सोमवार, 2 अगस्त 2021

कायस्थ समाज*

 एक बुद्धिमान समाज*


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*यह वाक्या, बात उस समय का है जब बादशाह अकबर थे, एक दिन उन्होंने वीरबल से पूँछा, वीरबल हिंदुस्तान में सबसे बुद्धिमान समाज कौन सा है।*

*वीरबल :- हुजूर "कायस्थ" सबसे बुद्धिमान समाज है।*

*अकबर तो हर बात का प्रमाण चाहते थे*

*अकबर:- हमे इसका दीदार (प्रैक्टिकल) रूबरू कराओ*

*वीरबल ने सभी समाज और जातियों के दो दो लोगो की लाल किले में बुलाया, जब सब लोग लाल किले के दीवाने आम में आये तो दोनों कायस्थ भाई सबसे आगे थे, जो अकबर के बिल्कुल नजदीक (अगर कभी मिले तो अकबर पहचान लें)*

*अब वीरबल ने अकबर का फरमान सबको सुनाया*

*वीरबल :- आप सभी लोग अपनी अपनी मूँछे बादशाह की भेंट करें। यह सुन दोनो कायस्थ भाई धीरे धीरे लाइन मे सबसे पीछे चले गए।*

*सब लोग आते गए और उनकी मूँछे कटती गई और अंत मे दोनो कायस्थ भाई ही रह गए और अब उनका ही नंबर था।*

*तब कायस्थ भाई बोले कि हम मूँछे तो कटवा ले "पर" एक बात है।*

*वीरबल ने अकबर के कान में कहा कि देखिए अब इनके "पर" निकलने शुरू हो गए।*

*अकबर:- बोले क्या बात है।*

*कायस्थ भाई:- हमारे हिन्दू समाज मे मूँछे तब कटती है जब पिता का स्वर्गवास हो जाता है और बड़े होने पर जब हमारी मूँछे निकलती है तब तक कम से कम 10,000 दीनारों का खर्चा आ जाता है। तब अकबर के आदेश पर 10,000 दीनार की थैली दी गई, कायस्थ भाइयों ने थैली को तुरंत पकड़ लिया और बोले कि हुजूर इसकी क्या जरूरत है। अकबर ने कहा कि भुगतान पूरा हुआ अब यह शाही मूँछे हो गई है दोनो कायस्थ भाइयों ने इसकी सहमति दी।*

*जब शाही हज्जाम ने उनकी मूंछों पर पानी लगाना शुरू किया, तभी शाही हज्जाम पर दो झापड़ रसीद किये हज्जाम चिल्लाया हुजूर मुझे मारा, अकबर के पूछने पर कायस्थ भाई ने कहा कि यह इन शाही मूंछो पर बेअदबी से पानी लगा रहा है इसको बोलो की आदाब और तमीज से पानी लगाए, अकबर भी हज्जाम से बोले कि आदाब से पानी लगाओ।*

 *अब जैसे ही शाही हज्जाम ने कायस्थ भाई की मूँछो पर उस्तरा लगाया, तभी उस हज्जाम को चार झापड़ और रसीद किये।*

*अब शहंशाह अकबर आए और बोले कि हमारे हज्जाम को क्यों मारा। तब कायस्थ भाई से कहा कि हुजूर हमारे बुजुर्गो ने हमे यही शिक्षा दी है कि बादशाह सलामत की इज्जत के लिये अपना सिर कटवा देना पर उनकी मूँछे झुकने भी नही देना। आपने इनका भुगतान कर दिया है अब यह शाही मूँछे आपकी  हो गई है हमारे रहते हुये यह आपकी मूँछे कैसे कोई काट सकता है।*

*बात बादशाह अकबर की समझ मे आई और शाही हज्जाम पर चिल्ला कर बोले कि यह शाही मूँछे है यह नही काटी जाएगी। जब दोनों कायस्थ भाई वहाँ से विदा लेकर चले गए तब वीरबल ने बादशाह से कहा कि दोनों कायस्थ भाई 10,000 दीनार की रकम ले गए, आपके शाही हज्जाम को 4, 6 झापड़ मार गए और अपनी मूँछे भी सही सलामत ले गए अब आप ही फैसला करे कि कौन सी जाति बुद्धिमान है।*

*बादशाह अकबर ने कहा वीरबल तुम सही कह रहे हो वास्तव में "कायस्थ समाज का बुद्धिमानी में कोई  जबाब ही नही है।"*

*चित्रगुप्त भगवान की जय*

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*धन्यवाद*

रविवार, 11 जुलाई 2021

आज की शबरी

 *#कलयुग कि #शबरी #आज की #तस्वीर में जो बुजुर्ग महिला बैठी हुई है। इनके #दर्शन करना बड़े #सौभाग्य की बात है क्योंकि यह पिछले 46 सालों से राधा रमन जी के प्रांगण में ही बैठी रहती है। और कभी राधा रमन जी की गलियां और राधा रमन जी का मंदिर छोड़कर   इधर उधर वृंदावन में कहीं नहीं गई। इन   बुजुर्ग महिला की उमर 81 साल हो चुकी है। जब यह  35 बरस की थी । तब यह  जगन्नाथ पुरी से चलकर अकेली वृंदावन के लिए आई थी। वृंदावन पहुंचकर इन्होंने किसी बृजवासी से वृंदावन का रास्ता पूछा ।उस ब्रजवासी ने इनको राधा रमन जी का मंदिर दिखा दिया। आज से 46 साल पहले कल्पना कीजिए वृंदावन कैसा होगा। यह अकेली जवान औरत सब कुछ छोड़ कर केवल भगवान के भरोसे वृंदावन आ गई। और किसी बृजवासी ने जब इनको राधा रमन जी का मंदिर दिखा   कर यह कह दिया यही वृंदावन है। तब से लेकर आज तक इनको 46 बरस हो गए यह राधा रमन जी का मंदिर छोड़कर कहीं नहीं गई। यह मंदिर के प्रांगण में बैठकर 46 साल से भजन गाती है। मंगला आरती के दर्शन करती हैं। कभी-कभी गोपी गीत गाती हैं। जब इनको कोई भक्त यह कहता है। माताजी वृंदावन घुम  आओ। तो यह कहती है। मैं कैसे जाऊं? लोग बोलते हैं। बस से या ऑटो से चली जाओ। तो यह कहती है जब मुझे किसी बृजवासी ने यह बोल दिया  यही वृंदावन है। तो मेरे बिहारी जी तो मुझे यही मिलेंगे। मेरे लिए तो सारा वृंदावन इसी राधा रमन मंदिर में  ही है। देखिए प्रेम और समर्पण की कैसी प्रकाष्ठा है। आज   के दौर में संत हो या आम जन सब धन -दौलत, रिश्ते- नातों के पीछे भाग रहे है । तो आज भी संसार में ऐसे दुर्लभ भक्त हैं जो केवल और केवल भगवान के पीछे भागते हैं। यह देखने में   बहुत निर्धन   दिखते हैं। परंतु इनका परम धन इनके भगवान 🙏राधा रमन🙏 जी है।* *हम संसार के लोग थोड़ी सी भक्ति करते हैं। और अपने आप को भकत समझ बैठते हैं। और थोड़ी सी भी परेशानी आई   या तो भगवान को कोसने लगते हैं। या उस भगवान को छोड़कर किसी अन्य देवी- देवता की पूजा करने लग जाते हैं। हमारे अंदर समर्पण तो है ही नहीं। आज   संसार के अधिकतर लोग अपनी परेशानियों से परेशान होकर कभी एक बाबा से दूसरे बाबा पर दूसरे बाबा से तीसरे बाबा पर भाग रहे हैं। ओर तो ओर हमारा ना अपने गुरु पर विश्वास है। ना किसी एक देवता को अपना इषट मानते है।  अधिकतर लोग भगवान को अगर प्यार भी करते हैं। तो किसी ना किसी भौतिक जरूरत के लिए करते हैं। परंतु इन दुर्लभ संत  महिला को को देखिये।जो सब कुछ त्याग कर केवल भगवान के भरोसे 46 साल से राधा रमन जी के प्रांगण में बैठी lऐसे संतो के चरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम*🙏🙏🌹

*Զเधे कृष्ण जी*

🙏🌹🌹🙏

सीता की आग्नेय दृष्टि

 🌹आज का भगवद चिंतन - 864🌹

एक बार अयोध्या के राज भवन में भोजन परोसा जा रहा था।

माता कौशल्या बड़े प्रेम से भोजन खिला रही थी।


माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया सभी ने अपनी अपनी पत्तलें सम्भाली सीता जी बड़े गौर से सब देख रही थी...


ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया जिसे माँ सीता जी ने देख लिया... 


लेकिन अब खीर में हाथ कैसे डालें ये प्रश्न आ गया माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर देखा वो जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया सीता जी ने सोचा अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा...


लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी के इस चमत्कार को देख रहे थे फिर भी दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष पहुँचकर माँ सीता जी को बुलवाया...


फिर उन्होंने सीताजी से कहा कि मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था...


आप साक्षात जगत जननी स्वरूपा हैं, लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना...


आपने जिस नजर से आज उस तिनके को देखा था उस नजर से आप अपने शत्रु को भी कभी मत देखना...


इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थीं...


तृण धर ओट कहत वैदेही...

सुमिरि अवधपति परम् सनेही...


यही है...उस तिनके का रहस्य...


इसलिये माता सीता जी चाहती तो रावण को उस जगह पर ही राख़ कर सकती थी लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन एवं भगवान श्रीराम को रावण-वध का श्रेय दिलाने हेतु वो शांत रही...

ऐसी विशालहृदया थीं हमारी जानकी माता...


-प्रेरक / भक्ति कथायें

🙏❤️🌹जय श्री कृष्णा🌹❤️🙏

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बेटी बनकर घर पे रही लक्ष्मी

 ।। माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु के साथ मृत्यु लोक  की भ्रमण की कहानी  !!

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🙏 जय श्रीकृष्ण, जय माता लक्ष्मीi 🙏

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 भगवान् विष्णुजी और सौभाग्य और धन की देवी माँ लक्ष्मीजी के साथ मृत्युलोक भ्रमण की कथा का अमृत पान करेंगे, परमेश्वर के तीन मुख्य स्वरूपों में से एक भगवान विष्णुजी का नाम स्वयं ही धन की देवी माँ लक्ष्मीजी के साथ लिया जाता है, शास्त्रों में कथाओं के अनुसार माँ लक्ष्मीजी हिन्दू धर्म में धन, सम्पदा, शान्ति, सौभाग्य और समृद्धि की देवी मानी जाती हैं।


माता लक्ष्मीजी भगवान् श्री विष्णुजी की अर्धांगिनी हैं. सुख व समृद्धि की प्रतीक माँ लक्ष्मी व भगवान् विष्णुजी को युगों-युगों से एक साथ ही देखा गया है, यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में धन का वास चाहता है, तो हमेशा ही मां लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु की आराधना अवश्य करे. इन दोनों का रिश्ता काफी शुद्ध व सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।


परंतु ऐसा क्या हुआ था? जो लक्ष्मीजी के कारण भगवान् विष्णुजी की आंखें भर आईं? एक कथा के अनुसार लक्ष्मीजी की किस बात से विष्णु जी इतने निराश हो गयें, एक बार भगवान विष्णुजी शेषनाग पर बैठे-बैठे उदास हो गयें और धरती पर जाने का विचार बनाया, धरती पर जाने का मन बनाते ही विष्णुजी जाने की तैयारियों में लग गये।


अपने स्वामी को तैयार होता देख कर लक्ष्मीजी ने उनसे पूछा- स्वामी, आप कहां जाने की तैयारी में लगे हैं? जिसके उत्तर में विष्णुजी ने कहा, हे देवी! मैं धरती लोक पर घूमने जा रहा हूँ, यह सुन माता लक्ष्मीजी का भी धरती पर जाने का मन हुआ और उन्होंने श्रीहरि से इसकी आज्ञा माँगी।


लक्ष्मीजी द्वारा प्रार्थना करने पर भगवान् विष्णुजी बोले आप मेरे साथ चल सकती हो, लेकिन एक शर्त पर, तुम धरती पर पहुँच कर उत्तर दिशा की ओर बिलकुल मत देखना, तभी मैं तुम्हें अपने साथ लेकर जाऊंगा. यह सुनते ही माता लक्ष्मीजी ने तुरंत हाँ कह दिया और विष्णुजी के साथ धरती लोक जाने के लिए तैयार हो गयीं।


माता लक्ष्मीजी और भगवान् विष्णुजी सुबह-सुबह धरती पर पहुँच गए. जब वे पहुंचे तब सूर्य देवता उदय हो ही रहें थे, कुछ दिनों पहले ही बरसात हुयी थी, इसलिये धरती पर  चारों ओर हरियाली ही हरियाली थी, धरती बेहद सुन्दर दिख रही थी, अतः माँ लक्ष्मीजी मन्त्र मुग्ध हो कर धरती के चारों ओर देख रही थीं, माँ लक्ष्मीजी भूल गयीं कि पति को क्या वचन दे कर साथ आई हैं।


अपनी नजर घुमाते हुए उन्होंने कब उत्तर दिशा की ओर देखा उन्हें पता ही नहीं चला? मन ही मन में मुग्ध हुई माता लक्ष्मीजी ने जब उत्तर दिशा की ओर देखा तो उन्हें एक सुन्दर बागीचा नजर आया. उस ओर से भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी. बागीचे में बहुत ही सुन्दर-सुन्दर फूल खिले थे. फूलों को देखते ही मां लक्ष्मी बिना सोचे समझे उस खेत में चली गईं और एक सुंदर सा फूल तोड़ लायीं।


फूल तोड़ने के पश्चात जैसे ही माँ लक्ष्मीजी भगवान् विष्णुजी के पास वापस लौट कर आयीं तब भगवान् विष्णुजी की आँखों में आँसू थे. माँ लक्ष्मीजी के हाथ में फूल देख विष्णुजी बोले, कभी भी किसी से बिना पूछे उसका कुछ भी नहीं लेना चाहियें, और साथ ही माँ लक्ष्मीजी को विष्णुजी को दिया हुआ वचन भी याद दिलाया, और फिर भगवान् विष्णुजी जी ने दी माँ लक्ष्मीजी को सजा।


माँ लक्ष्मीजी को अपनी भूल का जब आभास हुआ तो उन्होंने भगवानक्ष विष्णुजी से इस भूल की क्षमा मांगी, विष्णुजी ने कहा कि आपने जो भूल की है उस की सजा तो आपको अवश्य मिलेगी? जिस माली के खेत से आपने बिना पूछे फूल तोड़ा है, यह एक प्रकार की चोरी है, इसीलिये अब आप तीन वर्षों तक माली के घर नौकर बन कर रहो, उस के बाद मैं आपको बैकुण्ठ में वापस बुलाऊँगा।


भगवान् विष्णुजी का आदेश माता लक्ष्मीजी ने चुपचाप सर झुका कर मान स्वीकार किया, जिसके बाद माँ लक्ष्मीजी ने एक गरीब औरत का रूप धारण किया और उस खेत के मालिक के घर गयीं, माधव नाम के उस माली का एक झोपड़ा था जहां माधव पत्नी, दो बेटे और तीन बेटियों के साथ रहता था, माता लक्ष्मीजी जब एक साधारण औरत बन कर माधव के झोपड़े पर पधारी,  तो माधव ने पूछा- बहन आप कौन हो........??


