शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

हिन्दी उपन्यास का विकास

हिंदी उपन्यास का आरम्भ श्रीनिवासदास के "परीक्षागुरु' (१८४३ ई.) से माना जाता है। हिंदी के आरम्भिक उपन्यास अधिकतर ऐयारी और तिलस्मी किस्म के थे। अनूदित उपन्यासों में पहला सामाजिक उपन्यास भारतेंदु हरिश्चंद्र का "पूर्णप्रकाश' और चंद्रप्रभा नामक मराठी उपन्यास का अनुवाद था। आरम्भ में हिंदी में कई उपन्यास बँगला, मराठी आदि से अनुवादित किए गए।

हिंदी में सामाजिक उपन्यासों का आधुनिक अर्थ में सूत्रपात प्रेमचंद (१८८०-१९३६) से हुआ। प्रेमचंद पहले उर्दू में लिखते थे, बाद में हिंदी की ओर मुड़े। आपके "सेवासदन', "रंगभूमि', "कायाकल्प', "गबन', "निर्मला', "गोदान', आदि प्रसिद्ध उपन्यास हैं, जिनमें ग्रामीण वातावरण का उत्तम चित्रण है। चरित्रचित्रण में प्रेमचंद गांधी जी के "हृदयपरिवर्तन' के सिद्धांत को मानते थे। बाद में उनकी रुझान समाजवाद की ओर भी हुई, ऐसा जान पड़ता है। कुल मिलाकर उनके उपन्यास हिंदी में आधुनिक सामाजिक सुधारवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जयशंकर प्रसाद के "कंकाल' और "तितली' उपन्यासों में भिन्न प्रकार के समाजों का चित्रण है, परंतु शैली अधिक काव्यात्मक है। प्रेमचंद की ही शैली में, उनके अनुकरण से विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक, सुदर्शन, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि अनेक लेखकों ने सामाजिक उपन्यास लिखे, जिनमें एक प्रकार का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद अधिक था। परंतु पांडेय बेचन शर्मा "उग्र', ऋषभचरण जैन, चतुरसेन शास्त्री आदि ने फरांसीसी ढंग का यथार्थवाद और प्रकृतवाद (नैचुरॉलिज़्म) अपनाया और समाज की बुराइयों का दंभस्फोट किया। इस शेली के उपन्यासकारों में सबसे सफल रहे "चित्रलेखा' के लेखक भगवतीचरण वर्मा, जिनके "टेढ़े मेढ़े रास्ते' और "भूले बिसरे चित्र' बहुत प्रसिद्ध हैं। उपेन्द्रनाथ अश्क की "गिरती दीवारें' का भी इस समाज की बुराइयों के चित्रणवाली रचनाओं में महत्वपूर्ण स्थान है। अमृतलाल नागर की "बूँद और समुद्र' इसी यथार्थवादी शैली में आगे बढ़कर आंचलिकता मिलानेवाला एक श्रेष्ठ उपन्यास है। सियारामशरण गुप्त की नारी' की अपनी अलग विशेषता है।

मनोवैज्ञानिक उपन्यास जैनेंद्रकुमार से शुरू हुए। "परख', "सुनीता', "कल्याणी' आदि से भी अधिक आप के "त्यागपत्र' ने हिंदी में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान दिया। जैनेंद्र जी दार्शनिक शब्दावली में अधिक उलझ गए। मनोविश्लेषण में स. ही. वात्स्यायन "अज्ञेय' ने अपने "शेखर : एक जीवनी', "नदी के द्वीप', "अपने अपने अजनबी' में उत्तरोत्तर गहराई और सूक्ष्मता उपन्यासकला में दिखाई। इस शैली में लिखनेवाली बहुत कम मिलते हैं। सामाजिक विकृतियों पर इलाचंद्र जोशी के "संन्यासी', "प्रेत और छाया', "जहाज का पंछी' आदि में अच्छा प्रकाश डाला गया है। इस शैली के उपन्यासकारों में धर्मवीर भारती का "सूरज का सातवाँ घोड़ा' और नरेश मेहता का "वह पथबंधु था' उत्तम उपलब्धियाँ हैं।

ऐतिहासिक उपन्यासों में हजारीप्रसाद द्विवेदी का "बाणभट्ट की आत्मकथा' एक बहुत मनोरंजक कथाप्रयोग है जिसमें प्राचीन काल के भारत को मूर्त किया गया है। वृंदावनलाल वर्मा के "महारानी लक्ष्मी बाई', "मृगनयनी' आदि में ऐतिहासिकता तो बहुत है, रोचकता भी है, परंतु काव्यमयता द्विवेदी जी जैसी नहीं है। राहुल सांकृत्यायन (१८९५-१९६३), रांगेय राघव (१९२२-१९६३) आदि ने भी कुछ संस्मरणीय ऐतिहासिक उपन्यास दिए हैं।

यथार्थवादी शैली सामाजिक यथार्थवाद की ओर मुड़ी और "दिव्या' और "झूठा सच' के लेखक भूतपूर्व क्रांतिकारी यशपाल और "बलचनमा' के लेखक नागार्जुन इस धारा के उत्तम प्रतिनिधि हैं। कहीं कहीं इनकी रचनाओं में प्रचार का आग्रह बढ़ गया है। हिंदी की नवीनतम विधा आंचलिक उपन्यासों की है, जो शुरु होती है फणीश्वरनाथ "रेणु' के "मैला आँचल' से और उसमें अब कई लेखक हाथ आजमा रहे हैं, जैसे राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, शैलेश मटियानी, राजेंद्र अवस्थी, मनहर चौहान, शिवानी इत्यादि।

रविवार, 4 अप्रैल 2021

संघर्ष ks जादू

 तस्वीर में आप एक टमाटर के पौधे को देख रहे होंगे, शायद किसी यात्री ने टमाटर के बीज को ट्रेन से फेंक दिया होगा। ये पौधा मिट्टी की छाती फाड़कर नही बल्कि पत्थरों को चीरकर बाहर आया है।


जब ये ओर भी नन्हा सा होगा, तब शताब्दी ओर राजधानी जैसे तूफान से भी तेज दौड़ती ट्रेनों के बिल्कुल पास से गुजरते हुए भी इसने सिर्फ बढ़ना सीखा ओर बढ़ते बढ़ते आखिर कार इसने एक टमाटर को जन्म दे ही दिया।


इस पौधे के न हाथ है, न पांव, न ही दिमाग है, ओर तो ओर इसको जीवित रहने के लिए कम से कम मिट्टी और पानी तो मिलना चाहिए ही था, जो इसका हक भी था।


लेकिन इस पौधे ने बिना जल, बिना मिट्टी के, बिना की सुविधा के अपने आपको बड़ा किया और फला फूला, ओर जो इस पौधे के जीवन का उद्देश्य एक ओर फल को देना था, वो उद्देश्य इसने पूरा किया।


हम इंसानों के पास तो हाथ है, पांव है, दिमाग है, उसके बाद भी यदि हम जीवन मे अपने आपको कमजोर मानकर, जीवन को सही प्रकार से, जो हमारे जीवन का उद्देश्य है, इस प्रकार से नही जीते है तो इस जीवन मे आने का कोई औचित्य बचता ही नही है।


जिन लोगो को लगता है कि जीवन मे हम तो असफल हो गए हम तो जीवन मे कुछ कर ही नही सकते, हम तो बस अब बरबाद हो ही चुके है, तो उन्हें इस टमाटर के पौधे से कुछ सीख लेनी चाहिए। असली जीवन का नाम ही लगातार संघर्षों की कहानी है।

#Copied...

ओमप्रकाश का सच

 A man had a fullsome meal in a modest restaurant in Bombay and when the waiter presented the bill he went straight to the manager and admitted honestly that he had no money. He added  that he hadn't eaten for the past two days and was terribly hungry so was forced to do this. The manager heard his story patiently as the man promised that the day he gets a job the first thing he would do was to settle the bill. The manager smiled and told him to leave wishing him luck. The waiter who stood watching the drama was aghast. He questioned the manager "Saab why did you let him go". The manager replied, "Go and do your work". Few months later the same man came to the restaurant and settled his pending bill to the utter dismay of the waiter. The man thanked the manager and told him that he had bagged an acting offer. The manager visibly happy offered him a cup of tea and a  friendship bloomed between the two. The actor soon became a known face and did multiple films at a time. Later he owned a bungalow and a chaufer driven car. Times had changed but everytime he passed by that area he made it a point to visit the restaurant for a cup of tea with the manager who has shown incredible sympathy years ago. Faith at times does wonders. Had the manager thrashed and humiliated the hungry man that day maybe the industry wouldn't have got a talented and natural actor called Om Prakash. Remembering the veteran actor on his birth anniversary 🙏


Born 19 - 12 -1919


Death  21- 02 -1998

#copied

आज़ाद हिंद फ़ौज से सिनेमा जगत तक नाज़िर हुसैन का सफ़र

आज़ाद हिंद फ़ौज से सिनेमा जगत तक नाज़िर हुसैन का सफ़र



नाज़िर हुसैन का जन्म 15 मई 1922 को उत्तर प्रदेश के गाज़ीपुर जिले के उसिया नामक गाँव में हुआ था। हिंदी सिनेमा में अपने भावात्मक किरदारों के कारण आंसुओं का कनस्तर नाम से मशहूर नाज़िर हुसैन के पिता रेलवे में गार्ड की नौकरी करते थे और उन्होने ख़ुद भी बतौर फायरमैन रेलवे में काम किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौर में नाज़िर ब्रिटिश आर्मी में शामिल हुए जहाँ इन्हें मलेशिया और सिंगापुर में तैनात किया गया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस से काफ़ी प्रभावित होने के कारण वे आज़ाद हिंद फौज में शामिल हो गए।



देश की आज़ादी के बाद नाज़िर ने थियेटर का रुख़ किया,कलकत्ता में इन्होंने रंगमंच पर बहुत से नाटक किये जहाँ उनकी मुलाकात बिमल रॉय से हुई। बिमल रॉय ने नाज़िर के आज़ाद हिंद फौज के अनुभवों पर आधारित फिल्म बनाने का फैसला किया और पहला आदमी नामक फ़िल्म बनी जिसमे नाज़िर ने ना केवल एक्टिंग की बल्कि बतौर स्क्रीन राइटर और डायलॉग राइटर का भी काम किया। इस फ़िल्म की सफलता के बाद उन्होंने बिमल रॉय के साथ और भी कई फिल्में की जैसे दो बीघा जमीन और देवदास। उन्होंने हिंदी सिनेमा में 500 से अधिक फिल्मों में बतौर चरित्र अभिनेता का काम किया।



नाज़िर के सिनेमा जगत का सफ़र केवल इतना न था,जब नाज़िर की मुलाकात देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद से हुई तब उन्होने नाज़िर से क्षेत्रीय भाषाओं में सिनेमा बनाने के बारे में अपनी इच्छा ज़ाहिर की। डाॅक्टर राजेन्द्र प्रसाद के इस सुझाव के बाद उन्होंने भोजपुरी फ़िल्म की नींव रखी और पहली भोजपुरी फ़िल्म “गंगा मैया तोहे पियरी चढइबो” बनकर तैयार हुई।इसी वजह से उन्हें भोजपुरी सिनेमा के पितामह के रूप में भी जाना जाता है।

इस फ़िल्म की पटकथा नाज़िर हुसैन ने लिखी और इस फिल्म मे उन्होने अभिनय भी किया। बिहार के विश्वनाथ प्रसाद शाहबादी इस फिल्म के निर्माता बनने को राज़ी हो गये और इस फिल्म का निर्देशन कुंदन कुमार ने किया। वहीं फिल्म में संगीत दिया था चित्रगुप्त ने, शैलेन्द्र ने गीत लिखे और मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की गायकी ने धूम मचा दी थी।

इसके बाद उन्होंने फ़िल्म “बलम परदेसिया” का निर्देशन किया जिसने भोजपुरी सिनेमा को एक नए आयाम पर पहुँचा दिया।

भोजपुरी और हिंदी सिनेमा जगत में अपने रचनात्मक योगदान के लिए नाज़िर हुसैन हमेशा याद किए जाएंगे।

हास्य अभिनेता 'महमूद अली '

 हास्य अभिनेता 'महमूद अली 'की पुण्य तिथि (23 जुलाई 2004) पर विशेष


..............................................................................................


उस समय महमूद की मांग का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है वे तत्कालीन हीरो और विलेन से ज़्यादा फ़ीस लिया करते थे। फ़िल्म 'मैं सुंदर हूँ' में लीड एक्टर थे विश्वजीत।...... इस फ़िल्म में काम करने के लिए विश्वजीत ने 2 लाख रुपए लिए जबकि महमूद ने 8 लाख लिए। ....वैसे ही फ़िल्म 'हमजोली' के लिए उन्हें जितेंद्र से ज़्यादा पैसे मिले। ....अब जब उनके पास एक से एक महंगी कारे थे और महमूद एक बड़े स्टार बन गए थे उनके पास किसी चीज़ की कमी नहीं थी लेकिन बावजूद इसके बचपन में घटी इस घटना ने महमूद के जीवन में ऐसा गहरा प्रभाव डाला था वो उस साईकल वाली घटना को ताउम्र नहीं भूले ........अपने संघर्ष के दिनों में माली हालत ठीक करने के लिए महमूद ने मलाड से विरार के बीच चलने वाली लोकल में टॉफ़ियां तक ​​बेचीं। ड्राइवर बन कर लोगो की गाड़ी चलाई इसलिए वो गरीबी का दर्द समझते थे ...


महमूद ने कईयों का कॅरियर संवारा उसमें से एक पंचम भी हैं। पंचम यानी राहुल देव बर्मन, जिन्हें आर डी कहते हैं। इन्हें महमूद ने फ़िल्म 'छोटे नवाब' में बतौर संगीतकार लिया। अमिताभ बच्चन को अपनी फिल्म 'बॉम्बे तो गोवा ' के लिए महमूद ने उस वक्त साईन किया जब लोग उन्हें पहचानते भी नहीं थे .....


...............................................................


पवन मेहरा ✒


#ब्लॉग_सुहानी_यादें_बीते_सुनहरे_दौर_की


बुधवार, 31 मार्च 2021

कातिल मुस्कान ही थी शशि की पहचान

 शशिकला.... खुबसूरत और  तुफानी  मुसकराहट की मालकिन...! 


शशिकला का जन्म ता.4.8.1932  के रोज  सोलापुर में एक महाराष्ट़ियन फेमीली में हुआ था.. उनके पिता जी अनंत राव जावलकर  कपडे़ के वयापारी थे.. धनवान शिक्षीत और गौरव गौरव शाली फेमीली था... पर न जाने कया हुआ....!  जावलकर फेमीली के  बुरे दिन आये..! परिवार गरीब हो गया और  बडे परिवार को निभाने का फर्ज शशिकला को अदा करना पडा...! 


शशिकला के भाई को चारटर एकाउंटेंट बनाने के लिए इंग्लैंड भेजा गया था.. आशा थी कि  वह परिवार की देखभाल करेगा.... पर अफ़सोस..! वह वापिस आया ही नहीं... परिवार को गरीबी में छोड़ कर वह इंग्लैंड में ही सेटल हो गया!. 


शशिकला को बचपन से ही अभीनय का शौक था.


शशिकला के पिता जी के एक मित्र ने शशिकला को फिल्मों में नशीब आजमाने की नशिहत दी.. 


शशिकला और उनके पिताजी ने फिल्म स्टुडियो के चककर काटना शुरू किया... 


एक बार उस समय की  जानी मानी अभीनेत्री नूरजहां ने शशिकला को देखा और उसे फिल्म जीन्नत के लिए पसन्द करली...! इस तरह जीन्नत  शशिकला की पहेली फिल्म थी.


शशिकला  इस फिल्म में एक कव्वाली  आहे न भरी शिकवे न किये कुछ भी न जुबां से काम लीया..पे परदे पर दिखाई दी.. मेरा खयाल हे.. शायद अभीनेत्री शयामा भी इसी फिल्म में इसी कव्वाली में परदे पर दिखाई दी थी...! 


उसके बाद 1947 में नुरजहा दिलीप कुमार की फिल्म जुगनू आइ.. इस फिल्म में गायिका रोशन आरा बेगम का गाया हुआ   देश की पुरफेंक दिलकश हवा ओ मे रंगी.. गीत शशिकला पर फिलमाया गया... उस वक्त शशिकला बेहद खुबसूरत लगती थी तो उस गीत मे शशिकला के  बहोत सारे कलोज अप परदे पर दिखाये गये... फिल्म की हिरोइन नुरजहा से भी ज्यादा...! 


उसके बाद  1950 मे दिलीप कुमार कामीनी कौशल की फिल्म आरजू में भी शशिकला कमला के रोल में दिखाई दी.


शशिकला  बहोत ही प़तीभाशाली और खुबसूरत होते हुए भी उसे हिरोइन की भुमिकाए जयादा मिली नहीं.और जीस फिल्म में वह हिरोइन थी वह फिलमें फलोप हो गई..! 1953 में शममीकपुर के साथ शशिकला की एक  फिल्म जिवन जयोती आइ थी.इस फिल्म में शशिकला हिरोइन थी.शायद शममी कपुर की भी शुरूआत की फिल्म थी. फिल्म खास चली नहीं


शशिकला को हिरोइन के रोल न मिले तो उसने जो भी फिलमें मिले वह लेना शुरू कर दिया.. केरेक्टर रोल करने लगी.. घर जो चलाना था..! पैसे की बहोत जरूरत थी..! 


1962 में ताराचंद बडजातया की फिल्म आरती आइ. अशोक कुमार  मीना कुमारी और प़दिप कुमार भी थे इस फिल्म में.. एक मराठी नाटक पर आधारित थी इस फिल्म.शशिकला को फिल्म में झगडालू और कमिनी भाभी का रोल ओफर किया गया.. शशिकला के फेमीली वालों ने उस रोल को स्विकार लेने को दुराग्रह किया.. शशिकला ने रोल किया.. शशिकला के अभीनय की बहुत प़संसा हुइ..  फिल्म आरती के लिए शशिकला को सन 1962 का बेस्ट  सपोर्टिंग एकट़ेश का फिल्म फेर एवोर्ड भी मिला था..! 


फिर कया...! शशिकला को बहोत सारी फिलमें मिलने लगी.. जयादा तर वेंप के रोल मिलते थे...! फिल्म फूल और पतथर और अनुपमा के रोल के लिए  नोमीनेशन मिला पर फिल्म फेर एवोर्ड न मिलने से निराश भी हुई.....! पर  फिल्मों से पैसे मिलने से फेमीली को सेट कर शकी... 


1970 के दशक का पूर्वांध शशिकला के जीवन का सबसे खराब समय रहा... फिल्मों में काम मिलना कम हो रहा था.. शशिकला  व्यवसायीक और  पारावारिक समस्याओं से दुखी हो गई...! वह ईगतपुर चली गई.. ! 


कइ साल योगासन और ध्यानासन में गुजारे.. मधर टेरेसा के साथ रहे कर  दुखी लोगों की सेवा भी की. और मन की शांति  पाइ.. शशिकला की एक बेटी केंसर ग़सित होकर परलोक सिधार  ग इ.... लेकिन शशिकला ने अपने आप को संभाला...! 


उसके बाद... 


आठ साल के बाद  शशिकला ने फिल्म और  टीवी के छोटे परदे पर  फिर से पुरना गमन  किया... 


कूछ टीवी सीरीयलो और महाराजा.. लहुके दो रंग.. सलमा पे दिल आ गया जैसी फिलमों में भी काम किया... सावन कुमार ने कहा था.. मीना कुमारी के लिये जो रोल लिखा था वह शशिकला ने अदा किया...! 


शशिकला ने फिल्म आरती.. गुमराह.. हरियाली और रास्ता.. अनपढ़.. जंगली.. यह रास्ते हे प्यार के.. वक्त जैसी कई फिलमों में काम किया.. 


फिल्म पदमश्री लालू प्रसाद यादव में शायद शशिकला को आखिरी बार देखा था.


फिल्म वक्त 1965 की रानी साहेबा.. जिस के गले में से राजा(राजकुमार) हार चुराता हे.. और फिल्म फूल और पतथर का वह मशहूर गाना शिशे से पी या पैमाने से पी.. या मेरी आंखों के मैखाने से पी... वाले शशिकला के रोल आज भी नजर के सामने घुमते हे..! 


और...! फिल्म गुमराह की असली हिरोइन तो शशिकला ही थी..! कैसी हसीन लगती थी वोह..! Killer smile  के साथ उंगली में  चेइन हिलाते चलना.. फिल्म गुमराह में उनकी लाक्षणिक अदा थी..! फिल्म गुमराह में शशिकला का अभीनय जानदार था और उसके लिए शशिकला को सन 1964 में बेस्ट सपोर्टिंग एकट़ेस का फिल्म फेर एवोर्ड भी मिला था..! 


शशिकला ने ओम प्रकाश सयगल से शादी की हे.


शशिकला मेरी फेवरिट अदाकारा हे..  कल 4 अगस्त उनकी  birth date हे.... Happy birthday shashikala ji in advance...!!

सोमवार, 22 मार्च 2021

प्राण या अभिनय के प्राण

 अभिनय के प्राण  👍 जब #प्राण ने #बॉबी फ़िल्म के लिए मात्र 1 रुपये ली फीस 💐💐


प्राण उसूलों वाले एक्‍टर थे। उनके लिए पर्दे पर चमकने से ज्‍यादा महत्‍व उनके जिंदगी के कायदे थे। यही कारण है कि प्राण ने एक्टर और डायरेक्टर #राजकपूर की फिल्म ‘बॉबी’ के लिए महज एक रुपये की फीस ली थी। दरअसल, राजकपूर ने अपनी सारी पूंजी फिल्म ‘#मेरा_नाम #जोकर’ पर लगा दी थी 

और वो फिल्म #बॉक्स_ऑफिस पर बुरी तरह से फ्लॉप हो गई थी। #आर्थिक दिक्‍कतों से जूझ रहे राजकपूर के लिए यह प्राण की दोस्‍ती थी, जो काम के आड़े नहीं आ सकती थी ..

प्राण ने खलनायकी को नया मुकाम दिया। जब वो पर्दे पर आते थे तो दर्शकों की आंखे बस उनपर ही टिक जाती थी।

प्राण (12 फ़रवरी 1920 - 12 जुलाई 2013) 

हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रमुख चरित्र अभिनेता थे । इस भारतीय #अभिनेता ने हिन्दी सिनेमा में 1940 से 1990 के दशक तक दमदार खलनायक और नायक का अभिनय किया।

 उन्होंने 350 से अधिक फ़िल्मों में काम किया। उन्होंने खानदान (1942), और #हलाकू (1956) जैसी फ़िल्मों में मुख्य अभिनेता की भूमिका निभायी। उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय मधुमती (1958), जिस देश में गंगा बहती है (1960), उपकार (1967), शहीद (1965), आँसू बन गये फूल (1969), जॉनी मेरा नाम (1970), विक्टोरिया नम्बर २०३ (1972), बे-ईमान (1972), ज़ंजीर (1973), डॉन (1978) और दुनिया (1984) फ़िल्मों में माना जाता है।


प्राण ने अपने कैरियर के दौरान विभिन्न #पुरस्कार और #सम्मान अपने नाम किये। उन्होंने 1967, 1969 और 1972 में फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता पुरस्कार और 1997 में #फिल्मफेयर लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड जीता। उन्हें सन् 2000 में स्टारडस्ट द्वारा 'मिलेनियम के #खलनायक' द्वारा पुरस्कृत किया गया। 2001 में भारत सरकार ने उन्हें #पद्म_भूषण से सम्मानित किया और भारतीय सिनेमा में योगदान के लिये 2013 में #दादा_साहब_फाल्के सम्मान से नवाजा गया।


#AND

#PRAN....💐💐

जन्मदिन पर विशेष 🌹

केशव राणा अभिनेता

 Keshav Rana was a popular character artist of Bollywood during the classic era of 1950s – 1970s. He mostly played negative characters of stalker, pimp, henchman, greedy person etc on Bollywood screen.

