं या बड़े अपने घर आते हैं या नहीं?

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माता ने उसे बताया : ”तुमसे वे बड़े हैं और घर भी आते हैं पर हम लोग उन्हें देख नहीं सकते। जो उनको पाने के लिए व्याकुल होता है उसी के पुकारने पर वे उसके पास आते हैं।” 

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मोहन ने कहा : ”जंगल में आते समय मुझे बड़ा डर लगता है। मैं उस समय खूब व्याकुल हो जाता हूं। वहां पुकारू तो क्या गोपाल भाई आएंगे ?”

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माता ने कहा : ”तू विश्वास के साथ पुकारेगा तो अवश्य वे आएंगे।” मोहन की समझ में इतनी बात आई कि जंगल में अब डरने की जरूरत नहीं है। डर लगने पर मैं व्याकुल होकर पुकारूंगा तो मेरा गोपाल भाई वहा आ जाएगा।

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दूसरे दिन पाठशाला से लौटते समय जब वह वन में पहुचा उसे डर लगा। उसने पुकारा : ”गोपाल भाई ! तुम कहां हो ? मुझे यहा डर लगता है। मैं व्याकुल हो रहा हूं। गोपाल भाई !”

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जो दीनबंधु हैं दीनों के पुकारने पर वह कैसे नहीं बोलेंगे। मोहन को बड़ा ही मधुर स्वर सुनाई पड़ा : ”भैया ! तू डर मत। मैं यह आया।” यह स्वर सुनते ही मोहन का भय भाग गया।

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थोड़ी दूर चलते ही उसने देखा कि एक बहुत ही सुंदर ग्वालबाल उसके पास आ गया। वह हाथ पकड़कर बातचीत करने लगा। साथ-साथ चलने लगा। उसके साथ खेलने लगा। वन की सीमा तक वह पहुंचाकर लौट गया। गोपाल भाई को पाकर मोहन का भय जाता रहा।

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घर आकर उसने जब माता को सब बातें बताईं तब वह ब्राह्मणी हाथ जोडकर गदगद हो अपने प्रभु को प्रणाम करने लगी।

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उसने समझ लिया जो दयामयी द्रोपदी और गजेंद्र की पुकार पर दौड़ पड़े थे मेरे भोले बालक की पुकार पर भी वही आए थे। ऐसा ही नित्य होने लगा..

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एक दिन उसके गुरुजी के पिता का श्राद्ध होने लगा। सभी विद्यार्थी कुछ न कुछ भेंट देंगे। गुरुजी सबसे कुछ लाने को कह रहे थे। 

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मोहन ने भी सरलता से पूछा : “गुरुजी ! मैं क्या ले आऊं ?” गुरु को ब्राह्मणी की अवस्था का पता था। उन्होंने कहा : ‘बेटा ! तुमको कुछ नहीं लाना होगा।’

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लेकिन मोहन को यह बात कैसे अच्छी लगती। सब लड़के लाएंगे तो मैं क्यों न लाऊं उसके हठ को देखकर गुरुजी ने कह दिया : ”अच्छा तुम एक लोटा दूध ले आना।” 

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घर जाकर मोहन ने माता से गुरुजी के पिता के श्राद्ध की बात कही और यह भी कहा” मुझे एक लोटा दूध ले जाने की आज्ञा मिली है।”

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ब्राह्मणी के घर में था क्या जो वह दूध ला देती। मांगने पर भी उसे दूध कौन देता लेकिन मोहन ठहरा बालक। वह रोने लगा। 

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अंत में माता ने उसे समझाया : ”तू गोपाल भाई से दूध मांग लेना। वे अवश्य प्रबंध कर देंगे।” 

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दूसरे दिन मोहन ने जंगल में गोपाल भाई को जाते ही पुकारा और मिलने पर कहा : ”आज मेरे गुरुजी के पिता का श्राद्ध है। मुझे एक लोटा दूध ले जाना है। मां ने कहा है कि गोपाल भाई से मांग लेना। सौ मुझे तुम एक लोटा दूध लाकर दो।” 

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गोपाल ने कहा : ”मैं तो पहले से यह लौटा भर दूध लाया हूं । तुम इसे ले जाओ।” मोहन बड़ा प्रसन्न हुआ। 

