शनिवार, 19 सितंबर 2015

/ अनामी शरण बबल - 1







बिहारी दंगल में मुलायम इंट्री 
लडाई  मारपीट खींचतान उठापटक आरोप- प्रत्यारोपों जातिवाद और रंगदारी दादागिरी के लिए कुख्यात बिहार में इन दिनों चुनावी दंगल चालू है। भीतरघात में उलझे बिहार के तमाम कथित नेता फिलहाल बिहार के उत्थान विकास और बिहारियों की चिंता करने की बजाय अपने घर (पार्टी) को टूटने लूटने और उजडने से बचाने में लगे हैं। लालटेन में आग लगी है, तो विकास कुमार खेमा में भी भागमभाग मची है। कमल खेमा ही कमल को डूबो रही है। मझदार में कमल को ले जाकर मांझी ही बेदम हो रहे है। अपने पुराने साथियों से ज्यादा भगोड़ो और मौका परस्तों पर दांव लगाने के लिए बेकरार कमल की गिरती साख से दिल्ली बेदम है। इसी उठापटक में यूपी के पहलवान नेताजी का बिहार में जोर शोर से समाजवादी पताका लहराने से तमाम दलों के दलबदलूओं और मुलायम पार्टी में नयी जान आ गयी है। मुलायम दांव से कमल को राहत तो मिली है। हालांकि इस दांव के लिए नेताजी की मजबूरी को बिहारी पब्लिक सब जानती है। पुराने दुश्मन को समधि बनाकर भी रास्ते में छोड़ना किसी को भी नही भाएगा।

जनता परिवार के मुखिया जी


जीवन के उतरार्द्ध में पीएम बनने के लिए बेकरार नेताजी लोकसबा चुनाव में बुरी तरह शिकस्त खाने के बाद भी सपने में ही है. पूरे विपक्ष को एक करने की मुहिम को अंजाम देते हुए नेताजी ने जनता परिवार बनाया। तीसरा मोर्चे में बनते ही बिखरने की आशंका लग रही थी। खासकर. बिहार चुनाव को लेकर सबों में डर था कि परिवार से बिखरने का परचम कौन लहराएगा, मगर यह क्या कि सबलोग साथ में ही रहे और नेताजी ही बिदक कर अलग हो गए। कहा तो जा रहा है कि इसके पीछे कमल सुप्रीमों से कुछ डील हुआ है, मगर यह तो समय ही बताएगा कि नेताजी के इस बगावत के पीछे कौन है. किसको बचाने के लिए नेताजी ने घुटने टेक दिए अपनी और अपने परिवार पर लगने वाले कलंक से डील है या नोएडा के बदनाम इंजीनियर के काले कारनामों की बदनामी से बचने के लिए ही नेताजी को परिवार से भागना  मुनासिव लगा।



बिहार चुनाव के चरितार्थ
बिहार के चुनावी दंगल का फैसला तो आठ नवम्बर को होगा। किसको क्या नसीब होगा यह सब इसी दिन पत्ता चलेगा, मगर अभी से यह तय हो गया है कि बिहार में कमल खिले या न खिले मगर 2017 में यूपी में तो कमल को ही खिलना है. चुनाव बिहार में है, मगर कमल की नजर लखनऊ पर है। यानी तोता (सीबीआई) को लेकर सौदेबाजी में नेताजी और बहनजी निशाने पर है। तोता से कोई बैर करना चाहता नही, क्योंकि इमेज पर बट्टा के साथ साथ कोर्ट मुकदमा जेल का अलग से टेरर। यानी कमल को खिलाने के लिए तोता को हाथ में देख कर दामाद जी के कारनामों के सामने तो पंजे की भी चुप्पी बनी रहेगी. तो फिर किसमें है दम जो कमल को करे बेदम । दल बदलने के लिए चर्चित वेस्ट यूपी के जाटछोरे में कहां दम जो दिल्ली की कुर्सी से टकरा जाए। यानी दिखावे की चुनौती के बीच अवध नगरी में जय श्री राम ।  