He is mostly seen with smiling face but an evil and wicked heart on Bollywood screen, and has played numerous roles belonging to this category. This signature style makes him different from other character artists among his contemporaries. Sharafat, Johny Mera Naam, Yaadon Ki Baarat, Dillagi, Kab? Kyoon? Aur Kahan?, Mohabbat Zindagi Hai, Amar Prem, Be-Imaan, Dastaan, Jeet, Rampur ka Laxman, Nasihat, Suraj, Shankar Shambhu, Gambler, Naya Zamana, Blackmail, Rakhwale, Aan Milo Sajna, Seeta Aur Geeta, Katilon Ke Kaatil etc are among his famous character roles.


In 1966 film Dillagi where Keshav Rana played a full-fledged villain role

Keshav Rana hailed from Faizabad, and was a member of royal family. He joined film industry in the 1950s and played bit roles in movies like Insaan Jaag Uda. He rose to prominence in the second half of 1960s. Though he played numerous character roles, he got side-lined as a stalker or villain or a man with crookedness. But the truth that he excelled in handling negative roles carrying a positive smile on his face, and we can rarely find such artists in Bollywood, like we say “Chehre Mein Kuch and Mann Mein Kuch Or”. It can be said his acting potential was not fully exploited by filmmakers of yesterdays who followed a strict formula in filmmaking.

Keshav Rana – Some interesting and less-known facts

1. He is a member of a royal family of Faizabad.

2. His full name is Keshav Singh Faizabadi.

3. He played villain in 1966 film Dillagi, and it was one of his full-fledged roles throughout his career.

रात और दिन

Raat Aur Din- Director: Satyen Bose

Music: Shankar-Jaikishan

Lyrics: Hasrat Jaipuri

Singers: Lata Mangeshkar


रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है

रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है

जाने कहाँ है, ओ साथी, तू जो मिले जीवन उजियारा है

रात और दिन


पग पग मन मेरा ठोकर खाए, चाँद सूरज भी राह ना दिखाए

पग पग मन मेरा ठोकर खाए, चाँद सूरज भी राह ना दिखाए

ऐसा उजाला कोइ मन में समाये, जिस से पीया का दर्शन मिल जाए

रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है

जाने कहाँ है, ओ साथी, तू जो मिले जीवन उजियारा है

रात और दिन


गहरा ये भेद कोइ मुझको बताये, किसने किया हैं मुझपर अन्याय

गहरा ये भेद कोइ मुझको बताये, किसने किया हैं मुझपर अन्याय

जिस का हो दीप वो सुख नहीं पाए, ज्योत दिए की दूजे घर को सजाये

रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है

जाने कहाँ है, ओ साथी, तू जो मिले जीवन उजियारा है

रात और दिन


खुद नहीं जानू ढूंढें किसको नज़र, कौन दिशा हैं मेरे मन की डगर

खुद नहीं जानू ढूंढें किसको नज़र, कौन दिशा हैं मेरे मन की डगर

कितना अजब ये दिल का सफ़र, नदियाँ में आये जाए जैसे लेहेर

रात और दिन दिया जले, मेरे मन में फिर भी अंधियारा है

जाने कहाँ है, ओ साथी, तू जो मिले जीवन उजियारा है

रात और दिन

शनिवार, 20 मार्च 2021

दारा सिंह उर्फ़ हनुमान

 🌏 #विश्व_विजेता का #खिताब #जीतने वाले #पहले #भारतीय #फ्री_स्टाईल_कुश्ती 💪 #

पहलवान एवं #रामानंद_सागर की 📺 #रामायण के #हनुमान व #हिन्दी_सिनेमा की #हरक्यूलिस, #सुल्ताना_डाकू, #भक्ति_में_शक्ति, #जय_बजरंग_बली, #रूस्तम,  #किसान_और_भगवान, #लुटेरा, #ललकार, #कर्मा, #ऐलाने_जंग, #जब_मी_मेट जैसी कई #फिल्मों के #कलाकार, #चरित्र_अभिनेता, #लेखक, #निर्देशक, #पूर्व_राज्यसभा_सदस्य, #रूस्तम_ए_हिन्द #दारा_सिंह की #आठवी पुण्यतिथि  पर नमन 🌹

 🖋️मुकेश भार्गव🖋   #Dara_Singh

राजकपूर

 the great show man of the bollywood 

 🌷🌻🌷🌻🌷🌻

#Raaj_kapoor ❣️❣️❣️❣️

______________________


उन दिनों #टीवी ही एकमात्र #मनोरंजन का माध्यम था । 

हर रविवार को एक #सीरीज में फिल्में आती थी ।

#आरकेबैनर की फिल्में प्रति #रविवार को एक आती थी ।

मैंने कभी राज कपूर की कोई फ़िल्म नही देखी थी । न ही उन दिनों मुझे #ब्लैक एंड वाइट #फिल्मों आकर्षण नजर आता था ।

लेकिन #संयोग से जाने #अनजाने वह मुझे देखनी पड़ गई ..

टीवी मेरे सामने था तो देखनी पड़ी ।

#टीवी पर ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म चल रही थी ।

कभी कभी मैं टीवी की तरफ भी देख लेता था । लेकिन

जैसे ही मैंने देखना शुरू किया तो देखता चला गया ।

सबसे पहले मैंने जो फ़िल्म देखी वह आरके बैनर की #आह

फ़िल्म थी । बहुत पसंद आई , मै #राजकपूर का फैन बन गया । हर हफ्ते आने वाली #राजकपूर की फ़िल्म का बेताबी से इन्तजार करने लगा ।

मैंने क्रमशः #आह_आग_आवारा_श्री_420_अब_दिल्ली #दूर_नहीं_बूट_पोलिस_जिस_देश_मे_गंगा_बहती_है , #संगम_मेरा_नाम_जोकर_बॉबी_प्रेमरोग_सत्यम_शिवम #सुन्दरम_धर्मकर्म_हिना_राम_तेरीगंगा_मैली , आदि फिल्मे जिनमे खास रूप से राजकपूर का निर्देशन रहा सभी देख डाली ।


उनकी फिल्मों के #गीत , #संगीत , #कहानी , #लोकेशन्स , #एक्टिंग , #फोटोग्राफी , व #संदेश का जो #खूबसूरत तरीके से प्रदर्शन किया गया है,  वह अविस्मरणीय है , दुर्लभ है , सदा याद किया जाएगा । सभी फिल्मों की कहानियों , घटनाओं प्रसंगों गीतों को इस तरह गढ़ा गया है कि यथार्थ से जुड़ी कहानी सीधी दिल को छू जाती है 

#जन्मदिवस_14_दिसंबर_पर_ग्रेट_शोमैन_को_नमन 

   

       ____  #MUNEESH

        

  〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰〰🌷🌻🌷🌻🌷🌻

इफ्तिखार खान साहेब का जलवा

 इफ्तिखार साहेब ने लगभग 300 हिंदी फिल्मो में चरित्र भूमिकाये निभाई उनका असली नाम 'सैयदना इफ्तिखार अहमद शरीफ 'था ...

अक्सर पुलिसमैन की भूमिका में नजर आने वाले 'इफ्तिखार 'एक गायक और बेहतरीन पेन्टर भी थे कलकत्ते में उनके कई गैरफिल्मी गीत रेकॉर्ड हुए थे लेकिन अफसोस की बात यह है कि अंत तक उनके पास उनके गाया हुआ एक भी रेकॉर्ड नहीं रहा उन्होंने अपने चाहने वालों से अनुरोध करते रहे कि यदि किसी के पास भी यदि उनका गाया रेकॉर्ड हो तो उन्हें भेंट कर दें  ....अफ़सोस ऐसा हुआ नहीं ...... और वो इस आखरी हसरत को लिए हुए ही दुनिया से रुखसत हो गए  ...


महबूब की मेहंदी का 'नवाब सफ़दरजंग' ,झील के उस पार के 'दीवानजी' ,निकाह का 'जुम्मन चाचा' ,ज़ख़्मी के जज 'अशोक गांगुली' ,हमराज़ के' एडवोकेट जगमोहन कुमार ',नूरी के 'गुलाम नबी 'डॉन का 'डी.एस.पी डिसिल्वा' ,और दिवार का 'मुल्खराज़ डावर' हिंदी सिनेमा के दर्शको के जेहन में हमेशा अमर रहेगा........


🌷🌷 आज इफ्तिखार साहेब का 101 वा जन्मदिवस है 🌷🌷

...................................................................

Sayedna Iftekhar Ahmed Sharif

22 feb 1920  

....................................................................


◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆◆


दूसरों के लिए काम करने वाली लक्ष्मी छाया

 एक थी लक्ष्मी छाया!


१९७१ में राज खोसला की 'मेरा गांव मेरा देश' को सुपर हिट बनाने में जिन फैक्टर्स ने काम किया था उसमें निम्मांकित तीन गाने भी शामिल थे।


मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए..... 

हाय शरमाऊं किस-किस को बताऊं अपनी प्रेम कहानियां…और

आया, आया अटरिया पे कोई चोर.....


ये गाने नायिका आशा पारेख पर नहीं फिल्माए गए थे बल्कि एक कम जानी -पहचानी अभिनेत्री लक्ष्मी छाया पर फिल्माए गए थे। बच्चा-बच्चा जान गया था उसे।  राज खोसला ने ऐसा क्यों किया था? इस राज को आज तक कोई नहीं जान पाया। उनका मक़सद तो आशा पारेख की पतंग आसमान पर चढ़ाना था। यों कभी कभी ऐसा होता है कि बाज़ छोटे अदाकार भी अपनी अदाकारी से किरदार में जान डाल देते हैं कि फिल्म हिट होने सा सबब बन जाते हैं। और अहम अदाकार ठगे से रह जाते हैं। इससे पहले लक्ष्मी छाया नायिका की सहेली के छोटे-मोटे रोल किया करती थी। मज़े की बात ये थी ये नायिका ज्यादातर आशा पारेख ही रहती थी।


उन दिनों राज खोसला ने तय कर रखा था कि आशा पारेख को ग्लैमर की दुनिया से निकाल कर मीनाकुमारी सरीखी गंभीर अभिनेत्री बना देंगे। इसकी शुरआत वो 'दो बदन' से कर चुके थे।


'मेरा गांव…' सुपर हिट होने के बावजूद आशा पारेख को कुछ भी हासिल नहीं हुआ। लेकिन ट्रेजेडी ये रही कि 'मार दिया जाए की छोड़ दिया जाए गर्ल' से घर-घर की पहचान बनी लक्ष्मी छाया।


लक्ष्मी को 'रास्ते का पत्थर' में ज़रूर अच्छी फुटेज मिली। इसमें अमिताभ बच्चन नायक थे और नवोदिता नीता ख्याणी नायिका। नशे में हर वक़्त चूर लड़की के किरदार में लक्ष्मी ने जान डाल दी। लेकिन बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड नाकामी ने लक्ष्मी के अरमानों पर भी पानी फेर दिया। लक्ष्मी छाया की पहचान वही रही। वो नायिका की अच्छी सहेली से आगे नहीं बढ़ पायी। 

 

हर फ़िल्मी और गैर फ़िल्मी शख्स ये मानता था कि लक्ष्मी बहुत अच्छी डांसर तो है ही, उसमें ज़बरदस्त एक्टिंग पोटेंशियल भी है। डांसर-एक्ट्रेस का उन दिनों बोलबाला था। लेकिन मेजर रोल देने के लिए कोई तैयार नही था। क्योंकि तमाम बड़ी नायिकाओं (आशा पारेख , शर्मीला टैगोर , मुमताज़ इत्यादि) ने उनके ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ रखी थी और स्थापित नायिकाओं को नाराज़ करना कोई आसान काम नहीं था। 


'मेरा गावं…' से पहले एनसी सिप्पी की रहस्यमई 'गुमनाम' में लक्ष्मी पर फिल्माया एक मास्क पॉप गाना बहुत पॉपुलर हो चुका था - जान पहचान हो, जीना आसान हो.… , ये गाना २००१ में रिलीज़ हॉलीवुड फिल्म 'घोस्ट वर्ल्ड' की ओपनिंग में जस का तस रखा गया।


लक्ष्मी छाया ने तीसरी मंज़िल, प्यार का मौसम, नौनिहाल, बहारों के सपने आदि कुल ५५ फिल्मों में काम किया और लगभग हर फिल्म में उसे नोटिस भी किया गया। बस बड़ा काम नहीं मिला, सिर्फ वादे ही मिले।


लक्ष्मी छाया ने १९८६ में फ़िल्म "बिजली" के बाद फ़िल्में करना छोड़ गरीब बच्चियों के लिये एक निशुल्क डांसिंग स्कूल खोला लिया। वो साईं बाबा की ज़बरदस्त भक्त भी थीं। साईं बाबा पर टीवी सीरियल बना कर अपनी अगाध श्रद्धा को अभिव्यक्त करना चाहती थीं। मगर आर्थिक मजबूरी और फाइनेंस की समस्या के कारण उनका ये ख़्वाब अधूरा रह गया। 


०७ जनवरी १९४८ को जन्मी लक्ष्मी को कैंसर ने ०९ मई २००५ को महज़ ५६ की उम्र में गुमनामी की मौत इस दुनियाँ से चली गईं।


मीडिया ने 'मार दिया जाए गर्ल' लक्ष्मी छाया की मृत्यु का समाचार महज़ दो पंक्तियों में समेट दिया। शायद उन्हें लक्ष्मी छाया के 'होने' की जानकारी ही नहीं थी। 


-वीर विनोद छाबड़ा

परदेसियों से न अखियाँ मिलाना, परदेसियों को है.......

 परदेसियों से न अखियाँ मिलाना, परदेसियों को है इक दिन जाना। अपनी दौर की मशहूर और खूबसूरत अभिनेत्री नंदा का कोई जोड़ था।


इनका जन्म ८ जनवरी १९३९ को हुआ था। इनका पूरा नाम नंदा कर्नाटकी था। पिता विनायक दामोदर कर्नाटकी मराठी फिल्मों के अभिनेता, निर्माता व निर्देशक थे। नंदा फिल्मों में काम नहीं करना चाहती थीं। पर बॉलीवुड में इनकी एंट्री की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। जब ये ५ वर्ष की थीं तो इनके पिता अपनी एक फ़िल्म में इनसे एक लड़के का रोल कराना चाहते थे। पर फ़िल्म पूरी होने से पहले ही इनके पिता का देहांत हो गया। और १० साल के उम्र में ही परिवार की जिम्मेदारी इन पर आ गई।


बतौर बाल कलाकार मंदिर , जग्गू,शंकराचार्य , अंगारे में अभिनय किया। दिनकर पाटिल की निर्देशित मराठी फ़िल्म ‘कुलदेवता’ के लिये नंदा को पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने विशेष पुरस्कार से नवाजा था। नंदा ने कुल ८ गुजराती फ़िल्मों में भी काम किया। हिंदी में नंदा ने बतौर हीरोइन १९५७ में अपने चाचा वी शांता राम की फ़िल्म 'तूफान और दिया' में काम किया था। उसके बाद नंदा फ़िल्मों में ऐसी व्यस्त हुईं कि निजी ज़िंदगी के लिय उन्हें वक़्त ही नहीं मिला।


१९५९ में नंदा ने फ़िल्म 'छोटी बहन' में बलराज साहनी की अंधी बहन का किरदार निभाया था। उनका अभिनय दर्शकों को बहुत पसंद आया। राजेंद्र कुमार के साथ उनकी अगली फ़िल्म 'धूल का फूल' सुपरहिट रही। लेकिन, बहन के रोल उनका पीछा नहीं छोड़ रहे थे। नंदा एक बार फिर 1960 की फ़िल्म 'काला बाजार' में देव आनंद की बहन बनीं। नंदा ने सबसे ज्यादा ९ फ़िल्में शशिकपूर के साथ कीं। उन्होंने उनके साथ १९६१ में ‘चार दीवारी’ और १९६२ में ‘मेंहदी लगी मेरे हाथ’ जैसी फ़िल्में कीं। ‘जब जब फूल खिले’ तो एक ज़बरदस्त हिट  फ़िल्म साबित हुई। 


उन्होंने देव आनंद के साथ 'काला बाज़ार', 'हम दोनों', 'तीन देवियां', शशि कपूर के साथ 'नींद हमारी ख्‍वाब तुम्हारे', राजेश खन्ना के साथ ‘इत्तेफाक’ (1९६९) में उन्होंने निगेटिव किरदार तक निभाया, लेकिन दर्शक उनका ये रूप नहीं स्वीकार सके। बहरहाल, साल १९७२-७३ के बाद नंदा की एक के बाद एक कई फ़िल्में फ्लॉप होती रहीं और इस तरह से नंदा ने खुद को इंडस्ट्री से अलग कर लिया! नंदा की आखिरी फिल्मों में 'प्रेम रोग' और 'मजदूर' थी।


वर्ष १९५७ में उन्हें फ़िल्म भाभी के लिए फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड के लिए नॉमिनेट किया गया। १९६० में सहायक अभिनेत्री का फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड फ़िल्म अंचल के लिये मिला।


नंदा मनमोहन देसाई से बेहद प्यार करतीं थी। पर दोनों अपने प्यार का इज़हार न कर पाए। जब मनमोहन देसाई की पत्नी का निधन हो गया उसके बाद दोनों ने सगाई कर ली। उस समय मनमोहन की उम्र ५५ की और नंदा जी ५३ वर्ष की थीं। पर दो वर्ष बाद ही मनमोहन जी का निधन हो गया। मनमोहन देसाई के निधन के बाद से नंदा काफी अकेली हो गई थीं। वो किसी से ज्यादा बातें भी नहीं करती थीं। उनकी खास दोस्तों में माला सिन्हा और वहीदा रहमान थीं, जिनके साथ वो थोड़ा वक्त गुज़ार लिया करतीं। २५ मार्च २०१४ को ७५ वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।लेकिन, सिने प्रेमी उन्हें आज भी याद करते हैं।

बहज़ाद लखनवी और आग का वो गीत

 बहज़ाद लखनवी जी का लिखा फ़िल्म "आग" का गीत !


ज़िंदा हूँ इस तरह, कि ग़म-ए-ज़िंदगी नहीं

जलता हुआ दिया हूँ, मगर रोशनी नहीं


वो मुद्दते हुईं हैं किसी से जुदा हुए

लेकिन ये दिल की आग, अभी तक बुझी नहीं


आने को आ चुका था किनारा भी सामने

ख़ुद उसके पास, मेरी ही नैया गई नहीं


होठों के पास आए हँसी , क्या मज़ाल है

दिल का मुआमला है, कोई दिल्लगी नहीं


ये चाँद, ये हवा, ये फ़िज़ा, सब है मंद-मंद

जो तू नहीं तो इन में कोई दिलकशी नहीं

शक्ति सामंत की कहानी

 शक्ति सामंत का जन्म बंगाल के बर्धमान जिले में १३ जनवरी १९२६ को हुआ था। जब शक्ति दो साल के थे, उनके पिता एक दुर्घटना में नहीं रहे जिस कारण उन्हें अपने चाचा के पास यूपी के बदायूं आना पड़ा। अपने चाचा के कहने पर वो उनके काम में हाथ बंटाने लगे थे। इस बीच शक्ति को ऐक्टिंग का चस्का लग चुका था, जिसके चलते वो काम के साथ साथ थिएटर और ड्रामा भी करने लगे।


ये उनके चाचा को पसंद नहीं था। इसलिए चाचा का घर छोड़कर अपना शौक पूरा करने मुंबई आ गए। मुंबई में बिना किसी सहारे के जगह न मिल पाने की वजह से मुंबई से २०० किलोमीटर पहले दापोली में एक अंग्रेजी हाई स्कूल में नौकरी ली। यहां से मुंबई स्टीमर से बस दो-तीन घंटे की दूरी पर थी। तो वो आसानी से मुंबई आ-जा सकते थे।


फिल्मों में काम करने की चाह में शक्ति हर शुक्रवार को मुंबई चले जाते थे और अगले दो दिन वहीं काम की तलाश करते थे। पर मुंबई में काम मिलना इतना आसान नहीं था। उस टाइम बॉम्बे टॉकीज एक बड़ा स्टूडियो था, शक्ति भी वहीं जाकर अपनी उम्मीद तलाशते थे।


उस समय के जाने-माने एक्टर अशोक कुमार उर्फ दादामुनि बॉम्बे टॉकीज के साथ जुड़े हुए थे। शक्ति ने दादामुनि के पास जाकर काम मांगा, दादामुनि ने एक असिस्टेंट डायरेक्टर बनाकर शक्ति को काम पर तो रख लिया लेकिन बिना पैसे के, उन्हें सिर्फ खाना-पीना मिलता था, पैसे नहीं मिलते थे। एक ब्रेक पाने की कोशिश में लगे शक्ति के लिए यह बड़ा मौका था, वो बिना पैसे के भी काम करने लगे। बंगाली और हिंदी दोनों भाषा जानने के कारण वो डायरेक्टर फणी मजूमदार के लिए बांग्ला से हिंदी में ट्रांसलेशन का काम भी करते थे, इस काम के उन्हें पैसे भी मिलने लगे।


एक दिन शक्ति ने दादामुनि को अपने ऐक्टर बनने के सपने के बारे में बताया लेकिन दादामुनि ने उनके टैलेंट को देखते हुए डायरेक्शन की फील्ड में ही काम करते रहने की सलाह दी। अपनी ऐक्टिंग की हसरत को पूरी करने के लिए वो मूवीज में छोटे-मोटे रोल कर लेते थे. अमूमन सारी पिक्चरों में उन्हें एक पुलिसवाले का किरदार मिलता था जिसका काम बस ‘फॉलो हिम’ बोलना होता था। लेकिन इस बीच काम करते-करते उनकी बहुत-सी बड़ी हस्तियों से जान-पहचान हो गई थी। इनमें गुरुदत्त और ब्रजेन्द्र गौड़ भी थे, गौड़ को उन दिनों एक फिल्म डायरेक्ट करने का ऑफर हुआ जिसका नाम था ‘कस्तूरी’. पर गौड़ साहब उस टाइम एक दूसरी पिक्चर पर काम कर रहे थे. जिसके चलते उन्हें काम करने में दिक्कत महसूस हुई. उन्होंने इस काम में शक्ति की मदद मांगी, शक्ति तो इस मौके के लिए तैयार थे। उन्होंने २५० रुपये की तनख्वाह में काम करना तय किया। ये शक्ति की फिल्मों से पहली बड़ी कमाई थी।