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पाठशाला में गुरुजी दूसरे लड़कों के उपहार देखने और रखवाने में लगे थे। मोहन हंसता हुआ पहुंचा। कुछ देर तो वह प्रतीक्षा करता रहा कि उसके दूध को भी गुरुजी देखेंगे। 

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पर जब किसी का ध्यान उसकी ओर न गया तब वह बोला : ‘गुरुजी ! मैं दूध लाया हूं।’ गुरु जी ढेरों चीजें सम्हालने में व्यस्त थे। मोहन ने जब उन्हें स्मरण दिलाया तब झुंझलाकर बोले : ”जरा-सा दूध लाकर यह लड़का कान खाए जाता है जैसे इसने हमें निहाल कर दिया।

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इसका दूध किसी बर्तन से डालकर हटाओ इसे यहां से।”

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मोहन अपने इस अपमान से खिन्न हो गया। उसका उत्साह चला गया। उसके नेत्रों से आंसू गिरने लगे।

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नौकर ने लोटा लेकर दूध कटोरे मे डाला तो कटोरा भर गया फिर गिलास में डाला तो वह भी भर गया। बाल्टी में टालने लगा तो वह भी भर गई। भगवान के हाथ से दिया वह लोटा भर दूध तो अक्षय था। 

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नौकर घबराकर गुरुजी के पास गया। उसकी बात सुनकर गुरुजी तथा और सब लोग वहां आए अपने सामने एक बड़े पात्र में दूध डालने को उन्होंने कहा। पात्र भर गया पर लोटा तनिक भी खाली नहीं हुआ। इस प्रकार बड़े-बड़े बर्तन दूध से भर गए। 

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अब गुरुजी ने पूछा : ”बेटा ! तू दूध कहां से लाया हें ?” सरलता से बालक ने कहा : ”मेरे गोपाल भाईआ ने दिया।” गुरुजी और चकित हुए। उन्होंने पूछा : ”गोपाल भाई कौन ? तुम्हारे तो कोई भाई नहीं।”

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मोहन ने दृढ़ता से कहा : ”है क्यों नहीं। गौपाल भाई मेरा बड़ा भाई है। वह मुझे रोज वन में मिल जाते है। मां कहती हैं कि वह सब जगह रहता है पर दिखता नहीं कोई उसे खूब व्याकुल होकर पुकारे तभी वह आ जाता है। उससे जो कुछ मांगा जाए वह तुरंत दे देता है।”

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अब गुरुजी को कुछ समझना नहीं था। मोहन को उन्होंने हृदय से लगा लिया। श्राद्ध में उस दूध से खीर बनी और ब्राह्मण उसके स्वाद का वर्णन करते हुए तृप्त नहीं होते थे । 

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गोपाल भाई के दूध का स्वाद स्वर्ग के अमृत में भी नहीं तब संसार के किसी पदार्थ में कहां से होगा। उस दूध का बना श्राद्धान्त पाकर गुरुजी के पितर तृप्त ही नहीं हुए, माया से मुक्त भी हो गए। 

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श्राद्ध समाप्त हुआ। संध्या को सब लोग चले गए। मोहन को गुरुजी ने रोक लिया था। अब उन्होंने कहा : ”बेटा ! मैं तेरे साथ चलता हूं। तू मुझे अपने गोपाल भाई के दर्शन करा देगा न ?”

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मोहन ने कहा : ”चलिए मेरा गोपाल भाई तो पुकारते ही आ जाता है।” वन में पहुंच कर उसने पुकारा। उत्तर में उसे सुनाई पड़ा : ”आज तुम अकेले तो हो नहीं तुम्हें डर तो लगता नहीं, फिर मुझे क्यों बुलाते हो ?” 

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मोहन ने कहा : ”मेरे गुरुजी तुम्हें देखना चाहते हैं तुम जल्दी आओ !”

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जब मोहन ने गोपाल भाई को देखा तो गुरुजी से कहा : ”आपने देखा मेरा गोपाल भाई कितना सुदर है ?” 

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गुरुजी कहने लगे : “मुझे तो दिखता ही नहीं। मैं तो यह प्रकाशमात्र देख रहा हूं।”

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अब मोहन ने कहा : “गोपाल भाई ! तुम मेरे गुरुजी को दिखाई क्यों नहीं पड़ते ?”