समय समय की बात

तोते का भय दिखाकर पूरे देश में 60 साल तक मस्ती से राज करने वाली कांग्रेस अब उसी तोते से आशंकित है। देश के दामादजी पर कई राज्य. में कई तरह के मामले लंबित है। कहीं घोटाला तो कहीं कौडियों के भाव जमीन (पाकर) खरीदकर मोटी कमाई का मामला है तो कहीं कुछ और तरह के मामले में पीतलनगरी का मैंगोमैन वांछित है. पंजा के युवराजा बाबा के बाबा साबित हो जाने के बाद लोगों की नजर बेटी पर है। अमेठी पुत्री बनने से कतरा रही पुत्री फिलहाल अपनी मां और भाई की गाडी को पटरी पर संभाल रही है. बहन को लाओ पार्टी बचाओं की बारम्बार मांग उठ रही है, तो मैंगोमैन दामाद पर तोते का खतरा मंडरा रहा है। सबों को पता है कि ज्योंहि बहनजी पार्टी में हेड बनी नहीं कि दामाद की गर्दन पर तोते का शिकंजा होगा और मैंगोमैन की कारस्तानियों का असर मैडम वाईफ और पार्टी पर पडेगा ही । यानी पंजे पर बहन की लगाम के आसार नहीं है, भले ही पंजा 44 से आठ  क्यों न हो जाए।

पंजे का हाल पर नो कमेंट्स

समय बडा बलवान होता है. एक समय था कि पूरे देश में चारो तरफ पंजे की ही धूम होती थी। इसका सूरज कभी नहीं डूबता था. 130 साल पुरानी इस पार्टी के पतन काल के इस दौर में धीरे धीरे लोग ही इससे किनारा करते जा रहे है। दूसरी पार्टियों की पूंछ बनकर बिहार में 40 सीटो पर पंजा मैदान में है, मगर लोगों के चित से लोप हो गयी पंजे के लिए कोई उम्मीदवार नहीं मिल रहा. उस पर बिहार प्रभारी बने पूर्व दिल्ली पुलिस आयुक्त और भूत राज्यपाल महोदय दिल्ली की बजाय टिकट बांटने का काम दिल्ली से चला रहे है. मां बेटे के बिहार दौरे के बावजूद देखना हैं कि क्या इस बार पंजा कैरमबोर्ड की टीम बनाती है या खाता के नाम पर सिफर या...या.... .। नो कमेंट्स

कमल के तीन सीएम

यदि चुनाव में कमल का सिक्का चल निकला तो यकीन मानिए बिहारके लिए तीन
मार ले गयी तो पूर्व मंत्री नंदकिशोर यादव के सिर पर ताज संभव है। और यादव पर भारी साबित होकर विकास कुमार को रोकने में कमल सफल रही तो दूसरे नंबर के सुशील मोदी पर भी ताज मुमकिन है. मगर दोनों में यदि तू बडा या मैं का गेम चालू हुआ तो पीएम संघ की पसंद पत्रकार से नेता बने दिग्गज राजीव शुक्ल के साले रविशंकर प्रसाद सीधे पैराशूट सीएम बनकर पटना में अवतरित हो सकते है। ज्.दातर सांसदो के मित्र रहे पत्रकार राजीव शुक्ला को अपने प्रति लाईटमूड करने के इस स्वर्णीम मौके को भाजपा जाने नहीं देगी जो किसी भी विपत्ति में सबों के लिए संकटमोचक हो सकते है। यानी रविशंकर प्रसाद की दावेदारी बिहारी नेताओं पर भारी पड सकती है।


तेज और चिराग की साख

नेताजी के सीएम बेटे की किस्मत से सुलगने वाले बिहार में कई नेता है.। कहावत है कि अपना बेटा और पराये की बीबी सबों को मनभावन लगती है। अपने बेटे को सचिन तेंदुलकर या शाहरूख खान बनाने के लिए बिहारी नेताओं ने अपना सारा पावर प्रेशर पोलटिक्स पैसा भी लगाया मगर सपना जो साकार ना हो सका.। गंगाजल को अपनाकर भी राजनीति का चिराग सुलग नहीं पाया।  तो तेंदुलकर ना बन पाए क्रिकेटर तेज एक भी मैच खेले बगैर ही आईपीएल दिल्ली टीम में दो बार रहे तेज करोडपति जरूर हो गए। दोनों पुत्रों पर बाप की बिरासत संभालने का बोझ है. देखना है कि इस चुनाव में किसका तेज और चिराग सलामत रह पाता है ? लगता है इस मामले में नेताजी भारी ही रहेंगे।   