इस शुरुआत के बाद म्यूजीशियन और प्रॉड्यूसर एस एच बिहारी और लेखक दरोगाजी एक फिल्म बनाने जा रहे थे जिसका नाम था ‘इंस्पेक्टर’ (१९५६)। वो इस कहानी पर नाडियाड़वाला के साथ मिलकर काम कर रहे थे, उन्हें लगा कि इस स्टोरी को हिट बनाने के लिए किसी बड़े डायरेक्टर को लेना पड़ेगा पर इससे बजट बिगड़ जाएगा, ऐसे में उन्होंने पैसे बचाने के लिए किसी बड़े डायरेक्टर की जगह एक नये डायरेक्टर को काम दिया जिसका नाम था शक्ति सामंत मूवी में दादामुनि और गीता बाली ने काम किया और ‘इंस्पेक्टर’ सुपरहिट हुई , लेकिन मजे की बात तो यह थी कि ‘इंस्पेक्टर’ का काम पहले शुरू करने के बावजूद उनकी एक दूसरी मूवी ‘बहू’ (१९५४) पहले रिलीज हो गई थी।


इसके बाद उन्होंने एक फ़िल्म बनाने की सोची नाम रखा "हावड़ा ब्रिज" (१९५७) तय किया कि इस पिक्टर में अशोक कुमार और मधुबाला को लेंगे। पर उस वक्त इतने पैसे नहीं थे कि दोनों सुपरस्टार्स को ले सकें। उन्होंने अशोक कुमार से इस बारे में बात की। स्टोरी को देखकर अशोक कुमार खुद तो तैयार हो ही गये साथ ही मधुबाला से बात करने के लिये राजी हो गए और उन्हें सिर्फ एक रुपये टोकन मनी पर काम करने के लिए राजी कर लिया। साथ ही संगीतकार ओपी नैयर को १००० रुपये देकर साइन किया। ये फिल्म पर्दे पर सुपरहिट साबित हुई। और शक्ति सामंत की पहचान एक प्रॉड्यूसर के रूप में भी बन गई।


शक्ति दा की प्रमुख फ़िल्में रहीं हिल स्टेशन , डिटेक्टिव , जाली नोट , सिंगापुर , नॉटी बॉय, चाइना टाउन, कश्मीर की काली, सावन की घटा, ऐन इवनिंग इन पेरिस, आराधना, कटी पतंग, पागल कहीं का, जाने-अनजाने,अमर प्रेम, अनुराग, चरित्रहीन, अजनबी, अमानुष, महबूबा, अनुरोध, आनंद आश्रम, इत्यादि


शक्ति दा ने कुछ फिल्में प्रॉड्यूस भी की, और अपना शक्ति प्रॉडक्शन बनाया। शक्ति दा की एक बड़ी बात हिट फिल्मों के साथ हिट गानों की भी थी। उनकी फिल्मों के कई गाने एवरग्रीन गाने बन गए. इन गानों की लिस्ट बहुत लंबी है पर इनमें से कुछ खास नगमे ‘रूप तेरा मस्ताना’, ‘तारीफ करूं क्या उसकी’, ‘मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू’, ‘कोरा कागज था ये मन मेरा’, ‘बार-बार देखो’, ‘चंदा है तू’, ‘एक अजनबी हसीना से’ और ‘ये शाम मस्तानी’ और ' कश्मीर की काली के गाने प्रमुख हैं।


आराधना के अलावा उन्हें अनुराग और अमानुष फिल्मों के लिए बेस्ट डायरेक्टर का फिल्मफेयर मिला। डायरेक्टर के रूप में उनकी आखिरी फिल्म गीतांजलि १९९३ में आई थी और प्रॉड्यूसर के रूप में डॉन मुथुस्वामी २००८ में आई थी।


शक्ति दा लाइमलाइट से दूर रहने वाले लोगों में से थे। उनकी पत्नी और दो बेटे हमेशा चकाचौंध से दूर रहे। उनके एक पोते आदित्य सामंत ने ‘ये जो मोहब्बत है’ नाम की पिक्चर में काम किया। मजे की बात ये है कि इस पिक्चर का टाइटल भी शक्ति दा की फिल्म ‘कटी पतंग’ के एक गाने से लिया था।


फिल्मफेयर उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड देने वाला था लेकिन उससे कुछ दिन पहले उन्हें लकवा पड़ गया। इसके बाद वो ठीक नहीं हो पाए. और दिल की धड़कन रुकने से ८३ साल की उम्र में २००९ को शक्ति दा का निधन हो गया। अपने आखिरी समय में शक्ति दा गुमनामी में जिए। कोई भी बड़ी हस्ती उनके अंतिम संस्कार में नहीं आई और शक्ति दा बड़ी बेरुखी से हमसे रुखसत हो गए।

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

शशिकला da कोई हुस्नदार नहीं

 Shashikala __  the quintessential vamp of Bollywood


Shashikala, the number one whining, taunting, tormenting vamp of the Hindi cinema has been a household name which was synonymous earlier with a flighty woman who pouted and plotted the downfall of others, and later with a cruel sister-in-law who tortured younger women.


She has played such hateful roles literally in hundreds of films. Yet, behind those bouffant hairstyles and pouting lips, behind those cruel verbal jibes hides a woman whose life is like an riveting novel which you cannot put down once you have started to read it.


Born in Solapur in 1932, she wandered from studio to studio looking for work. She earned in bits and pieces till she met Noor Jehan, the reigning screen queen/singer of that era. Her husband Shaukat Hussain Rizvi was making Zeenat (1945) then and she was included in a qawwali scene and small roles in films like Jugnu (1947), Arzoo (1950), Teen Batti Char Raasta (1953) and other films.


It was in Aarti (1962) with Meena Kumari, Ashok Kumar and Pradeep Kumar that she clicked as a vamp for the first time and offers poured in for such roles. Her next power-packed performance as a vamp was in B R Chopra's Gumraah (1963).


Shashikala's other notable films include Shart (1954), Patrani (1956), Nau Do Gyarah (1957), Sujata (1959), Kanoon (1960), Singapore (1960), Junglee (1961), Anpadh (1962), Yeh Rastey Hain Pyar Ke (1963), Hamrahi (1963),Aayi Milan ki Bela (1964), Aap Ki Parchhaiyan (1964), Waqt (1965), Anupama (1966), Neend Hamari Khwab Tumhare (1966), Phool Aur Patthar (1967), Chhoti Bahu (1971), Chhote Sarkar (1974), Khubsoorat (1980) and Souten (1983). She played Shah Rukh Khan's mother in Baadshah (1999).


A very beautiful title song 'Yeh Rastey Hain Pyar Ke Chalna Sambhal Sambhal Ke' was filmed on Shashikala in 1963. She was really a superb actress.


Shashikala has received eight nominations for the Filmfare Best Supporting Actress Award and won the award twice, for Aarti (1962) and Gumraah (1963).


She is the disciple of Mother Teresa, and worked for nine years in her various homes in Kolkata looking after leprosy patients and orphans.

सशाधर मुखर्जी का जलवा

 #साशधरमुख़र्जी

  दिन देके देखो’, ‘लव इन शिमला’, ‘एक मुसाफिर एक हसीना’ और ‘लीडर’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में बनाने वाले बॉलीवुड के मशहूर निर्माता सशाधर मुखर्जी का जन्म 29 सितंबर 1909 को झांसी में हुआ था। सशाधर ने अपने करियर की शुरुआत भारतीय सिनेमा के इतिहास के पुराने स्टुडियो बॉम्बे टॉकीज से की। उन्होंने अपने करियर में न सिर्फ बेहतरीन फिल्में बनाई बल्कि उन्होंने कई लोगों को भी फिल्म इंडस्ट्री से जोड़ा। अशोक कुमार को बॉम्बे टॉकीज सशाधर मुखर्जी ले कर आये थे।


सशाधर मुखर्जी ने सती रानी देवी से शादी की। उनके 6 बच्चे थे। सती रानी देवी अशोक कुमार, अनूप कुमार, किशोर कुमार की इकलौती बहन थीं। सशाधर मुखर्जी अपने बेटे जॉय मुखर्जी को हिंदी सिनेमा में बतौर अभिनेता लॉन्च करना चाहते थे। इसलिए सशाधर एक नये चेहरे की तलाश कर रहे थे। इसी दौरान साधना ने सिंधी फिल्म ‘अबाना’ की थी और उनकी फोटो एक मैगजीन में छपी थी। सशाधर मुखर्जी ने मैगजीन की वो फोटो देखी और साधना को अपनी फिल्म ‘लव इन शिमला’ में कास्ट कर लिया गया। इस फिल्म से साधना को खूब शोहरत मिली और वो रातों-रात  स्टार बन गई। इस फिल्म के बाद साधना के प्रशंसक उनके हेयरस्टाइल से लेकर उनके कपड़ों की भी नकल करने लगे थे।


1943 में अभिनेता अशोक कुमार ने निर्माता सशाधर मुखर्जी के साथ मिलकर एक प्रोडक्शन हाउस खोला। नाम रखा फिल्मिस्तान स्टूडियो। यह स्टूडियो 4.5 एकड़ जमीन पर फैला है। 1940 और 50 के दशक में यहां कई बड़ी फिल्मों की शूटिंग हुई। 14 सेट वाले इस स्टूडियो में करीब 60 हिट फिल्मों की शूटिंग हो चुकी है। इनमें ‘नागिन’, ‘अनारकली’, ‘शहीद’ और ‘शबनम’ शामिल हैं। सशाधर के बाद उनके बच्चे जॉय, देव, शोमू ने फिल्मिस्तान स्टूडियो का काम संभाला।


सशाधर मुखर्जी के बेटे शोमू ने अब्बीनेत्री तनुजा से शादी की। उनकी दो बेटियां हैं काजोल और तनिशा। काजोल एक अभिनेत्री हैं जिनकी शादी अजय देवगन से हुई। जो कि एक सुपरस्टार हैं। वहीं सशाधर मुखर्जी के पोते अयान मुखर्जी हिंदी फिल्मों के मशहूर निर्देशक हैं। इस तरह मुखर्जी के पूरे परिवार ने बॉलीवुड में अपना योगदान दिया है।


ब्लॉकबस्टर फिल्में बनाने वाले निर्माता सशाधर को साल 1967 में पद्मश्री से  सम्मानित किया गया। साल 1990 में उनका निधन हो गया था।

#copied

गुरुवार, 18 मार्च 2021

सतसंग शाम DB-RS 18/03

 **राधास्वामी!! 18-03-2021- आज शाम सतसँग में पढे गये पाठ:-                                                        

 (1) धन धन धन मेरे सतगुरु प्यारे। करूँ आरती नैन निहारे।।-(क्या महिमा मैं उनकी गाऊँ। उमँग उमँग चरनन लिपटाऊँ।।) (प्रेमबानी-1-शब्द-8-पृ.सं.143,144, विशाखापत्तनम दयालनगर ब्राँच-166)                                                                      


(2) प्रेम की महिमा क्या गाई। हिये मेन सीतलता छाई।। सुन्न में चढ गई सुरत अकेल। करत वहाँ हंसन सँग अब केल।।-(परम पुर्ष राधास्वामी हुए सहाय। लिया मोहि अपनी गोद बिठाय।।) (प्रेमबानी-4-शब्द-7-पृ.सं.136)                                                                      

 (3) यथार्थ प्रकाश-भाग दूसरा कल से आगे।।    

   सतसँग के बाद:- 

                                                

(1) राधास्वामी मूल नाम।।                                 (2) अतोला तेरी कर न सके कोई तोल।।                                                           

(3) बढत सतसँग अब दिन दिन। अहा हा हा ओहो हो हो।।                             

 🙏🏻राधास्वामी🙏🏻**

**राधास्वामी!! 18-03- 2021

 आज शाम सत्संग में पढ़ा गया बचन-

कल से आगे -

[सतलोक और अन्य चेतन- मंडल ]-

(191) का शेष भाग:-              

           

उत्तर-निःसन्देह हमारी पुस्तकों की बातें तो बच्चों की सी बातें हैं। और आपके सब आक्षेप अग्रगण्य विद्वानों की सी बातें हैं। और , जैसा आपके भाई कहते हैं कारण यह है कि राधास्वामी मत में किसी ने वेद शास्त्र पढ़े नहीं हैं और आपका मस्तिष्क शास्त्रों की शिक्षा से परिपूर्ण है पर आप यह तो बतलाइए कि आप जो ब्रह्मा मलिक की सत्ता में विश्वास रखते हैं और उसे सच्चिदानंदस्वरूप अनंत और सर्व व्यापक मानते हैं तो आपको उसकी सत्ता तथा इन गुणों का ज्ञान कैसे हुआ आप कहेंगे कि वेदों और दूसरे धर्म ग्रंथों में ऐसा लिखा है पर आपने स्वयं तो ईश्वर को नहीं देखा और न ही उसके इन गुणों का अनुभव प्राप्त किया है या यूँ कहिए कि आपके पास ईश्वर और ईश्वर के पूरवोक्त बातें मानने के लिए केवल 2 युग में पहली वेद बचन और दूसरी ऋषि बचन किंतु जो किया जाता है कि वह स्वयं ईश्वर के बनाए हुए हैं इसलिए ईश्वर की सत्ता और उसके गुणों के प्रमाण है वेदों की साक्षी तो मानने योग्य नहीं चाहती और आप के विश्वास के समर्थन के लिए केवल ब्रह्म ऋषि ऋषि यों की साक्षी रह जाती है जो आपके और आपके सहमत लोगों के मत में से पर्याप्त है किंतु यदि आप के विश्वास के प्रमाण के लिए केवल 36 महापुरुषों की साक्षी पर्याप्त है तो बेचारे आदमियों के लिए भी उनके आपसे पुरुषों की साक्षी मानी जानी चाहिए और जिन चेतन मंडलों का वर्णन किया है उनमें विश्वास करने की उन्हें अनुमति होनी चाहिए।      

🙏🏻 राधास्वामी🙏🏻                      

यथार्थ प्रकाश-भाग दूसरा

 -परम गुरु हुजूर साहबजी महाराज!


आदमकद लाजवाब भारत भूषण अग्रवाल

 भारत भूषण...! 


 एक  एसा कलाकार ....सुखदुःख ..जिंदगी की छाओं घुप..  खुशी कम...गम जयादा   जिसके जीवन का मानों की हिस्सा ही बन गये थे!  एक बार भारत भुषण ने अपनी जिंदगी से दुखी हो कर कहा था.... मौत तो सबको आती हे जीना सबको नहीं आता.. मुझे तो बिलकुल नही आया...!! 


भारत भुषण अग्रवाल का जन्म मेरठ शहर में तारीख 14 जुन 1920 के रोज हुआ था। उनके पिताजी वकिल थे तो अपना बेटा भी वकिल बने एसा चाहते थे लेकिन भारत भुषण को तो फिल्म कलाकार बनना था तो कलकत्ता चले गये। भारत भुषण ने सन 1941 मे फिल्म चित्र लेखा में एक छोटी सी भूमिकाg निभा कर अपनी फिल्मी जिंदगी शुरू की।  इस फिल्म में मेहताब  नांद़ेकर   ज्ञानी और रमोला की प़मुख भूमिकाएं थी।इस फिल्म से भारत भुषण को कामयाबी ऐसी मिली कि  फिल्म भक्त कबीर में महेताब और मजहरखां के साथ प़मुख भूमिका निभायी। भारत भुषण की शक्ल भी हूबहू भक्त कबीर जैसी ही थी...!  


भारत भुषण फिर बंबई आ गये 1943 में फिल्म भाइचारा में काम किया।. केदार शर्मा की फिल्म सोहाग रात में काम मिला । फिल्म में गीता बाली और बेगम पारा भी थे। शांताक़ुज में एक कमरा लेकर रहने लगे। 


फिर क्या. !   फिलमें मिलने लगी.... सफलता का दौर शुरू हुआ। 1948 में सोहाग रात  1949 में नलीनी जयवंत के साथ चकोरी । फिल्म उधधार जीसमे देव आनंद मूननवर सुलतान और निरूपा रोय भी थे। 1951 में गीता बाली के साथ एक थी लड़की नरगिस के साथ सागर.. .  नलीनी जयवंत और शेखर के साथ आंखे.1952 में गीता बाली और प़िथवीराज के साथ आनंद मठ प़दिपकुमार भी थे इस फिल्म में उनकी पहेली फिल्म थी। बैजु बावरा ने तो धुम मचा दी..! भारत भुषण सुपर स्टार बन गये..! 1954 में फिल्म चैतन्य महाप्रभु के लिए फिल्म फेयर एवोर्ड मिला! 


भारत भुषण की फिल्म केरीयर बुलंदी पर थी।


भारत भुषण ने उस समय सबसे बड़ी और किंमती कार शैवरलेट खरीदी। कालांतर में टैगोर रोड पर अपना आलीशान बंगला खडा़ किया जिसके निर्माण का काम एक अंग्रेज को दिया था। बंगला खुब कलात्मक ढंग से सजाया गया! 


भारत भुषण की हिट फिल्में आती रही। जेसे 1953 में वैजयन्ती माला के साथ लड़की.. 1954 में बीना राय के साथ मीनार जिसमें प़ाण भी थे। 1954 में ही गीता बाली के साथ  कवि  इस फिल्म का तलत महेमुद का गाया हुआ  में पि के नहीं आया.. बहुत ही मधुर था। सुरैया के साथ मिरज़ा साहेब नूतन के साथ सबाब आइ।और हिट फिलमें जैसे कि बसंत बहार  गेटवे ओफ इंडिया  चंपावती फागुन  रानी रुप मती सोहीनी महिवाल  सम़ाट चंद़ गुप्त  सावन घुंघट बरसात की रात   परदेशी जैसी फिलमो में काम करके भारत भुषण ने  खुब नाम और दाम कमाये। 


उस दौर की सभी नामी अभिनेत्रीओ के साथ भारत भुषण ने काम किया। 


भारत भुषण ने फिल्म बसंत बहार  और बरसात की रात का निर्माण भी किया दोनों फिलमें हिट हो गई और  भारत भुषण के पास खुब पैसा आ गया और वह मालामाल हो गये! 


मधुबाला से दोस्ती का चर्चा भी आम हूवाँ! 


अब समय ने करवट ली! 


कहते हे अपने भाई के कहने पर ओर अपने भाई के बेटे को हिरो बनाने के चक्कर में भारत भुषण ने  1964 में एक फिल्म का निर्माण किया।यही भारत भुषण के जीवन की सबसे बड़ी भुल साबित हुई! फिल्म का नाम था दूज का चांद.. फिल्म की हिरोइन थी बी. सरोजा देवी... फिल्म में अशोक कुमार भी थे। 


इस फिल्म के निर्माण में भारत भुषण ने अपनी सारी कमाई लगा दी! मगर अफसोस! फिल्म बुरी तरह से फलोप हो ग इ..!!  भारत भुषण की जीवन भर की कमाई  इस फिल्म की वजह से चली गई;! भारत भुषण पैसे से बरबाद हो गये. ! फिल्म बनाने में लगाई गई  रकम उधार ली गई थी उसे चुकाने में  भारत भुषण की सभी  मोटर कार   बंगले बीक गये! भारत भुषण का आलिशान बंगला आशिर्वाद राजेन्द्र कुमार ने खरीद लिया.. भारत भुषण को पढाई का बहोत शौक था उनके पास क इ किंमती किताबें थी वह भी  कबाडी को बेचनी पडी! 


भारत भुषण का सब कुछ बिक गया। इज्जत दौलत शौहरत सब कुछ  चला गया  । भारत भुषण मशहूरी से गुमनामी में चले गये! अपना बंगला छोड़ कर किराये के  छोटे मकान में रहने के दिन आये! 


बड़ी फिल्मों में काम मिलना बंद हो गया। तो जो भी  रोल मीले करने लगे! बड़ी बड़ी कार में बैठ कर शूटिंग में जाने वाले भारत भुषण बस में बैठ कर काम  पर जाने लगे! 


फिल्म जहाँ आरा और तकदीर के बाद जितेंद्र की फिल्म विश्वास और शशि कपूर की फिल्म पयार का मौसम में पिता के रोल करने के बाद तो बीलकुल extra  जैसे रोल मिले..! कहते हे पेट और पैसे के लिए   वह भी किये! 


इस तरह एक सुपर स्टार extra कलाकार बन गये! 


अपने जमाने में बडी ही सातविक विचारधारा के थे भारत भुषण! विसुद्ध शाकाहारी... अपने दोस्तों को मूंग की दाल खीचडी पालक आलू का भोजन करा के खुश होते थे। 


12 नवंबर 1954 के रोज उनकी पहेली  पत्नी सरला की  मौत के बाद  लंबे समय तक शादी नहीं की। पुस्तकें  पढते रहते। बाद में  रत्ना से दुसरी शादी की थी। रत्ना भी फिलमो में केरेक्टर ऐकटर थी। 


भारत भुषण की बेटी  अपराजिता  ने रामानंद सागर की  सीरीयल  रामायण मै रावण की पत्नी मंदोदरी का रोल किया था। अपराजीता कै क इ फिल्मों में छोटे मोटे रोल में देखा हे। दुसरी बेटी का नाम अनुराधा हे। 


भारत भुषण ने दिलीप कुमार  राज कपुर देवा आनंद जैसे  बडे  कलाकारों दौर में भी अपनी एक अलग जगह बनाइ थी। लेकिन भारत भुषण ने खास तौर पर साधु गायक या कवि की भूमिकाएं निभाई हे। लंबे बाल भोलाभाला खुबसूरत चहेरा वाकई  साधु गायक या कवि के रोल के लिए ही बना था! 


सुपर स्टार से  बीलकुल  extra कलाकार बनने वाले और मशहूरी से गुमनामी में चले जाने वाले ओर अपनी जिंदगी में सुख समृद्धि से गरीबी तक का अनुभव करने वाले भारत भुषण का तारीख 27.1.1992 के रोज बंबई में देहांत हो गया! 


1959 में मधुबाला के साथ भारत भुषण की एक फिल्म कल हमारा हे आइ थी। उस फिल्म में महंमद रफी की आवाज में एक गीत था..... ये सच हे ए जहाँ वालो  हमें जीना नहीं आया.. मरे सो बार जी ते जी ...मगर मरना नहीं आया...!! 


एसा नहीं  लगता.!? गीत कार ने भारत भुषण की मनो वेदना अपने गीत मे  लिख दी हे..!!  ?

बुधवार, 17 मार्च 2021

सुपर निर्माता निदेशक,नासीर हुसैन

 13 मार्च को पुराने ज़माने के सुपर हिट निर्माता निदेशक,कथा लेखक,संवाद लेखक मरहूम नासीर हुसैन साहब की पुण्यतिथि पर विनम्र अभिवादन करते हुए उनकी सुपरहिट फिल्मों से रफ़ी साहब के गाये सर्वश्रेष्ठ नग़मों की सूची पेश है*   ....