तब मां लक्ष्मी ने कहा- मैं एक गरीब औरत हूं, मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं, मैंने कई दिनों से खाना भी नहीं खाया, मुझे कोई भी काम दे दो. मैं तुम्हारे घर का काम कर लिया करूँगी और इसके बदले में आप मुझे अपने घर के एक कोने में आसरा दे देना, माधव बहुत ही अच्छे दिल का मालिक था, उसे दया आ गयीं, लेकिन उस ने कहा, बहन मैं तो बहुत ही गरीब हूं, मेरी कमाई से मेरे घर का खर्च काफी कठिनाई से चलता है।


लेकिन अगर मेरी तीन बेटियां है उसकी जगह अगर चार बेटियां होतीं तो भी मुझे गुजारा करना था, अगर तुम मेरी बेटी बन कर और जैसा रूखा-सूखा हम खाते हैं उसमें खुश रह सकती हो तो बेटी अन्दर आ जाओ।


माधव ने माँ लक्ष्मीजी को अपने झोपड़े में शरण दी,  और माँ लक्ष्मीजी तीन साल तक उस माधव के घर पर नौकरानी बन कर रहीं, कथा के अनुसार कहा जाता है कि जिस दिन माँ लक्ष्मीजी माधव के घर आईं थी, उसके दूसरे दिन ही माधव को फूलों से इतनी आमदनी हुई कि शाम को उसने एक गाय खरीद ली।


फिर धीरे-धीरे माधव ने जमीन खरीद ली और सबने अच्छे-अच्छे कपड़े भी बनवा लियें, कुछ समय बाद माधव ने एक बडा पक्का घर भी बनवा लिया, माधव हमेशा सोचता था कि मुझे यह सब इस महिला के आने के बाद मिला है, इस बेटी के रूप में मेरी किस्मत आ गई है...


एक दिन माधव जब अपने खेतों से काम खत्म करके घर आया, तो उसने अपने घर के द्वार पर गहनों से लदी एक देवी स्वरूप औरत को देखा, जब निकट गया तो उसे आभास हुआ कि यह तो मेरी मुंहबोली चौथी बेटी यानि वही औरत है, कुछ समय के बाद वह समझ गया कि यह देवी कोई और नहीं बल्कि स्वयं माँ लक्ष्मीजी हैं, यह जानकर माधव बोला- हे माँ हमें क्षमा करें, हमने आपसे अनजाने में ही घर और खेत में काम करवाया, हे माँ यह हमसे कैसा अपराध हो गया, हे माँ हम सब को माफ़ कर दे।


यह सुन माँ लक्ष्मीजी मुस्कुराईं और बोलीं- हे माधव तुम बहुत ही अच्छे और दयालु व्यक्त्ति हो, तुमने मुझे अपनी बेटी की तरह रखा, अपने परिवार का सदस्य बनाया, इसके बदले मैं तुम्हें वरदान देती हूंँ, कि तुम्हारे पास कभी भी खुशियों की और धन की कमी नहीं रहेगी, तुम्हें सारे सुख मिलेंगे जिसके तुम हकदार हो. इसके पश्चात माँ लक्ष्मीजी अपने स्वामी श्री हरि के द्वारा भेजे रथ में बैठकर वैकुण्ठ चली गयीं, हे माँ मेरी नम्र विनंती है कि जैसे माधव पर कृपा दृष्टि रखी, वैसी ही कृपा दृष्टि हमारे समाज और देश पर रखना।


                 🌹जय श्री लक्ष्मी माँ!🌹

महाभारत की कहानी

 एक रात के लिए पुनर्जीवित हुए थे महाभारत युद्ध में मारे गए वीर=======


        आज  महाभारत से जुडी एक अदभुत घटना के बारे में बता रहे है जब महाभारत युद्ध में मारे गए समस्त शूरवीर जैसे की भीष्म, द्रोणाचार्य, दुर्योधन, अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्र, कर्ण, शिखंडी  आदि एक रात के लिए पुनर्जीवित हुए थे यह घटना महाभारत  युद्ध ख़त्म होने के 15 साल बाद घटित हुई थी। साथ ही हम आपको बताएँगे की धृतराष्ट्, गांधारी, कुन्ती और विदुर की मौत कैसे हुई ? 


आइए इन सब के बारे में विस्तार पूर्वक जानते है –

राजा बनने के पश्चात हस्तिनापुर में युधिष्ठिर धर्म व न्यायपूर्वक शासन करने लगे। युधिष्ठिर प्रतिदिन धृतराष्ट्र व गांधारी का आशीर्वाद लेने के बाद ही अन्य काम करते थे। इस प्रकार अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी आदि भी सदैव धृतराष्ट्र व गांधारी की सेवा में लगे रहते थे, लेकिन भीम के मन में धृतराष्ट्र के प्रति हमेशा द्वेष भाव ही रहता। भीम धृतराष्ट्र के सामने कभी ऐसी बातें भी कह देते जो कहने योग्य नहीं होती थी।


इस प्रकार धृतराष्ट्र, गांधारी को पांडवों के साथ रहते-रहते 15 साल गुजर गए। एक दिन भीम ने धृतराष्ट्र व गांधारी के सामने कुछ ऐसी बातें कह दी, जिसे सुनकर उनके मन में बहुत शोक हुआ। तब धृतराष्ट्र ने सोचा कि पांडवों के आश्रय में रहते अब बहुत समय हो चुका है। इसलिए अब वानप्रस्थ आश्रम (वन में रहना) ही उचित है। गांधारी ने भी धृतराष्ट्र के साथ वन जाने में सहमति दे दी। धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ विदुर व संजय ने वन जाने का निर्णय लिया।


वन जाने का विचार कर धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को बुलाया और उनके सामने पूरी बात कह दी। पहले तो युधिष्ठिर को बहुत दुख हुआ, लेकिन बाद में महर्षि वेदव्यास के कहने पर युधिष्ठिर मान गए। जब युधिष्ठिर को पता चला कि धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ विदुर व संजय भी वन जा रहे हैं तो उनके शोक की सीमा नहीं रही। धृतराष्ट्र ने बताया कि वे कार्तिक मास की पूर्णिमा को वन के लिए यात्रा करेंगे। वन जाने से पहले धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों व अन्य परिजनों के श्राद्ध के लिए युधिष्ठिर से धन मांगा।


भीम ने द्वेषतावश धृतराष्ट्र को धन देने के इनकार कर दिया, तब युधिष्ठिर ने उन्हें फटकार लगाई और धृतराष्ट्र को बहुत-सा धन देकर श्राद्ध कर्म संपूर्ण करवाया। तय समय पर धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर व संजय ने वन यात्रा प्रारंभ की। इन सभी को वन जाते देख पांडवों की माता कुंती ने भी वन में निवास करने का निश्चय किया। पांडवों ने उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन कुंती भी धृतराष्ट्र और गांधारी के साथ वन चलीं गईं।


धृतराष्ट्र आदि ने पहली रात गंगा नदी के तट पर व्यतीत की। कुछ दिन वहां रुकने के बाद धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती, विदुर व संजय कुरुक्षेत्र आ गए। यहां महर्षि वेदव्यास से वनवास की दीक्षा लेकर ये सभी महर्षि शतयूप के आश्रम में निवास करने लगे। वन में रहते हुए धृतराष्ट्र घोर तप करने लगे। तप से उनके शरीर का मांस सूख गया। सिर पर महर्षियों की तरह जटा धारण कर वे और भी कठोर तप करने लगे। तप से उनके मन का मोह दूर हो गया। गांधारी और कुंती भी तप में लीन हो गईं। विदुर और संजय इनकी सेवा में लगे रहते और  तपस्या किया करते थे।


इस प्रकार वन में रहते हुए धृतराष्ट्र आदि को लगभग 1 वर्ष बीत गया। इधर हस्तिनापुर में एक दिन राजा युधिष्ठिर के मन में वन में रह रहे अपने परिजनों को देखने की इच्छा हुई। तब युधिष्ठिर ने अपने सेना प्रमुखों को बुलाया और कहा कि वन जाने की तैयारी करो। 


मैं अपने भाइयों व परिजनों के साथ वन में रह रहे महाराज धृतराष्ट्र, माता गांधारी व कुंती आदि के दर्शन करूंगा। इस प्रकार पांडवों ने अपने पूरे परिवार के साथ वन जाने की यात्रा प्रारंभ की। पांडवों के साथ वे नगरवासी भी थे, जो धृतराष्ट्र आदि के दर्शन करना चाहते थे।


पांडव अपने सेना के साथ चलते-चलते उस स्थान पर आ गए, जहां धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती रहते थे। जब युधिष्ठिर ने उन्हें देखा तो वे बहुत प्रसन्न हुए और मुनियों के वेष में अपने परिजनों को देखकर उन्हें शोक भी हुआ। धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती भी अपने पुत्रों व परिजनों को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। 


जब युधिष्ठिर ने वहां विदुरजी को नहीं देखा तो धृतराष्ट्र से उनके बारे में पूछा। धृतराष्ट्र ने बताया कि वे कठोर तप कर रहे हैं। तभी युधिष्ठिर को विदुर उसी ओर आते हुए दिखाई दिए, लेकिन आश्रम में इतने सारे लोगों को देखकर विदुरजी पुन: लौट गए।


युधिष्ठिर उनसे मिलने के लिए पीछे-पीछे दौड़े। तब वन में एक पेड़ के नीचे उन्हें विदुरजी खड़े हुए दिखाई दिए। उसी समय विदुरजी के शरीर से प्राण निकले और युधिष्ठिर में समा गए। जब युधिष्ठिर ने देखा कि विदुरजी के शरीर में प्राण नहीं है तो उन्होंने उनका दाह संस्कार करने का निर्णय लिया। तभी आकाशवाणी हुई कि विदुरजी संन्यास धर्म का पालन करते थे।


 इसलिए उनका दाह संस्कार करना उचित नहीं है। यह बात युधिष्ठिर ने आकर महाराज धृतराष्ट्र को बताई। युधिष्ठिर के मुख से यह बात सुनकर सभी को आश्चर्य हुआ।


युधिष्ठिर आदि ने वह रात वन में ही बिताई। अगले दिन धृतराष्ट्र के आश्रम में महर्षि वेदव्यास आए। जब उन्हें पता चला कि विदुरजी ने शरीर त्याग दिया तब उन्होंने बताया कि विदुर धर्मराज (यमराज) के अवतार थे और युधिष्ठिर भी धर्मराज का ही अंश हैं। इसलिए विदुरजी के प्राण युधिष्ठिर के शरीर में समा गए।


 महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती से कहा कि आज मैं तुम्हें अपनी तपस्या का प्रभाव दिखाऊंगा। तुम्हारी जो इच्छा हो वह मांग लो।


तब धृतराष्ट्र व गांधारी ने युद्ध में मृत अपने पुत्रों तथा कुंती ने कर्ण को देखने की इच्छा प्रकट की। द्रौपदी आदि ने कहा कि वह भी अपने परिजनों को देखना चाहते हैं। महर्षि वेदव्यास ने कहा कि ऐसा ही होगा। युद्ध में मारे गए जितने भी वीर हैं, उन्हें आज रात तुम सभी देख पाओगे। 


ऐसा कहकर महर्षि वेदव्यास ने सभी को गंगा तट पर चलने के लिए कहा। महर्षि वेदव्यास के कहने पर सभी गंगा तट पर एकत्रित हो गए और रात होने का इंतजार करने लगे।


रात होने पर महर्षि वेदव्यास ने गंगा नदी में प्रवेश किया और पांडव व कौरव पक्ष के सभी मृत योद्धाओं का आवाहन किया। थोड़ी ही देर में भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, दु:शासन, अभिमन्यु, धृतराष्ट्र के सभी पुत्र, घटोत्कच, द्रौपदी के पांचों पुत्र, राजा द्रुपद, धृष्टद्युम्न, शकुनि, शिखंडी आदि वीर जल से बाहर निकल आए। उन सभी के मन में किसी भी प्रकार का अंहकार व क्रोध नहीं था। महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र व गांधारी को दिव्य नेत्र प्रदान किए। अपने मृत परिजनों को देख सभी के मन में हर्ष छा गया।


सारी रात अपने मृत परिजनों के साथ बिता कर सभी के मन में संतोष हुआ। अपने मृत पुत्रों, भाइयों, पतियों व अन्य संबंधियों से मिलकर सभी का संताप दूर हो गया। तब महर्षि वेदव्यास ने वहां उपस्थित विधवा स्त्रियों से कहा कि जो भी अपने पति के साथ जाना चाहती हैं, वे सभी गंगा नदी में डुबकी लगाएं।


 महर्षि वेदव्यास के कहने पर अपने पति से प्रेम करने वाली स्त्रियां गंगा में डुबकी लगाने लगी और शरीर छोड़कर पतिलोक में चली गईं। इस प्रकार वह अद्भुत रात समाप्त हुई।


इस प्रकार अपने मृत परिजनों से मिलकर धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती व पांडव बहुत प्रसन्न हुए। लगभग 1 महीना वन में रहने के बाद युधिष्ठिर आदि पुन: हस्तिनापुर लौट आए। इस घटना के करीब 2 वर्ष बाद एक दिन देवर्षि नारद युधिष्ठिर के पास आए। 


युधिष्ठिर ने उनका स्वागत किया। जब देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि वे गंगा नदी के आस-पास के तीर्थों के दर्शन करते हुए आए हैं तो युधिष्ठिर ने उनसे धृतराष्ट्र, गांधारी व माता कुंती के बारे में पूछा। तब देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि तुम्हारे वन से लौटने के बाद धृतराष्ट्र आदि हरिद्वार चले गए। वहां भी उन्होंने घोर तपस्या की।


एक दिन जब वे गंगा स्नान कर आश्रम आ रहे थे, तभी वन में भयंकर आग लग गई। दुर्बलता के कारण धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती भागने में असमर्थ थे। इसलिए उन्होंने उसी अग्नि में प्राण त्यागने का विचार किया और वहीं एकाग्रचित्त होकर बैठ गए। इस प्रकार धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती ने अपने प्राणों का त्याग कर दिया। 


संजय ने ये बात तपस्वियों को बताई और वे स्वयं हिमालय पर तपस्या करने चले गए। धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती की मृत्यु का समाचार जब महल में फैला तो हाहाकार मच गया। तब देवर्षि नारद ने उन्हें धैर्य बंधाया। युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक सभी का श्राद्ध कर्म करवाया और दान-दक्षिणा देकर उनकी आत्मा की शांति के लिए संस्कार किए।...#जयश्रीकृष्णा..💐..