मांझी के सुपुत्र

बड़बोले पन के लिए कुख्यात भूत सीएम मांझी के पुत्र कई लाख रूपयों के साथ पिछले दिन धऱ दबोचे गए। तो इसे भी विपक्ष की साजिश कहकर मामले की सफाई देने में पिताश्री को मैदान में उतरना पडा। भूत सीएम ने इसे लोकप्रियता के भय से दूसरों पर बदनाम करने का आरोप मढ दिया। 40 साल से राजनीति करते हुए और कई दफा मंत्री रह चुके मांझी की नेशनल पहचान अंतत खड़ाऊ सीएम बनकर ही मिली। और अब खुद को जनाधार वाले नेता मानकर दूसरों को गरियाने वाले मांझी जी को यह कौन समझाएं कि धन लेकर घूम रहे सुपुत्र के पास या तो काला धन होगा या कोई लेनदेन का । कोई विपक्ष लाखों गंवाकर मांझी सुपुत्र को बंदी बनवाना तो नहीं ही चाहेगा।
इस तरह तो बन जाएगा हार्दिक बडा नेता

लगता है कि युवा हार्दिक पटेल को बीजेपी गुजरात का जननेता बनाकर ही दम लेगी। हार्दिक को कमतर आंकने की भूल करके कमल की बड़ी किरकिरी हो चुकी है, इसके बावजूद कोई सीख लेने की बजाय हार्दिक को मौके बेमौके पकड़कर उसको खबर बनने दिया जा  सहा है। सरकार का यही हाल सरकारी रहा तो इसमें कोई शक नहीं कि 2017 में पटेल के हार्दिक स्वागत के लिए भी तैयार रहना होगा. तमाम सरकारी बंदिशों के बाद भी राजधानी में 10 लाख की भीड जुटा लेना सीएम मैडम के लिए भी आसान नहीं है। पीएम के खिलाफ आग उगदलने वाला यह नेता तो बिहार में भी जाने वाला है यानी खुद को कद से ज्यादा कर चुका यह गुजराती सिरदर्द कहीं पीएम के विकास के मॉडल स्टेट पर ही न  काबू कर ले.



अनामी शरणबबल






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कल न जाए ?







    




सड़क से संसद तक............  / अनामी शरण बबल - 1

या
.......हाजिर हो  / अनामी शरण बबल - 1


बिहारी दंगल में मुलायम इंट्री
लडाई  मारपीट खींचतान उठापटक आरोप- प्रत्यारोपों जातिवाद और रंगदारी दादागिरी के लिए कुख्यात बिहार में इन दिनों चुनावी दंगल चालू है। भीतरघात में उलझे बिहार के तमाम कथित नेता फिलहाल बिहार के उत्थान विकास और बिहारियों की चिंता करने की बजाय अपने घर (पार्टी) को टूटने लूटने और उजडने से बचाने में लगे हैं। लालटेन में आग लगी है, तो विकास कुमार खेमा में भी भागमभाग मची है। कमल खेमा ही कमल को डूबो रही है। मझदार में कमल को ले जाकर मांझी ही बेदम हो रहे है। अपने पुराने साथियों से ज्यादा भगोड़ो और मौका परस्तों पर दांव लगाने के लिए बेकरार कमल की गिरती साख से दिल्ली बेदम है। इसी उठापटक में यूपी के पहलवान नेताजी का बिहार में जोर शोर से समाजवादी पताका लहराने से तमाम दलों के दलबदलूओं और मुलायम पार्टी में नयी जान आ गयी है। मुलायम दांव से कमल को राहत तो मिली है। हालांकि इस दांव के लिए नेताजी की मजबूरी को बिहारी पब्लिक सब जानती है। पुराने दुश्मन को समधि बनाकर भी रास्ते में छोड़ना किसी को भी नही भाएगा।