*रफ़ी-नासिर हुसैन के सर्वश्रेष्ठ नग़मे*

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*


*फ़िल्म-तीसरी मंज़िल*

१)-

ओ हसीना ज़ुल्फो वाली,जाने-जहाँ, ढूँढती है क़ाफ़िर आँखे, किसके निशां- *साथ आशा*

२)-

दीवाना मुझ सा नहीं,इस अम्बर के नीचे- *एकल*

३)-

तुमने मुझे देखा,होकर बेवफ़ा, रुक गयी ये जमीं,थम गया आसमाँ, जानेमन जाने जाँ- *एकल*

४)-

देखिए,साहिबो,वो कोई,और थी,और ये वो है जिनपे मैं मरता हूँ- *साथ आशा*

५)-

आजा आजा,मैं हूँ प्यार तेरा,अल्ला अल्ला,इंतज़ार तेरा- *साथ आशा*

-----//-----

*फ़िल्म-कारवाँ*

६)-

कितना प्यारा वादा है,इन मतवाली आँखो का- *साथ लता*

७)-

चढ़ती जवानी मेरी चाल मस्तानी,तूने कदर ना जानी रामा- *साथ लता*

८)-

अरे हो,गोरियां कहाँ तेरा देस रे,गोरिया कहाँ तेरा देस रे- *साथ आशा*

-----//-----

*फ़िल्म-प्यार का मौसम*

९)-

तुम बिन जाऊँ कहाँ,के दुनिया मे आके,चाहा तुझे- *साथ किशोर व एकल भी*

१०)-

चे खुश नज़ारें,चे खुश नज़ारें,के दिल पुकारे है प्यार की मंजिल- *एकल*

११)-

निसुल्ताना रे,प्यार का मौसम आया,अरे हाये रे हरी हरी छाया- *साथ लता*

-----//-----

*"फ़िल्म-दिल देके देखो*

१२)-

दिल देके देखो दिल देके देखो,दिल लेने वालों,दिल देना सीखो जी- *साथ आशा*

१३)-

ओ मेघा रे छाए घनन घनन,पवन चले सनन सनन- *एकल*

१४)-

यार चुलबुला है,हसीन दिलरुबा है मेरे दिल मे प्यार का थोड़ा थोड़ा- *साथ आशा*

१५)-

प्यार की क़सम है,न देखो ऐसे प्यार से- *साथ आशा*

१६)-

हम और तुम और ये समाँ- *एकल*

१७)-

बड़े है दिल के काले,हाँ वही,भोली सी सूरत वाले- *साथ आशा*

१८)-

राही मिल गए राहों में,बातें हुईं निग़ाहों में,तुम समझे हम समझे,प्यार हो गया- *एकल*

१९)-

बोलो बोलो,कुछ तो बोलो,प्यार हो तो कह दो हाँ, प्यार नहीं तो कह दो ना- *एकल*

२०)-

रॉक रॉक बेबी रॉक,दो एकम दो,दो दूनी चार- *साथ आशा*

२१)-

कौन ये आया महफ़िल में,बिजली सी चमकी इस दिल मे- *साथ आशा*

-----//-----

*फ़िल्म-हम किसी से कम नहीं*

२२)-

क्या हुआ वादा तेरा,वो क़सम,वो इरादा- *साथ सुषमा श्रेष्ठ*

२३)-

है अगर दुश्मन,दुश्मन,ज़माना ग़म नहीं  ग़म नहीं,हम किसी से कम नहीं,कम नहीं- *साथ आशा*

२४)-

चाँद मेरा दिल,चाँदनी हो तुम,चाँद से भी दूर,न जाओ मेरी जान- *एकल*

२५)-

क्या हुआ तेरा वादा,वो क़सम,वो इरादा- *एकल*

----- *संतोष कुमार मस्के-संकलन से* -----

---------------------///---------------------

भाग-2

*रफ़ी-नासीर हुसैन के सर्वश्रेष्ठ नग़मे*

*संकलनकर्ता-संतोष कुमार मस्के*

*फ़िल्म-जब प्यार किसी से होता है*

२६)-

जियाँ हो जियाँ हो जियाँ कुछ बोल दो,अरे हो,दिल का पर्दा खोल दो- *साथ लता व एकल भी*

२७)-

सौ साल पहले,मुझे तुमसे प्यार था,आज भी है और कल भी रहेगा- *साथ लता*

२८)-

तेरी ज़ुल्फो से जुदाई तो नहीं माँगी थी,क़ैद माँगी थी,रिहाई तो नहीं माँगी थी- *एकल*

२९)-

बिन देखे और बिन पहचाने,तुम पर हम कुर्बान,मोहब्बत इसको कहते है,मोहब्बत इसको कहते है- *एकल*

३०)-

ये आँखे उफ़ उई,ये अदाएं उफ उई मा,प्यार क्यों न होगा- *एकल*

-----//-----

*फ़िल्म-तुमसा नहीं देखा*

३१)-

यूँ तो हमने लाख हसीं देखे है,तुमसा नहीं देखा- *एकल*

३२)-

छुपने वाले सामने आ,छुप छुप के मेरा  जी ना जला,सूरज की किरण,बादल की छुअन- *एकल*

३३)-

जवानियाँ ये मस्त मस्त बिन पिए, जलाती चल रही है राह में दीये- *एकल*

३४)-

आये है दूर से,मिलने हुजूर से,ऐसा भी गुस्सा क्या है,दिन है के रात है- *साथ आशा*

३५)-

देखो क़सम से देखो क़सम से,कहते है तुमसे हाँ,हम भी जलेंगे हाथ मलेंगे,सोच के तुमको हाँ- *साथ आशा*

३६)-

सर पे टोपी लाल हाथ मे,रेशम का रुमाल,ओ तेरा क्या कहना- *साथ आशा*

-----//-----

*फ़िल्म-फिर वही दिल लाया हूँ*

३७)-

बंदा परवर,थाम लो ज़िगर,बनके प्यार मैं आया हूँ,आपके लिए हुजूर फिर वही दिल लाया हूँ- *एकल*

३८)-

हमदम मेरे,खेल ना जाना,चाहत के इक़रार का- *साथ आशा*

३९)-

लाखों है निग़ाह में,जिंदगी की राह में,सनम हसीन जवाँ- *एकल*

४०)-

अजी,क़िबला मोहतरमा,कभी शोला, कभी नग़मा- *एकल*

४१)-

आँचल में सजा लेना कलियाँ,ज़ुल्फो में सितारें भर लेना,जब याद मेरी सताने लगे,तब याद हमे भी कर लेना- *एकल*

४२)-

ज़ुल्फ़ की छाँव में,चेहरे का उजाला लेकर,तेरी वीरान सी रातों को,सजाया हमने- *साथ आशा*

४३)-

दूर बहुत दूर,मत जाइए,लेके क़रार हमारा,ऐसा न हो कि राह में लूट जाए, प्यार हमारा- *साथ आशा*

-----//-----

*फ़िल्म-ज़माने को दिखाना है*

४४)-

पूछो ना यार क्या हुआ,दिल का क़रार क्या हुआ- *साथ आशा,पद्मिनी कोल्हापुरे व ऋषि कपूर*

४५)-

बोलो बोलो,कुछ तो बोलो,सामने वाले ले गए बाज़ी- *साथ आशा*

-----//-----

*फ़िल्म-यादों की बारात*

४६)-

यादों की बारात,निकली है आज,दिल के द्वारे,दिल पुकारे- *साथ किशोर, लता,पद्मिनी व शिवांगी कोल्हापुरे*

४७)-

चूरा लिया है तुमने जो दिल को,नजऱ नहीं चुराना सनम,बदल के मेरी तूम जिंदगानी,कहीं बदल ना जाना सनम- *साथ आशा*

४८)-

यादों की बारात,निकली है आज दिल के द्वारे,दिल पुकारे- *साथ किशोर*

-----//-----

४९)-

ज़माने ने मारे,जवाँ कैसे कैसे,जमीं खा गयी, आसमाँ कैसे कैसे- *बहारों के सपने* *एकल*

५०)-

सुनो सीता की कहानी,के वो महलों की रानी,छोड़कर घरबार,गयी वनवास,किसी ने क़दर ना जानी- *बिराज बहु* *एकल*

५१)-

घुँघट से क्यों नैना झाँके,जाने वाले जान गये- *आँगन* *साथ आशा*

----- *संतोष कुमार मस्के-संकलन से* -----

---------------------///---------------------

कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए बयां और ”

हैं और भी दुनिया में सुख़न्वर बहुत अच्छे 

कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए बयां और ” l 


1954 में आई 'मिनर्वा मूवीटोन 'की फिल्म ‘मिर्जा गालिब’ राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाली पहली हिंदी फिल्म थी इसके बाद राष्ट्रीय पुरस्कारों को कई वर्गों में बांटा गया ,इस फिल्म के लिए गजलों के बादशाह 'तलत महमूद' की मखमली और गायिका,अभिनेत्री 'सुरैया 'की मिठास भरी आवाजों में गाई गई गजलें और गीत बेहद मकबूल हुए ......भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी सुरैया की महानता के बारे में कहा था कि,, उन्होंने मिर्ज़ा ग़ालिब की शायरी को आवाज़ देकर उनकी आत्मा को अमर बना दिया,,.... फिल्म मे मिर्ज़ा ग़ालिब की पत्नी ( निगार सुल्ताना ) और प्रेमिका नवाब जान ( सुरैया ) के बीच के द्वंद्व को आधार बनाया गया है इस फिल्म में भारत भूषण ने शायर मिर्जा गालिब के किरदार को इतने सहज और असरदार ढंग से निभाया कि यह गुमां होने लगता है कि गालिब ही परदे पर उतर आए हों। सोहराब मोदी की फिल्म ‘मिर्ज़ा ग़ालिब (1954)' ग़ालिब के जीवन पर बनी सबसे यादगार फिल्म है ऐतिहासिक फिल्मे बनाने में माहिर सोहराब मोदी यूँ तो अपनी फिल्मो में ज्यादातर लीड रोल खुद करते थे लेकिन उन्होने मिर्ज़ा ग़ालिब के रोल के लिए अपनी बुलंद आवाज़ को माफिक नहीं पाया और अभिनेता भारत भूषण को मिर्ज़ा ग़ालिब के रोल में परदे पर जीवंत कर दिखाया उनका ये ऐतिहासिक निर्णय उनके सिनेमा प्रेम और काम के प्रति कमिटमेंट को दर्शाता है....courtesy by Pawan Mehra

रविवार, 7 मार्च 2021

चर्चित साहित्यकार प्रकाश मनु से अनामी शरण बबल की बातचीत

 बातचीत / बाल साहित्य का इतिहास आज समूचे हिंदी संसार की धरोहर बन चुका है...!मनु 


वरिष्ठ साहित्यकार और बाल साहित्य के इतिहास के लेखक प्रकाश मनु से अनामीशरण बबल की बातचीत

*

अनामीशरण बबल – मनु जी, आप बाल साहित्य के जाने-माने हस्ताक्षर हैं। कृपया बताएँ कि आप बाल साहित्य को किस तरह परिभाषित करेंगे?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, एकदम सीधे-सादे शब्दों में कहना हो तो बाल साहित्य का मतलब है बच्चों का साहित्य—बच्चों का अपना साहित्य, जिसे पढ़कर वे आनंदित हों, उसके साथ नाचें, झूमें-गाएँ और खेल-खेल में जीवन के महत्त्वपूर्ण पाठ भी सीख लें। यों यह बाल साहित्य ही है, जिसके जरिए किसी बच्चे का संपूर्ण और संतुलित विकास होता है, इसी के जरिए उसे जरूरी मानसिक खुराक मिलती है, और प्रेम, सहानुभूति, परदुखकातरता जैसे बुनियादी संस्कार भी, जो हर पल उसके साथ रहते हैं...उसे सही राह दिखाते हैं और कभी भटकने नहीं देते। बरसों पहले मैं पुरानी पीढ़ी के एक बड़े बाल साहित्यकार कन्हैयालाल मत्त जी से मिला था। बातों-बातों में मैंने उनसे पूछा कि मत्त जी, आपके खयाल से कोई अच्छी बाल कविता कैसी होनी चाहिए? सुनकर उन्होंने जवाब दिया था कि मनु जी, मैं तो उसी को अच्छी बाल कविता मानता हूँ जिसे पढ़ या सुनकर बच्चों के हदय की कली खिल जाए। मैं समझता हूँ, यह केवल अच्छी बाल कविता ही नहीं, समूचे बाल साहित्य की भी कसौटी है। कोई अच्छी कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक—यहाँ तक कि जीवनी और ज्ञान-विज्ञान साहित्य भी जब तक इस तरह न लिखा जाएगा कि वह बच्चों को आनंदित करे, तब तक वे उसे पढ़ने के लिए उत्साहित न होंगे, भले ही आपने उसमें कितने ही अच्छे-अच्छे विचार क्यों न जड़ दिए हों। बच्चे अपने लिए लिखी रचनों से आनंदित हों, यह पहली शर्त है। हाँ, पर इससे यह भी न समझ लेना चाहे कि बाल साहित्य केवल बच्चों के मनोरंजन के लिए है। बच्चे अपने लिए लिखी रचनाओं से आनंदित होंगे तो वे खेल-खेल में जीवन के बहुत से जरूरी पाठ भी सीख लेंगे। यही अच्छे बाल साहित्य का उद्देश्य भी है। 

अनामीशरण – मनु जी, कृपया बताएँ कि बाल साहित्य क्या है और उसमें किन-किन विधाओं में प्रचुरता से लिखा गया है?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, बाल साहित्य क्या है, इसका जवाब तो मैंने अभी-अभी दिया ही है। आम तौर से बड़ों के साहित्य में जो विधाएँ हैं, वे सभी बाल साहित्य में भी आपको नजर आएँगी। बाल कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, ज्ञान-विज्ञान साहित्य सबमें काफी काम हुआ है। हालाँकि संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत वगैरह में जितना काम होना चाहिए था, उतना नहीं हुआ। ऐसे ही कछ और विधाएँ हैं, जिनमें काम करने के लिए पूरा मैदान खाली है।

अनामीशरण - बाल साहित्य और इसकी सतत प्रवहमान धाराओं में आपको ऐसा क्या प्रतीत हुआ कि आपको लगा, बाल साहित्य का भी इतिहास लिखा जाना चाहिए?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, मोटे तौर से बीसवीं शताब्दी का प्रारंभिक काल ही बाल साहित्य के प्रारंभ का समय भी है। तब से कोई सौ-सवा सौ बरसों में बाल साहित्य की हर विधा में बहुत काम हुआ है। बाल कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, बाल जीवनी और ज्ञान-विज्ञान साहित्य—सबमें बहुत साहित्य लिखा गया है और उनमें कुछ कृतियाँ तो इतनी उत्कृष्ट और असाधारण हैं कि चकित रह जाना पड़ता है। बाल साहित्य के इतिहास की भूमिका में मैंने लिखा है कि बाल साहित्य जिसे एक छोटा पोखऱ समझा जाता है, वह तो एक ऐसा अगाध समंदर हैं, जिसमें सृजन की असंख्य उत्ताल तरंगें नजर आती हैं। बीच-बीच में बहुत उज्जवल और चमकती हुई मणियाँ भी दिखाई दे जाती हैं।...एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि हिंदी साहित्य के बड़े से बड़े दिग्गजों ने बाल साहित्य लिखा और उस धारा को आगे बढ़ाया है। आपको आश्चर्य होगा, हिंदी का पहला बाल उपन्यास प्रेमचंद ने लिखा था। ‘कुत्ते की कहानी’ उस बाल उपन्यास का नाम है, और वह प्रेमचंद ने तब लिखा, जब वे ‘गोदान’ लिख चुके थे और अपने कीर्ति के शिखर पर थे। क्या पता, अगर वे और जीते रहते तो कितनी अनमोल रचनाएँ बच्चों की झोली में डालकर जाते। आपको पता होगा, प्रेमचंद के समय मौलिक उपन्यास तो न थे, पर अनूदित उपन्यास बहुत थे। पर प्रेमचंद को उनसे संतोष न था। उन्हें लगा कि पराई भाषा के उपन्यासों से बच्चों का उतना जुड़ाव नहीं हो पाता, और उन्हें सही परिवेश भी नहीं मिल पाता। इसलिए हिंदी में बच्चों के लिए कोई ऐसा उपन्यास लिखना चाहिए, जो उन्हें बिल्कुल अपना सा लगे। और तब लिखा उन्होंने बाल उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’, जिसका नायक एक कुत्ता कालू है। उपन्यास में उसके कमाल के कारनामों का वर्णन है, पर इसके साथ ही प्रेमचंद ने भारतीय समाज की जाने कितनी विडंबनाएँ और सुख-दुख भी गूँथ दिए हैं। यहाँ तक कि गुलामी की पीड़ा भी। उपन्यास के अंत में कालू कुत्ते को हर तरह का आराम है। उसे डाइनिंग टेबल पर खाना खाने को मिलता है। तमाम नौकर-चाकर उसकी सेवा और टहल के लिए मौजूद हैं। पर तब भी वह खुश नहीं है। वह कहता है, मुझे सारे सुख, सारी सुविधाएँ हासिल हैं, पर मेरे गले में गुलामी का पट्टा बँधा हुआ है और गुलामी से बड़ा दुख कोई और नहीं है। ऐसे कितने ही मार्मिक प्रसंग और मार्मिक कथन हैं जो उपन्यास पढ़ने के बाद मन में गड़े रह जाते हैं। यह है प्रेमचंद के उपन्यास-लेखन की कला, जो उनके लिखे इस बाल उपन्यास में भी देखी जा सकती है।

पर अकेले प्रेमचंद नहीं हैं, जिन्होंने बच्चों के लिखा लिखा। अमृतलाल नागर, रामवृक्ष बेनीपुरी, मैथिलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, सुभदाकुमारी चौहान, दिनकर, जहूरबख्श, मोहन राकेश, कमलेश्वर, राजेंद यादव, मन्नू भंडारी, शैलेश मटियानी, बच्चन, भवानी भाई, प्रभाकर माचवे, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय—सबने बच्चों के लिए लिखा और खूब लिखा।...तो जैसे-जैसे मैं बाल साहित्य के इस अगाध समंदर में गहरे डूबता गया, बाल साहित्य की एक से एक सुंदर और चमकीली मणियों से मैं परचता गया। और बहुत बार तो लगा कि ऐसी दमदार कृतियाँ तो बड़ों के साहित्य में भी नहीं हैं, जैसी बाल साहित्य में हैं। तब मुझे लगा कि यह बात तो दर्ज होनी चाहिए, कहीं न कहीं लिखी जानी चाहिए। पर मैं देखता था कि ज्यादातर बाल साहित्यकार इस चीज को लेकर उदासीन थे, या कम से कम वैसी व्याकुलता उनमें नहीं महसूस होती थी, जैसी मैं महसूस करता था और भीतर-भीतर तड़पता था। 

तो अनामी भाई, उसी दौर में कहीं अंदर से पुकार आई कि प्रकाश मनु, तुम यह काम करो। बेशक यह काम बहुत चुनौती भरा है, पर तुम इसे कर सकते हो, तुम्हें करना ही चाहिए। और मैं इसमें जुट गया। मैं कितना कामयाब हो पाऊँगा या नहीं, इसे लेकर मन में संशय था। पर जैसे-जैसे काम में गहरे डूबता गया, यह संशय खत्म होता गया। मुझे लगा कि यह तो मेरे जीवन की एक बड़ी तपस्या है. और सारे काम छोड़कर मुझे इसे पूरा करना चाहिए। तो सारे किंतु-परंतु भूलकर मैं इस काम में लीन हो गया। 

ऐसा नहीं कि बाधाएँ कम आई हों। मेरे पास कुछ अधिक साधन भी न थे। फिर भी किताबें खरीदना तो जरूरी था। बिना इसके इतिहास कैसे लिखा जाता? इन बीस बरसों में कोई डेढ़-दो लाख रुपए मूल्य की पुस्तकें खरीदनी पड़ीं। जो सज्जन कंप्यूटर पर मेरे साथ बैठकर घंटों कंपोजिंग और निरंतर संशोधन भी करते थे, वे बहुत धैर्यवान और मेहनती थे। पर उन्हें उनके काम का मेहनताना तो देना ही था। कोई बीस बरस यह काम चला और दो-ढाई लाख रुपए तो कंपोजिंग आदि पर खर्च हुए ही। हर बार नई किताबें आतीं तो मैं उन्हें बीच-बीच में जोड़ता। इतिहास का विस्तार बहुत अधिक न हो, इसलिए बार-बार उसे तराशना पड़ता। लिखना और संपादन, काट-छाँट...फिर लिखना, फिर संपादन, यह सिलसिला बीस बरस तक चलता रहा। इस पूरे महाग्रंथ के कोई सौ के लगभग प्रिंट लिए गए। हर बार काट-छाँटकर फिर नया प्रिंट।...सिलसिला कहीं रुकता ही न था। कभी-कभी तो लगता था कि मैं मर जाऊँगा और यह काम पूरा न होगा।...पर अंततः पिछले बरस यह काम पूरा हुआ और लगा कि सिर पर से कोई बड़ा भारी पहाड़ उतर गया हो। काम पूरा होने के बाद भी यकीन नहीं हो रहा था कि मैंने सच ही इसे पूरा कर लिया है।

अनामीशरण - आपसे पहले भी क्या बाल साहित्य के इतिहास पर काम हुआ है?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, यह हिंदी बाल साहित्य का पहला इतिहास है। हाँ, इससे पहले सेवक जी ने हिंदी बाल कविता का इतिहास लिखा था, ‘बालगीत साहित्य : इतिहास एवं समीक्षा’ शीर्षक से। सन् 2003 में मेधा बुक्स से खुद मेरा इतिहास-ग्रंथ आया था, ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’। बाल साहित्य के इस बृहत् इतिहास-ग्रंथ से पहले अभी तक कुल दो ही इतिहास छपे थे, पर ये दोनों केवल बाल कविता तक सीमित थे। हिंदी बाल साहित्य का पहला इतिहास-ग्रंथ तो यही है, जो सन् 2018 में प्रभात प्रकाशन से बड़े खूबसूरत कलेवर में छपकर आया है। इसे लिखने में मेरे जीवन के कोई बीस-बाईस वर्ष लगे। 

अनामीशरण - बाल साहित्य का इतिहास न सही, पर क्या ऐसा कोई और बड़ा काम हुआ है, जिसमें बाल साहित्य के सिलसिलेवार विकास को दर्शाया गया हो?

प्रकाश मनु – इस इतिहास-ग्रंथ से पहले अनामी जी, मेरी एक पुस्तक ‘हिंदी बाल साहित्य : नई चुनौतियाँ और संभावनाएँ’ आ चुकी थी, जिसमें अलग-अलग विधाओं में बाल साहित्य की विकास-यात्रा को दरशाया गया था। काफी लंबे-लंबे इतिहासपरक लेख इसमें हैं। यह पुस्तक सन् 2014 में आई थी। इसी तरह शकुंतला कालरा जी की एक संपादित पुस्तक ‘बाल साहित्य : विधा विवेचन’ भी आ चुकी थी, जिनमें बाल साहित्य की अलग-अलग विधाओं पर अलग-अलग साहित्यकारों ने लिखा। पर बाल साहित्य का कोई विधिवत और संपूर्ण इतिहास अब तक नहीं आया था। इसलिए मेरे ग्रंथ ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’ ने, मैं समझता हूँ, एक बड़े अभाव की पूर्ति की। मेरे जीवन का सबसे बड़ा सपना तो यह था ही कि मैं हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखूँ। पर मेरे साथ-साथ यह बाल साहित्य के सैकड़ों लेखकों का भी सपना था कि ऐसा इतिहास-ग्रंथ सामने आए।...तो मैं समझता हूँ, मैंने केवल अपना ही नहीं, सैकड़ों बाल साहित्यकारों का सपना भी पूरा किया है। और यह काम हो सका, इसका श्रेय मैं अपने मित्रों, शुभचिंतकों और उन सैकड़ों बाल साहित्यकारों को देता हूँ जिनकी शुभकामनाएँ मेरे साथ थीं, और उसी से मुझे इतनी हिम्मत, इतनी शक्ति मिली कि यह काम पूरा हो सका। सच पूछिए तो अनामी जी, मुझे लगता है कि यह काम करने की प्रेरणा मुझे ईश्वर ने दी और उसी ने मुझसे यह काम पूरा भी करा लिया। मैं तो बस एक निमित्त ही था। इतनी सारी सद्प्रेरणाएँ मेरे साथ न होतीं तो मैं भला क्या कर सकता था? एक पुरानी कविता का सहारा लेकर कहूँ तो—‘कहा बापुरो चंद्र...!!’