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उत्तर मिला : ”तुम्हारी बात दूसरी है। तुम्हारा अत: करण शुद्ध है तुममें सरल विश्वास है, अत: मैं तुम्हारे पास आता हूं।

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तुम्हारे गुरुदेव को जो प्रकाश दिख गया उनके लिए वही बहुत है। उनका इतने से ही कल्याण हो जाएगा।

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उस अमृत भरे स्वर को सुनकर गुरुदेव का हृदय गदगद हो गया। उनको अपने हृदय में भगवान के दर्शन हुए। भगवान की उन्होंने स्तुति की।

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कुछ देर में जब भगवान अंतर्धान हो गए, तब मोहन को साथ लेकर वे उसके घर आए और वहां पहुंचकर उनके नेत्र भी धन्य हो गए। 

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गोपाल भाई उस ब्राह्मणी की गोद में बैठे थे और माता के नेत्रों की अश्रुधार उनकी काली धराली अलकों को भिगो रही थी। माता को शरीर की सुध-बुध ही नहीं थी।

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Bhakti Kathayen भक्ति कथायें

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 ((((((( जय जय श्री राधे )))))))

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गुरुवार, 5 अगस्त 2021

अनामी शरण बबल / राजेंद्र अवस्थी की याद में

 राजेन्द्र अवस्थी को याद करते हए



अनामी शरण बबल




दिल्ली शहर का चरित्र एकदम अनोखा और बेईमान सा है। एक बार दिल्ली से दिल लगने के बाद न तो कोई दिल्ली को छोड़ पाता है और ना ही दिल्ली अपने ग्लैमर पाश से उसको छोड़ती है। दिल्ली दिल में बस जाती है, और दिल्ली के तिलिस्म से भी कोई चाहकर भी बाहर नहीं हो पाता। मगर पिछले 28 सालों में यह देखा आजमाया या पाया है कि दिल्ली से दूर रहते हुए संबंधों में जो उष्मा बेताबी गरमी रोमांच लगाव, ललक आकर्षण और उत्कंठा होती है। यही लगाव दिल्ली पहुंचते ही नरमा जाता है। दिल्ली में रहते हुए भी आदमी अपनों से अपनों के लिए दूर हो जाता है।


















राजेन्द्र अवस्थी को याद करते हए


अनामी शरण बबल




जीवन में पहली बार मैं दिल्ली 1984 में आया था। फरवरी की कंपकपाती ठंड में उस समय विश्व पुस्तक मेला का बाजार गरम था। दिल्ली का मेरा इकलौता मित्र अखिल अनूप से अपनी मस्त याराना थी। कालचिंतन के चिंतक पर बात करने से पहले दिल्ली पहुंचने और दिल्ली में घुलने मिलने की भी तो अपनी चिंता मुझे ही करनी थी। उस समय हिन्दी समाज में कादम्बिनी और इसके संपादक का बड़ा जलवा था। इस बार की दिल्ली यात्रा में अवस्थी जी से मेरी एकाएक क्षणिक मुलाकात पुस्तक मेले के किसी एक समारोह में हुई थी। जिसमें केवल उनके चेहरे  को देखा भर था।

मगर 1984 में ही गया के एक कवि प्रवीण परिमल मेरे घर देव औरंगाबाद बिहार में आया तो फिर प्रवीण से भी इतनी जोरदार दोस्ती हुई जो आज भी है। केवल अपने लेखक दोस्तों से मिलने के लिए ही मैं एक दो माह में गया भी चला जाता था। इसी बहाने गया के ज्यादातर लेखक कवि पत्रकारों से भी दोस्ती सलामत हो गयी। जिसमें सुरंजन का नाम सबसे अधिक फैला हुआ था। दिल्ली से अनभिज्ञ मैं सुरंजन के कारण ही कादम्बिनी परिवार से परिचित हुआ।  जब भी दिल्ली आया तो पहुंचने पर कुछ समय कादम्बिनी के संपादकीय हॉल मे या कैंटीन में जरूर होता था। खासकर धनजंय सिंह सुरेश नीरव या कभी कभार प्रभा भारद्वाज दीदी  समेत कई लोग होते थे जिनके पास बैठकर या एचटी कैंटीन (जो अपने अखबार से ज्यादा कैंटीन के लिए ही आसपास में फेमस था) में कभी खाना तो कभी चाय नाश्ते का ही स्वाद काफी होता था।  