रविवार, 6 जून 2021

ऑपरेशन ब्लूस्टार की 37 वीं बरसी पर / रेहान फ़ज़ल

 कैसे थे जरनैल सिंह भिंडरावाले की ज़िदगी के आख़िरी पल / रेहान फ़ज़ल 


अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले भिंडरावाले ने तीन पत्रकारों से बात की थी. एक थे बीबीसी के मार्क टली. दूसरे टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सुभाष किरपेकर और तीसरे मशहूर फ़ोटोग्राफ़र रघु राय. सीआरपीएफ़ ने ऑप्रेशन ब्लूस्टार शुरू होने से चार दिन पहले यानि 1 जून को स्वर्ण मंदिर पर फ़ायरिंग शुरू कर दी थी. 2 जून को मार्क टली की भिंडरावाले से आखिरी मुलाकात हुई थी. वो अकाल तख़्त में बैठे हुए थे. मार्क टली और सतीश जैकब अपनी किताब ‘अम़ृतसर मिसेज़ गाँधीज़ लास्ट बैटिल’ में लिखते हैं, ‘जब मैंने भिडरावाले से फ़ायरिंग के बारे में पूछा तो उन्होंने जवाब दिया. फ़ायरिंग बताती है कि सरकार स्वर्ण मंदिर का अपमान करने पर तुली हुई है और सिखों और उनके रहने के तरीके को बर्दाश्त नहीं कर सकती है. अगर सरकार ने मंदिर में घुसने की कोशिश की तो उसका  माकूल जवाब दिया जाएगा. लेकिन उस दिन भिंडरावाले सहज नहीं दिख रहे थे. ज़ाहिर है वो तनाव में थे. आमतौर से वो अपनेआप को फ़िल्म किया जाना पसंद करते थे लेकिन उस दिन उन्होंने उख़ड़ कर कहा था, आप लोग जल्दी कीजिए. मुझे और भी ज़रूरी काम करने हैं.’

भिंडरावाले को विश्वास था कि सेना अंदर नहीं आएगी

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सुभाष किरपेकर अकेले पत्रकार थे जो सेना द्वारा स्वर्ण मंदिर को घेर लिए जाने के बाद जरनैल सिंह भिंडरावाले से मिले थे. तब भी जरनैल सिंह का मानना था कि सेना मंदिर के अंदर नहीं घुसेगी. किरपेकर ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद छपी किताब ‘द पंजाब स्टोरी’ में लिखते हैं, ‘मैंने  भिंडरावाले से पूछा क्या सेना के सामने आपके लड़ाके कम नहीं पड़ जाएंगे ? उनके पास बेहतर हथियार भी हैं. भिंडरावाले ने तुरंत जवाब दिया था, ‘भेड़ें हमेशा शेरों से ज़्यादा संख्या में होती हैं. लेकिन एक शेर हज़ार भेड़ो का सामना कर सकता है. जब शेर सोता है तो चिड़ियाँ चहचहाती हैं. लेकिन जब वो उठता है तो चिडियाँ उड़ जाती हैं.’ जब मैंने उनसे पूछा कि आपको मौत से डर नहीं लगता तो उनका जवाब था ‘कोई सिख अगर मौत से डरे तो वो सच्चा सिख नहीं है.’  भिंडरावाले के बगल में स्वर्ण मंदिर की सुरक्षा की योजना बनाने वाले मेजर जनरल शहबेग सिंह भी खड़े थे. जब मैंने उनसे पूछा कि आपको क्या उम्मीद है, एक्शन कब शूरू होगा ? तो उन्होंने जवाब दिया शायद ‘आज रात ही.’’


मशहूर फ़ोटेग्राफ़र रघु राय ने मुझे बताया था कि वो भिडरावाले से उनकी मौत से एक दिन पहले मिले थे. ‘उन्होंने मुझसे पूछा तू यहाँ क्यों आया है ? मैंने कहा पाजी मैं आपसे मिलने आया हूँ. मैं तो आता ही रहता हूँ. उन्होंने फिर ‘पूछा  अब क्यों आया है तू ?’  मैंने जवाब दिया ‘देखने के लिए कि आप कैसे हैं.’ मैं देख सकता था कि उनकी आँखे लाल सुर्ख़ थीं.  मैं उनमें गुस्सा और डर दोनों पढ़ पा रहा था.’


6 जून को दोपहर चार बजे से लाउडस्पीकर से लगातार घोषणाएं की जा रही थीं कि जो चरमपंथी अभी भी कमरों या तयख़ानों में हैं, बाहर आकर आत्मसमर्पण कर सकते हैं.  लेकिन तब तक  भिडरावाले का कोई पता नहीं था. ऑप्रेशन ब्लूस्टार के कमाँडर लेफ़्टिनेंट जनरल बुलबुल बरार अपनी किताब  ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार द ट्रू स्टोरी’ में लिखते हैं, ‘जब 26 मद्रास के जवान अकालतख़्त में घुसे तो उन्होंने दो चरमपंथियों को भागने की कोशिश करते पाया. उन्होंने उनपर गोली चलाई. उनमें से एक व्यक्ति तो मारा गया लेकिन दूसरे शख़्स को उन्होंने पकड़ लिया. उससे जब सवाल किए गए तो उसने सबसे पहले बताया कि भिंडरावाले अब इस दुनिया में नहीं हैं. फिर वो हमारे सैनिकों को उस जगह ले गया जहाँ भिंडरावाले और उनके 40 अनुयायियों की लाशें पड़ी हुई थीं. थोड़ी देर बाद हमें तयख़ाने में जनरल शहबेग सिंह की भी लाश मिली. उनके हाथ में अभी भी उनकी कारबाइन थी और उनके शरीर के बगल में उनका वॉकीटॉकी पड़ा हुआ था.’ बाद में जब मैंने जनरल बरार से बात की तो उन्होंने मुझे बताया, ‘अचानक तीस चालीस लोगों बाहर निकलने के लिए ने दौड़ लगाई. तभी मुझे लग गया कि भिडरावाले नहीं रहे, क्योंकि तभी अंदर से फ़ायर आना भी बंद हो गया. तब हमने अपने जवानों से कहा कि अंदर जा कर तलाशी लो. तब जा कर हमें उनकी मृत्यु का पता लगा. उसके बाद उनके शव को  उत्तरी विंग के बरामदे में ला कर रखा गया जहाँ पुलिस, इंटेलिजेंस ब्यूरो और हमारी हिरासत में आए चरमपंथियों ने उनकी शिनाख़्त की.’


ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद प्रकाशित हुई किताब ‘द पंजाब स्टोरी’ में शेखर गुप्ता लिखते हैं, ‘अफ़सरों ने मुझे बताया कि जब वो लोग अकाल तख़्त के अंदर घुसे तो पूरे इलाके में बारूद की गंध भरी हुई थी और दो इंच तक फ़र्श इस्तेमाल हो चुके कारतूसों से अटा पड़ा था. कुछ अफ़सर तो इस बात को लेकर अंचंभे में थे कि चरमपंथी इतनी ज़्यादा फ़ायरिंग कैसे कर पाए. ऑटोमेटिक फ़ायरिंग आप लगातार नहीं कर सकते, क्योंकि आपके हथियार में समस्या उठ खड़ी होती है और अगर आप बीच में अंतराल न रखे तो कभी कभी तो उसकी नाल भी गर्म और कभी कभी पिघल भी जाती है. अगर भारतीय सेना के जवान इस तरह की भीषण फ़ायरिंग करते तो उन्हें कारतूस बरबाद करने के लिए अपने अफ़सरों की डाँट खानी पड़ सकती थी. भारतीय सेना के अफ़सरों ने मुझे बताया कि कई चरमपंथियों के कंधों पर नीले निशान थे जो बताता था कि उनमें तर्कसंगत होने की कमी भले ही हो लेकिन उनके जोश में कोई कमी नहीं निकाली जा सकती थी.’


भिडरावाले के आखिरी क्षणों का वर्णन दो जगह मिलता है. अकाल तख़्त के तत्कालीन जत्थेदार किरपाल सिंह ने अपनी किताब ‘आई विटनेस अकाउंट  ऑफ़ ऑपरेशन ब्लूस्टार’ में  अकाल तख़्त के प्रमुख ग्रंथी ज्ञानी प्रीतम सिंह को कहते हुए बताया हैं, ‘मैं तीन सेवादारों के साथ अकाल तख़्त के उत्तरी किनारे  में बैठा हुआ था. करीब 8 बजे फ़ायरिंग थोड़ी कम हुई तो मैंने संत जरनैल सिंह भिडरावाले को अपने कमरे के पास शौचालय की तरफ़ से आते देखा. उन्होंने नल में अपने हाथ धोए और वापस अकाल तख़्त की तरफ़ लौट गए. करीब साढ़े आठ बजे भाई अमरीक सिंह ने अपने हाथ धोए और हम सब को सलाह दी कि हम सब लोग निकल जाएं. जब हमने उनसे उनकी योजना के बारे में पूछा. उन्होंने मुझे बताया कि संत तयख़ाने में हैं. पहले उन्होंने 7 बजे शहीद होना तय किया था लेकिन फिर उन्होंने उसे साढ़े नौ बजे तक स्थगित कर दिया था. फिर मैंने संत के  लोगों से लोहे के दरवाज़े की चाबी ली और फिर मैं अपने 12 साथियों के साथ बोहार वाली गली में निकल आया और दरबार साहब के एक दूसरे सेवादार भाई बलबीर सिंह के घर में शरण ली.’

एक और किताब ‘द गैलेंट डिफ़ेडर’ में ए आर दरशी अकाल तख़्त के सेवादार हरि सिंह को कहते बताते हैं, ‘मैं 30 लोगों के साथ कोठा साहब में छिपा हुआ था.  6 जून को करीब साढ़े सात बजे  भाई अमरीक सिंह वहाँ आए और हमसे कहा कि हम कोठा साहब छोड़ दें क्योंकि अब सेना द्वारा लाए गए टैंकों का मुकाबला नहीं किया जा सकता. कुछ मिनटों बाद संत भिडरावाले अपने 40 समर्थकों के साथ कमरे में दाखिल हुए. उन्होंने गुरुग्रंथ साहब के सामने बैठ कर प्रार्थना की और अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा जो लोग शहादत लेना चाहते हैं, मेरे साथ रुक सकते हैं. बाकी लोग अकालतख़्त छोड़ दें.’


जब भिंडरावाले मलबे पर पैर रखते हुए अकाल तख़्त के सामने की तरफ़ गए तो उनके पीछे उनके 30 अनुयायी भी थे. जैसे ही वो आँगन में निकले उनका स्वागत गोलियों से किया गया. मार्क टली और सतीश जैकब अपनी किताब ‘अमृतसर मिसेज़ गाँधीज़ लास्ट बैटिल’ में लिखते हैं, ‘बाहर निकलते ही अमरीक सिंह को गोली लगी लेकिन कुछ लोग आगे दौड़ते ही चले गए. फिर फ़ायर का एक और बर्स्ट आया जिससे भिंडरावाले के 12 या 13 साथी धराशाई हो गए. मुख्य ग्रंथी प्रीतम सिंह भी उस कमरे में छिपे हुए थे. अचानक कुछ लोगों ने अंदर आ कर कहा कि  अमरीक सिंह शहीद हो गए हैं. जब उनसे संत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने उन्हें मरते हुए नहीं देखा है. मार्क टली और सतीश जैकब लिखते हैं,  ‘राष्ट्पति ज्ञानी ज़ैल सिंह के सलाहकार रहे त्रिलोचन सिंह को अकाल तख़्त के एक ग्रंथी ने बताया था कि जब भिंडरावाले बाहर आए थे तो उनकी जाँघ में गोली लगी थी. फिर उनको दोबारा भवन के अंदर ले जाया गया. लेकिन किसी ने भी भिंडरावाले को अपनी आँखों के सामने मरते हुए नहीं देखा.’