अनामीशरण – ‘नंदन’ जैसी लोकप्रिय बाल पत्रिका में काम करने के अनुभव और बाल कथाओं के विपुल संसार से दो-चार होते रहने की सतत प्रकिया ने क्या आपके जीवन दर्शन, सोच-विचार और गहन वैचारिक मंथन पर गहरा प्रभाव डाला है? इतिहास लेखन में आपके ‘नंदन’ कार्यानुभव का असर पड़ा है?

प्रकाश मनु – निस्संदेह अनामी भाई, बाल पत्रिका ‘नंदन’ से जुड़ने पर ही मुझे पता चला कि बाल साहित्य का विस्तार कितनी दूर-दूर तक है। साथ ही उसमें बचपन की ऐसी खूबसूरत बहुरंगी छवियाँ हैं, कि उनका आनंद लेने के लिए आप फिर से बच्चा बन जाना चाहते हैं।... ‘नंदन’ में काम करते हुए जब भी मुझे फुर्सत मिलती, मैं पत्रिका की पुरानी फाइलें उठा लेता और पढ़ने लगता। मुझे यह बड़ा आनंददायक लगता था। इसलिए कि उन्हें पढ़ते हुए बरसों पहले ‘नंदन’ में छपे रचनाकारों से मेरी बड़ी जीवंत मुलाकात हो जाती और मैं अभिभूत हो उठता।... फिर ‘नंदन’ के शुरुआती अंक देखे तो मेरी आँखें खुली की खुली रह गईं। उनमें ऐसा अपूर्व खजाना था कि मैं झूम उठा। अमृललाल नागर के ‘बजरंगी पहलवान’ और ‘बजरंगी-नौरंगी’ ऐसे जबरदस्त उपन्यास थे कि पढ़ते हुए मैं किसी और ही दुनिया में पहुँच गया। इसी तरह कमलेश्वर की ‘होताम के कारनामे’ एक विलक्षण कहानी थी। मनोहर श्याम जोशी का उपन्यास ‘आओ करें चाँद की सैर’ भी ऐसा ही अद्भुत था। यहाँ तक कि राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी और मोहन राकेश की बड़ी दिलचस्प कहानियाँ पढ़ने को मिलीं। मोहन राकेश ने बच्चों के लिए कुल चार कहानियाँ लिखी हैं, और वे चारों आपको ‘नंदन’ के पुराने अंकों में मिल जाएँगी। हरिशंकर परसाई, वृंदावनलाल वर्मा, रघुवीर सहाय, सबने बच्चों के लिए लिखा और जमकर लिखा। इनकी रचनाएँ मुझे ‘नंदन’ के पुराने अंकों में पढ़ने को मिलीं।

मैं अकसर सुना करता था कि हिंदी में बड़े साहित्यकारों ने बच्चों के लिए नहीं लिखा, पर यह तो उलटा ही मामला था। यानी मैं देखता कि भला कौन बड़ा साहित्यकार है जिसने बच्चों के लिए नहीं लिखा!...यह एक विलक्षण चीज थी मेरे लिए। मुझे लगता, यह बात तो किसी को पता ही नहीं। तो किसी न किसी को तो यह सब लिखना चाहिए। मैं बाल साहित्य पर विस्तृत लेख लिखता और उनमें इन बातों का जिक्र करता। धीरे-धीरे मुझे लगा कि हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखने के लिए जमीन खुद-ब-खुद तैयार हो गई है और फिर मैं इस काम में जुट गया।...तो इसमें शक नहीं, अनामी भाई, कि मैं ‘नंदन’ में था, इस कारण हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिख पाया। नहीं तो शायद मेरे लिए इतना बड़ा काम कर पाना कतई संभव न हो पाता। 

अनामीशरण – मनु जी, आपने बाल साहित्य का इतिहास लिखा है, पर मेरा प्रश्न है कि बाल कविता, कहानी और पौराणिक कथाओं, लोककथाओं समेत अन्य कई विधाओं में लिखे गए बाल साहित्य को किस कसौटी पर साहित्य कहा और माना जा सकता है?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, इसका जवाब तो मैं पहले दे ही चुका हूँ। बच्चों के लिए लिखी गई कविता, कहानियाँ, उपन्यास, नाटक और दूसरी विधाओं में रचे गए साहित्य का एक बड़ा हिस्सा बच्चों को एक गहरी रचनामक संतुष्टि और आनंद देता है, और अपने साथ बहा ले जाता है। वह जाने-अनजाने बाल पाठकों के व्यक्तित्व को निखारता और उन्हें जीवन जीने की सही दिशा और सकारात्मक ऊर्जा देता है। साथ ही उनके आगे विचार और कल्पना के नए-नए अज्ञात झरोखे खोलकर, उनके व्यक्तित्व का विकास करता है, उनके सामने नई संभावनाओं के द्वार खोलता है। यह काम ऊँचे दर्जे का साहित्य ही कर सकता है। मैं समझता हूँ कि बच्चों के लिए लिखी गई कविता कहानी, उपन्यास, नाटकों आदि की परख के लिए यह एक सही कसौटी है, जिसके आधार पर उनका मूल्यांकन किया जाना चाहिए, और यही काम मैंने बाल साहित्य के इतिहास में किया है। बेशक बच्चों के लिए लिखी गई सभी रचनाएँ समान महत्त्व और ऊँचाई की नहीं हैं। बहुत सी साधारण रचनाएँ भी हैं। पर बाल साहित्य का इतिहास लिखते हुए मेरी निगाह बच्चों के लिए लिखी गई श्रेष्ठ और कलात्मक रूप से सुंदर रचनाओं पर ही रही है। मैं समझता हूँ कि उनके आधार पर ही बाल साहित्य का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। 

और यह तो बड़ों के साहित्य में भी है। वहाँ भी साधारण रचनाओं की काफी भीड़ है, पर हम किसी भी विधा की उत्कृष्ट रचनाओं के आधार पर ही उसका मूल्यांकन करते हैं, तथा उसकी शक्ति और संभावनाओं की पड़ताल करते हैं।...हाँ, जहाँ तक लोककथाओं और पौराणिक कथाओं का सवाल है, तो वे बाल पाठकों के लिए तो लिखी नहीं गई थीं। तो उनमें ऐसा बहुत कुछ है, जो बच्चों के काम का नहीं है। इसलिए लोककथाओं और पुराण कथाओं को बाल साहित्य नहीं माना जा सकता। हाँ, कुछ लेखकों ने लोककथाओं और पुराण कथाओं को बच्चों के लिए बड़ी कल्पनाशीलता के साथ नए और सर्जनात्मक रूपों में ढालकर प्रस्तुत किया है। मैं समझता हूँ, बच्चों के लिए विशेष रूप से पुनःसर्जित रचनाओं को ही बाल साहित्य के अंतगत लेना चाहिए। बाकी रचनाओं को भ्रमवश बाल साहित्य भले ही समझ लिया जाए, पर सच पूछिए तो उन्हें बाल साहित्य मानना एक बड़ी भूल होगी। मैंने अपने इतिहास-ग्रंथ में उन्हीं लोककथाओं और पुराण कथाओं की खासकर चर्चा की है, जिनका सच में ही बाल पाठकों के लिए पुनःसृजन किया गया है। 

अनामीशरण - बाल साहित्य के इतिहास पर आपके लंबे शोध और साधना का साकार रूप एक बृहत् ग्रंथ के रूप में सन् 2018 में सामने आया है। पर यह कितने वर्षों के निरंतर विचार-मंथन, शोध, अनुसंधान, खोज और अंततः नियोजन का प्रतिफल है?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, मोटे तौर से इस इतिहास-ग्रंथ को पूरा करने में मुझे कोई बीस-बाईस बरस लगे। शुरू में पता नहीं था कि काम इतना बड़ा है कि मैं इसके नीचे बिल्कुल दब जाऊँगा।...धीरे-धीरे जब पुस्तकों की खोज में जुटा तो समझ में आया कि यह काम कितना कठिन है। हर कालखंड की सैकड़ों पुस्तकों को खोजना, गंभीरता से उन्हें पढ़ना, फिर उनके बारे में अपनी राय और विचारों को इस इतिहास-ग्रंथ में शामिल करना खेल नहीं था। बीच-बीच में साँस फूल जाती और लगता था कि यह काम कभी पूरा हो ही नहीं पाएगा। पर इसे ईश्वरीय अनुकंपा ही कहूँगा कि अंततः यह काम पूरा हुआ...और मुझे लगा कि सच ही मेरे जीवन का एक बड़ा सपना पूरा हो गया है।

अनामीशरण – यह इतिहास-ग्रंथ लिखने का विचार आपके मन में कब आया? फिर विचारों की इस पूरी पटकथा को मन से कॉपी पर उतारकर सामने लाना—यह एक लंबा सिलसिला रहा होगा। आपने ही अभी बताया, कोई बीस-बाईस वर्ष। तो इस बाबत अपने उन चंद मित्रों के नाम बताएँ, जिनसे आपने इतिहास लेखन की भावी योजनाओं पर गंभीरता से बात की। उन मित्रों की क्या प्रतिकिया रही?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, यह काम मोटे तौर से सन् 1997 से शुरू हुआ था, जब मैंने बाल साहित्य पर पत्र-पत्रिकाओं में खूब लंबे-लंबे लेख लिखने शुरू किए थे। वे लेख ऐसे थे, जिनके पीछे काफी तैयारी थी, और जो महीनों की मेहनत से तैयार किए गए थे। सन् 2003 में मेरा लिखा हुआ इतिहास-ग्रंथ ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’ आया। वह भी इसी योजना का एक हिस्सा था। कहना न होगा कि इस इतिहास को खूब सराहा गया। दामोदर अग्रवाल और डा. श्रीप्रसाद सरीखे बाल साहित्यकारों ने बड़े उत्साहवर्धक पत्र लिखे। दामोदर अग्रवाल जी का कहना था कि यह ऐसा काम है, जिसे आगे आने वाले सौ सालों तक भुलाया नहीं जा सकता। दूरदर्शन ने एक विशेष कार्यक्रम इस पर केंद्रित किया, जिसमें मेरे अलावा डा. शेरजंग गर्ग और बालस्वरूप राही जी भी सम्मिलित थे। यह एक स्मरणीय विचार-गोष्ठी थी। डा. शेरजंग गर्ग और राही जी ने बड़े सुंदर अल्फाज में इस इतिहास के महत्त्व पर प्रकाश डाला। कुल मिलाकर हिंदी बाल कविता के इतिहास का बहुत उत्साहपूर्वक स्वागत हुआ। इससे जाहिर है, मेरी हिम्मत भी बढ़ी। सन् 2003 में मैंने निश्चय कर लिया कि अब चाहे जितनी भी मुश्किलें आएँ, पर समूचे हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखना है। यह सिर पर पहाड़ उठा लेना है, तब यह न जानता था। पर एक थरथराहट भरे पवित्र संकल्प के साथ यह काम विधिवत मैंने शुरू कर दिया था। 

तब से इसके कई प्रारूप बने और बदले गए। बीच-बीच में सैकड़ों नई-पुरानी पुस्तकें जुड़ती गईं। बच्चों के लिए लिखी गई जो भी अच्छी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक मुझे मिलती, मैं गंभीरता से उसे पढ़ता, फिर पुस्तक का संक्षिप्त ब्योरा और उस पर अपनी राय वगैरह दर्ज कर लेता। यों इस इतिहास-ग्रंथ का कलेवर भी समय के साथ-साथ बढ़ता गया। इसलिए बीच-बीच में लगातार संपादन भी जरूरी था। शुरू में इतिहास की जो परिकल्पना मन में थी, वह भी बाद में जाकर कुछ बदली, और इसमें बहुत कुछ नया जुड़ता और घटता रहा। यों इस इतिहास-ग्रंथ को पूरा करने में मुझे कोई बीस-बाईस बरस लगे। 

मेरे निकटस्थ साथियों और आत्मीय जनों में देवेंदकुमार, रमेश तैलंग और कृष्ण शलभ ऐसे करीबी मित्र थे, जिनसे लगातार इसे लेकर बात होती थी। इतिहास-ग्रंथ की पूरी परिकल्पना की उनसे दर्जनों बार चर्चा हुई। इसमें आ रही कठिनाइयों की भी। सबने अपने-अपने ढंग से मेरी मदद की। उन्होंने कुछ दुर्लभ पुस्तकें तो उपलब्ध कराईं ही, बीच-बीच में जब मेरी हिम्मत टूटने लगती थी, तो वे हौसला बँधाते। बाद के दिनों में श्याम सुशील भी जुड़े और उनका बहुत सहयोग मिला। उन्होंने यह पूरा इतिहास-ग्रंथ पढ़कर कई उपयोगी सुझाव दिए। संपादन में भी मदद की। सच पूछो तो ऐसे प्यारे और निराले दोस्त न मिले होते, तो यह काम शायद कभी पूरा ही न हो पाता। और अगर पूरा होता भी, तो शायद इतने सुचारु ढंग से संपन्न न होता। मेरा मकसद केवल इतिहास लिखना ही न था। बल्कि मैं चाहता था कि इस इतिहास-ग्रंथ की जो परिकल्पना मेरे मन में है, यह ठीक उसी रूप में पूरा हो। इस बृहत् कार्य में किसी भी तरह का समझौता मैं नहीं करना चाहता था। ऐसा भी हुआ कि लाखों रुपए खर्च करके जो पुस्तकें मैं खरीदकर लाया, उनमें से किसी पर सिर्फ दो-चार लाइनें ही लिखी गईं, किसी पर मात्र दो-एक पैरे। पर मुझे संतुष्टि थी कि हर पुस्तक को मैंने खुद पढ़ा और अपने ढंग से अपने विचारों को दर्ज किया। दूसरों के विचार मैं उधार नहीं लेना चाहता था, और वह मैंने नहीं किया। पुस्तकें खुद पढ़कर राय बनाई और फिर उसे उचित क्रम में तसल्ली से लिखा। इससे काम कई गुना बढ़ गया, पर इसी का तो आनंद था। इसीलिए जब यह इतिहास-ग्रंथ पूरा हुआ तो लगा, मेरी जीवन भर की तपस्या पूरी हो गई, और मेरी आँखों से आनंद भरे आँसू बह निकले।

अनामीशरण – मनु जी, क्या आपके आसपास के लेखकों और मित्रों की मिली-जुली प्रतिकियाओं ने भी इतिहास लेखन की धारणा और आपकी योजनाओं को सबल बनाया है?

प्रकाश मनु – हाँ, अनामी भाई, मैं बहुत खुले दिल और खुले विचारों का आदमी हूँ। मेरे जीवन में कुछ भी दबा-ढका नहीं है, और जो भी है वह सबके सामने है। इसलिए जो भी लेखक या मित्र मिलते, मैं इनसे खुलकर इस काम की चर्चा करता। फिर उनकी जो प्रतिक्रिया होती, उस पर भी पूर्वाग्रह मुक्त होकर खुले दिल से विचार करता। जो भी सुझाव मुझे काम के लगते, उन्हें मैं अपनाने की कोशिश करता। जाहिर है कि इससे मुझे बहुत लाभ हुआ और इतिहास कहीं अधिक मुकम्मल रूप में सामने आया।

अनामीशरण - जब आपने इस इतिहास की रूपरेखा पर काम आरंभ किया तो उस समय आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास लेखन, काल-विभाजन और अलग-अलग कालखंडों के नामकरण आदि को भी क्या आपने ध्यान में रखा? आपने बाल साहित्य के इतिहास में काल-विभाजन किस आधार पर और किन तार्किक मानदंडों पर रखकर निर्धारित किया?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में काल-विभाजन किया है। पर उनके और मेरे काल-विभाजन में बहुत फर्क है। इसलिए भी कि हिंदी साहित्य की परंपरा कई सदियों पुरानी है, जबकि हिंदी में बाल साहित्य की शुरुआत मोटे तौर से बीसवीं शताब्दी से ही हुई। तो मुझे केवल सौ-सवा सौ साल की कालावधि में ही वर्गीकरण करना था। शुक्ल जी ने अलग-अलग कालखंडों में हिंदी साहित्य की प्रवृत्तियों के अनुसार काल-विभाजन किया, जबकि मेरा काल-विभाजन हिंदी बाल साहित्य की विकास-यात्रा या उसके ग्राफ को लेकर था। इसलिए बीसवीं सदी के प्रारंभ से आजादी हासिल होने तक के कालखंड, यानी स्वतंत्रता-पूर्व काल को मैंने हिंदी बाल साहित्य का प्रारंभिक दौर या आदि काल माना। आजादी के बाद हिंदी बाल साहित्य की ओर बहुत से साहित्यिकों का ध्यान गया और इस कालखंड में बहुत उत्कृष्ट रचनाएँ सामने आईं। खासकर छठे दशक से आठवें दशक तक का बाल साहित्य बड़ी ही अपूर्व कलात्मक उठान वाला बाल साहित्य है, जिसमें बाल साहित्य की प्रायः सभी विधाओं में एक से एक उम्दा रचनाएँ लिखी गईँ। इसलिए इस दौर को मैंने हिंदी बाल साहित्य का गौरव काल कहा। 

सन् 1981 से लेकर अब तक के बाल साहित्य में बहुत विस्तार है। बहुत से नए लेखकों का काफिला बाल साहित्य से जुड़ा और काफी लिखा भी गया गया। पर इस दौर में वह ऊँचाई नहीं है, जो विकास युग में नजर आती है। इस कालखंड को मैंने विकास युग का नाम दिया। इस तरह हिंदी बाल साहित्य के इतिहास में मेरा काल- विभाजन प्रवृत्तिगत न होकर, बाल साहित्य की विकास-यात्रा को लेकर है। मोटे तौर से यह अध्ययन की सुविधा के लिए है। इस पर कोई बहुत अधिक मताग्रह मेरा नहीं है कि इन कालखंडों के नाम और कालावधि बस यही हो सकती है। पर मैं देखता हूँ कि सामान्यतः सभी बाल साहित्य अध्येताओं ने इसे खुले मन से स्वीकार कर लिया है, और इसी आधार पर बाल साहित्य के अध्ययन की परंपरा चल निकली है। मुझे निश्चित रूप से यह सुखद लगता है। इसलिए कि काल-विभाजन पर निरर्थक विवाद के बजाय हमारा ध्यान तो बाल साहित्य की विकास की गतियों को जाँचने और आँकने में होना चाहिए। 

अनामीशरण – मनु जी, बाल लेखन और बाल साहित्य के बीच क्या फर्क है, और किस मापदंड पर यह तय होता है कि अमुक रचना बाल साहित्य के अंतर्गत आएगी या नहीं?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, जो बाल लेखन है, या खास तौर से बच्चों के लिए लिखी गई रचनाएँ हैं, वही कुल मिलाकर बाल साहित्य है, अगर वे रचनाएँ बाल पाठकों को आनंदित करने के साथ-साथ एक तरह की रचनात्मक संतुष्टि दे पाती हैं। साथ ही उनकी शख्सियत को सँवारने और उसके सर्वांगीण विकास में अपनी अहम भूमिका निभाती हैं। 

अनामीशरण – यानी आपके खयाल से बाल साहित्य वह है जो बच्चों को आनंदित करने के साथ ही उसे संस्कारित भी करे और कोई दृष्टिकोण भी दे?

प्रकाश मनु – बिल्कुल...। अनामी भाई, आपने एकदम ठीक कहा। 

अनामीशरण - साहित्य की परिभाषा आपकी नजर में क्या है?

प्रकाश मनु – मोटे तौर से कहूँ तो साहित्य भाषा में मनुष्य के मन की अभिव्यक्ति है, जिसमें अपना और समाज का सुख-दुख, भविष्यत, सपनों की उड़ान, आकांक्षाएँ और जीवन यथार्थ प्रतिबिंबित होता हो। कोई अच्छा साहित्य हमें सृजनात्मक संतुष्टि तो देता ही है, पर इसके साथ ही वह जीवन की सहज आलोचना भी है, जिसमें हमारे आगत की दिशा, भीतर का मर्म और आदर्श छिपा होता हो। इस तरह वह हमें नैतिक आदर्शों की राह पर ले जाने में मार्गदर्शक का काम भी करता है। 

अनामीशरण - यहाँ पर जब बाल साहित्य की बात चल रही है, तो कृपया बताएँ कि बड़ों के लिए लिखे गए साहित्य और बाल साहित्य के बीच मूल अंतर क्या है?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, मूलतः दोनों के बीच कोई अंतर नहीं है। बस, एक ही अंतर है कि बाल साहित्य बच्चों के लिए लिखा जाता है, इसलिए इसकी भाषा और अभिव्यक्ति बाल मन के अनुकूल सीधी, सरल होती है, जिससे बच्चे उसका आनंद ले सकें। बाल साहित्य में उलझाऊ बिंब, कल्पना, अमूर्त भाषा और पेचीदा अभिव्यक्ति के लिए कोई जगह नहीं है। हमारी दादी-नानियाँ बोलचाल की भाषा और लय में जो बातें कहती हैं, बच्चे उन्हें बड़ी आसानी से ग्रहण कर लेते हैं और उसी रौ में बहने लगते हैं। बाल साहित्य में भी इसी बोलचाल की भाषा और लय की दरकार है। और जहाँ तक किसी लेखक की रचनात्मक संतुष्टि या किसी रचना की अद्वितीयता और पूर्णता की बात है, वह बड़ों का साहित्य हो या बाल साहित्य, दोनों में समान ही होती है।

अनामीशरण - बाल साहित्य के आरंभिक काल और उसकी विकास-यात्रा को आपने किस तरह अपने इतिहास-ग्रंथ में रेखांकित किया है?