इस मिलने जुलने का एक बड़ा फायदा यह भी हुआ कि कादम्बिनी में उभरते युवा कवियों के लिए सबसे लोकप्रिय  दो पेजी स्तंभ प्रवेश में मेरी छह सात कविताएं लंबी प्रतीक्षा के बिना ही 1985 अक्टूबर में छप गयी । जिसके बाद औरंगाबाद और आसपास के इलाकों से करीब 100 से ज्यादा लोगों ने पत्र लिखकर मेरा हौसला बढाया । तभी मुझे कादम्बिनी की लोकप्रियता का अंदाजा लगा। देव के सबसे मशहूर लेखक पत्रकार और सासंद रहे शंकर दयाल सिंह (चाचा) का भी पटना से दिल्ली सफर के बीच लिखा पत्र भी मेरी खुशी में इजाफा कर गया।


दिल्ली लगातार आने जाने के चलते संपादक राजेन्द्र अवस्थी जी भी हमलोग को ठीक से पहचानने लगे थे। पहली बार कोई ( धनंजय सिंह सुरेश नीरव जी या कभी प्रभा जी) अवस्थी जी के कमरे में ले जाकर मुझे छोड़ देते थे। बारम्बार आने की वजह से अवस्थी जी से भी मैं खुल गया था । कई बार तो मैं अपन ज्यादा न समझ में आने के बाद भी उनके संपादकीय काल चिंतन पर ही कोई चर्चा कर बैठता तो कभी अगले तीन चार माह के भावी अंकों पर भी पूछ बैठता। कभी कभी मुझे अब लगता है कि इतने बड़े संपादक और साहित्यकात होने पर भी वे मेरे जैसे एकदम कोरा कागज से भी कितने सहज बने रहते थे। लेखक कवि से ज्यादा उत्साही साहित्य प्रेमी सा मैं उनके सामने बकबक कर देता तो भी वे मीठी मुस्कान के संग ही सरल बने रहते थे।

 मेरी आलतू फालतू बातों या नकली चापलूसी की बजाय सीधे भावी कार्यक्रमों योजनाओं पर या सामान्य अंक के बाद किस तरह किसी विशेष अंक  की रूपरेखा बनाते और तैयारी पर मेरा पूछना भी उनको रास आने लगा था । दो एक बार वे मुझसे पूछ बैठते कि भावी अंको को लेकर इतनी उत्कंठा क्यों होती है  ? इस पर मैं सीधे कहता था कि यदि अंक को लेकर मन में जिज्ञासा नहीं होगी तो उसे खरीदना पढना सहेजना या किसी अंक की बेताबी से इंतजार या दोस्तों में चर्चा क्यों करूंगा ? मेरा यह जवाब उनको हमेशा पसंद आता था। मैं अब महसूस करता हूं कि वे भी बड़ी चाव से अपने विशेष अंकों के बारे में ही मुझे बताते थे। कभी उबन सा महसूस नहीं करते।