एक और ग्रंथी ज्ञानी पूरन सिंह को सैनिकों ने बताया था कि  उन्हें भिडरावाले और अमरीक  सिंह के शव सात तारीख की सुबह अकाल तख़्त के आँगन में मिले थे. स्वर्ण मंदिर के बरामदे में इन तीनों के शव की तस्वीरे हैं. लेकिन एक तस्वीर में ये साफ़ दिखाई देता है कि शहबेग  सिंह  की बाँह में रस्सी बँधी हुई है जिससे पता चलता है कि उनके शव को अकाल तख़्त से खींच कर बाहर लाया गया था. ये भी हो सकता है कि  वो सैनिक सिर्फ़ ये बताना चाह रहे हों कि उन्होंने शवों को अकाल तख़्त के सामने देखा था और उनको ये पता ही न हो कि शव पहले कहाँ पाए गए थे.


 भिंडरावाले की मौत 6 जून को ही हो गई थी. मार्क टली और सतीश जैकब अपनी किताब ‘अमृतसर मिसेज़ गाँधीज़ लास्ट बैटिल’ में लिखते हैं, ‘जब एक अफ़सर ने बरार को सूचना दी कि भिंडरावाले का किला ढ़ह गया है तो उन्होंने एक गार्ड की ड्यूटी वहाँ लगा दी. उन्होंने प्राँगड़ की तलाशी लेने के लिए सुबह होने का इंतेज़ार किया. 7 जून की सुबह तलाशी के दौरान भिंडरावाले, शहबेग सिंग और अमरीक सिंह के शव तयखाने में पाए गए.  ब्रिगेडियर ओंकार एस गोराया भी अपनी किताब  ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार एंड आफ़्टर एन आईविटनेस अकाउंट’ में लिखा हैं,  ‘भिंडरावाले के शव की सबसे पहले शिनाख़्त डीएसपी अपर सिंह बाजवा की. मैं भी बर्फ़ की सिल्ली पर लेटे हुए जरनैल सिंह भंडरावाले के शव को पहचान सकता था, हाँलाकि पहले मैंने उन्हें कभी जीवित नहीं देखा था. उनका जूड़ा खुला हुआ था और उनके एक पैर की हड्डी टूटी हुई थी. उनके जिस्म पर गोली के कई निशान थे.’


भिडरावाले के शव का अंतिम संस्कार 7 जून की शाम को साढ़े सात बजे किया गया. मार्क टली लिखते हैं, ‘उस समय मंदिर के आसपास करीब दस हज़ार लोग जमा हो गए थे लेकिन सेना ने उनको आगे नहीं बढ़ने दिया. भिंडरावाले, अमरीक सिंह और दमदमी टकसाल के उप प्रमुख थारा सिंह के शव को  मंदिर के पास चिता पर रखा गया. चार पुलिस अधिकारियों ने भिंडरावाले के शव को लॉरी से उठाया और सम्मानपूर्वक चिता तक लाए. एक अधिकारी ने मुझे बताया कि वहाँ मौजूद बहुत से पुलिसकर्मियों की आँखों में आँसू थे.’


जनरल शहबेग सिंह का शव भी अकाल तख्त के तहख़ाने में पाया गया था.  संभव है कि वो 5 या 6 जून की रात को ही घायल हो गए हों. जब शहबेग सिंह के बेटे प्रबपाल सिंह  ने पंजाब के राज्यपाल को फ़ोन कर  अपने पिता के अतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति माँगी तो राज्यपाल ने कहा हज़ारों और लोग भी अंतिम संस्कार में शामिल होने का अनुरोध कर रहे हैं. अगर उन्होंने शहबेग सिंह के बेटे को ये अनुमति दी तो उन्हें अन्य लोगों को भी अनुमति देनी पड़ेगी. जब प्रबपाल सिंह ने कहा कि क्या उन्हें उनकी अस्थियाँ मिल सकती हैं तो राज्यपाल का जवाब था, उन्हें भारत की पवित्र नदियों में प्रवाहित कर दिया जाएगा.  शहबेग सिंह के अंतिम संस्कार का कोई आधिकारिक रिकार्ड नहीं मिलता.

भिंडरावाले का अंतिम संस्कार हो जाने के बावजूद कई दिनों तक ये अफवाह फैली रही कि वो जीवित हैं. जनरल बरार ने मुझे बताया, ‘अगले ही दिन कहानियाँ शुरू हो गई कि भिंडरावाले उस दिन सुरक्षित निकल गए थे और पाकिस्तान पहुंच गए थे. पाकिस्तान का टेलिविजन अनाउंस कर रहा था कि भिंडरावाले हमारे पास हैं और 30 जून को हम उन्हें टेलिविजन पर दिखाएंगे. मेरे पास सूचना और प्रसारण मंत्री मंत्री एच के एल भगत और विदेश सचिव एमके रस्गोत्रा के फ़ोन आये कि आप तो कह रहे हैं कि भिंडरावाले की मौत हो गई है लेकिन पाकिस्तान कह रहा है कि वो उनके यहाँ हैं. मैंने उन्हें बताया उनके शव की पहचान हो गई है. उनका शव उनके परिवार को दे दिया गया है और उनके समर्थकों ने आ कर उनके पैर छुए हैं.’ पंजाब के गाँवों में रहने वाले लोगों ने 30 जून का बहुत बेसब्री से इंतेज़ार किया.  उन्हें उम्मीद थी कि वो अपने हीरो को टीवी पर साक्षात देख पाएंगे लेकिन उनकी ये मुराद पूरी नहीं हुई.  जनरल बरार अपनी किताब ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार द ट्रू स्टोरी’ में स्वीकार करते हैं, ‘मैंने भी कौतुहलवश उस रात अपना टेलिविजन सेट खोला क्योंकि इस तरह की अफवाहें थीं भिंडरावाले की शक्ल से मिलते जुलते किसी शख़्स को प्लास्टिक सर्जरी कर पाकिस्तानी टीवी पर दिखाया जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.’

बुधवार, 19 मई 2021

अपनी निरख परख करते रहें / कृष्ण मेहता

 "वही उन्नति करता है जो स्वयं अपने को उपदेश देता है।"/ कृष्ण  मेहता 

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हम दो भागों में बंटे हैं एक वह जो सुखीदुखी होता है,दूसरा वह जो सुखद दुखद है।इसमें हमारी भूमिका सुखीदुखी की है।हम यह तो भूल ही जाते हैं कि जो सुखद दुखद है वह हमारा ही हिस्सा है।इसे हम पहचानें और ठीक करें यह जरूरत हमेशा बनी रहती है।यह पहचान नहीं है तो हम बाहरी जगत को सुखद दुखद मानेंगे और उसे ठीक करने में लगेंगे।सारा संघर्ष इसी बात का है।वास्तविकता भिन्न है-

"व्यक्ति को हानि,पीडा और चिंताएं उसकी किसी आंतरिक दुर्बलता के कारण होती है।उस दुर्बलता को दूर करके कामयाबी मिल सकती है।"

हम ही हैं हानिकारक, पीडादायक,चिंताजनक।अपने इस रुप को उपदेश देने से काम नहीं चलता।यह चित्त है और हमही चित्त हैं।इसे दुश्मन की तरह देखना भी बाधक है।हमें जानना होगा किस तरह हम कष्टप्रद हैं बिना स्वयं से दूर भागे। आत्मपलायन और आत्मबल विपरीत बातें हैं यद्यपि सीधे आत्मबल आता नहीं।आत्मपलायन को समाप्त करना होता है।इसके लिये हम कष्टप्रद हैं तो अपने इस रुप के साथ रहना और उसे सहना पडता है।सारी समस्या स्वयं को न सह पाने के कारण ही हैं।लगता है बाहर हैं व्यक्ति, घटना,परिस्थिति उन्हें हम सह नहीं पाते।

एक बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिये कि बाहर असहनीय कुछ भी नहीं है,हम ही हैं असहनीय और जीना तो अपने आपमें है।जिसे अपने आपमें जीना आगया उसे सब आगया।

यह बडा किमती सूत्र है।

यह है स्वयं के साथ घुलमिलकर रहना ताकि उसके साथ एक हुआ जा सके,वही हुआ जा सके।हम "स्वयं" हो जाएं(सेल्फ)।

"Be yourself,and nothing more."

स्व में रहना,स्व से घुलमिलकर रहना एक ही बात है।अभी हम "पर" से घुलेमिले हैं रागद्वेष पूर्वक।

प्रेम से भी सबके साथ घुलमिलकर रह सकते हैं।सेवा भी यही है।

आज समाचार सुने बिहार सरकार सामूदायिक रसोईघर खोल रही है सभी जिलों में।अच्छा लगा।सवाल यह नहीं कि सरकार किस पार्टी की है।यह बडी बचकानी बात है।अभी यह राजनीति करने का समय नहीं।

अभी जरूरत है इस बात की कि सरकार और प्रजा मिलकर काम करे।होता यह है कि कुछ काम सरकार के भरोसे छोड दिये जाते हैं,कुछ प्रजा के भरोसे।प्रजा हर चीज सरकार पर छोड देती है।ऐसे में सरकार अपना ध्यान महामारी पर लगाती है,भोजन व्यवस्था प्रजा पर छोड देती है लेकिन जब सरकार इसकी भी जिम्मेदारी लेती है तो जनता में नयी चेतना का संचार होता है।जनता को तो सुखदुख में अनुकूल सरकार ही चाहिये।

अभी यह स्थिति है कि भोजनसमस्या कहीं भी आ सकती है।इस समस्या का हल सरकार और प्रजा दोनों को साथ मिलकर निकालना चाहिये।एक काम सरकार करे,दूसरा काम लोग करें या दोनों काम दोनों मिलकर करें।

कुछ लोग और संस्थाएं हैं जो अपने स्तर पर यह पुनीत कार्य कर रहे हैं फिर भी उनके और सरकार के मिलकर कार्य करने से बहुत फर्क पडता है।बहुत बल मिलता है एक दूसरे से एक दूसरे को।

सरकार यदि महामारी में ही लगी रहे,भोजनव्यवस्था से ध्यान हटा ले तो जनता अकेली पड जाती है।

अभी किसीको भी जरासा भी अकेला नहीं पडना चाहिये न सरकार को,न जनता को।दोनों एक दूसरे की मांगों को देखें,समझें और एक दूसरे को पूरा सहयोग करें इसकी अनिवार्यता है।

यह आध्यात्मिक आवश्यकता है कि आदमी स्वयं अपने आपके साथ घुलमिलकर रहे।

इसमें दोनों बातें हैं।आदमी अपने सुखरुप के साथ मिलकर रह सकता है,दुखरुप के साथ नहीं।अपने कष्टप्रद रुप के साथ रहने के लिये बडा धैर्य, बडी गहरी समझ चाहिये वर्ना खुद के साथ मिलकर रहना आसान नहीं।

दूसरी बात बाहरी व्यक्ति, घटना,परिस्थिति को मूल कारण न समझे अपनी समस्या का इसीलिए कहा-खोजें तो अपनी हर समस्या के मूल में अपनी ही कोई आंतरिक दुर्बलता मिल जायेगी।

इसी संसार में ऐसी महान आत्माएं हुई हैं जिन्होंने अपनी कोई फिक्र नहीं करके दुखी,पीडित लोगों की मदद की है।परहित सरिस धर्म नहीं भाई।कहा भी है-जो दृढ राखे धर्म को तेहीं राखे करतार।

ऐसा व्यक्ति आश्चर्यजनक रुप से निर्भय,निश्चिंत हो जाता है।

जिसे चिंता सताती हो उसके लिये तो सेवाधर्म महान औषधि की तरह है चिंतारोग से मुक्ति पाने की।

यह करतार की तरह है जो उसे संभाल लेती है।मूल बात तो यही है क्योंकि सब उसीका है।इस की अवज्ञा करके हम केवल अपने ही स्वार्थ को महत्व दें तो कर्तापन के अभिमान के साथ चिंताभय की पीडा आ ही जाती है।जो सबके साथ मिलकर रहता है,सामूहिक समाधान खोजता है वह सकारात्मक होता है।

स्वयं के साथ मिलकर रहना आध्यात्मिक आवश्यकता है।इसे स्वार्थी नहीं कहा जा सकता।सच बात यह है कि अपने हृदय में अपने आपके साथ घुलमिलकर रहने से अपने सभी मानसिक विभाजन,अपने पराये की मान्यताएं लुप्त हो जाती हैं।ऐसा व्यक्ति जो व्यक्तिगत रुप से अखंड है सामूहिक दृष्टि से सबके साथ रह सकता है,सबको सहयोग कर सकता है।

भीतर भेद हो बाहर समूह को लेकर विचार हो तो उसकी कृति परोपदेश तक सीमित रह जाती है।इस वजह से आत्मोपदेश की महत्ता बताई।पहले स्वयं समझे ,स्वयं करता हो और ऐसा हर एक आदमी हो अर्थात् हर आदमी स्वयं अपनी जिम्मेदारी का अहसास करे फिर सब ठीक है।फिर जो भी समस्या आये सामूहिक रुप से मिलकर उसका मुकाबला किया जा सकता है।आदमी अकेला नहीं पडता।

अभी भी सरकार और जनता का भेद बना हुआ है।जनता,सरकार की ओर देख रही है।कर्फ्यू, लोकडाउन की बाध्यता झेल रही है।यह भेद समाप्त हो सकता है अगर दोनों मिलकर कार्य करें।

सरकार भी अलग कहां है?प्रजातंत्र में सरकार,प्रजा का ही तो हिस्सा है प्रजा की देखभाल के लिये,उसकी सेवा,सुरक्षा के लिये।

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

हिन्दी उपन्यास का विकास

हिंदी उपन्यास का आरम्भ श्रीनिवासदास के "परीक्षागुरु' (१८४३ ई.) से माना जाता है। हिंदी के आरम्भिक उपन्यास अधिकतर ऐयारी और तिलस्मी किस्म के थे। अनूदित उपन्यासों में पहला सामाजिक उपन्यास भारतेंदु हरिश्चंद्र का "पूर्णप्रकाश' और चंद्रप्रभा नामक मराठी उपन्यास का अनुवाद था। आरम्भ में हिंदी में कई उपन्यास बँगला, मराठी आदि से अनुवादित किए गए।