प्रकाश मनु – बहुत मोटे तौर से कहूँ तो अनामी भाई, बाल साहित्य के प्रारंभिक दौर में अभिव्यक्ति सीधी-सादी थी, बाल साहित्य की चौहद्दी भी बहुत बड़ी नहीं थी। बहुत थोड़े से विषय थे जिन पर कविता, कहानियाँ, नाटक लिखे जाते थे। फिर वह दौर हमारी पराधीनता का काल था, इसलिए बच्चों में देशराग और देश के गौरव की भावना भरना भी जरूरी था, ताकि ये बच्चे बड़े होकर आजादी की ल़ड़ाई के वीर सिपाही बनें और देश के लिए बढ़-चढ़कर काम करें। आजादी के बाद के बाल साहित्य में बहुत कलात्मक उठान के साथ ही अभिव्यक्ति के नए-नए रास्ते खुले और बाल साहित्य का परिदृश्य भी बड़ा होता गया। सन् 80 के बाद तो हमारे समाज में बड़ी तेजी से परिवर्तन हुआ और उसकी सीधी अभिव्यक्ति बाल साहित्य में देखने को मिलती है। इस कालखंड में बाल साहित्य में कहीं अधिक खुलापन आया और बाल मन की अभिव्यक्ति के नए-नए रास्ते दिखाई पड़े। कहीं बच्चे कंधों पर लटके भारी बस्ते की शिकायत कर रहे हैं, कहीं वे खेलकूद की आजादी माँगते दिखाई देते हैं और कभी विनम्रता से बड़ों से कह रहे हैं कि वे उन्हें दोस्तों के सामने न डाँटें, क्योंकि इससे उन्हें बहुत कष्ट होता है। मोबाइल फोन, कंप्यूटर, गूगल, ईमेल तथा रोबोट समेत आधुनिक प्रोद्योगिकी की बहुत सी चीजें भी इधर बाल साहित्य में आई हैं। आजादी से पहले इनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। 

अनामीशरण - बाल लेखन में क्या आपको कोई ऐसा मोहक तत्व मिला, जिससे आपको बहुत आनंद और संतुष्टि मिली हो, और आपको लगा हो कि बाल साहित्य के इतिहास लेखन की आपकी लगन और मेहनत सार्थक हो गई है?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, बाल सहित्य में मैं जैसे-जैसे गहरे उतरता गया, मुझे लगा, कि अरे, यहाँ तो एक से एक सुंदर और कलात्मक कृतियों का भंडार है, जिसका किसी को पता ही नहीं है। अमृतलाल नागर के उपन्यास ‘बजरंगी पहलवान’ और ‘बजरंगी नैरंगी’ ऐसे ही थे, जिन्हें आप पढ़ लें तो बिल्कुल बच्चे ही बन जाएँ। प्रेमचंद की ‘कुत्ते की कहानी’ का मैंने ऊपर वर्णन किया है। वह एक अद्भुत उपन्यास है। भूपनारायण दीक्षित के ‘नानी के घर में टंटू’ और ‘बाल राज्य’ भी ऐसे ही अनूठे उपन्यास हैं, जिनमें बड़ा रस, बड़ा कौतुक है। इसी तरह बच्चों के लिए लिखी गई बड़ी ही अद्भुत कहानियाँ और नाटक मुझे मिले, जो मेरे लिए किसी अचरज से कम न थे। और बाल कविता की बात करें तो दामोदर अग्रवाल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, शेरजंग गर्ग, डा. श्रीप्रसाद, निरंकारदेव सेवक, द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी, इनके यहाँ ऐसी कविताओं का अनमोल खाना है जिसे हम दुनिया की किसी बड़ी से बड़ी भाषा के बाल साहित्य के समने बड़े गर्व से रख सकते हैं। सच कहूँ तो उनमें ऐसी बहुत सी चीजें भी थीं, जिन्हें पढ़ते हुए लगा कि शायद बड़ों के साहित्य में भी रचनात्मक ऊँचाई वाली वाली ऐसी सुंदर और भावपूर्ण रचनाएँ न होंगी। 

हालाँकि बाल साहित्य में भी साधारण चीजों का बड़ा जखीरा है। उसे देखते हुए बार-बार लगता था कि बाल साहित्य में जो उत्कृष्ट है, उसे अलगाकर दिखाने और मूल्यांकन की बहुत जरूरत है, क्योंकि असल में तो यही बाल साहित्य है। मुझे लगता, किसी न किसी को तो यह काम करना चाहिए। पर मैंने अपने आसपास देखा, किसी को इस काम में रुचि नहीं थी। लोग कविता लिख रहे थे, कहानी लिख रहे थे, या और भी ऐसी ही चीजें। पर अपने लेखन के छोटे से दायरे के बाहर वे झाँकना भी नहीं चाहते थे। उनसे कहा जाता कि बाल साहित्य में एक से एक बड़ी निधियाँ हैं और उन्हें सबके लाने की दरकार है, तो वे ऊपर से हाँ-हाँ करते और फिर अपनी उसी छोटी सी दुनिया में लीन हो जाते। मैं समझ गया कि यह काम बड़ा है, इसलिए कोई हाथ में नहीं लेना चाहता। लोग यह तो चाहते हैं कि यह काम जरूरी है और होना चाहिए, पर वे चाहते हैं कि इस उलझाऊ और पेचीदा काम को कोई और करे, वे स्वयं इस पचड़े में न पड़ें। तब मुझे लगने लगा कि यह काम मुझे करना है, करना ही है, चाहे कितनी ही परेशानियाँ क्यों न आएँ, पर करना है। यों एक बड़ा सपना मन में पैदा हुआ और यह किसी ईश्वरीय अनुकंपा से कम नहीं है कि आखिर वह पूरा भी हुआ।

अनामीशरण - हिंदी साहित्य का इतिहास सबसे पहले तो शुक्ल जी ने लिखा, मगर बाद में उसकी बाढ़ आ गई। कइयों ने शुक्ल जी की ही पटकथा में दो-चार अध्याय काट-जोड़कर नई किताब लिख दी। अगर इसी तरह की स्थितियों से तुलना करते हुए, आपके इतिहास की चर्चा की जाए तो...? क्या आपको लगता है कि आपके बाद बाल साहित्य के कई और इतिहास भी लिखे जाएँगे, जो सीधे-सीधे आपसे प्रेरित होंगे?

प्रकाश मनु – हाँ, यह ठीक है अनामी भाई, कि आचार्य शुक्ल के बाद हिंदी साहित्य के इतिहास बहुत लिखे गए। थोड़ा फेर-फार करके नया इतिहास लिख देने का खेल भी बहुत चला। पर इससे आचार्य शुक्ल के इतिहास-ग्रंथ का महत्त्व तो कम नहीं हो जाता। बल्कि समय के साथ-साथ उसका महत्त्व निरंतर बढ़ता ही गया है। हो सकता है कि मेरे इतिहास-ग्रंथ ‘हिंदी बाल साहित्य का इतिहास’ को पढ़कर और लोग भी बाल साहित्य का इतिहास लिखने के लिए उत्साहित हों। अगर ऐसा है, तो उनका स्वागत। चूँकि इस क्षेत्र में जमीनी काम मैंने बहुत कर दिया, इसलिए हो सकता है कि उनका बहुत श्रम बच जाए। जिस काम को करने में मेरे बीस बरस लगे, उसे वे थोड़े कम समय में भी कर सकते हैं। पर मेरा कहना है कि किसी इतिहास लेखक को गंभीर अध्येता भी होना चाहिए, और उसे इतिहास लिखते समय निज और पर की बहुत सी सीमाओं से ऊपर उठना चाहिए। किसी इतिहास लेखक के अपने विचार तो हो सकते हैं, होने चाहिए भी, पर उसे निजी संबंधों के घेरे से तो यकीनन ऊपर उठना होगा, क्योंकि अंततः तो महत्त्व कृति का है। इतिहास लेखक का मूल्यांकन जितना तटस्थ होगा, पूर्वाग्रहों से परे होगा, उतना ही उसके इतिहास को मान-सम्मान भी मिलेगा। मुझे खुशी है कि मेरे इस इतिहास-ग्रंथ को लेकर एक बड़ी हलचल दिखाई पड़ी तथा लेखकों और पाठकों की बड़े व्यापक स्तर पर प्रतिकियाएँ मिलीं। अधिकतर लेखकों ने बड़े उत्साह से इसका स्वागत किया। मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ।

अनामीशरण - मेरे खयाल से इतनी तितर-बितर, बिखरी हई उपेक्षित बाल रचनाओं और उनके लेखकों की तलाश और उनकी रचनात्मकता को प्रकाश में लाना काफी कठिन काम था। खासा दुरूह। नहीं...?

प्रकाश मनु – निस्संदेह यह एक बड़ी तपस्या थी, अनामी भाई। इस इतिहास-ग्रंथ को लिखने के लिए पुस्तकें कहाँ-कहाँ से जुटाई गईं, अगर मैं यह बताने बैठूँ तो यह खुद में एक इतिहास हो जाएगा। मैंने आपको बताया कि कोई डेढ़-दो लाख रुपए की पुस्तकें मैंने खरीदीं। दिल्ली में जहाँ भी कहीं पुस्तक-पदर्शनी होती, मैं वहाँ जाता। जेब में डेढ़-दो हजार रुपए होते। उनसे जितनी अधिकतम पुस्तकें मैं खरीद सकता था, खऱीद लेता। बस, वापसी के लिए बस या रेलगाड़ी के टिकट के पैसे बचा लेता, ताकि घर पहुँच सकूँ। फिर दोनों हाथों में भारी-भारी थैले पकड़े हुए, पसीने से लथपथ मैं घर आता। उन किताबों को अपनी अलमारी में सहेजकर रखता। फिर उन्हें पढ़ने का सिलसिला चलता, और पढ़ने के बाद अलग-अलग विधा की पुस्तकों का वर्गीकरण करता। फिर इन पुस्तकों को इतिहास-ग्रंथ में उपयुक्त स्थान पर शामिल करने की मुहिम में जुट जाता। यह एक अंतहीन सिलसिला था। इसीलिए मैंने इसे अपने जीवन की सबसे बड़ी तपस्या कहा। 

अनामीशरण - आपने जब इतिहास लेखन पर काम करना आरंभ किया, तो बहुत से ऐसे प्रतिभाशाली लेखक होंगे, जिन पर पहले किसी का ध्यान न था, पर आपके इतिहासपरक लेखों आदि के जरिए वे एकाएक चर्चा में आ गए। या कहें कि उन्हें नया जीवन मिला। आपके खयाल से कितने ऐसे साहित्यकार हैं, जिनको इस इतिहास से नया जीवन मिला और उनके लेखन को कालजयी माना गया?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, मैंने इस तरह गिना तो नहीं। पर निश्चित रूप से दर्जनों ऐसे साहित्यकार होंगे, जिनके लिखे पर पहले लोगों का ध्यान नहीं गया था, पर इतिहास में विशेष चर्चा और फोकस होने पर बहुतों का ध्यान उनकी तरह गया। ऐसा बहुत से पुराने प्रतिभाशाली लेखकों के साथ हुआ और नए उभरते हुए लेखकों के साथ भी। पुराने लेखकों में भी बहुत से समर्थ रचनाकार किन्हीं कारणों से अलक्षित रह जाते हैं। उनकी रचना की शक्ति और विलक्षणता पर लोगों का ध्यान नहीं जाता। एक इतिहासकर का काम उन्हें खोजकर सामने लाना है, और बेशक वह काम मैंने किया। ऐसा करके मैंने किसी पर उपकार नहीं किया, बल्कि इतिहासकार का एक स्वाभाविक कर्तव्य है यह। आजादी से पहले के लेखकों में स्वर्ण सहोदर और विद्याभूषण विभु बड़े ही समर्थ बाल साहित्यकार हैं, जिनकी कविताओं में बड़ी ताजगी है, जो आज भी हमें लुभाती है। और भी ऐसे लेखक हैं, जिनकी तरफ पहले अधिक ध्यान नहीं गया था। पर पहले मेरे हिंदी बाल कविता के इतिहास, और अब इस इतिहास-ग्रंथ में भी उनके महत्त्व की इस ढंग से चर्चा हुई, जो आँखें खोल देने वाली है। इसी तरह बहुत से नए उभरते हुए, लेकिन समर्थ लेखकों की ओर भी मेरा ध्यान गया। प्रदीप शुक्ल, अरशद खान, फहीम अहमद, शादाब आलम ऐसे ही साहित्यकार हैं, जिनके महत्त्व को मैंने बाल साहित्य में एक नई संभावना के रूप में रेखांकित किया। उनकी रचनाओं की शक्ति, नएपन और ताजगी की चर्चा की। मैं समझता हूँ, इससे उनका हौसला तो बढ़ा ही होगा, औरों को भी इसी तरह बढ़-चढ़कर कुछ कर दिखाने की चुनौती मिली होगी। या उनके आगे एक नया मार्ग खुला होगा।...और अगर ऐसे और भी नए समर्थ लेखक आगे आए, तो मैं सबसे पहले उनका नोटिस लूँगा और इतिहास के अगले संस्करण में उन्हें शामिल करूँगा। इतिहास-लेखक के रूप में यह मेरा दायित्व है, इसलिए इससे मैं बच नहीं सकता। बल्कि सच पूछिए तो मुझे इसमें आनंद आता है। 

अनामीशरण – मनु जी, आपका यह चिर प्रतीक्षित ग्रंथ अब आ गया है, और पिछले कई महीनों के दौरान इस पर ढेरों प्रतिकियाएँ आपको मिली होंगी। उनमें कोरी तारीफ और सराहना वाली औपचारिक टिप्पणियों को छोड़ दें, तो ऐसे कितने गंभीर सुझाव या प्रतिकियाएँ मिलीं, जिनसे आपको लगा कि अब भी कुछ काम बाकी है? क्या लेखकों की प्रतिक्रियाओं में कुछ ऐसे मुद्दे भी उभरे, जिन पर इतिहास लिखते समय आपका ध्यान तो गया, पर आपने कोई खास महत्त्व नहीं दिया था?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, आपने ठीक कहा। इस ग्रंथ के आते ही पाठकों और बाल साहित्यकारों की प्रतिकियाओं की मानो बाढ़ आ गई। ज्यादातर साहित्यकारों ने मुक्त कंठ से इसकी सराहना की, और इसे बाल साहित्य में ‘एक मील का पत्थर’ कहा। एक वरिष्ठ साहित्यकार ने तो आचार्य रामचंद शुक्ल के इतिहास से इसकी तुलना करते हुए कहा कि मनु जी, जिस तरह आचार्य शुक्ल ने हिंदी साहित्य का इतिहास लिखकर एक बड़ा और ऐतिहासिक काम किया, उसी तरह हिंदी बाल साहित्य का इतिहास लिखकर आपने भी ऐसा काम किया है, जिसका महत्त्व समय के साथ निरंतर बढ़ता जाएगा। आज से सौ साल बाद भी लोग इतनी ही उत्सुकता और जिज्ञासा भाव के साथ इसे पढ़ेंगे। इसी तरह एक और बड़े साहित्यकार की टिप्पणी थी कि मनु जी, आपने बाल साहित्य के विशाल समंदर को मथकर उसकी सबसे उज्ज्वल मणियाँ और दुर्लभ खजाना खोज निकाला है और उसे इस बृहत् इतिहास-ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किया है।...ऐसी और भी ढेरों प्रतिक्रियाएँ थीं। पर अनामी भाई, सच तो यह है कि मैं खुद को आचार्य शुक्ल के पैरों की धूल भी नहीं समझता। हाँ, इतना जरूर है कि आचार्य शुक्ल के इतिहास समेत हिंदी साहित्य के अन्यान्य इतिहास-ग्रंथों को मैंने बड़ी गभीरता से पढ़ा है, और उनसे बहुत कुछ सीखा भी है। बाल साहित्य का इतिहास लिखते हुए वह मेरे बहुत काम आया। 

इस ग्रंथ को लेकर निस्संदेह ऐसे सुझाव और प्रतिकियाएँ भी मिलीं, अनामी भाई, जिनसे आगे के काम की दिशाएँ भी खुलती जान पड़ीं। मेरी बहुत कोशिशों के बावजूद कुछ नए-पुराने लोगों की कृतियाँ मुझे उपलब्ध नहीं हो पाई थीं। इसलिए मैं जिस तरह उन पर लिखना चाहता था, नहीं लिख पाया। इस इतिहास के आने पर बहुत से लेखकों ने अपना प्रकाशित साहित्य मुझे भेजा, जो पहले बहुत प्रयत्न करने पर भी मुझे हासिल नहीं हो पाया था। मैं इन कृतियों को पढ़कर नोट्स ले रहा हूँ, ताकि आगे चलकर इन्हें भी इतिहास में शुमार किया जाए। मुझे खेद है कि ये चीजें मुझे पहले नहीं मिलीं। पर अब मिली हैं तो मेरी पूरी कोशिश होगी कि इनमें से अच्छी कृतियों को उचित महत्त्व देते हुए, मैं इस इतिहास-ग्रंथ में शामिल करूँ तथा उनकी विशेषताओं को रेखांकित करूँ।

अनामीशरण - क्या अभी से आपने काम आरंभ कर दिया है, जिसे दूसरे संस्करण में समायोजित करेंगे?

प्रकाश मनु – जी हाँ, मैंने काम शुरू कर दिया है, और इस इतिहास-ग्रंथ के दूसरे संस्करण में वे सब चीजें शामिल हों, जो छूट गई थीं—मेरी यह पूरी कोशिश होगी। इसके अलावा इक्कीसवीं सदी के बाल साहित्य पर भी मेरी एक बड़ी पुस्तक आ रही है। उसमें भी इनमें से बहुत सी चीजों की चर्चा आपको मिलेगी।

अनामीशरण - इस इतिहास के लेखक प्रकाश मनु के बजाय, एक जाने-माने साहित्यकार तथा बच्चों के प्रिय लेखक और संपादक के तौर पर कृपया इस इतिहास के सबसे सबल और निर्बल पक्ष पर विस्तार से प्रकाश डालें। 

प्रकाश मनु – अनामी भाई, इस तरह अपने को अलग-अलग हिस्सों में बाँटकर तो मैं नहीं देखता। मैं बच्चों के लिए लिखूँ या बड़ों के लिए, बाल साहित्य का इतिहास लिखूँ या बच्चों के लिए कविता, कहानियाँ, नाटक और उपन्यास, बंदा तो मैं एक ही हूँ, और वही रहूँगा। एक रचनाकार के रूप में मैं यह लिखूँ या वह लिखूँ, उसमें जीवन और रस भी वही होगा, भाषा की रवानगी, कल्पना का वितान और मेरे भीतर की चिंताएँ भी वही रहेंगी। यहाँ तक कि मेरी उधेड़बुन और सुख-दुख भी वही रहेंगे, जो कहीं न कहीं मेरी हर रचना का हिस्सा बनते हैं। बस, थोड़ा-थोड़ा लिखने का ढंग बदलता है, और यह भी बड़े सहज ढंग से होता है। इसके लिए मैं कोई लबादा नहीं ओढ़ता और न इसकी कोई जरूरत पड़ती है।...अलबत्ता इस इतिहास-ग्रंथ के सबल और निर्बल पक्षों की बात करनी हो, तो मैं कहूँगा कि इस इतिहास-ग्रंथ में मैंने मन का इतना रस डाल दिया है कि कोई चाहे तो इस इतिहास को इतिहास के साथ-साथ एक रोचक उपन्यास के तौर पर भी पढ़ सकता है, और उसे इसमें वाकई आनंद आएगा। उसे लगेगा कि वह एक ऐसी फुलवारी से गुजर रहा है, जिसमें तरह-तरह के रंग और गंधों वाले बेशुमार फूल खिले हैं और तरह-तरह की मोहक वीथियाँ हैं। बाल कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, ज्ञान-विज्ञान साहित्य—बाल साहित्य की ये अलग-अलग विधाएँ ही जैसे उस सुंदर उद्यान की अलग-अलग सरणियाँ हैं। इनमें घूमते हुए पाठक एक रचनात्मक आनंद से भीगता है और उसका मन प्रफुल्लित होता है। इसलिए कि हर विधा की शक्ति और खूबसूरती को मैंने जगह-जगह बड़े आत्मीय ढंग से उजागर किया है। 

इसी तरह अगर इस इतिहास-ग्रंथ की निर्बलता की बात करनी हो, तो अपनी एक कमजोरी की मुझे स्वीकारोक्ति करनी चाहिए। और वह यह, कि मैं कुछ फूलों की सुंदरता पर इतना मुग्ध हो जाता हूँ कि उनके रस-माधुर्य का वर्णन करते हुए भूल ही जाता हूँ कि इस चक्कर में कुछ दूसरे उपेक्षित भी हो रहे हैं। एक इतिहासकार के नाते मैंने भरसक तटस्थ रहने की कोशिश की, पर मैं अपने मन और विचारों का क्या करूँ? जिन रचनाकारों की रचनाओं से मैं अधिक मुग्ध होता हूँ, तो जाहिर है, इतिहास में उनका प्रमुखता से और बार-बार जिक्र होता चलता है। मैं चाहूँ या न चाहूँ, इससे बच ही नहीं सकता। शायद एक अच्छे इतिहासकार के नाते मुझे अपनी रुचियों से थोड़ा और ऊपर उठना चाहिए था।...हालाँकि अनामी, मैं देखता हूँ, कि अगर इस तरह की दुर्बलता की बात की जाए तो आचार्य शुक्ल भी इससे परे नहीं हैं। वहाँ भी तुलसी की बात हो तो शुक्ल जी का मन जैसे बह उठता है, पर वही जब कबीर की बात करते हैं, तो उनका लहजा हमें बदला-बदला सा नजर आता है। फिर इतिहासकार कोरा इतिहासकार तो नहीं। इसके साथ-साथ वह एक मनुष्य, एक रचनाकार, आलोचक और साहित्य का पाठक भी तो है। वह अपने विचारों से तटस्थ कहाँ तक हो सकता है? हाँ, निजी संबंधों के घेरे से बेशक उसे ऊपर उठना चाहिए, और यह शुक्ल जी के इतिहास में भी आपको नजर आएगा, और सौभाग्य से मेरे बाल साहित्य के इतिहास में भी।

अनामीशरण – प्राचीन काल से लोककथाओं के विविध स्वरूपों से हम परिचित रहे हैं। तो क्या इसी तरह बाल काव्य की भी प्राचीन काल में सृजनात्मक परंपरा रही है और रही है, तो समय के साथ उसमें किस तरह के बदलाव आते गए? आपने अपने इतिहास में इसे किस तरह समेटा?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, लोककथाओं की तरह बच्चों के खेलगीतों की परंपरा भी सदियों पुरानी है। ‘खेल कबड्डी आल-ताल, मेरी मूँछें लाल-लाल...’ सरीखे गीत हमारे यहाँ बरसोंबरस से गाए जाते रहे हैं। कितनी ही पीढ़ियों का बचपन इन्हें गाते हुए गुजरा। इसी तरह ‘बरसो राम धड़ाके से, बुढ़िया मर गई खाके से...’, ‘सूख-सूख पट्टी, चंदन गट्टी...’, ‘चंदा मामा दूर के, खोए पकाए दूर के...’ ऐसे गीत हैं, जिनका आज से साठ-पैंसठ बरस पहले मैंने अपने बचपन में आनंद लिया था। अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे पिछले तीन-चार सौ बरसों से तो चल ही रहे हैं। पिछली जाने कितनी पीढ़ियों का बचपन इन्हें गाते-गुनगुनाते हुए, इनके साथ झूमते-गाते हुए बड़ा हुआ, और आज के बच्चे भी इन्हें भूले नहीं हैं। हम नहीं जानते कि कब से यह परंपरा चली आती है, शायद पाँच-छह सौ बरस पहले से या शायद और भी पहले थे।...कहना चाहिए कि यह मौखिक बालगीतों की परंपरा थी। बीसवीं सदी में आकर वही नए-नए बालगीतों में ढलकर एक नया साहित्यिक कलेवर ले लेती है और बच्चों के गले का हार बन जाती है। यों इससे पहले सूर, तुलसी के वात्सल्य वर्णन में, या फिर अमीर खुसरो की पहेलियों में बहुत कुछ ऐसा है, जो बालगीतों के बहुत नजदीक है। पर इसकी कोई अनवरत परंपरा नहीं बन पाई। मेरा मानना है कि यह बाल साहित्य की पूर्व पीठिका है। बाल साहित्य की सुव्यवस्थित परंपरा तो बीसवीं सदी के प्रारंभ से ही बन पाई। मैंने अपने इतिहास में प्रमुख रूप से उसी की चर्चा की है। बाल साहित्य की मौखिक परंपरा और मध्यकाल में सूर, तुलसी आदि की बाल छवियों और क्रीड़ा आदि के वर्णन को मैंने शामिल नहीं किया।

अनामीशरण - बाल साहित्य से जुड़े लेखकों को आज भी हमारे आलोचक लेखक नहीं मानते। खासकर बालगीतकारों के साथ तो कुछ ज्यादा ही उपेक्षा और नजरअंदाज करने का रवैया रहा है। बड़ों और बाल साहित्य के रचनाकारों के बीच इस अनुचित भेदभाव के तरीके पर आपकी क्या टिपणी है?