उनदिनों 1987 में वे साप्ताहिक हिन्दुस्तान पत्रिका के संपादन का काम भी संभाल रहे थे। एक बार मैं अचनक टपका तो वे दो चार मिनट में ही बोल पड़े आज काफी बिजी हूं फिर आइएगा। मैने उठने की चेष्टा के साथ पूछ बैठा कोई खास अंक की रणनीति बना रहे है  क्या ?  उनके हां कहते ही मैंने मौके की गंभीरता और नजाकत को समझे बगैर ही कह डाला कि इसके लिए सर आप संपादकीय टीम के साथ बैठकर फाईनल टच दे और सबको इसमें सुझाव देने को पर जोर दे। इससे कई नए सुझाव के बाद तो विशेषांकों में और निखार आएगा। मेरी बात सुनकर वे एकटक मुझे देखने लगे। मुझे लगा कि मुझसे कोई गलती हो गयी। तो मैं हकलाते हुए पूछा मैने कुछ गलती कर दी क्या ? इस पर वे खिलखिला पड़े और हंसते हुए कहा बैठो अनामी बैठो तुम बैठो। मैं भी एकदम भौचक्क कि कहां तो वे मुझे देखते ही भगाने के फिराक में थे और अब ठहाका मारते हुए बैठने का संकेत कर रहे है। उन्होने पूछा कि चाय पीओगे क्या मेरी उत्कंठा और बढ़ गयी। चाय का आदेश देते हुए उन्होने कहा यार मुझे तुम जैसे ही लड़कों की जरूरत है। मैं एक पल गंवाए बिना ही तुरंत कह डाला कि सर तो वीकली में मुझे रख लीजिए न फिर कुछ सबसे अलग हटकर नया रंग रूप देते है। उन दिनों मैं दिल्ली में iimc-hj/1987-88 का छात्र थआ।  मेरी सादगी या बालसुलभ उत्कंठा पर मुस्कुराते हुए कहा जरूर अनामी तुम पर ध्यान रखूंगा पर साप्ताहिक हिन्दुस्तान तो अब केवल एक साल का बच्चा रह गया है।  इसको बंद किया जाना है लिहाजा मैं मैनेजमेट को कह नहीं सकता और साप्ताहिक के अंक तो बस पूंजीपतियों के लाभ हानि के हिसाब किताब के लिए छप रहा है।  पर अनामी मुझे तुम बहुत उत्साही लगते हो और मैं तुमको बहुत पसंद भी करता हूं। अपने उत्साह को किसी भी हाल में कभी मरने नहीं देना । यही आपकी पूंजी है जो कभी मौका मिलने पर आपको नया राह दिखाएगी। पहले तो मैं उनकी बाते सुनकर जरा उदास सा हो गया था, पर अवस्थी जी ,से अपनी तारीफ सुनकर मन पुलकित हो उठा।  मैने उनसे पूछा कि आप मेरे मन को रखने के लिए कह रहे है, या वाकई इन बातों से कुछ झलकता है ? मेरी बात सुनकर उन्होने कहा इसका फैसला समय पर छोड दो अनामी।


भारतीय जनसंचार संस्थान में नामांकन के बाद पूरे कादम्बिनी परिवार से महीने में दो एक बार मुलाकात जरूर कर लेता था। उस समय दिल्ली आज की तरह हसीन शहर ना होकर गंवार सा थका हुआ शहर था। जिंदगी में भी न रफ्तार थी न दुकानों में ही कोई खास चमक दमक ।  दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) का मासिक बस पास हम छात्रों को 13 रूपए में मिलता था। पूरी दिल्ली में घूमना एकदम आसान था । और दिल्ली के कोने कोने को जानने की उत्कंठा ही मुझे इधर उधर घूमने और जानने को विवश करती थी।

पत्रकारिता के पाठ्यक्रम के दौरान एक प्रोजेक्ट बनाना था। इसके लिए मुझे किसी एक संपादक से साक्षात्कार लेना था। और जाहिर है कि राजेन्द्र अवस्थी हमारे हीरो संपादक थे। फोन करके समय लिया और एकदम समय पर मैं उनके कमरे के बाहर खड़ा था। कमरे के भीतर गया तो हमेशा की तरह चश्मे के पीछे से मुस्कुराता चेहरा और उन्मुक्त हास्य के साथ स्वागत करने की उनकी एक मनोहर शैली थी। बहुत सारे सवालों के साथ मैं श्री अवस्थी की पत्रकारिता संपादकीय कौशल लेखन से लेकर आदिवासियों पर किए गए शोधपरक काम और घोटूल ( अविवाहित आदिवासी युवा लड़के लड़कियों का नाईट क्लब) जहां पर वे आपस में जीवन साथी पसंद करते है) पर अपनी जिज्ञासा सहित बहुत कुछ जानने की मानसिक उतेजना के साथ हाजिर था।

बहुत सारे सवालों का वे सटीक और सारगभित उतर दिया। तभी वे एकाएक खिलखिला पड़े अरे अनामी आपने मुझे कितना पढा है ? मैने तुरंत कहा कि कथा कहानी उपन्यास तो एकदम नहीं पर आपके संपादकीय कालचिंतन और इधर उधर के समारोह सेमिनारों में जो आपने विचार रखे हैं उसकी करीब 20-22 कटिंग के अलावा करीब एक दर्जन आपके इंटरव्यू का कतरन भी मेरे पास है और सबों को मिलाकर आपका पूरा लेखकीय छवि मेरे पास है। मेरी बात सुनकर वे फिर हंस पड़े। उन्होने कहाकि आदिवासियों पर काम करने वाला मैं हिन्दी का पहला साहित्यकार हूं इससे जुड़े सवाल को सामने रखे ताकि उसके बहाने मैं अपनी मेहनत और कार्य को फोकस कर सकूं।