हिंदी में सामाजिक उपन्यासों का आधुनिक अर्थ में सूत्रपात प्रेमचंद (१८८०-१९३६) से हुआ। प्रेमचंद पहले उर्दू में लिखते थे, बाद में हिंदी की ओर मुड़े। आपके "सेवासदन', "रंगभूमि', "कायाकल्प', "गबन', "निर्मला', "गोदान', आदि प्रसिद्ध उपन्यास हैं, जिनमें ग्रामीण वातावरण का उत्तम चित्रण है। चरित्रचित्रण में प्रेमचंद गांधी जी के "हृदयपरिवर्तन' के सिद्धांत को मानते थे। बाद में उनकी रुझान समाजवाद की ओर भी हुई, ऐसा जान पड़ता है। कुल मिलाकर उनके उपन्यास हिंदी में आधुनिक सामाजिक सुधारवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जयशंकर प्रसाद के "कंकाल' और "तितली' उपन्यासों में भिन्न प्रकार के समाजों का चित्रण है, परंतु शैली अधिक काव्यात्मक है। प्रेमचंद की ही शैली में, उनके अनुकरण से विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक, सुदर्शन, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि अनेक लेखकों ने सामाजिक उपन्यास लिखे, जिनमें एक प्रकार का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद अधिक था। परंतु पांडेय बेचन शर्मा "उग्र', ऋषभचरण जैन, चतुरसेन शास्त्री आदि ने फरांसीसी ढंग का यथार्थवाद और प्रकृतवाद (नैचुरॉलिज़्म) अपनाया और समाज की बुराइयों का दंभस्फोट किया। इस शेली के उपन्यासकारों में सबसे सफल रहे "चित्रलेखा' के लेखक भगवतीचरण वर्मा, जिनके "टेढ़े मेढ़े रास्ते' और "भूले बिसरे चित्र' बहुत प्रसिद्ध हैं। उपेन्द्रनाथ अश्क की "गिरती दीवारें' का भी इस समाज की बुराइयों के चित्रणवाली रचनाओं में महत्वपूर्ण स्थान है। अमृतलाल नागर की "बूँद और समुद्र' इसी यथार्थवादी शैली में आगे बढ़कर आंचलिकता मिलानेवाला एक श्रेष्ठ उपन्यास है। सियारामशरण गुप्त की नारी' की अपनी अलग विशेषता है।

मनोवैज्ञानिक उपन्यास जैनेंद्रकुमार से शुरू हुए। "परख', "सुनीता', "कल्याणी' आदि से भी अधिक आप के "त्यागपत्र' ने हिंदी में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान दिया। जैनेंद्र जी दार्शनिक शब्दावली में अधिक उलझ गए। मनोविश्लेषण में स. ही. वात्स्यायन "अज्ञेय' ने अपने "शेखर : एक जीवनी', "नदी के द्वीप', "अपने अपने अजनबी' में उत्तरोत्तर गहराई और सूक्ष्मता उपन्यासकला में दिखाई। इस शैली में लिखनेवाली बहुत कम मिलते हैं। सामाजिक विकृतियों पर इलाचंद्र जोशी के "संन्यासी', "प्रेत और छाया', "जहाज का पंछी' आदि में अच्छा प्रकाश डाला गया है। इस शैली के उपन्यासकारों में धर्मवीर भारती का "सूरज का सातवाँ घोड़ा' और नरेश मेहता का "वह पथबंधु था' उत्तम उपलब्धियाँ हैं।

ऐतिहासिक उपन्यासों में हजारीप्रसाद द्विवेदी का "बाणभट्ट की आत्मकथा' एक बहुत मनोरंजक कथाप्रयोग है जिसमें प्राचीन काल के भारत को मूर्त किया गया है। वृंदावनलाल वर्मा के "महारानी लक्ष्मी बाई', "मृगनयनी' आदि में ऐतिहासिकता तो बहुत है, रोचकता भी है, परंतु काव्यमयता द्विवेदी जी जैसी नहीं है। राहुल सांकृत्यायन (१८९५-१९६३), रांगेय राघव (१९२२-१९६३) आदि ने भी कुछ संस्मरणीय ऐतिहासिक उपन्यास दिए हैं।

यथार्थवादी शैली सामाजिक यथार्थवाद की ओर मुड़ी और "दिव्या' और "झूठा सच' के लेखक भूतपूर्व क्रांतिकारी यशपाल और "बलचनमा' के लेखक नागार्जुन इस धारा के उत्तम प्रतिनिधि हैं। कहीं कहीं इनकी रचनाओं में प्रचार का आग्रह बढ़ गया है। हिंदी की नवीनतम विधा आंचलिक उपन्यासों की है, जो शुरु होती है फणीश्वरनाथ "रेणु' के "मैला आँचल' से और उसमें अब कई लेखक हाथ आजमा रहे हैं, जैसे राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, शैलेश मटियानी, राजेंद्र अवस्थी, मनहर चौहान, शिवानी इत्यादि।

रविवार, 4 अप्रैल 2021

संघर्ष ks जादू

 तस्वीर में आप एक टमाटर के पौधे को देख रहे होंगे, शायद किसी यात्री ने टमाटर के बीज को ट्रेन से फेंक दिया होगा। ये पौधा मिट्टी की छाती फाड़कर नही बल्कि पत्थरों को चीरकर बाहर आया है।


जब ये ओर भी नन्हा सा होगा, तब शताब्दी ओर राजधानी जैसे तूफान से भी तेज दौड़ती ट्रेनों के बिल्कुल पास से गुजरते हुए भी इसने सिर्फ बढ़ना सीखा ओर बढ़ते बढ़ते आखिर कार इसने एक टमाटर को जन्म दे ही दिया।


इस पौधे के न हाथ है, न पांव, न ही दिमाग है, ओर तो ओर इसको जीवित रहने के लिए कम से कम मिट्टी और पानी तो मिलना चाहिए ही था, जो इसका हक भी था।


लेकिन इस पौधे ने बिना जल, बिना मिट्टी के, बिना की सुविधा के अपने आपको बड़ा किया और फला फूला, ओर जो इस पौधे के जीवन का उद्देश्य एक ओर फल को देना था, वो उद्देश्य इसने पूरा किया।


हम इंसानों के पास तो हाथ है, पांव है, दिमाग है, उसके बाद भी यदि हम जीवन मे अपने आपको कमजोर मानकर, जीवन को सही प्रकार से, जो हमारे जीवन का उद्देश्य है, इस प्रकार से नही जीते है तो इस जीवन मे आने का कोई औचित्य बचता ही नही है।


जिन लोगो को लगता है कि जीवन मे हम तो असफल हो गए हम तो जीवन मे कुछ कर ही नही सकते, हम तो बस अब बरबाद हो ही चुके है, तो उन्हें इस टमाटर के पौधे से कुछ सीख लेनी चाहिए। असली जीवन का नाम ही लगातार संघर्षों की कहानी है।

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ओमप्रकाश का सच

 A man had a fullsome meal in a modest restaurant in Bombay and when the waiter presented the bill he went straight to the manager and admitted honestly that he had no money. He added  that he hadn't eaten for the past two days and was terribly hungry so was forced to do this. The manager heard his story patiently as the man promised that the day he gets a job the first thing he would do was to settle the bill. The manager smiled and told him to leave wishing him luck. The waiter who stood watching the drama was aghast. He questioned the manager "Saab why did you let him go". The manager replied, "Go and do your work". Few months later the same man came to the restaurant and settled his pending bill to the utter dismay of the waiter. The man thanked the manager and told him that he had bagged an acting offer. The manager visibly happy offered him a cup of tea and a  friendship bloomed between the two. The actor soon became a known face and did multiple films at a time. Later he owned a bungalow and a chaufer driven car. Times had changed but everytime he passed by that area he made it a point to visit the restaurant for a cup of tea with the manager who has shown incredible sympathy years ago. Faith at times does wonders. Had the manager thrashed and humiliated the hungry man that day maybe the industry wouldn't have got a talented and natural actor called Om Prakash. Remembering the veteran actor on his birth anniversary 🙏


Born 19 - 12 -1919


Death  21- 02 -1998

#copied

आज़ाद हिंद फ़ौज से सिनेमा जगत तक नाज़िर हुसैन का सफ़र

आज़ाद हिंद फ़ौज से सिनेमा जगत तक नाज़िर हुसैन का सफ़र



नाज़िर हुसैन का जन्म 15 मई 1922 को उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले के उसिया नामक गाँव में हुआ था। हिंदी सिनेमा में अपने भावात्मक किरदारों के कारण आंसुओं का कनस्तर नाम से मशहूर नाज़िर हुसैन के पिता रेलवे में गार्ड की नौकरी करते थे और उन्होने ख़ुद भी बतौर फायरमैन रेलवे में काम किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में नाज़िर ब्रिटिश आर्मी में शामिल हुए जहाँ इन्हें मलेशिया और सिंगापुर में तैनात किया गया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस से काफ़ी प्रभावित होने के कारण वे आज़ाद हिंद फौज में शामिल हो गए।



देश की आज़ादी के बाद नाज़िर ने थियेटर का रुख़ किया,कलकत्ता में इन्होंने रंगमंच पर बहुत से नाटक किये जहाँ उनकी मुलाकात बिमल रॉय से हुई। बिमल रॉय ने नाज़िर के आज़ाद हिंद फौज के अनुभवों पर आधारित फिल्म बनाने का फैसला किया और पहला आदमी नामक फ़िल्म बनी जिसमे नाज़िर ने ना केवल एक्टिंग की बल्कि बतौर स्क्रीन राइटर और डायलॉग राइटर का भी काम किया। इस फ़िल्म की सफलता के बाद उन्होंने बिमल रॉय के साथ और भी कई फिल्में की जैसे दो बीघा जमीन और देवदास। उन्होंने हिंदी सिनेमा में 500 से अधिक फिल्मों में बतौर चरित्र अभिनेता का काम किया।



नाज़िर के सिनेमा जगत का सफ़र केवल इतना न था,जब नाज़िर की मुलाकात देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद से हुई तब उन्होने नाज़िर से क्षेत्रीय भाषाओं में सिनेमा बनाने के बारे में अपनी इच्छा ज़ाहिर की। डाॅक्टर राजेन्द्र प्रसाद के इस सुझाव के बाद उन्होंने भोजपुरी फ़िल्म की नींव रखी और पहली भोजपुरी फ़िल्म “गंगा मैया तोहे पियरी चढइबो” बनकर तैयार हुई।इसी वजह से उन्हें भोजपुरी सिनेमा के पितामह के रूप में भी जाना जाता है।

इस फ़िल्म की पटकथा नाज़िर हुसैन ने लिखी और इस फिल्म मे उन्होने अभिनय भी किया। बिहार के विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी इस फिल्म के निर्माता बनने को राज़ी हो गये और इस फिल्म का निर्देशन कुंदन कुमार ने किया। वहीं फिल्म में संगीत दिया था चित्रगुप्त ने, शैलेन्द्र ने गीत लिखे और मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की गायकी ने धूम मचा दी थी।

इसके बाद उन्होंने फ़िल्म “बलम परदेसिया” का निर्देशन किया जिसने भोजपुरी सिनेमा को एक नए आयाम पर पहुँचा दिया।

भोजपुरी और हिंदी सिनेमा जगत में अपने रचनात्मक योगदान के लिए नाज़िर हुसैन हमेशा याद किए जाएंगे।

हास्य अभिनेता 'महमूद अली '

 हास्य अभिनेता 'महमूद अली 'की पुण्य तिथि (23 जुलाई 2004) पर विशेष


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उस समय महमूद की मांग का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है वे तत्कालीन हीरो और विलेन से ज़्यादा फ़ीस लिया करते थे। फ़िल्म 'मैं सुंदर हूँ' में लीड एक्टर थे विश्वजीत।...... इस फ़िल्म में काम करने के लिए विश्वजीत ने 2 लाख रुपए लिए जबकि महमूद ने 8 लाख लिए। ....वैसे ही फ़िल्म 'हमजोली' के लिए उन्हें जितेंद्र से ज़्यादा पैसे मिले। ....अब जब उनके पास एक से एक महंगी कारे थे और महमूद एक बड़े स्टार बन गए थे उनके पास किसी चीज़ की कमी नहीं थी लेकिन बावजूद इसके बचपन में घटी इस घटना ने महमूद के जीवन में ऐसा गहरा प्रभाव डाला था वो उस साईकल वाली घटना को ताउम्र नहीं भूले ........अपने संघर्ष के दिनों में माली हालत ठीक करने के लिए महमूद ने मलाड से विरार के बीच चलने वाली लोकल में टॉफ़ियां तक ​​बेचीं। ड्राइवर बन कर लोगो की गाड़ी चलाई इसलिए वो गरीबी का दर्द समझते थे ...


महमूद ने कईयों का कॅरियर संवारा उसमें से एक पंचम भी हैं। पंचम यानी राहुल देव बर्मन, जिन्हें आर डी कहते हैं। इन्हें महमूद ने फ़िल्म 'छोटे नवाब' में बतौर संगीतकार लिया। अमिताभ बच्चन को अपनी फिल्म 'बॉम्बे तो गोवा ' के लिए महमूद ने उस वक्त साईन किया जब लोग उन्हें पहचानते भी नहीं थे .....


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पवन मेहरा ✒


#ब्लॉग_सुहानी_यादें_बीते_सुनहरे_दौर_की


बुधवार, 31 मार्च 2021

कातिल मुस्कान ही थी शशि की पहचान

 शशिकला.... खुबसूरत और  तुफानी  मुसकराहट की मालकिन...! 