जनता परिवार के मुखिया जी


जीवन के उतरार्द्ध में पीएम बनने के लिए बेकरार नेताजी लोकसबा चुनाव में बुरी तरह शिकस्त खाने के बाद भी सपने में ही है. पूरे विपक्ष को एक करने की मुहिम को अंजाम देते हुए नेताजी ने जनता परिवार बनाया। तीसरा मोर्चे में बनते ही बिखरने की आशंका लग रही थी। खासकर. बिहार चुनाव को लेकर सबों में डर था कि परिवार से बिखरने का परचम कौन लहराएगा, मगर यह क्या कि सबलोग साथ में ही रहे और नेताजी ही बिदक कर अलग हो गए। कहा तो जा रहा है कि इसके पीछे कमल सुप्रीमों से कुछ डील हुआ है, मगर यह तो समय ही बताएगा कि नेताजी के इस बगावत के पीछे कौन है. किसको बचाने के लिए नेताजी ने घुटने टेक दिए अपनी और अपने परिवार पर लगने वाले कलंक से डील है या नोएडा के बदनाम इंजीनियर के काले कारनामों की बदनामी से बचने के लिए ही नेताजी को परिवार से भागना  मुनासिव लगा।



बिहार चुनाव के चरितार्थ
बिहार के चुनावी दंगल का फैसला तो आठ नवम्बर को होगा। किसको क्या नसीब होगा यह सब इसी दिन पत्ता चलेगा, मगर अभी से यह तय हो गया है कि बिहार में कमल खिले या न खिले मगर 2017 में यूपी में तो कमल को ही खिलना है. चुनाव बिहार में है, मगर कमल की नजर लखनऊ पर है। यानी तोता (सीबीआई) को लेकर सौदेबाजी में नेताजी और बहनजी निशाने पर है। तोता से कोई बैर करना चाहता नही, क्योंकि इमेज पर बट्टा के साथ साथ कोर्ट मुकदमा जेल का अलग से टेरर। यानी कमल को खिलाने के लिए तोता को हाथ में देख कर दामाद जी के कारनामों के सामने तो पंजे की भी चुप्पी बनी रहेगी. तो फिर किसमें है दम जो कमल को करे बेदम । दल बदलने के लिए चर्चित वेस्ट यूपी के जाटछोरे में कहां दम जो दिल्ली की कुर्सी से टकरा जाए। यानी दिखावे की चुनौती के बीच अवध नगरी में जय श्री राम ।  

समय समय की बात

तोते का भय दिखाकर पूरे देश में 60 साल तक मस्ती से राज करने वाली कांग्रेस अब उसी तोते से आशंकित है। देश के दामादजी पर कई राज्य. में कई तरह के मामले लंबित है। कहीं घोटाला तो कहीं कौडियों के भाव जमीन (पाकर) खरीदकर मोटी कमाई का मामला है तो कहीं कुछ और तरह के मामले में पीतलनगरी का मैंगोमैन वांछित है. पंजा के युवराजा बाबा के बाबा साबित हो जाने के बाद लोगों की नजर बेटी पर है। अमेठी पुत्री बनने से कतरा रही पुत्री फिलहाल अपनी मां और भाई की गाडी को पटरी पर संभाल रही है. बहन को लाओ पार्टी बचाओं की बारम्बार मांग उठ रही है, तो मैंगोमैन दामाद पर तोते का खतरा मंडरा रहा है। सबों को पता है कि ज्योंहि बहनजी पार्टी में हेड बनी नहीं कि दामाद की गर्दन पर तोते का शिकंजा होगा और मैंगोमैन की कारस्तानियों का असर मैडम वाईफ और पार्टी पर पडेगा ही । यानी पंजे पर बहन की लगाम के आसार नहीं है, भले ही पंजा 44 से आठ  क्यों न हो जाए।