मेरे पास इस संदर्भ से जुड़े तो कोई खास सवाल और गहन जानकारी थी नहीं। मेरे हथियार डालने पर कमान उन्होने खुद थाम ली। इस बाबत तब एक तरह से जानकारी देने के लिए अवस्थी जी खुद ही कोई सवाल करते और सुविधा जनक  तरीके से आदिवासियों के जनजीवन रहन सहन पर जवाब भी देकर बताने लगे। एकदम रसिक भाव से आदिवासी महिलाओं के देह लावण्य शारीरिक सौष्ठव से लेकर अंग प्रत्यंग पर रौशनी डालते हुए मुझे भी आदिवासी सौंदर्य पर मोहित कर डाला। घोटुल और उनकी काम चेतना पर भी अवस्थी जी ने मोहक प्रकाश डाला। करीब एक घंटे तक श्री अवस्थी जी अपना इंटरव्यू खुद मेरे सामने लेते देते रहे और मैं उनकी रसीली नशीली मस्त बातों और आदिवासी महिलाओं की देह और कामुकता का रस पीता रहा। और अंत में खूब जोर से ठठाकर हंसते हुए श्री अवस्थी जी ने इंटरव्यू समापन के साथ ही अपने संग मुझे भी समोसा और चाय पीने का सुअवसर प्रदान किया।


एक बार उन्होने पूछा आपने मेरा उपन्यास जंगल के फूल पढा है ? ना कहने पर फौरन अपने बुक सेल्फ से एक प्रति निकालकर मुझे दे दी। मगर इस उपन्यास पर अपनी बेबाक राय बताने के लिए भी कहा। इस बहुचर्चित उपन्यास को मेरे ही किसी उस्ताद मित्र ने गायब कर दी। तो सालों के बाद अवस्थी जी ने मुझे इसकी दूसरी प्रति 11 सितम्बर 1997 को फिर से दी। और हस्ताक्षर युक्त यह बहुमूल्य प्रति आज भी मेरे किताबों के मेले की शोभा है। और करीब एक माह के बाद इस किताब की बेबाक समीक्षा मैने उनके दफ्तर में ही उन्हें सुना दी।

पहले तो मेरे मन में श्री अवस्थी को लेकर एक छैला वाली इमेज गहरा गयी मगर दूसरे ही पल उनकी सादगी और निश्छलता पर मन मोहित भी हुआ कि मुझ जैसे एकदम नए नवेलों के साथ भी इतनी सहजत सरलता और आत्मीयता से बात करना इनके व्यक्तित्व का सबसे सबल और मोहक पक्ष है। इस इंटरव्यू समापन के बाद उनकी ही चाय और समोसे खाते हुए मैने पूछा कि आदिवासी औरतों के मांसल देहाकार पर आपका निष्कर्ष महज एक लेखक की आंखों का चमत्कार है या आपने कभी स्पर्श सुख का भी आनंद लिया है। मेरे सवाल पर झेंपने की बजाय  एकदम उत्सुकता मिश्रित हर्ष के साथ बताया कि मैं इनलोगों के साथ कई माह तक रहा हूं तो मैं सब जान गया था।

बात को पर्दे में रखने की कला का तो आदर करने के बाद भी घोटुल प्रवास पर रौशनी डालने को कहा, तो  इस सवाल को लेकर भी वे काफी उत्साहित दिखे। उन्होने कहा कि आदिवासी समाज में कई वर्जनाओं (प्रतिबंधों) नहीं है। घोटुल भी इस समाज की आधुनिक सोच मगर सफल और स्वस्थ्य प्रेममय दाम्पत्य जीवन की सीख और प्रेरणा देती है। मैने उनसे पूछा कि आमतौर पर आदिवासी इलाकों में अधिकारियों या कर्मचारियों द्वारा अपने साथ परिवार या पत्नी को लाने जाने वालों को मूर्ख क्यों समझा या माना जाता है  ? इस सवाल पर वे हंस पड़े और सेक्स को लेकर खुलेपन या बहुतों से शारीरिक संबंध को भी समाज में बुरा नहीं माना जाना ही इनके लिए अभिशाप बन गया है।