प्रकाश मनु – असल में अनामी भाई, यह हमारे समाज के कुंठित होने की निशानी है, जिसमें न बच्चे के लिए सम्मानपूर्ण स्थान है और न बाल साहित्य के लिए। हालाँकि दुनिया की हर संपन्न भाषा में बाल साहित्य और बाल साहित्य रचने वालों के लिए बहुत गहरे आदर और सम्मान की भावना है। फिर हमारे यहाँ बाल साहित्य और बाल साहित्यकारों के प्रति यह दुर्भाव क्यों है, यह समझना मुश्किल है।...जरूर इसके पीछे हमारे आलोचकों की कोई कुंठा है। हालाँकि प्रेमचंद सरीखे हिंदी के दिग्गज कथाकार ने बच्चों के लिए एक से एक सुंदर कहानियाँ लिखीं, बल्कि ‘कुत्ते की कहानी’ सरीखा उपन्यास भी, जिसे हिंदी का पहला बाल उपन्यास होने का गौरव हासिल है। पर पता नहीं क्यों, ज्यादातर लोग इस बात से अनजान हैं। इसी तरह आपको शायद पता नहीं कि प्रेमचंद की ‘ईदगाह’, ‘गुल्ली-डंडा’, ‘बड़े भाईसाहब’, ‘दो बैलों की कथा’ सरीखी कहानियाँ असल में बड़ों के लिए लिखी गई थीं। यह अलग बात है कि बच्चे भी इनका आनंद लेते हैं।...पर आपको आश्चर्य होगा कि प्रेमचंद ने विशेष रूप से बच्चों के लिए ‘गुब्बारे में चीता’ सरीखी कई सुंदर और भावपूर्ण कहानियाँ लिखी थीं, जो उनकी पुस्तक ‘जंगल की कहानियाँ’ में शामिल हैं। ये इतनी सुंदर और रसपूर्ण कहानियाँ हैं कि इन्हें पढ़ते हुए आपका भी बच्चा बन जाने का मन करेगा, ताकि आप इनका भरपूर आनंद ले सकें। और अकेले प्रेमचंद ही क्यों, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, सुभद्राकुमारी चौहान, रामनरेश त्रिपाठी और आगे चलकर निराला, पंत, महादेवी वर्मा, भवानी भाई, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना—सबने बच्चों के लिए लिखा और खूब लिखा। यह परंपरा आगे भी चलती आई और आज के दौर के कई बड़े और प्रतिभाशाली लेखक भी बच्चों के लिए लिख रहे हैं। निराला की ‘भिक्षुक’ जैसी मर्मस्पर्शी कविताएँ तो बच्चे पढ़ते ही हैं। पर उन्होंने बच्चों के लिए सुंदर जीवनियाँ भी लिखी हैं। इसी तरह निराला ने अपनी ‘सीख भरी कहानियाँ’ पुस्तक में ईसप की कथाओं को बच्चों के लिए बड़े ही खूबसूरत कलेवर में पेश किया है। इस पुस्तक की भूमिका भी बहुत महत्त्वपूर्ण है, जिसमें निराला कहते हैं, कि वही लेखक अमर हो पाता है, जिसकी रचनाएँ बच्चे रस लेकर पढ़ते हैं। यानी जो साहित्य बच्चों के दिल में उतर जाता है, वही अमर साहित्य है। बाल साहित्य के लिए ये सम्मानपूर्ण अल्फाज किसी और के नहीं, महाप्राण निराला के हैं, जो हमारे शीर्षस्थ साहित्यकार हैं, और बीसवीं सदी के सबसे बड़े कवि। फिर भी अगर आलोचकों को बाल साहित्य का यह विशाल वैभव नहीं नजर आता तो यह हमारी आलोचना का दुर्भाग्य है, हिंदी के बाल साहित्य का नहीं। 

वैसे अनामी भाई, आपको हैरानी होगी, हमारे आलोचक इतने कुंठित हैं कि जब वे रामनरेश त्रिपाठी, दिनकर, महादेवी वर्मा, रघुवीर सहाय या सर्वेश्वर के रचनाकार व्यक्तित्व की चर्चा करते हैं तो उनके बाल साहित्य को एकदम ओट कर देते हैं। पर वे नहीं जानते कि बाल साहित्य की चर्चा के बगैर इनमें से किसी भी साहित्यकार के व्यक्तित्व और संवेदना को वे ठीक से समझ ही नहीं सकते। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हिंदी की आलोचना अपनी पिछली भूल-गलतियों और सीमाओं से उबरेगी और बाल साहिय के महत्त्व को स्वीकारेगी। हालाँकि मैं फिर कहूँगा कि आलोचक स्वीकारें या नहीं, इससे हिंदी बाल साहित्य की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ता। वह तो है और अपने मीठे रस से लाखों बालकों को आनंदित कर रहा है, उनके व्यक्तित्व को दिशा दे रहा है। यह अपने आप में बड़ी बात है। आज आलोचना भूल कर रही है तो यकीनन कल वह भूल-सुधार भी करेगी, और तब उसे समझ में आएगा कि जिस बाल साहित्य को वह छोटा पोखर समझ रही थी, वह तो एक महासिंधु है। बस, आँखें खोलकर उसे देखने, समझने और सराहने की जरूरत है।

अनामीशरण – मनु जी, मेरे खयाल से बाल पाठकों के लिए करीब दर्जन भर बाल पत्रिकाएँ आज भी ठीक-ठाक निकल रही हैं, जिनके लाखों पाठक हैं। क्या आप इस स्थिति से संतुष्ट है?

प्रकाश मनु – पूरी तरह तो नहीं अनामी भाई, इसलिए कि इतने बड़े देश में हिंदी के बाल पाठकों के लिए कोई पचास-साठ पत्रिकाएँ तो होनी ही चाहिए। और कितना अच्छा हो, अगर उनकी ग्राहक संख्या लाखों में हो और वे देश के कोने-कोने में बैठे बच्चों तक पहुँचे। सच पूछिए तो मैं इन बाल पत्रिकाओं को, सिर्फ पत्रिका नहीं, बल्कि देश भर में फैले बाल पाठकों के लिए ओपन एयर यूनिवर्सिटी मानता हूँ। जीवन के ऐसे खुले विश्वविद्यालय, जिनमें नाम लिखाने की दरकार नहीं है। अगर आप नियमित पत्रिका पढ़ते हैं तो आप खुद-ब-खुद संस्कारित होंगे। आपकी भाषा, विचार, बल्कि कहना चाहिए समूचे व्यक्तित्व में निखार आएगा। इसलिए अनामी भाई, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे देश-समाज के बचपन को सँवारने में बाल पत्रिकाओं की बहुत बड़ी भूमिका है। हो सकता है, आज नहीं तो कल देश के विचारशील लोगों का ध्यान बाल पत्रिकाओं की ओर जाए, और यह बड़ी सुखद स्थिति होगी।

यों बाल पत्रिकाओं का वर्तमान भी कम उत्साहजनक नहीं है। बाल साहित्य बच्चों का साहित्य है और वह इन सुंदर, सुरुचिपूर्ण रूप-सज्जा वाली बाल पत्रिकाओं के जरिए उन तक पहुँच रहा है, तो संवाद अपने आप पूरा हो जाता है। बाल साहित्य के अच्छे आलोचक और पारखी हों तो यह और भी अच्छी बात है, पर अगर यह काम उतनी बड़ी मात्रा में नहीं हो पा रहा, तो भी अच्छा बाल साहित्य किसी सुंदर गुलदस्ते जैसी सजी-धजी, बहुरंगी पत्रिकाओँ के माध्यम से बच्चों तक पहुँचे, उनके व्यक्तित्व और रुचियों को सँवारे और उनके संपूर्ण विकास में अपनी भूमिका निभाए, तो यह भी कोई छोटी बात नहीं है। मेरा निश्चित मत है कि आज के निराशा भरे दौर में भी, अगर हमारे यहाँ बचपन अधिक भटका नहीं है, तो इसका श्रेय हमें अच्छी बाल पत्रिकाओं को देना होगा।

अनामीशरण – मनु जी, बाल साहित्य के समकालीन हालात पर आपकी प्रतिकिया? 

प्रकाश मनु – अनामी भाई, सच कहूँ तो वर्तमान दौर बाल साहित्य की सर्वांगीण उन्नति और बहुमुखी विकास का दौर है, जब कि उसकी पताका आसमान में ऊँची लहरा रही है। ‘नंदन’ के यशस्वी संपादक जयप्रकाश भारती जी बड़े जोर-शोर और उत्साह से इक्कीसवीं सदी को बालक और बाल साहित्य की सदी कहा करते थे। तब उनकी बात हमें ज्यादा समझ में नहीं आती थी। पर यह एक सुखद आश्चर्य है कि समय ने इसे सच कर दिया है। निस्संदेह इक्कीसवीं सदी बाल साहित्य के असाधारण उत्कर्ष की सदी है। इसे आज बड़ों के साहित्यकार भी महसूस कर रहे हैं और वे खुद बड़ी जिम्मेदारी के साथ बच्चों के लिए लिख रहे हैं। अगर कोई खुली आँखों से देखे तो उसे आज बाल साहित्य की विजय-गाथा हवाओं के मस्तक पर लिखी हुई नजर आ सकती है। जो लोग आज इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे, वे कल इसे स्वीकार करेंगे। इसके अलावा उनके पास दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है।

अनामीशरण - कई दशक तक देश की सबसे अच्छी और सबसे अधिक बिकने वाली पत्रिका ‘नंदन’ के साथ आप जुड़े रहे। आपके खयाल से उस समय के ‘नंदन’ का सबसे सबल पक्ष क्या था? ऐसे ही, ‘नंदन’ में और क्या सुधार होना चाहिए था, ताकि इसका महत्त्व और बेहतर साख रहती?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, आपका यह सवाल बहुत अच्छा है। मैं कोई पच्चीस वर्षों तक ‘नंदन’ के संपादन से जुड़ा रहा। लगभग अपना पूरा जीवन ही मैंने ‘नंदन’ के जरिए बाल साहित्य की सेवा में लगाया है, और ये दिन मेरे लिए कितने आनंद भरे थे, मैं आपको बता नहीं सकता। इसलिए कि ‘नंदन’ के जरिए देश भर के बच्चों और बाल साहित्य दोनों से जुड़ने का आनंद मुझे मिला। इससे मेरा मन ही नहीं, आत्मा भी शीतल होती थी और कहीं अंदर लगता था कि बच्चों के लिए लिखकर हम उनके नन्हे हृदयों में उजाला कर रहे हैं। ऐसे असंख्य दीप जलाकर मानो हम ईश्वर का ही अधूरा काम पूरा कर रहे हैं, जिससे यह दुनिया कुछ और सुंदर और आनंदपूर्ण हो जाएगी! अनामी भाई, आपने ‘नंदन’ के सबसे सबल पक्ष के बारे में पूछा है। मेरे खयाल से ‘नंदन’ का सबसे सबल पक्ष यह था कि उसमें बच्चों के लिए ऐसी सामग्री हम लोग देते थे, जिसे पढ़कर वे आनंदित हों और खेल-खेल में बहुत कुछ सीखें भी। उसमें छपने वाली कहानियाँ हों, कविताएँ, लेख या फिर विविध किस्म की जानकारियाँ, ये सब इतनी आसान भाषा में और इतने रुचिकर ढंग से हम लोग प्रस्तुत करते थे, कि अगर किसी बच्चे के सामने ‘नंदन’ पत्रिका रखी हो, तो वह उसे उठाए बगैर रह ही नहीं सकता था। और एक बार हाथ में लेने के बाद वह उसे पढ़े बिना नहीं छोड़ सकता था। यह बहुत बड़ी चीज थी, जिसने ‘नंदन’ को लाखों बच्चों की सबसे लोकप्रिय और चहेती पत्रिका बना दिया।...उन दिनों जयप्रकाश भारती जी ‘नंदन’ के संपादक थे और उनके प्राण जैसे ‘नंदन’ में ही बसते थे। पत्रिका में छपने वाली रचनाओं का एक-एक शब्द उनकी आँखों से गुजरता था, तभी वह छपने जाता था। वे हमें सिखाते कि हम बच्चों के लिए जो भी लिखें, वह बेहद आसान भाषा में हो। वाक्य छोटे-छोटे, रोजमर्रा के जीवन में स्तेमाल होने वाले आसान शब्द...पर उन्हीं में हम चाहें तो बहुत गहरा प्रभाव ला सकते हैं। यह ‘नंदन’ की एक बड़ी विशेषता थी, जो आज भी बनी हुई है। इसी तरह भारती जी पत्रिका में ज्ञान या उपदेश ठूँसने के खिलाफ थे। वे कहते थे, ज्ञान की यह भारी गठरी तो बच्चों की पाठ्य पुस्तकों में ही बहुत है। हमें उसके सिर पर रखे बोझे को और बढ़ाना नहीं है, बल्कि कम करना है। बच्चा ‘नंदन’ की रचनाएँ उत्फुल्ल होकर पढ़ेगा तो उसके भीतर पढ़ने-लिखने की ऐसी ललक पैदा होगी कि स्कूल की किताबें भी वह बड़ी रुचि से पढ़ेगा, जीवन में बहुत कुछ सीखेगा और आगे चलकर देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनेगा, जिसके मन में दूसरों के लिए प्यार और हमदर्दी होगी। ऐसा सहृदय और संवेदनशील बच्चा किसी के साथ बेईमानी नहीं करेगा, किसी को धोखा नहीं देगा। सच पूछिए तो ‘नंदन’ बच्चों के भीतर बड़े-बड़े जीवन-मूल्य भरने वाली पत्रिका थी, पर यह सब इतना अनायास होता था कि बच्चे को पता ही नहीं चलता था कि वह खेल-खेल में कैसे जीवन की बड़ी-बड़ी बातें सीखता जा रहा है। मैं समझता हूँ, ‘नंदन’ की सबसे बड़ी खासियत शायद यही थी।

आपने उस दौर के ‘नंदन’ में सुधार की बात पूछी है, तो बस एक ही बात हम लोग महसूस करते थे कि इसमें परीकथाओं और पुराण कथाओं की अधिकता है। उस समय ‘नंदन’ पत्रिका अगर इस अति से बच पाती और साथ ही आधुनिक कथाएँ भी उसमें शामिल होतीं, जिनमें बच्चे अपने जीवन में नित्यपति जो देखते और झेलते हैं, उसके अक्स सामने आते, तो पत्रिका का रूप कुछ अधिक संतुलित हो जाता। इसी तरह खेल, विज्ञान आदि का महत्त्व दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है, उनके बिना आज के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पर ‘नंदन’ में उनकी उपस्थिति उतनी न थी, जितनी होनी चाहिए थी। पत्रिका में बच्चों को खेल-खेल में विज्ञान की जानकारी दी जाती, तो जरूर वे रुचि से पढ़ते और बहुत कुछ सीखते भी। विज्ञान भी उनके लिए खेल की तरह ही होता। इसी तरह खेलों के इतिहास आदि की जानकरी उन्हें दी जाती तो यह बहुत आनंददायक होता। पर ‘नंदन’ में ये चीजें बहुत कम देखने को मिलती थीं और कभी-कभार ही नाम-मात्र के लिए उनके दर्शन हो जाते थे। बाद में भारती जी के सेवामुक्त होने पर जब क्षमा शर्मा जी कार्यकारी संपादक बनीं, तो ‘नंदन’ का रूप बदला। हम सबने उसके नए कलेवर के बारे में खुले मन से विचार किया। फिर ‘नंदन’ में बड़े अनूठे ढंग से नई-नई चीजें शुरू की गईं। बाल पाठकों ने इस बदलाव को बहुत पसंद किया। हम लोगों ने पत्रिका के एक से एक सुंदर विशेषांक निकाले, जिन पर बच्चो की बहुत उत्साहपूर्ण प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलती थीं।...काश, यह कुछ बरस पहले भारती जी के समय में ही हो जाता, तो ‘नंदन’ का जलवा आज कुछ और ही होता, और बेशक उसकी प्रसार संख्या भी बढ़ती। 

अनामीशरण – मनु जी, देश में इस समय प्रकाशित हो रही बाल पत्रिकाओं के हाल पर आपकी क्या राय है?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, इस समय देश में हिंदी की कई अच्छी बाल पत्रिकाएँ प्रकाशित हो रही हैं, जिनका जुदा-जुदा व्यक्तित्व है और अपने ढंग से सभी बाल साहित्य की सेवा कर रही हैं। इनमें ‘नंदन’ और ‘बाल भारती’ पत्रिकाएँ तो बहुत पुरानी हैं। उन्होंने एक तरह से अपना पुराना चोला उतारकर आज के समय से अपना रिश्ता बनाया है और पुनर्नवा होकर बच्चों और बाल साहित्य की महत्त्वपूर्ण संदेशवाहिका बनी हुई हैं। इनमें ‘बाल भारती’ पत्रिका सन् 1948 में प्रारंभ हुई थी और ‘नंदन’ सन् 1964 से निकल रही है। समय के बहुत थपेड़े झेलकर और बहुत सारे परिवर्तनों से होते हुए भी वे अच्छा बाल साहित्य बच्चों तक पहुँचा रही हैं, यह अच्छी बात है। इसी तरह ‘चकमक’ एक अलग तरह की पत्रिका है, जिसकी सोच काफी अलग है और उसने लीक से हटकर बहुत से अच्छे काम किए हैं। इन सबसे अलग एक बेहद महत्त्वपूर्ण पत्रिका, जिसके पीछे कोई बड़ा आर्थिक अवलंब नहीं है और जो बहुत कम साधनों से निकल रही है, वह है ‘बालवाटिका’, जिसने पिछले कुछ वषों में अपनी एक नई सबल पहचान बनाई है, और उसे बाल साहित्य की सर्वाधिक प्रतिनिधि पत्रिका होने का गौरव हासिल है। ‘बालवाटिका’ की विशेषता है कि उसके साथ देश भर के बाल साहित्यकार जुड़े हैं और पत्रिका के बड़े ही विनम्र और समर्पित संपादक भैरूँलाल गर्ग बड़े आदर के साथ नए-पुराने सभी बाल साहित्यकारों की रचनाएँ प्रकाशित करते हैं। बाल साहित्य और बाल साहित्यकारों का परिवार कितना बड़ा और रचनात्मक रूप से समृद्ध है, यह ‘बालवाटिका’ पढ़ने से ही पता चल जाता है। 

‘बालवाटिका’ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ न सिर्फ बाल साहित्यकारों की अच्छी से अच्छी रचनाएँ पढ़ने को मिलती हैं, बल्कि बाल साहित्य विमर्श की भी यह बड़ी महत्त्वपूर्ण पत्रिका है। बाल साहित्य से जुड़े हुए मुद्दों को वह बड़ी गंभीरता से उठाती है। इसी तरह अपना पूरा जीवन लगाकर बच्चों का साहित्य लिखने वाले बड़े और दिग्गज साहित्यकारों पर ‘बालवाटिका’ में समय-समय पर बड़े गंभीर और पठनीय लेख पढ़ने को मिल जाते हैं। इतना ही नहीं, पिछले कुछ वर्षों से बाल साहित्य के शिखर पुरुषों निरंकारदेव सेवक, द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी, हरिकृष्ण देवसरे, जयप्रकाश भारती, डा. श्रीप्रसाद, आनंदप्रकाश जैन, ठाकुर श्रीनाथ सिंह, शकुंतला सिरोठिया, मनोहर वर्मा, राष्ट्रबंधु आदि पर इतने सुंदर और स्मरणीय विशेषांक ‘बालवाटिका’ के निकले कि शायद कुछ बरस पहले इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती थी। निश्चित रूप से ‘बालवाटिका’ का यह एक ऐतिहासिक अवदान है। इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। इसी तरह ‘बालवाटिका’ बाल साहित्य की एकमात्र पत्रिका है, जिसमें निरंतर बाल साहित्य की विविध विधाओं पर बड़ी रोचक सामग्री पढ़ने को मिल जाती है। यह भी, मैं समझता हूँ, बड़ी प्रशंसनीय कोशिश है। बच्चों के लिए बड़े ही सरस और भावपूर्ण संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, आत्मकथा-अंश, उपन्यास-अंश, एकांकी आदि जितनी बहुलता से ‘बालवाटिका’ में छपते हैं, वैसा कहीं और देखने को मिलेगा, यह कल्पना तक मुश्किल है। शकुंतला सिरोठिया, द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी जी और निरंकारदेव सेवक जी की जन्मशती पर किसी और पत्रिका में शायद दो पंक्तियाँ भी नहीं छपीं, पर ‘बालवाटिका’ ने सुंदर विशेषांक निकालकर उनका स्मरण किया। इससे बाल साहित्य का गौरव बढ़ा है, इसलिए देखते ही देखते ‘बालवाटिका’ बाल साहित्य की सबसे महत्त्वपूर्ण और प्रतिनिधि पत्रिका के रूप में उभरकर आई है, जिसके साथ बाल साहित्यकारों का एक बड़ा कारवाँ नजर आता है। आगे भी यह इसी तरह चले तो कोई शक नहीं कि बाल साहित्य की कीर्ति-पताका दूर-दूर तक लहराती नजर आएगी। 

हालाँकि यह खुद में बड़े आश्चर्य की बात है कि इतने सीमित साधनों से ऐसा असंभव लगता काम गर्ग जी ने इतनी विनमता और समर्पण भाव के साथ कर दिखाया। उनके आग्रह पर रचनाकार अपना सर्वश्रेष्ठ देने के लिए विकल रहते हैं। निस्संदेह इस सबने ‘बालवाटिका’ को बाल पत्रिकाओं की कतार में सबसे अलग और वरेण्य स्थान पर काबिज कर दिया है। यों सभी पत्रिकाएँ अपने-अपने ढंग से काम कर रही हैं, पर ‘बालवाटिका’ कई मामलों में बेनजीर है और अपने ढंग से बाल साहित्य की अनथक सेवा कर रही है। कुछ पत्रिकाएँ सिर्फ पत्रिकाएँ होती हैं और इतिहास में उनका नाम दर्ज होता है, पर कुछ पत्रिकाएँ आगे बढ़कर इतिहास निर्मित करती हैं। ‘बालवाटिका’ को भी मैं इस दृष्टि से, बाल साहित्य का इतिहास गढ़ने वाली पत्रिका कहता हूँ।

अनामीशरण - आज जब बाल साहित्य के इतिहास पर आपने काम कर लिया है तो आपकी नजर में बच्चों के लिए एक सार्थक, रचनात्मक और सर्वोत्तम बाल पत्रिका कैसी होनी चाहिए? इसकी रूपरेखा पर कृपया प्रकाश डालें। 