पंजे का हाल पर नो कमेंट्स

समय बडा बलवान होता है. एक समय था कि पूरे देश में चारो तरफ पंजे की ही धूम होती थी। इसका सूरज कभी नहीं डूबता था. 130 साल पुरानी इस पार्टी के पतन काल के इस दौर में धीरे धीरे लोग ही इससे किनारा करते जा रहे है। दूसरी पार्टियों की पूंछ बनकर बिहार में 40 सीटो पर पंजा मैदान में है, मगर लोगों के चित से लोप हो गयी पंजे के लिए कोई उम्मीदवार नहीं मिल रहा. उस पर बिहार प्रभारी बने पूर्व दिल्ली पुलिस आयुक्त और भूत राज्यपाल महोदय दिल्ली की बजाय टिकट बांटने का काम दिल्ली से चला रहे है. मां बेटे के बिहार दौरे के बावजूद देखना हैं कि क्या इस बार पंजा कैरमबोर्ड की टीम बनाती है या खाता के नाम पर सिफर या...या.... .। नो कमेंट्स

कमल के तीन सीएम

यदि चुनाव में कमल का सिक्का चल निकला तो यकीन मानिए बिहारके लिए तीन
मार ले गयी तो पूर्व मंत्री नंदकिशोर यादव के सिर पर ताज संभव है। और यादव पर भारी साबित होकर विकास कुमार को रोकने में कमल सफल रही तो दूसरे नंबर के सुशील मोदी पर भी ताज मुमकिन है. मगर दोनों में यदि तू बडा या मैं का गेम चालू हुआ तो पीएम संघ की पसंद पत्रकार से नेता बने दिग्गज राजीव शुक्ल के साले रविशंकर प्रसाद सीधे पैराशूट सीएम बनकर पटना में अवतरित हो सकते है। ज्.दातर सांसदो के मित्र रहे पत्रकार राजीव शुक्ला को अपने प्रति लाईटमूड करने के इस स्वर्णीम मौके को भाजपा जाने नहीं देगी जो किसी भी विपत्ति में सबों के लिए संकटमोचक हो सकते है। यानी रविशंकर प्रसाद की दावेदारी बिहारी नेताओं पर भारी पड सकती है।


तेज और चिराग की साख

नेताजी के सीएम बेटे की किस्मत से सुलगने वाले बिहार में कई नेता है.। कहावत है कि अपना बेटा और पराये की बीबी सबों को मनभावन लगती है। अपने बेटे को सचिन तेंदुलकर या शाहरूख खान बनाने के लिए बिहारी नेताओं ने अपना सारा पावर प्रेशर पोलटिक्स पैसा भी लगाया मगर सपना जो साकार ना हो सका.। गंगाजल को अपनाकर भी राजनीति का चिराग सुलग नहीं पाया।  तो तेंदुलकर ना बन पाए क्रिकेटर तेज एक भी मैच खेले बगैर ही आईपीएल दिल्ली टीम में दो बार रहे तेज करोडपति जरूर हो गए। दोनों पुत्रों पर बाप की बिरासत संभालने का बोझ है. देखना है कि इस चुनाव में किसका तेज और चिराग सलामत रह पाता है ? लगता है इस मामले में नेताजी भारी ही रहेंगे।   

मांझी के सुपुत्र

बड़बोले पन के लिए कुख्यात भूत सीएम मांझी के पुत्र कई लाख रूपयों के साथ पिछले दिन धऱ दबोचे गए। तो इसे भी विपक्ष की साजिश कहकर मामले की सफाई देने में पिताश्री को मैदान में उतरना पडा। भूत सीएम ने इसे लोकप्रियता के भय से दूसरों पर बदनाम करने का आरोप मढ दिया। 40 साल से राजनीति करते हुए और कई दफा मंत्री रह चुके मांझी की नेशनल पहचान अंतत खड़ाऊ सीएम बनकर ही मिली। और अब खुद को जनाधार वाले नेता मानकर दूसरों को गरियाने वाले मांझी जी को यह कौन समझाएं कि धन लेकर घूम रहे सुपुत्र के पास या तो काला धन होगा या कोई लेनदेन का । कोई विपक्ष लाखों गंवाकर मांझी सुपुत्र को बंदी बनवाना तो नहीं ही चाहेगा।
इस तरह तो बन जाएगा हार्दिक बडा नेता