दिल्ली  विवि के हंसराज कॉलेज की वार्षिक पत्रिका हंस को किसी तरह अपने नाम करके और प्रेमचंद की पत्रिका हंस नाम का चादर ओढ़ाकर विख्यात कथाकार राजेन्द्र यादव और हंस का दरियागंज की एक तंग गली में जब पुर्नजन्म हुआ हंस के जन्म (1986 तक) से पहले तक  तो दिल्ली के लेखक और पाठकों के बीच कादम्बिनी नामक पत्रिका का ही बड़ा जलवा था। श्री अवस्थी जी को लेकर मेरे मन में आदर तो था पर उनके रोमांस और महिला मित्रों के चर्चे भी साहित्यिक गलियारे में खूब होती थी। कभी कभी तो मैं उन लेखकों को देखकर हैरत में पड़ जाता कि जो लोग अवस्थी जी को दिल खोलकर गरियाते और दर्जनों लेखिकाओं के साथ संबंधों का सामूहिक आंखो देखा हाल सुनाकर लोगों को रसविभोर कर देते थे। मगर  इसी तरह के कई लेखक जब कभी अवस्थी जी के सामने जाते या मिलते तो एकदम दास भक्ति चारण शैली में तो बेचारे कुत्ते को भी शर्मसार कर देते दिखे। और यह देख मेरी आंखे फटी की फटी रह जाती। शहरिया कल्चर और आधुनिक संबंधों की मस्तराम शैली ने मुझे एक तरह से महानगरीय  अपसंस्कृति से अवगत कराया। वही यह भी बताया कि किसी भी खास मौके पर किसी को भी बातूनी चीरहरण कर देना या चरित्रहनन कर देना किसी को अपमानित भले लगे मगर इन बातों से लेखकीय समाज में इनकी रेटिंग का ग्राफ हमेशा बुलंदी पर ही रहता। और नाना प्रकार के गपशप के बीच अवस्थी जी एचटी दरबारके
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मोहक मदिरा को कोई न कहो बुरा


ई समाज में पता नहीं क्यों लोग दारू और दारूबाजों को ठीक नजर से नहीं देखते हैं। मेरा मानना है कि संयम के साथ किसी भी चीज के सेवन बुराई क्या है ? सामान्य लोग मानते हैं कि यह दारू मदिरा शराब से आदमी बिगड. जाता है। अपन परिवार भी कुछ इस मामले में तनी पुरानी सोच वाला ही है। खैर इस पारिवारिक बुढ़ऊंपन सोच के कारण गाहे बेगाहे दर्जनों मौकों पर अपने दारूबाज दोस्तों की नजर में मेरा जीवन बेकार एकदम अभिशाप सा हो गया। इन तगमों उलाहनों और प्रेम जताने के नाम पर दी जाने वाली मनभावन रिश्तों वाली गालियों को सहन के बाद भी दारू कभी मुझे अपनी तरफ आकर्षित नहीं कर सकी। मेरी धारणा है कि दारू को कोई नहीं पीता अंतत दारू ही सबको पी जाती है। इन तमाम पूर्वाग्रहों और गंवईपन वाली धारणा के बाद भी एक घटना ने मेरी आंखे खोल दी। चाहे शराब की जितनी भी हम निंदा करे, मगर शराब कुछ मामलों में संजीवनी से कम नहीं।

सुरंजन के साथ मैं सहारनपुर में ही था।  तभी लांयस क्लब वालो नें अपने सालाना जलसे में खास तौर पर अवस्थी जी को बुलाया था। अपने परम सहयोगी सुरेश नीरव  के साथ पूरे आदर सम्मान के साथ वे सहारनपुर पधारे। कहना बेमानी होगा कि इनका किस तरह का स्वागत किया गया होगा। बढ़िया होटेल में इनको और नीरव जी को ठहराया गया। रंगारंग कार्यक्रम के बीच रात में खानपान भी था। और इनसे मिलिए कार्यक्रम में अवस्थी जी को शहर की गणमान्य महिलाओं और महिला लेखको से मिलना था। उनके दिल्ली से आते ही हमलोग की सहारनपुर में एकाध घंटे की मुलाकात हो गयी थी। नीरव जी के संग गपशप के अलावा अवस्थी जी भी हम दोनों को यहां देखकर बहुत खुश हुए।