प्रकाश मनु – मैंने बताया न, ‘नंदन’, ‘बाल भारती’, ‘चकमक’ और ‘बालवाटिका’—ये सभी पत्रिकाएँ अपने-अपने ढंग से बाल साहित्य की सेवा कर रही हैं। सभी का जुदा-जुदा व्यक्तित्व है, पर सभी में कुछ न कुछ ऐसा है जो औरों से अलग और विशिष्ट है। इसलिए इन सभी पत्रिकाओं की विशेषताएँ शामिल करके अगर कोई आदर्श पत्रिका बन सके, तो वह शायद मेरे ही नहीं, हर बच्चे और बाल साहित्यकार की भी सबसे प्रिय पत्रिका होगी, जो उसके दिल के बहुत करीब होगी। मेरे सपनों की इस आदर्श पत्रिका में ‘नंदन’ और ‘चकमक’ सरीखी पत्रिकाओं की मोहक सज्जा और आकर्षण होगा तो ‘बाल भारती’ सरीखा परंपरा और आधुनिकता का सम्मिलन भी। साथ ही उसमें ‘बालवाटिका’ सरीखी वैचारिक ऊर्जा, प्रखरता और रचनात्मक समृद्धि होगी। इतना ही नहीं, ‘बालवाटिका’ में बाल साहित्य के साथ-साथ बाल साहित्यकारों के प्रति भी असीम सम्मान का भाव नजर आता है। मेरी आदर्श पत्रिका में यह चीज जरूर होगी। इसी तरह ‘बालवाटिका’ में कहानी, कविता के साथ-साथ बड़े ही भावपूर्ण संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, आत्मकथा, उपन्यास-अंश, एकांकी आदि भी पढ़ने को मिल जाते हैं। मैं चाहूँगा कि मेरी आदर्श पत्रिका में बाल साहित्य की ये सभी विधाएँ शामिल हों, ताकि वह समस्त बाल साहित्य की सर्वाधिक प्रतिनिधि पत्रिका कहला सके।...यों बेशक उसमें ‘बालवाटिका’ का अंश सबसे अधिक होगा, इसलिए कि गर्ग जी उसमें बाल साहित्यकारों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रचनाएँ आग्रह कर-करके मँगवाते, और उतने ही आदर के साथ सँजोते भी हैं। ‘बालवाटिका’ और उसके उत्साही संपादक भैरूँलाल गर्ग जी के मन में लेखकों और साहित्यकारों के प्रति जो सम्मान का भाव है, उसका सौवाँ अंश भी मुझे किसी और पत्रिका में नजर नहीं आता। पर इसे मैं इन पत्रिकाओं की बड़ी कमजोरी मानता हूँ। अगर बाल साहित्यकारों के प्रति आपके मन में सम्मान नहीं है, तो बाल साहित्य के प्रति आपका अनुराग भी सच्चा नहीं हो सकता। 

यों एक बात तो निश्चित है कि मेरी आदर्श बाल पत्रिका में बाल साहित्य के लिए जीवन अर्पित करने वाले साहित्यिकों की आपको निरंतर उपस्थिति देखने को मिलेगी। उनकी कालजयी रचनाओं के जरिए उन्हें याद करने का सिलसिला भी चलता रहेगा। मेरी वह आदर्श पत्रिका कब निकलेगी, कैसे निकलेगी और मेरे जीवन काल में निकलेगी भी कि नहीं, मैं नहीं जानता। पर कम से कम उसका सपना तो मैं देख ही सकता हूँ, और अनामी भाई, मैं अपने जीवन के आखिरी पल तक ऐसी सुंदर और सर्वांगपूर्ण पत्रिका का सपना देखता रहूँगा।

अनामीशरण – बड़ों के साहित्य के समकालीन परिदृश्य पर आपकी टिप्पणी? उसकी तुलना में बाल साहित्य के वर्तमान हालात को आप किस तरह देखते हैं?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, मोटे तौर से बड़ों के साहित्य और बाल साहित्य के समकालीन परिदृश्य में कोई बहुत अंतर नहीं है। दोनों ही रचनात्मक दृष्टि से खासे समृद्ध हैं और एक उत्साह भरा माहौल दोनों में ही नजर आता है। जिस तरह बड़ों के लिए लिखी जा रही कहानियों, कविताओं, उपन्यासों आदि में नई पीढ़ी बहुत प्रचुरता से हिस्सा ले रही है और एक ताजगी भरी फिजाँ दिखाई देती है, लगभग वही मंजर बाल साहित्य में भी है, जिसमें एक साथ तीन या चार पीढ़ियों के साहित्यकार निरंतर लिख रहे हैं और हर ओर खासी सक्रियता नजर आती है। शायद बड़ों के लिए लिखे जा रहे साहित्य का ही बाल साहित्य पर यह प्रभाव पड़ा कि अभी तक उपेक्षित रही विधाओं संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत, रेखाचित्र, आत्मकथा आदि में भी अब खासी हलचल दिखाई देती है। और यहाँ तक कि जीवनी और ज्ञान-विज्ञान साहित्य में भी बहुत कुछ नयापन और कलातमक ताजगी नजर आती है। खासकर युवा पीढ़ी की सक्रियता दोनों ही जगह उत्साह भरा मंजर उपस्थित करती दिखाई देती है। इससे कई जगह तो पुरानी पीढ़ी के अंदर भी थोड़ी सक्रियता और कुछ नया करने की ललक पैदा हुई है। इसे मैं शुभ संकेत मानता हूँ।

इसी तरह बड़ों का साहित्य हो या बाल साहित्य, दोनों ही जगह अगर एक ओर उत्कृष्ट साहित्य नजर आता है तो दूसरी ओर बहुत सी साधारण चीजों की बाढ़ भी है, जिनके बीच से श्रेष्ठ और उत्कृष्ट को निरंतर अलगाने की जरूरत है। पर बड़ों के साहित्य को समीक्षा, आलोचना आदि के जैसे सुअवसर मिल जाते हैं, वैसा बाल साहित्य में बहुत कम है, और इसका कुछ खमियाजा भी उसे सहना पड़ता है। इसके कारण बाल साहित्य में जो श्रेष्ठ है, उस पर हमारा ध्यान नहीं जाता, और कई बार औसत साहित्य इतनी जगह घेर लेता है कि बहुत लोग पूछते हैं कि मनु जी, क्या यही है वह बाल साहित्य, जिसके आप इतने गुण गाते हैं? तब उन्हें समझाना पड़ता है कि देखिए, बाल साहित्य में बहुत सी साधारण चीजें भी हैं। जैसे कोई भूसे से भरी कोठरी हो, जिसमें बीच-बीच में बहुत मीठे रसभरे दाने भी नजर आ जाते हैं। पर किसी भी साहित्य का मूल्यांकन तो उसकी श्रेष्ठ रचनाओं से ही होना चाहिए। यह जितना बड़ों के साहित्य के बारे में सच है, उतना ही बाल साहित्य के बारे में भी। तो कुल मिलाकर अनामी भाई, हिंदी में बड़ों के लिए लिखा जाने वाला साहित्य और बाल साहित्य—ये दोनों दो समांतर चलती निरंतर प्रवहमान नदियाँ हैं, जो एक-दूसरे को भी कुछ न कुछ प्रेरणा देती हैं। मैं समझता हूँ, यह किसी भी भाषा के लिए बड़े गौरव की चीज है। 

अनामीशरण – आपका यह महाग्रंथ बाल लेखन का इतिहास है या बाल साहित्य का इतिहास? यदि बाल साहित्य का इतिहास है तो बाल साहित्य क्या है, या साहित्य में बालपन क्या है, जिसके महत्त्व को निरंतर उपेक्षित किया जाता रहा है?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, बाल साहित्य और बाल लेखन में कोई फर्क तो है नहीं। वैसे मेरा इतिहास-ग्रंथ हिंदी बाल साहित्य का इतिहास है। यों भी बाल साहित्य, मेरे खयाल से, बाल लेखन की तुलना में कहीं अधिक व्यापक और मानीखेज भी है। फिर बाल लेखन से कुछ ध्वनि इस तरह की भी निकलती है कि यह केवल बच्चों दारा लिखा गया साहित्य है, जबकि बाल साहित्य असल में तो बड़ों द्वारा बच्चों के लिए लिखा गया साहित्य है। इसमें कुछ हिस्सा बच्चों द्वारा खुद भी लिखा गया है, पर मोटे तौर से तो बड़ों ने बच्चों के लिए जो सुंदर, मोहक और आनंदपूर्ण रचनाएँ लिखीं, वे ही बाल साहित्य के अंतर्गत आती हैं।

अनामीशरण - इतिहास लेखन के सिलसिले में बरसोंबरस जो गहरी खोजबीन आपने की, उसमें आपको क्या ऐसा अनोखा और रोमांचित करने वाला मिला, या कि अभी तक अज्ञात रहे कौन-कौन से ऐसे अनमोल रत्न हासिल हुए, जिन्हें अब आप किसी और तरह से सामने लाने की योजना पर काम कर रहे हैं?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, इतिहास लिखते समय जो सबसे अद्भुत चीजें मुझे मिलीं, वे थीं हमारे बड़े साहित्यकारों द्वारा बच्चों के लिए लिखी गई एक से एक मनोरम रचनाएँ। हिंदी बाल साहित्य का यह पक्ष बहुतों के लिए अज्ञात है। पर वह इतना सुंदर, मोहक, अनुपम और रोमांचित करने वाला है कि सच पूछिए तो मैं हैरान रह गया। हिंदी में बार-बार यह कहा जाता है कि बड़े साहित्यकारों ने बाल साहित्य नहीं लिखा, पर इतिहास लिखते समय निरंतर अध्ययन और खोजबीन से यह धारणा गलत साबित हुई। लगा कि हिंदी के एक से एक दिग्गज कवियों, कथाकारों ने बच्चों के लिए लिखा है। और बहुत अच्छा लिखा है। मैं प्रेमचंद क जिक्र तो पहले कर ही चुका हूँ, जिन्होंने बच्चों के लिए पहला उपन्यास ‘कुत्ते की कहानी’ लिखा, और इसे मैं बाल साहित्य का बहुत बड़ा गौरव और सौभाग्य मानता हूँ। इसी तरह प्रेमचंद ने ‘जंगल की कहानियाँ’ शीर्षक से बच्चों के लिए विशेष रूप से कुछ कहानियाँ लिखीं, जिनका आज भी बहुतों को पता नहीं है। बाल साहित्य के प्रांरंभिक काल में हरिऔध, मैथिलीशरण गुप्त, दिनकर, सुभदाकुमारी चौहान, रामनरेश त्रिपाठी सरीखे कवियों ने बच्चों के लिए एक से एक सुंदर कविताएँ लिखीं। ये कविताएँ सचमुच निराले और अनमोल रत्नों सरीखी हैं। इसी तरह मैथिलीशरण गुप्त की लिखा एक बड़ी सुंदर बाल कहानी भी मुझे मिली, जो ‘बाल भारती’ पत्रिका में छपी थी। कहानी का नाम है, ‘जगद्देव’ और यह वाकई मन को बाँध लेने वाली कहानी है, जिसमें जगद्देव का त्यागमय, उदात्त चरित्र भूलता नहीं है। बाद के दौर में भवानी भाई, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना सरीखे कवियों ने एक से एक अद्भुत कविताएँ लिखीं। पंत और महादेवी ने भी बच्चों के लिए रसपूर्ण कविताएँ लिखीं और निराला की ‘सीख भरी कहानियाँ’ तो बहुत ही दमदार हैं। निराला ने बच्चों के लिए सुंदर जीवनियाँ भी लिखीं, जिनका बहुतों को पता नहीं है। इसी तरह कमलेश्वर, मोहन राकेश, राजेंद्र यादव, मन्नू भंडारी, शैलेश मटियानी, कृष्ण चंदर, कृष्ण बलदेव वैद, हरिशंकर परसाई सरीखे लेखकों ने बच्चों के लिए खूब लिखा। बल्कि आपको हैरानी होगी, मैंने कृष्णा सोबती के कुछ सुंदर कल्पनापूर्ण शिशुगीत भी पढ़े हैं, जो ‘नंदन’ के पुरानी फाइलों में सुरक्षित हैं। मैंने उनका जिक्र इस इतिहास-ग्रंथ में किया है। इसी तरह बाद के दौर में रमेशचंद्र शाह, राजेश जोशी, नवीन सागर समेत बहुत से लेखकों-कवियों ने बच्चों के लिए लिखा, जिनका कोई जिक्र नहीं करता और बहुतों को इसकी जानकारी भी नहीं है। पर इस इतिहास-ग्रंथ में उनके लिखे बाल साहित्य का मैंने बड़े सम्मान से जिक किया है। इसी तरह श्रीलाल शुक्ल ने रवींद्रनाथ ठाकुर की एक पद्यकथा के आधार पर इतना अद्भुत हास्य-विनोदपूर्ण बाल नाटक लिखा है कि उसे पढ़कर बच्चा बन जाने का मन करता है। यह नाटक है, ‘आविष्कार जूते का’। पढ़ते जाइए और खुदर-खुदर हँसते जाइए। मैं समझता हूँ, इस इतिहास-ग्रंथ में ऐसे एक से एक अनमोल नगीने हैं, जिन्हें पढ़कर बहुतों की आँखें खुल जाएँगी और बाल साहित्य की सीमाएँ कहाँ-कहाँ तक जा पहुँची हैं, जानकर वे अचरज में पड़ जाएँगे।...मेरा मन है कि बाल कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि के बड़े संचयन निकालूँ, जिसमें मौजूद दौर के रचनाकारों के साथ-साथ पुराने साहित्य महारथियों के ऐसे अनमोल नगीनों को भी शामिल करूँ। वह कब तक हो पाएगा, हो पाएगा भी कि नहीं, मैं नहीं जानता। इसलिए कि अब मेरी शक्तियाँ क्षीण हो रही हैं। पर अगर साँसों की डोर चलती रही, तो ऐसे कुछ बड़े और यादगार काम तो मैं जरूर करना चाहूँगा।

अनामीशरण – मनु जी, अपने इतिहास लेखन की कुछ प्रेरणादायी बातों को आप पाठकों को बताना चाहेंगे?

प्रकाश मनु – हाँ, अनामी भाई। और इसमें सबसे प्रमुख बात यह है कि बाल साहित्य हर दौर में बच्चों से और अपने समय से करीबी तौर से जुड़ा रहा है और उसमें लगातार आशा, जिजीविषा के स्वर सुनाई देते रहे हैं, जिनसे बच्चों में कुछ कर दिखाने का हौसला पैदा होता है। फिर एक बड़ी बात है, बाल साहित्य की शाश्वत अपील की। आज से साठ बरस पहले की पीढ़ी जिस बाल साहित्य को पढ़कर बड़ी हुई, उसे उनके बच्चों ने और आगे चलकर नाती-पोतों ने भी पढ़ा और वही आनंद हासिल किया। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि बाल साहित्य हमारी भाषा और हमारे देश-समाज की स्थायी धरोबहर है। वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे देश के बचपन को सँवार रहा है। बच्चों को बचपन की उत्फुल्लता से जोड़ने के साथ-साथ बाल साहित्य उनके अनुभव-क्षितिज का भी निरंतर विस्तार करता है और उनकी आत्मा को उजला करता है। ऐसे बच्चे बड़े होकर निश्चित रूप से देश के बहुत सजग, जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बनेंगे और बड़े-बड़े काम कर दिखाएँगे। 

और सबसे बड़ी बात तो यह है कि बाल साहित्य हमें अच्छा मनुष्य बनाता है। ऐसे बच्चे बड़े होकर इंजीनियर बने तो वे अच्छे और कुशल इंजीनियर साबित होंगे, डाक्टर बने तो अच्छे और सहानुभूतिपूर्ण डाक्टर बनेंगे और अध्यापक बने तो बड़े स्नेहिल और जिम्मेदार अध्यापक बनेंगे। मैं समझता हूँ, बाल साहित्य की यह बहुत बड़ी सेवा है। अनामी भाई, यह इतिहास लिखते हुए मैंने पाया कि ऐसा सुंदर, कल्पनापूर्ण और सुंदर भावों से भरा बाल साहित्य हमारे देश में हर काल में लिखा गया और उसने पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बचपन को सँवारा। इसका सीधा मतलब यह है कि इस देश को समृद्ध करने और सही दिशा में आगे बढ़ाने में बाल साहित्य की बहुत बड़ी भूमिका रही है। यह निस्संदेह बड़ी सुखद और रोमांचित करने वाली बात है, जो हमारे भीतर आशा और उम्मीदों का उजाला भर देती है।

अनामीशरण - इस इतिहास लेखन के बाद क्या बाल लेखन के प्रति आपकी धारणा में कोई बदलाव आया है? बाल साहित्य को लेकर आपकी सबसे बड़ी चिंता क्या है?

प्रकाश मनु – हाँ, अनामी भाई, बाल साहित्य का इतिहास लिखने के बाद एक बड़ा परिवर्तन तो आया है मेरे विचारों में। बल्कि एक नहीं, कई परिवर्तन। सबसे बड़ा परिवर्तन तो यह है कि इतिहास लेखन के बाद बाल साहित्य की शक्ति, रचनात्मक समृद्धि तथा बच्चों के भीतर भाव और संवेदना के विस्तार की उसकी अपरिमित सामर्थ्य को लेकर मेरे भीतर आस्था कहीं अधिक गहरी हुई है। मुझे लगता है कि आज जब हमारे समाज में चारों ओर निराशा का पसारा है, तो ऐसे माहौल में बाल साहित्य एक बड़ी संभावना है, जो हमारे दिलों में उम्मीद के दीए जलता है। यहीं एक बात और जोड़नी जरूरी लगती है कि बाल साहित्य बच्चों के लिए तो जरूरी है ही, पर वह केवल बच्चों के लिए ही नहीं, बड़ों के लिए भी उतना ही जरूरी है। बड़े उसे पढ़ते हैं तो उन्हें अपना भोला बचपन याद आता है। बचपन की उस निश्छल दुनिया में पहुँचना उन्हें कहीं अंदर से निमज्जित करता है और पवित्र बनाता है। फिर एक बात और। बड़े जब बाल साहित्य पढ़ेंगे, तो बच्चों के मन और संवेदना को अच्छी तरह समझ पाएँगे। इससे उन्हें यह भी समझ में आएगा कि हम कोई ऐसा काम न करें, जिससे बच्चों के कोमल हृदय को चोट पहुँचे। वे बच्चों के मन की उमंग और सपनों को बेहतर ढंग से समझ पाएँगे और उसे पूरा करने के लिए दोस्त बनकर मदद करेंगे। इससे बच्चों का व्यक्तित्व तो निखरेगा ही, बड़ों का व्यक्तित्व भी निखरेगा। वे अच्छे माता-पिता, अभिभावक और स्नेहशील अध्यापक बन सकेंगे।

अनामीशरण – पर मनु जी, यहीं एक सवाल है मेरा। आपको क्या लगता है, बाल लेखन क्या बच्चों की पहुँच में है? 

प्रकाश मनु – हाँ, हिंदी में बच्चों के लिए अच्छी पत्रिकाएँ तो हैं ही, इसके अलावा उनके लिए बहुत पुस्तकें छपती हैं और वे बिकती भी हैं। यह एक संकेत तो है कि बाल साहित्य बच्चों तक पहुँच रहा है और पढ़ा जा रहा है। फिर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, साहित्य अकादेमी तथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय का प्रकाशन विभाग—ये सभी संस्थान बच्चों के लिए सुंदर ढंग से पुस्तकें छापकर उन्हें बच्चों तक पहुँचाने में बड़ी मदद कर रहे हैं। खुद मेरे पास अकसर बच्चों के फोन आते हैं कि अंकल, हमने आपकी यह कहानी पढ़ी और हमें अच्छी लगी।...वे दूर-दराज के बच्चे हैं, कोई बिहार, कोई छत्तीसगढ़ का—पर कोई अच्छी रचना पढ़कर लेखक से बात करने की इच्छा उनके भीतर जोर मारती है। इसका मतलब यह है कि बाल साहित्य पढा जा रहा है और वह बच्चों के दिलों मे भी अपनी जगह बना रहा है। मैं समझता हूँ, यह बड़ा शुभ संकेत है, जो मन को सुकून देता है।

अनामीशरण – आप कई दशकों तक ‘नंदन’ के संपादन से जुड़े रहे हैं तो बच्चों और उनके सृजन से भी परिचित हैं। इस लिहाज से कृपया बताएँ कि बाल लेखन में क्या बच्चों का कोई सृजनात्मक हाथ है या सभी वरिष्ठ और युवा लोग ही बाल लेखन में सक्रिय हैं?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, ‘नंदन’ में हम बच्चों के लिए कई प्रतियोगिताएँ रखते थे। उनमें वे कोई चित्र देखकर कहानी लिखते थे या फिर कविता की कुछ पंक्तियाँ जोड़ते थे। आज का तो मैं नहीं जानता, पर उन दिनों इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले बच्चों के उत्साह का ठिकाना न था। किसी एक प्रतियोगिता के लिए हजारों प्रविष्टियाँ हर महीने आती थीं। उनमें से किसे प्रथम, किसे द्वितीय या तृतीय स्थान पर रखा जाए, यह तय कर पाना बड़ा मुश्किल काम था। हम सभी साथी मिलकर बैठते थे और तब यह निर्णय होता था। काफी विचार-विमर्श और पूरी जिम्मेदारी के साथ। हमें बड़ी खुशी होती थी, जब उनमें से कई लोग बाद में आकर मिलते थे। तब वे बड़े लेखक या किसी और रूप में प्रसिद्धि पा चुके होते थे और कृतज्ञता से भरकर इसका श्रेय ‘नंदन’ को देते थे। ऐसा भी होता कि जिन्होंने बरसों पहले बच्चे के रूप में ‘नंदन’ की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया, बाद में बड़े होने पर उनकी रचनाएँ ‘नंदन’ में सम्मानपूर्वक छपीं। बच्चों की लिखी छोटी-छोटी कविताएँ भी कभी-कभार ‘नंदन’ में ‘नन्ही कलम’ शीर्षक से छपती थीं। 

यों ‘नंदन’ में हम ज्यादातर बड़ों की रचनाएँ, या जाने-माने लेखकों की रचनाएँ ही देते थे। इसका कारण यह था कि बच्चों की कविताओं, कहानियों आदि में भाषा आदि की अनगढ़ता और लापरवाही होती थी। कविताओं में छंद, लय आदि की गड़बड़ियाँ भी होती थीं। दूसरे बच्चे इन्हें पढ़ें और इसी को मॉडल मानकर ग्रहण करें, तो वे भी अशुद्ध चीजें ही सीख लेंगे। इससे उनके मन में जो भ्रांति पैदा होगी, वह दूर तक उनके साथ रहेगी। यह तो अच्छी बात नहीं है। तो हमारी कोशिश यह रहती थी कि उनके लिए जो कविताएँ, कहानियाँ और दूसरी रचनाएँ ‘नंदन’ में छपें, वे बड़े और सिद्ध लेखकों की हों, जो बच्चों को लुभाएँ और पढ़ने पर खुद उन्हें भी रचनात्मक रूप से समृद्ध करें। इसलिए अनामी भाई, यह बात आपकी ठीक है कि ज्यादातर बाल साहित्य बड़ों का ही लिखा हुआ है। यह केवल हिंदी में ही नहीं, देश-दुनिया की सारी भाषाओं में है।

अनामीशरण – मनु जी, बाल लेखन का सबसे सबल पक्ष क्या है जो प्रायः सभी लेखकों की रचनाओं में देखा जा सकता है?

प्रकाश मनु – अनामी भाई, बाल साहित्य का सबसे सबल पक्ष तो वह रस-आनंद है, जो बच्चों के लिए लिखी गई प्रायः सभी रचनाओं में मिलता है, और पढ़ने वाले को अपने साथ बहा ले जाता है। इसी तरह बाल साहित्य आशा और उम्मीद का साहित्य है, और यह बात भी प्रायः सभी लेखकों की कविताओं और कहानियों में नजर आ जाती है। बड़ों के साहित्य और बाल साहित्य में एक बड़ा फर्क ही यह है कि बाल साहित्य उम्मीद के दीए जलाकर हमारी आत्मा को उजला और प्रकाशित करता है। इसीलिए मैं बार-बार आग्रह करता हूँ कि बाल साहित्य केवल बच्चों के लिए नहीं है, उसे बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी पढ़ना चाहिए। और अगर बड़े उसे पढ़ेंगे तो वे नाउम्मीदी के अँ