शशिकला का जन्म ता.4.8.1932  के रोज  सोलापुर में एक महाराष्ट़ियन फेमीली में हुआ था.. उनके पिता जी अनंत राव जावलकर  कपडे़ के वयापारी थे.. धनवान शिक्षीत और गौरव गौरव शाली फेमीली था... पर न जाने कया हुआ....!  जावलकर फेमीली के  बुरे दिन आये..! परिवार गरीब हो गया और  बडे परिवार को निभाने का फर्ज शशिकला को अदा करना पडा...! 


शशिकला के भाई को चारटर एकाउंटेंट बनाने के लिए इंग्लैंड भेजा गया था.. आशा थी कि  वह परिवार की देखभाल करेगा.... पर अफ़सोस..! वह वापिस आया ही नहीं... परिवार को गरीबी में छोड़ कर वह इंग्लैंड में ही सेटल हो गया!. 


शशिकला को बचपन से ही अभीनय का शौक था.


शशिकला के पिता जी के एक मित्र ने शशिकला को फिल्मों में नशीब आजमाने की नशिहत दी.. 


शशिकला और उनके पिताजी ने फिल्म स्टुडियो के चककर काटना शुरू किया... 


एक बार उस समय की  जानी मानी अभीनेत्री नूरजहां ने शशिकला को देखा और उसे फिल्म जीन्नत के लिए पसन्द करली...! इस तरह जीन्नत  शशिकला की पहेली फिल्म थी.


शशिकला  इस फिल्म में एक कव्वाली  आहे न भरी शिकवे न किये कुछ भी न जुबां से काम लीया..पे परदे पर दिखाई दी.. मेरा खयाल हे.. शायद अभीनेत्री शयामा भी इसी फिल्म में इसी कव्वाली में परदे पर दिखाई दी थी...! 


उसके बाद 1947 में नुरजहा दिलीप कुमार की फिल्म जुगनू आइ.. इस फिल्म में गायिका रोशन आरा बेगम का गाया हुआ   देश की पुरफेंक दिलकश हवा ओ मे रंगी.. गीत शशिकला पर फिलमाया गया... उस वक्त शशिकला बेहद खुबसूरत लगती थी तो उस गीत मे शशिकला के  बहोत सारे कलोज अप परदे पर दिखाये गये... फिल्म की हिरोइन नुरजहा से भी ज्यादा...! 


उसके बाद  1950 मे दिलीप कुमार कामीनी कौशल की फिल्म आरजू में भी शशिकला कमला के रोल में दिखाई दी.


शशिकला  बहोत ही प़तीभाशाली और खुबसूरत होते हुए भी उसे हिरोइन की भुमिकाए जयादा मिली नहीं.और जीस फिल्म में वह हिरोइन थी वह फिलमें फलोप हो गई..! 1953 में शममीकपुर के साथ शशिकला की एक  फिल्म जिवन जयोती आइ थी.इस फिल्म में शशिकला हिरोइन थी.शायद शममी कपुर की भी शुरूआत की फिल्म थी. फिल्म खास चली नहीं


शशिकला को हिरोइन के रोल न मिले तो उसने जो भी फिलमें मिले वह लेना शुरू कर दिया.. केरेक्टर रोल करने लगी.. घर जो चलाना था..! पैसे की बहोत जरूरत थी..! 


1962 में ताराचंद बडजातया की फिल्म आरती आइ. अशोक कुमार  मीना कुमारी और प़दिप कुमार भी थे इस फिल्म में.. एक मराठी नाटक पर आधारित थी इस फिल्म.शशिकला को फिल्म में झगडालू और कमिनी भाभी का रोल ओफर किया गया.. शशिकला के फेमीली वालों ने उस रोल को स्विकार लेने को दुराग्रह किया.. शशिकला ने रोल किया.. शशिकला के अभीनय की बहुत प़संसा हुइ..  फिल्म आरती के लिए शशिकला को सन 1962 का बेस्ट  सपोर्टिंग एकट़ेश का फिल्म फेर एवोर्ड भी मिला था..! 


फिर कया...! शशिकला को बहोत सारी फिलमें मिलने लगी.. जयादा तर वेंप के रोल मिलते थे...! फिल्म फूल और पतथर और अनुपमा के रोल के लिए  नोमीनेशन मिला पर फिल्म फेर एवोर्ड न मिलने से निराश भी हुई.....! पर  फिल्मों से पैसे मिलने से फेमीली को सेट कर शकी... 


1970 के दशक का पूर्वांध शशिकला के जीवन का सबसे खराब समय रहा... फिल्मों में काम मिलना कम हो रहा था.. शशिकला  व्यवसायीक और  पारावारिक समस्याओं से दुखी हो गई...! वह ईगतपुर चली गई.. ! 


कइ साल योगासन और ध्यानासन में गुजारे.. मधर टेरेसा के साथ रहे कर  दुखी लोगों की सेवा भी की. और मन की शांति  पाइ.. शशिकला की एक बेटी केंसर ग़सित होकर परलोक सिधार  ग इ.... लेकिन शशिकला ने अपने आप को संभाला...! 


उसके बाद... 


आठ साल के बाद  शशिकला ने फिल्म और  टीवी के छोटे परदे पर  फिर से पुरना गमन  किया... 


कूछ टीवी सीरीयलो और महाराजा.. लहुके दो रंग.. सलमा पे दिल आ गया जैसी फिलमों में भी काम किया... सावन कुमार ने कहा था.. मीना कुमारी के लिये जो रोल लिखा था वह शशिकला ने अदा किया...! 


शशिकला ने फिल्म आरती.. गुमराह.. हरियाली और रास्ता.. अनपढ़.. जंगली.. यह रास्ते हे प्यार के.. वक्त जैसी कई फिलमों में काम किया.. 


फिल्म पदमश्री लालू प्रसाद यादव में शायद शशिकला को आखिरी बार देखा था.


फिल्म वक्त 1965 की रानी साहेबा.. जिस के गले में से राजा(राजकुमार) हार चुराता हे.. और फिल्म फूल और पतथर का वह मशहूर गाना शिशे से पी या पैमाने से पी.. या मेरी आंखों के मैखाने से पी... वाले शशिकला के रोल आज भी नजर के सामने घुमते हे..! 


और...! फिल्म गुमराह की असली हिरोइन तो शशिकला ही थी..! कैसी हसीन लगती थी वोह..! Killer smile  के साथ उंगली में  चेइन हिलाते चलना.. फिल्म गुमराह में उनकी लाक्षणिक अदा थी..! फिल्म गुमराह में शशिकला का अभीनय जानदार था और उसके लिए शशिकला को सन 1964 में बेस्ट सपोर्टिंग एकट़ेस का फिल्म फेर एवोर्ड भी मिला था..! 


शशिकला ने ओम प्रकाश सयगल से शादी की हे.


शशिकला मेरी फेवरिट अदाकारा हे..  कल 4 अगस्त उनकी  birth date हे.... Happy birthday shashikala ji in advance...!!

सोमवार, 22 मार्च 2021

प्राण या अभिनय के प्राण

 अभिनय के प्राण  👍 जब #प्राण ने #बॉबी फ़िल्म के लिए मात्र 1 रुपये ली फीस 💐💐


प्राण उसूलों वाले एक्‍टर थे। उनके लिए पर्दे पर चमकने से ज्‍यादा महत्‍व उनके जिंदगी के कायदे थे। यही कारण है कि प्राण ने एक्टर और डायरेक्टर #राजकपूर की फिल्म ‘बॉबी’ के लिए महज एक रुपये की फीस ली थी। दरअसल, राजकपूर ने अपनी सारी पूंजी फिल्म ‘#मेरा_नाम #जोकर’ पर लगा दी थी 

और वो फिल्म #बॉक्स_ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप हो गई थी। #आर्थिक दिक्‍कतों से जूझ रहे राजकपूर के लिए यह प्राण की दोस्‍ती थी, जो काम के आड़े नहीं आ सकती थी ..

प्राण ने खलनायकी को नया मुकाम दिया। जब वो पर्दे पर आते थे तो दर्शकों की आंखे बस उनपर ही टिक जाती थी।

प्राण (12 फ़रवरी 1920 - 12 जुलाई 2013) 

हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रमुख चरित्र अभिनेता थे । इस भारतीय #अभिनेता ने हिन्दी सिनेमा में 1940 से 1990 के दशक तक दमदार खलनायक और नायक का अभिनय किया।

 उन्होंने 350 से अधिक फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने खानदान (1942), और #हलाकू (1956) जैसी फ़िल्मों में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभायी। उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय मधुमती (1958), जिस देश में गंगा बहती है (1960), उपकार (1967), शहीद (1965), आँसू बन गये फूल (1969), जॉनी मेरा नाम (1970), विक्टोरिया नम्बर २०३ (1972), बे-ईमान (1972), ज़ंजीर (1973), डॉन (1978) और दुनिया (1984) फ़िल्मों में माना जाता है।


प्राण ने अपने कैरियर के दौरान विभिन्न #पुरस्कार और #सम्मान अपने नाम किये। उन्होंने 1967, 1969 और 1972 में फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार और 1997 में #फिल्मफेयर लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड जीता। उन्हें सन् 2000 में स्टारडस्ट द्वारा 'मिलेनियम के #खलनायक' द्वारा पुरस्कृत किया गया। 2001 में भारत सरकार ने उन्हें #पद्म_भूषण से सम्मानित किया और भारतीय सिनेमा में योगदान के लिये 2013 में #दादा_साहब_फाल्के सम्मान से नवाजा गया।


#AND

#PRAN....💐💐

जन्मदिन पर विशेष 🌹

केशव राणा अभिनेता

 Keshav Rana was a popular character artist of Bollywood during the classic era of 1950s – 1970s. He mostly played negative characters of stalker, pimp, henchman, greedy person etc on Bollywood screen.

He is mostly seen with smiling face but an evil and wicked heart on Bollywood screen, and has played numerous roles belonging to this category. This signature style makes him different from other character artists among his contemporaries. Sharafat, Johny Mera Naam, Yaadon Ki Baarat, Dillagi, Kab? Kyoon? Aur Kahan?, Mohabbat Zindagi Hai, Amar Prem, Be-Imaan, Dastaan, Jeet, Rampur ka Laxman, Nasihat, Suraj, Shankar Shambhu, Gambler, Naya Zamana, Blackmail, Rakhwale, Aan Milo Sajna, Seeta Aur Geeta, Katilon Ke Kaatil etc are among his famous character roles.


In 1966 film Dillagi where Keshav Rana played a full-fledged villain role

Keshav Rana hailed from Faizabad, and was a member of royal family. He joined film industry in the 1950s and played bit roles in movies like Insaan Jaag Uda. He rose to prominence in the second half of 1960s. Though he played numerous character roles, he got side-lined as a stalker or villain or a man with crookedness. But the truth that he excelled in handling negative roles carrying a positive smile on his face, and we can rarely find such artists in Bollywood, like we say “Chehre Mein Kuch and Mann Mein Kuch Or”. It can be said his acting potential was not fully exploited by filmmakers of yesterdays who followed a strict formula in filmmaking.

Keshav Rana – Some interesting and less-known facts

1. He is a member of a royal family of Faizabad.

2. His full name is Keshav Singh Faizabadi.

3. He played villain in 1966 film Dillagi, and it was one of his full-fledged roles throughout his career.

रात और दिन

Raat Aur Din- Director: Satyen Bose

Music: Shankar-Jaikishan

Lyrics: Hasrat Jaipuri

Singers: Lata Mangeshkar


रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है

रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है

जाने कहाँ है, ओ साथी, तू जो मिले जीवन उजियारा है

रात और दिन


पग पग मन मेरा ठोकर खाए, चाँद सूरज भी राह ना दिखाए

पग पग मन मेरा ठोकर खाए, चाँद सूरज भी राह ना दिखाए

ऐसा उजाला कोइ मन में समाये, जिस से पीया का दर्शन मिल जाए

रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है

जाने कहाँ है, ओ साथी, तू जो मिले जीवन उजियारा है

रात और दिन


गहरा ये भेद कोइ मुझको बताये, किसने किया हैं मुझपर अन्याय

गहरा ये भेद कोइ मुझको बताये, किसने किया हैं मुझपर अन्याय

जिस का हो दीप वो सुख नहीं पाए, ज्योत दिए की दूजे घर को सजाये

रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है

जाने कहाँ है, ओ साथी, तू जो मिले जीवन उजियारा है

रात और दिन


खुद नहीं जानू ढूंढें किसको नज़र, कौन दिशा हैं मेरे मन की डगर

खुद नहीं जानू ढूंढें किसको नज़र, कौन दिशा हैं मेरे मन की डगर

कितना अजब ये दिल का सफ़र, नदियाँ में आये जाए जैसे लेहेर

रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है

जाने कहाँ है, ओ साथी, तू जो मिले जीवन उजियारा है

रात और दिन

शनिवार, 20 मार्च 2021

दारा सिंह उर्फ़ हनुमान

 🌏 #विश्व_विजेता का #खिताब #जीतने वाले #पहले #भारतीय #फ्री_स्टाईल_कुश्ती 💪 #

पहलवान एवं #रामानंद_सागर की 📺 #रामायण के #हनुमान व #हिन्दी_सिनेमा की #हरक्यूलिस, #सुल्ताना_डाकू, #भक्ति_में_शक्ति, #जय_बजरंग_बली, #रूस्तम,  #किसान_और_भगवान, #लुटेरा, #ललकार, #कर्मा, #ऐलाने_जंग, #जब_मी_मेट जैसी कई #फिल्मों के #कलाकार, #चरित्र_अभिनेता, #लेखक, #निर्देशक, #पूर्व_राज्यसभा_सदस्य, #रूस्तम_ए_हिन्द #दारा_सिंह की #आठवी पुण्यतिथि  पर नमन 🌹

 🖋️मुकेश भार्गव🖋   #Dara_Singh

राजकपूर

 the great show man of the bollywood 

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#Raaj_kapoor ❣️❣️❣️❣️

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उन दिनों #टीवी ही एकमात्र #मनोरंजन का माध्यम था । 

हर रविवार को एक #सीरीज में फिल्में आती थी ।

#आरकेबैनर की फिल्में प्रति #रविवार को एक आती थी ।

मैंने कभी राज कपूर की कोई फ़िल्म नही देखी थी । न ही उन दिनों मुझे #ब्लैक एंड वाइट #फिल्मों आकर्षण नजर आता था ।

लेकिन #संयोग से जाने #अनजाने वह मुझे देखनी पड़ गई ..