लगता है कि युवा हार्दिक पटेल को बीजेपी गुजरात का जननेता बनाकर ही दम लेगी। हार्दिक को कमतर आंकने की भूल करके कमल की बड़ी किरकिरी हो चुकी है, इसके बावजूद कोई सीख लेने की बजाय हार्दिक को मौके बेमौके पकड़कर उसको खबर बनने दिया जा  सहा है। सरकार का यही हाल सरकारी रहा तो इसमें कोई शक नहीं कि 2017 में पटेल के हार्दिक स्वागत के लिए भी तैयार रहना होगा. तमाम सरकारी बंदिशों के बाद भी राजधानी में 10 लाख की भीड जुटा लेना सीएम मैडम के लिए भी आसान नहीं है। पीएम के खिलाफ आग उगदलने वाला यह नेता तो बिहार में भी जाने वाला है यानी खुद को कद से ज्यादा कर चुका यह गुजराती सिरदर्द कहीं पीएम के विकास के मॉडल स्टेट पर ही न  काबू कर ले.



अनामी शरणबबल






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कल न जाए ?







    

बुधवार, 2 सितंबर 2015

भारत के मंदिर)


 

 

 

 Temples of India (भारत के मंदिर)

Shiv Temple  (शिव मंदिर)

असीरगढ़ का किला - श्रीकृष्ण के श्राप के कारण यहां आज भी भटकते हैं अश्वत्थामा, किले के शिवमंदिर में प्रतिदिन करते है पूजा

काठगढ़ महादेव - यहां है आधा शिव आधा पार्वती रूप शिवलिंग (अर्धनारीश्वर शिवलिंग)

स्तंभेश्वर महादेव - शिव पुत्र कार्तिकेय ने करी थी स्थापना, दिन में दो बार नज़रों से ओझल होता है यह मंदिर

टूटी झरना मंदिर- रामगढ़(झारखंड) - यहाँ स्वयं माँ गंगा करती है शिवजी का जलाभिषेक

बिजली महादेव- कुल्लू -हर बारह साल में शिवलिंग पर गिरती है बिजली

लिंगाई माता मंदिर - स्त्री रूप में होती है शिवलिंग की पूजा

अचलेश्वर महादेव - अचलगढ़ - एक मात्र मंदिर जहां होती है शिव के अंगूठे की पूजा

ममलेश्वर महादेव मंदिर - यहां है 200 ग्राम वजनी गेहूं का दाना - पांडवों से है संबंध

नागचंद्रेश्वर मंदिर - साल में मात्र एक दिन खुलता है मंदिर

चमत्कारिक भूतेश्वर नाथ शिवलिंग - हर साल बढ़ती है इसकी लम्बाई

अनोखा शिवलिंग - महमूद गजनवी ने इस पर खुदवाया था कलमा

महादेवशाल धाम - जहाँ होती है खंडित शिवलिंग की पूजा - गई थी एक ब्रिटिश इंजीनियर की जान

निष्कलंक महादेव - गुजरात - अरब सागर में स्तिथ शिव मंदिर - यहां मिली थी पांडवों को पाप से मुक्ती

परशुराम महादेव गुफा मंदिर - मेवाड़ का अमरनाथ - स्वंय परशुराम ने फरसे से चट्टान को काटकर किया था निर्माण

कमलनाथ महादेव मंदिर - झाडौल - यहां भगवान शिव से पहले की जाती है रावण की पूजा

कामेश्वर धाम कारो - बलिया - यहाँ भगवान शिव ने कामदेव को किया था भस्म

अचलेश्वर महादेव - धौलपुर(राजस्थान) - यहाँ पर है दिन मे तीन बार रंग बदलने वाला शिवलिंग

लक्ष्मणेश्वर महादेव - खरौद - यहाँ पर है लाख छिद्रों वाला शिवलिंग (लक्षलिंग)

भोजेश्वर मंदिर (Bhojeshwar Temple) - भोपाल - यहाँ है एक ही पत्थर से निर्मित विशव का सबसे बड़ा शिवलिंग (World's tallest shivlinga made by one rock)
जंगमवाड़ी मठ - वाराणसी : जहा अपनों की मृत्यु पर शिवलिंग किये जाते हे दान

एक हथिया देवाल- मात्र एक हाथ से और एक रात में बने इस प्राचीन शिव मंदिर के शिवलिंग की नहीं होती है पूजा, आखिर क्यों? 