 रंगारंग कार्यक्रम निपट गया था और इनसे मिलिए का आयोजन भी समापन के बाद खाने और पीने का दौर चलने लगा था। अवस्थी जी भी नशे मे थे। दारू का रंग दिखने लगा था। तभी एकाएक पता नहीं सुरंजन एकाएक क्यों सनक गया और करीब 25-30 मिनट तक अवस्थी जी को गालियां देने लगा । दर्जनो लांछनों के साथ सुरंजन ने अपनी अश्लील भाषा में कहे तो अवस्थी जी को बेनकाब कर दिया। चारो तरफ सन्नाटा सा हो गया। मगर किसी क्लब वालों ने सुरंजन को पकड़ने या मौके से बाहर ले जाने की कोई कोशिश नहीं की। एक तरफ कई सौ लोग खड़े होकर इस घटना को देख रहे थे और दूसरी तरफ सुरंजन के गालियों के गोले फूट रहे थे। खुमार में अवस्थी जी बारबार सुरंजन को यही कहते क्यों नाराज हो रहे हैं सुरंजन इस बार आपकी कविता कवर पेज पर छापूंगा। तो बौखलाहट से तमतमाये सुरंजन ने मां बहिन बीबी नानी बेटी आदि को दागदार करते हुए कुछ इसी तरह कि गाली बकी थी तू क्या छापेगा आदि इत्यादि अनादि।

मैं दो चार बार अवस्थी सुरंजन कुरूक्षेत्र में जाकर सुरंजन को पकड़ने रोकने की पहल की। कईयों को इसके लिए सामने आने के लिए भी कहा पर बेशर्म आयोजक अपने मुख्य अतिथि का अपने ही शहर में बेआबरू होते देखकर भी बेशर्म मुद्रा में खड़े रहे। वहीं मैं एकदम हैरान कि जिस सुरंजन के साथ मैं अपना बेड और रूम शेयर कर रहा हूं वो भीतर से इतना खतरनाक है। खाल नोंचने का भी कोई यह तरीका है भला।

इस बेशर्म वाक्या का मेरा प्रत्यक्षदर्शी होना मेरे लिए बेहदअपमान जनक सा था। इस घटना के बाद रात में ही मेरे और सुरंजन के बीच अनबन सी हो गयी और मैने जमकर इस गुंडई की निंदा की। वो मेरे उपर ही बरसने की कोशिश की। मैने देर रात को फिलहाल प्रसंग बंद रात काटी। और अगले दिन सुबह तैयार होकर होटेल जाने लगा। इस घटना के बाद सुरंजन की भी बोलती बंद थी. हमलोग होटेल पहुंचे। मेरे मन में  यह आशंका और जिज्ञासा थी कि अवस्थी जी कैसे होगे?
मगर यह क्या ? कमरे में हमलोग को देखते ही अवस्थी जी मुस्कुरा पड़े और आए आइए कहकर स्वागत किया। कमरे में नीरव जी पहले से ही विराजमान थे। हमलोग को देखते ही अवस्थीजी ने हमलोग को अपने साथ ही खिलाया चाय कॉफी में भी साथ रखा। माहौल ऐसा लग रहा था मानो कल रात कुछ हुआ ही न था या कल रात की बेइज्जती का उन्हें कोई आभास नहीं था।

हमलोग उनके साथ करीब दो घंटे तक साथ रहा और उनकी विदाई के साथ ही सुरंजन के साथ वापस दफ्तर लौटा। मेरे दिमाग में कई दिनों तक यह घटना घूमती रही। सुरंजन भी एकाध माह के अंदर ही कुछ विवाद होने के बाद विश्वमानव अखबार छोड़कर वापस दिल्ली लौट गया। मगर मैं 11 दिसम्बर 1988 तक सहारनपुर में ही रहा। एक सड़क हादसे में बुरी तरह घायल होने के बाद दिल्ली में करीब एक माह तक इलाज हुआ.। मगर जैसे आदमी अपने पहले प्यार को जीवनभर भूल नहीं पाता ठीक उसी तरह पहली नौकरी की इस शहर को 28 साल के बाद भी मैं भूल नहीं पाया हूं। आज भी इस शहर में बहुत सारे मित्र है जिनकी यादें मुझे इस शहर की याद और कभी कभार यहां जाने के लिए विवश कर देती है।