टीवी मेरे सामने था तो देखनी पड़ी ।

#टीवी पर ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म चल रही थी ।

कभी कभी मैं टीवी की तरफ भी देख लेता था । लेकिन

जैसे ही मैंने देखना शुरू किया तो देखता चला गया ।

सबसे पहले मैंने जो फ़िल्म देखी वह आरके बैनर की #आह

फ़िल्म थी । बहुत पसंद आई , मै #राजकपूर का फैन बन गया । हर हफ्ते आने वाली #राजकपूर की फ़िल्म का बेताबी से इन्तजार करने लगा ।

मैंने क्रमशः #आह_आग_आवारा_श्री_420_अब_दिल्ली #दूर_नहीं_बूट_पोलिस_जिस_देश_मे_गंगा_बहती_है , #संगम_मेरा_नाम_जोकर_बॉबी_प्रेमरोग_सत्यम_शिवम #सुन्दरम_धर्मकर्म_हिना_राम_तेरीगंगा_मैली , आदि फिल्मे जिनमे खास रूप से राजकपूर का निर्देशन रहा सभी देख डाली ।


उनकी फिल्मों के #गीत , #संगीत , #कहानी , #लोकेशन्स , #एक्टिंग , #फोटोग्राफी , व #संदेश का जो #खूबसूरत तरीके से प्रदर्शन किया गया है,  वह अविस्मरणीय है , दुर्लभ है , सदा याद किया जाएगा । सभी फिल्मों की कहानियों , घटनाओं प्रसंगों गीतों को इस तरह गढ़ा गया है कि यथार्थ से जुड़ी कहानी सीधी दिल को छू जाती है 

#जन्मदिवस_14_दिसंबर_पर_ग्रेट_शोमैन_को_नमन 

   

       ____  #MUNEESH

        

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इफ्तिखार खान साहेब का जलवा

 इफ्तिखार साहेब ने लगभग 300 हिंदी फिल्मो में चरित्र भूमिकाये निभाई उनका असली नाम 'सैयदना इफ्तिखार अहमद शरीफ 'था ...

अक्सर पुलिसमैन की भूमिका में नजर आने वाले 'इफ्तिखार 'एक गायक और बेहतरीन पेन्टर भी थे कलकत्ते में उनके कई गैरफिल्मी गीत रेकॉर्ड हुए थे लेकिन अफसोस की बात यह है कि अंत तक उनके पास उनके गाया हुआ एक भी रेकॉर्ड नहीं रहा उन्होंने अपने चाहने वालों से अनुरोध करते रहे कि यदि किसी के पास भी यदि उनका गाया रेकॉर्ड हो तो उन्हें भेंट कर दें  ....अफ़सोस ऐसा हुआ नहीं ...... और वो इस आखरी हसरत को लिए हुए ही दुनिया से रुखसत हो गए  ...


महबूब की मेहंदी का 'नवाब सफ़दरजंग' ,झील के उस पार के 'दीवानजी' ,निकाह का 'जुम्मन चाचा' ,ज़ख़्मी के जज 'अशोक गांगुली' ,हमराज़ के' एडवोकेट जगमोहन कुमार ',नूरी के 'गुलाम नबी 'डॉन का 'डी.एस.पी डिसिल्वा' ,और दिवार का 'मुल्खराज़ डावर' हिंदी सिनेमा के दर्शको के जेहन में हमेशा अमर रहेगा........


🌷🌷 आज इफ्तिखार साहेब का 101 वा जन्मदिवस है 🌷🌷

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Sayedna Iftekhar Ahmed Sharif

22 feb 1920  

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दूसरों के लिए काम करने वाली लक्ष्मी छाया

 एक थी लक्ष्मी छाया!


१९७१ में राज खोसला की 'मेरा गांव मेरा देश' को सुपर हिट बनाने में जिन फैक्टर्स ने काम किया था उसमें निम्मांकित तीन गाने भी शामिल थे।


मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए..... 

हाय शरमाऊं किस-किस को बताऊं अपनी प्रेम कहानियां…और

आया, आया अटरिया पे कोई चोर.....


ये गाने नायिका आशा पारेख पर नहीं फिल्माए गए थे बल्कि एक कम जानी -पहचानी अभिनेत्री लक्ष्मी छाया पर फिल्माए गए थे। बच्चा-बच्चा जान गया था उसे।  राज खोसला ने ऐसा क्यों किया था? इस राज को आज तक कोई नहीं जान पाया। उनका मक़सद तो आशा पारेख की पतंग आसमान पर चढ़ाना था। यों कभी कभी ऐसा होता है कि बाज़ छोटे अदाकार भी अपनी अदाकारी से किरदार में जान डाल देते हैं कि फिल्म हिट होने सा सबब बन जाते हैं। और अहम अदाकार ठगे से रह जाते हैं। इससे पहले लक्ष्मी छाया नायिका की सहेली के छोटे-मोटे रोल किया करती थी। मज़े की बात ये थी ये नायिका ज्यादातर आशा पारेख ही रहती थी।


उन दिनों राज खोसला ने तय कर रखा था कि आशा पारेख को ग्लैमर की दुनिया से निकाल कर मीनाकुमारी सरीखी गंभीर अभिनेत्री बना देंगे। इसकी शुरआत वो 'दो बदन' से कर चुके थे।


'मेरा गांव…' सुपर हिट होने के बावजूद आशा पारेख को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। लेकिन ट्रेजेडी ये रही कि 'मार दिया जाए की छोड़ दिया जाए गर्ल' से घर-घर की पहचान बनी लक्ष्मी छाया।


लक्ष्मी को 'रास्ते का पत्थर' में ज़रूर अच्छी फुटेज मिली। इसमें अमिताभ बच्चन नायक थे और नवोदिता नीता ख्याणी नायिका। नशे में हर वक़्त चूर लड़की के किरदार में लक्ष्मी ने जान डाल दी। लेकिन बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड नाकामी ने लक्ष्मी के अरमानों पर भी पानी फेर दिया। लक्ष्मी छाया की पहचान वही रही। वो नायिका की अच्छी सहेली से आगे नहीं बढ़ पायी। 

 

हर फ़िल्मी और गैर फ़िल्मी शख्स ये मानता था कि लक्ष्मी बहुत अच्छी डांसर तो है ही, उसमें ज़बरदस्त एक्टिंग पोटेंशियल भी है। डांसर-एक्ट्रेस का उन दिनों बोलबाला था। लेकिन मेजर रोल देने के लिए कोई तैयार नही था। क्योंकि तमाम बड़ी नायिकाओं (आशा पारेख , शर्मीला टैगोर , मुमताज़ इत्यादि) ने उनके ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ रखी थी और स्थापित नायिकाओं को नाराज़ करना कोई आसान काम नहीं था। 


'मेरा गावं…' से पहले एनसी सिप्पी की रहस्यमई 'गुमनाम' में लक्ष्मी पर फिल्माया एक मास्क पॉप गाना बहुत पॉपुलर हो चुका था - जान पहचान हो, जीना आसान हो.… , ये गाना २००१ में रिलीज़ हॉलीवुड फिल्म 'घोस्ट वर्ल्ड' की ओपनिंग में जस का तस रखा गया।


लक्ष्मी छाया ने तीसरी मंज़िल, प्यार का मौसम, नौनिहाल, बहारों के सपने आदि कुल ५५ फिल्मों में काम किया और लगभग हर फिल्म में उसे नोटिस भी किया गया। बस बड़ा काम नहीं मिला, सिर्फ वादे ही मिले।


लक्ष्मी छाया ने १९८६ में फ़िल्म "बिजली" के बाद फ़िल्में करना छोड़ गरीब बच्चियों के लिये एक निशुल्क डांसिंग स्कूल खोला लिया। वो साईं बाबा की ज़बरदस्त भक्त भी थीं। साईं बाबा पर टीवी सीरियल बना कर अपनी अगाध श्रद्धा को अभिव्यक्त करना चाहती थीं। मगर आर्थिक मजबूरी और फाइनेंस की समस्या के कारण उनका ये ख़्वाब अधूरा रह गया। 


०७ जनवरी १९४८ को जन्मी लक्ष्मी को कैंसर ने ०९ मई २००५ को महज़ ५६ की उम्र में गुमनामी की मौत इस दुनियाँ से चली गईं।


मीडिया ने 'मार दिया जाए गर्ल' लक्ष्मी छाया की मृत्यु का समाचार महज़ दो पंक्तियों में समेट दिया। शायद उन्हें लक्ष्मी छाया के 'होने' की जानकारी ही नहीं थी। 


-वीर विनोद छाबड़ा

परदेसियों से न अखियाँ मिलाना, परदेसियों को है.......

 परदेसियों से न अखियाँ मिलाना, परदेसियों को है इक दिन जाना। अपनी दौर की मशहूर और खूबसूरत अभिनेत्री नंदा का कोई जोड़ था।


इनका जन्म ८ जनवरी १९३९ को हुआ था। इनका पूरा नाम नंदा कर्नाटकी था। पिता विनायक दामोदर कर्नाटकी मराठी फिल्मों के अभिनेता, निर्माता व निर्देशक थे। नंदा फिल्मों में काम नहीं करना चाहती थीं। पर बॉलीवुड में इनकी एंट्री की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। जब ये ५ वर्ष की थीं तो इनके पिता अपनी एक फ़िल्म में इनसे एक लड़के का रोल कराना चाहते थे। पर फ़िल्म पूरी होने से पहले ही इनके पिता का देहांत हो गया। और १० साल के उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारी इन पर आ गई।


बतौर बाल कलाकार मंदिर , जग्गू,शंकराचार्य , अंगारे में अभिनय किया। दिनकर पाटिल की निर्देशित मराठी फ़िल्म ‘कुलदेवता’ के लिये नंदा को पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विशेष पुरस्कार से नवाजा था। नंदा ने कुल ८ गुजराती फ़िल्मों में भी काम किया। हिंदी में नंदा ने बतौर हीरोइन १९५७ में अपने चाचा वी शांता राम की फ़िल्म 'तूफान और दिया' में काम किया था। उसके बाद नंदा फ़िल्मों में ऐसी व्यस्त हुईं कि निजी ज़िंदगी के लिय उन्हें वक़्त ही नहीं मिला।


१९५९ में नंदा ने फ़िल्म 'छोटी बहन' में बलराज साहनी की अंधी बहन का किरदार निभाया था। उनका अभिनय दर्शकों को बहुत पसंद आया। राजेंद्र कुमार के साथ उनकी अगली फ़िल्म 'धूल का फूल' सुपरहिट रही। लेकिन, बहन के रोल उनका पीछा नहीं छोड़ रहे थे। नंदा एक बार फिर 1960 की फ़िल्म 'काला बाजार' में देव आनंद की बहन बनीं। नंदा ने सबसे ज्यादा ९ फ़िल्में शशिकपूर के साथ कीं। उन्होंने उनके साथ १९६१ में ‘चार दीवारी’ और १९६२ में ‘मेंहदी लगी मेरे हाथ’ जैसी फ़िल्में कीं। ‘जब जब फूल खिले’ तो एक ज़बरदस्त हिट  फ़िल्म साबित हुई। 


उन्होंने देव आनंद के साथ 'काला बाज़ार', 'हम दोनों', 'तीन देवियां', शशि कपूर के साथ 'नींद हमारी ख्‍वाब तुम्हारे', राजेश खन्ना के साथ ‘इत्तेफाक’ (1९६९) में उन्होंने निगेटिव किरदार तक निभाया, लेकिन दर्शक उनका ये रूप नहीं स्वीकार सके। बहरहाल, साल १९७२-७३ के बाद नंदा की एक के बाद एक कई फ़िल्में फ्लॉप होती रहीं और इस तरह से नंदा ने खुद को इंडस्ट्री से अलग कर लिया! नंदा की आखिरी फिल्मों में 'प्रेम रोग' और 'मजदूर' थी।


वर्ष १९५७ में उन्हें फ़िल्म भाभी के लिए फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड के लिए नॉमिनेट किया गया। १९६० में सहायक अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड फ़िल्म अंचल के लिये मिला।


नंदा मनमोहन देसाई से बेहद प्यार करतीं थी। पर दोनों अपने प्यार का इज़हार न कर पाए। जब मनमोहन देसाई की पत्नी का निधन हो गया उसके बाद दोनों ने सगाई कर ली। उस समय मनमोहन की उम्र ५५ की और नंदा जी ५३ वर्ष की थीं। पर दो वर्ष बाद ही मनमोहन जी का निधन हो गया। मनमोहन देसाई के निधन के बाद से नंदा काफी अकेली हो गई थीं। वो किसी से ज्यादा बातें भी नहीं करती थीं। उनकी खास दोस्तों में माला सिन्हा और वहीदा रहमान थीं, जिनके साथ वो थोड़ा वक्त गुज़ार लिया करतीं। २५ मार्च २०१४ को ७५ वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।लेकिन, सिने प्रेमी उन्हें आज भी याद करते हैं।

बहज़ाद लखनवी और आग का वो गीत

 बहज़ाद लखनवी जी का लिखा फ़िल्म "आग" का गीत !


ज़िंदा हूँ इस तरह, कि ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं

जलता हुआ दिया हूँ, मगर रोशनी नहीं


वो मुद्दते हुईं हैं किसी से जुदा हुए

लेकिन ये दिल की आग, अभी तक बुझी नहीं


आने को आ चुका था किनारा भी सामने

ख़ुद उसके पास, मेरी ही नैया गई नहीं


होठों के पास आए हँसी , क्या मज़ाल है

दिल का मुआमला है, कोई दिल्लगी नहीं


ये चाँद, ये हवा, ये फ़िज़ा, सब है मंद-मंद

जो तू नहीं तो इन में कोई दिलकशी नहीं

शक्ति सामंत की कहानी

 शक्ति सामंत का जन्म बंगाल के बर्धमान जिले में १३ जनवरी १९२६ को हुआ था। जब शक्ति दो साल के थे, उनके पिता एक दुर्घटना में नहीं रहे जिस कारण उन्हें अपने चाचा के पास यूपी के बदायूं आना पड़ा। अपने चाचा के कहने पर वो उनके काम में हाथ बंटाने लगे थे। इस बीच शक्ति को ऐक्टिंग का चस्का लग चुका था, जिसके चलते वो काम के साथ साथ थिएटर और ड्रामा भी करने लगे।


ये उनके चाचा को पसंद नहीं था। इसलिए चाचा का घर छोड़कर अपना शौक पूरा करने मुंबई आ गए। मुंबई में बिना किसी सहारे के जगह न मिल पाने की वजह से मुंबई से २०० किलोमीटर पहले दापोली में एक अंग्रेजी हाई स्कूल में नौकरी ली। यहां से मुंबई स्टीमर से बस दो-तीन घंटे की दूरी पर थी। तो वो आसानी से मुंबई आ-जा सकते थे।


फिल्मों में काम करने की चाह में शक्ति हर शुक्रवार को मुंबई चले जाते थे और अगले दो दिन वहीं काम की तलाश करते थे। पर मुंबई में काम मिलना इतना आसान नहीं था। उस टाइम बॉम्बे टॉकीज एक बड़ा स्टूडियो था, शक्ति भी वहीं जाकर अपनी उम्मीद तलाशते थे।


उस समय के जाने-माने एक्टर अशोक कुमार उर्फ दादामुनि बॉम्बे टॉकीज के साथ जुड़े हुए थे। शक्ति ने दादामुनि के पास जाकर काम मांगा, दादामुनि ने एक असिस्टेंट डायरेक्टर बनाकर शक्ति को काम पर तो रख लिया लेकिन बिना पैसे के, उन्हें सिर्फ खाना-पीना मिलता था, पैसे नहीं मिलते थे। एक ब्रेक पाने की कोशिश में लगे शक्ति के लिए यह बड़ा मौका था, वो बिना पैसे के भी काम करने लगे। बंगाली और हिंदी दोनों भाषा जानने के कारण वो डायरेक्टर फणी मजूमदार के लिए बांग्ला से हिंदी में ट्रांसलेशन का काम भी करते थे, इस काम के उन्हें पैसे भी मिलने लगे।


एक दिन शक्ति ने दादामुनि को अपने ऐक्टर बनने के सपने के बारे में बताया लेकिन दादामुनि ने उनके टैलेंट को देखते हुए डायरेक्शन की फील्ड में ही काम करते रहने की सलाह दी। अपनी ऐक्टिंग की हसरत को पूरी करने के लिए वो मूवीज में छोटे-मोटे रोल कर लेते थे. अमूमन सारी पिक्चरों में उन्हें एक पुलिसवाले का किरदार मिलता था जिसका काम बस ‘फॉलो हिम’ बोलना होता था। लेकिन इस बीच काम करते-करते उनकी बहुत-सी बड़ी हस्तियों से जान-पहचान हो गई थी। इनमें गुरुदत्त और ब्रजेन्द्र गौड़ भी थे, गौड़ को उन दिनों एक फिल्म डायरेक्ट करने का ऑफर हुआ जिसका नाम था ‘कस्तूरी’. पर गौड़ साहब उस टाइम एक दूसरी पिक्चर पर काम कर रहे थे. जिसके चलते उन्हें काम करने में दिक्कत महसूस हुई. उन्होंने इस काम में शक्ति की मदद मांगी, शक्ति तो इस मौके के लिए तैयार थे। उन्होंने २५० रुपये की तनख्वाह में काम करना तय किया। ये शक्ति की फिल्मों से पहली बड़ी कमाई थी।


इस शुरुआत के बाद म्यूजीशियन और प्रॉड्यूसर एस एच बिहारी और लेखक दरोगाजी एक फिल्म बनाने जा रहे थे जिसका नाम था ‘इंस्पेक्टर’ (१९५६)। वो इस कहानी पर नाडियाड़वाला के साथ मिलकर काम कर रहे थे, उन्हें लगा कि इस स्टोरी को हिट बनाने के लिए किसी बड़े डायरेक्टर को लेना पड़ेगा पर इससे बजट बिगड़ जाएगा, ऐसे में उन्होंने पैसे बचाने के लिए किसी बड़े डायरेक्टर की जगह एक नये डायरेक्टर को काम दिया जिसका नाम था शक्ति सामंत मूवी में दादामुनि और गीता बाली ने काम किया और ‘इंस्पेक्टर’ सुपरहिट हुई , लेकिन मजे की बात तो यह थी कि ‘इंस्पेक्टर’ का काम पहले शुरू करने के बावजूद उनकी एक दूसरी मूवी ‘बहू’ (१९५४) पहले रिलीज हो गई थी।


इसके बाद उन्होंने एक फ़िल्म बनाने की सोची नाम रखा "हावड़ा ब्रिज" (१९५७) तय किया कि इस पिक्टर में अशोक कुमार और मधुबाला को लेंगे। पर उस वक्त इतने पैसे नहीं थे कि दोनों सुपरस्टार्स को ले सकें। उन्होंने अशोक कुमार से इस बारे में बात की। स्टोरी को देखकर अशोक कुमार खुद तो तैयार हो ही गये साथ ही मधुबाला से बात करने के लिये राजी हो गए और उन्हें सिर्फ एक रुपये टोकन मनी पर काम करने के लिए राजी कर लिया। साथ ही संगीतकार ओपी नैयर को १००० रुपये देकर साइन किया। ये फिल्म पर्दे पर सुपरहिट साबित हुई। और शक्ति सामंत की पहचान एक प्रॉड्यूसर के रूप में भी बन गई।


शक्ति दा की प्रमुख फ़िल्में रहीं हिल स्टेशन , डिटेक्टिव , जाली नोट , सिंगापुर , नॉटी बॉय, चाइना टाउन, कश्मीर की काली, सावन की घटा, ऐन इवनिंग इन पेरिस, आराधना, कटी पतंग, पागल कहीं का, जाने-अनजाने,अमर प्रेम, अनुराग, चरित्रहीन, अजनबी, अमानुष, महबूबा, अनुरोध, आनंद आश्रम, इत्यादि


शक्ति दा ने कुछ फिल्में प्रॉड्यूस भी की, और अपना शक्ति प्रॉडक्शन बनाया। शक्ति दा की एक बड़ी बात हिट फिल्मों के साथ हिट गानों की भी थी। उनकी फिल्मों के कई गाने एवरग्रीन गाने बन गए. इन गानों की लिस्ट बहुत लंबी है पर इनमें से कुछ खास नगमे ‘रूप तेरा मस्ताना’, ‘तारीफ करूं क्या उसकी’, ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू’, ‘कोरा कागज था ये मन मेरा’, ‘बार-बार देखो’, ‘चंदा है तू’, ‘एक अजनबी हसीना से’ और ‘ये शाम मस्तानी’ और ' कश्मीर की काली के गाने प्रमुख हैं।


आराधना के अलावा उन्हें अनुराग और अमानुष फिल्मों के लिए बेस्ट डायरेक्टर का फिल्मफेयर मिला। डायरेक्टर के रूप में उनकी आखिरी फिल्म गीतांजलि १९९३ में आई थी और प्रॉड्यूसर के रूप में डॉन मुथुस्वामी २००८ में आई थी।


शक्ति दा लाइमलाइट से दूर रहने वाले लोगों में से थे। उनकी पत्नी और दो बेटे हमेशा चकाचौंध से दूर रहे। उनके एक पोते आदित्य सामंत ने ‘ये जो मोहब्बत है’ नाम की पिक्चर में काम किया। मजे की बात ये है कि इस पिक्चर का टाइटल भी शक्ति दा की फिल्म ‘कटी पतंग’ के एक गाने से लिया था।


फिल्मफेयर उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड देने वाला था लेकिन उससे कुछ दिन पहले उन्हें लकवा पड़ गया। इसके बाद वो ठीक नहीं हो पाए. और दिल की धड़कन रुकने से ८३ साल की उम्र में २००९ को शक्ति दा का निधन हो गया। अपने आखिरी समय में शक्ति दा गुमनामी में जिए। कोई भी बड़ी हस्ती उनके अंतिम संस्कार में नहीं आई और शक्ति दा बड़ी बेरुखी से हमसे रुखसत हो गए।

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

शशिकला da कोई हुस्नदार नहीं

 Shashikala __  the quintessential vamp of Bollywood


Shashikala, the number one whining, taunting, tormenting vamp of the Hindi cinema has been a household name which was synonymous earlier with a flighty woman who pouted and plotted the downfall of others, and later with a cruel sister-in-law who tortured younger women.


She has played such hateful roles literally in hundreds of films. Yet, behind those bouffant hairstyles and pouting lips, behind those cruel verbal jibes hides a woman whose life is like an riveting novel which you cannot put down once you have started to read it.


Born in Solapur in 1932, she wandered from studio to studio looking for work. She earned in bits and pieces till she met Noor Jehan, the reigning screen queen/singer of that era. Her husband Shaukat Hussain Rizvi was making Zeenat (1945) then and she was included in a qawwali scene and small roles in films like Jugnu (1947), Arzoo (1950), Teen Batti Char Raasta (1953) and other films.


It was in Aarti (1962) with Meena Kumari, Ashok Kumar and Pradeep Kumar that she clicked as a vamp for the first time and offers poured in for such roles. Her next power-packed performance as a vamp was in B R Chopra's Gumraah (1963).


Shashikala's other notable films include Shart (1954), Patrani (1956), Nau Do Gyarah (1957), Sujata (1959), Kanoon (1960), Singapore (1960), Junglee (1961), Anpadh (1962), Yeh Rastey Hain Pyar Ke (1963), Hamrahi (1963),Aayi Milan ki Bela (1964), Aap Ki Parchhaiyan (1964), Waqt (1965), Anupama (1966), Neend Hamari Khwab Tumhare (1966), Phool Aur Patthar (1967), Chhoti Bahu (1971), Chhote Sarkar (1974), Khubsoorat (1980) and Souten (1983). She played Shah Rukh Khan's mother in Baadshah (1999).


A very beautiful title song 'Yeh Rastey Hain Pyar Ke Chalna Sambhal Sambhal Ke' was filmed on Shashikala in 1963. She was really a superb actress.


Shashikala has received eight nominations for the Filmfare Best Supporting Actress Award and won the award twice, for Aarti (1962) and Gumraah (1963).


She is the disciple of Mother Teresa, and worked for nine years in her various homes in Kolkata looking after leprosy patients and orphans.

सशाधर मुखर्जी का जलवा

 #साशधरमुख़र्जी

  दिन देके देखो’, ‘लव इन शिमला’, ‘एक मुसाफिर एक हसीना’ और ‘लीडर’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में बनाने वाले बॉलीवुड के मशहूर निर्माता सशाधर मुखर्जी का जन्म 29 सितंबर 1909 को झांसी में हुआ था। सशाधर ने अपने करियर की शुरुआत भारतीय सिनेमा के इतिहास के पुराने स्टुडियो बॉम्बे टॉकीज से की। उन्होंने अपने करियर में न सिर्फ बेहतरीन फिल्में बनाई बल्कि उन्होंने कई लोगों को भी फिल्म इंडस्ट्री से जोड़ा। अशोक कुमार को बॉम्बे टॉकीज सशाधर मुखर्जी ले कर आये थे।


सशाधर मुखर्जी ने सती रानी देवी से शादी की। उनके 6 बच्चे थे। सती रानी देवी अशोक कुमार, अनूप कुमार, किशोर कुमार की इकलौती बहन थीं। सशाधर मुखर्जी अपने बेटे जॉय मुखर्जी को हिंदी सिनेमा में बतौर अभिनेता लॉन्च करना चाहते थे। इसलिए सशाधर एक नये चेहरे की तलाश कर रहे थे। इसी दौरान साधना ने सिंधी फिल्म ‘अबाना’ की थी और उनकी फोटो एक मैगजीन में छपी थी। सशाधर मुखर्जी ने मैगजीन की वो फोटो देखी और साधना को अपनी फिल्म ‘लव इन शिमला’ में कास्ट कर लिया गया। इस फिल्म से साधना को खूब शोहरत मिली और वो रातों-रात  स्टार बन गई। इस फिल्म के बाद साधना के प्रशंसक उनके हेयरस्टाइल से लेकर उनके कपड़ों की भी नकल करने लगे थे।


1943 में अभिनेता अशोक कुमार ने निर्माता सशाधर मुखर्जी के साथ मिलकर एक प्रोडक्शन हाउस खोला। नाम रखा फिल्मिस्तान स्टूडियो। यह स्टूडियो 4.5 एकड़ जमीन पर फैला है। 1940 और 50 के दशक में यहां कई बड़ी फिल्मों की शूटिंग हुई। 14 सेट वाले इस स्टूडियो में करीब 60 हिट फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। इनमें ‘नागिन’, ‘अनारकली’, ‘शहीद’ और ‘शबनम’ शामिल हैं। सशाधर के बाद उनके बच्चे जॉय, देव, शोमू ने फिल्मिस्तान स्टूडियो का काम संभाला।


सशाधर मुखर्जी के बेटे शोमू ने अब्बीनेत्री तनुजा से शादी की। उनकी दो बेटियां हैं काजोल और तनिशा। काजोल एक अभिनेत्री हैं जिनकी शादी अजय देवगन से हुई। जो कि एक सुपरस्टार हैं। वहीं सशाधर मुखर्जी के पोते अयान मुखर्जी हिंदी फिल्मों के मशहूर निर्देशक हैं। इस तरह मुखर्जी के पूरे परिवार ने बॉलीवुड में अपना योगदान दिया है।


ब्लॉकबस्टर फिल्में बनाने वाले निर्माता सशाधर को साल 1967 में पद्मश्री से  सम्मानित किया गया। साल 1990 में उनका निधन हो गया था।

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