Mata Temple  (माता के मंदिर)

ज्वालामुखी देवी - यहाँ अकबर ने भी मानी थी हार - होती है नौ चमत्कारिक ज्वाला की पूजा

दंतेश्वmरी मंदिर - दन्तेवाड़ा - एक शक्ति पीठ - यहाँ गिरा था सती का दांत

51 Shakti Peeth (51 शक्ति पीठ)

करणी माता मंदिर, देशनोक (Karni Mata Temple , Deshnok) - इस मंदिर में रहते है 20,000 चूहे, चूहों का झूठा प्रसाद मिलता है भक्तों को
कामाख्या मंदिर - सबसे पुराना शक्तिपीठ - यहाँ होती हैं योनि कि पूजा, लगता है तांत्रिकों व अघोरियों का मेला

तरकुलहा देवी (Tarkulha Devi) - गोरखपुर - जहाँ चढ़ाई गयी थी कई अंग्रेज सैनिकों कि बलि

तनोट माता मंदिर (जैसलमेर) - जहा पाकिस्तान के गिराए 3000 बम हुए थे बेअसर

दैवीय चमत्कार- 50 लाख लीटर पानी से भी नहीं भरा शीतला माता के मंदिर में स्तिथ ये छोटा सा घडा़

जीजी बाई का मंदिर- एक अनोखा मंदिर जहाँ मन्नत पूरी होने पर मां दुर्गा को चढ़ती है चप्पल और सैंडिल

जीण माता मंदिर- औरंगजेब भी नहीं कर पाया था इस मंदिर को खंडित, मधुमक्खियों ने की थी रक्षा

सिमसा माता मंदिर- जहां फर्श पर सोने से होती है नि:संतान महिलाओं को संतान की प्राप्ति

मां बम्लेश्वरी मंदिर- ऊंचे पहाड़ पर स्थित माता के इस मंदिर से जुड़ी है एक प्रसिद्ध प्रेम कहानी

चौसठ योगिनी मंदिर, मुरैना- यह मंदिर कहलाता था तांत्रिक विश्वविद्यालय, होते थे तांत्रिक अनुष्ठान

Hanuman Temple (हनुमान मंदिर)

भारत के प्रसिद्ध 16 हनुमान मंदिर

गिरजाबंध हनुमान मंदिर - रतनपुर - एक अति प्राचीन मंदिर जहाँ स्त्री रूप में होती है हनुमान कि पूजा

तेलंगाना में है हनुमान जी और उनकी पत्नी सुवर्चला का मंदिर

कष्टभंजन हनुमान मंदिर- जहाँ हनुमान जी के पैरों में स्त्री रूप में बैठे है शनि देव

भारत में दो जगह है हनुमान पुत्र मकरध्वज के मंदिर


Other Temple (अन्य मंदिर)

भारत के 10 प्रसिद्ध सूर्य मंदिर

पाकिस्तान स्तिथ हिन्दुओं के 20 प्राचीन, पौराणिक और ऐतिहासिक मंदिर

भारत के 10 सबसे अमीर मंदिर

अद्भुत हैंगिंग लेपाक्षी टेम्पल

अदभुत गणेश प्रतिमा - दंतेवाड़ा में 3000 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थापित 10 वि सदी की गणेश प्रतिमा

अष्टविनायक - गणेश जी के आठ अति प्राचीन मंदिर, जहाँ है स्वयंभू गणेश जी

चमत्कारिक कनिपक्कम गणपति मंदिर (आंध्रप्रदेश) - लगातार बढ़ा रहा है मूर्ति का आकार

भारत के प्रमुख तीर्थ - 51 शक्ति पीठ, 12 ज्योतिर्लिंग, 7 सप्तपुरी और 4 धाम

पहाड़ी मंदिर - रांची - भारत का एक मात्र मंदिर जहाँ राष्ट्रीय पर्वो पर फहराया जाता है तिरंगा

बाबा हरभजन सिंह मंदिर - सिक्किम - इस मृत सैनिक की आत्मा आज भी करती है देश की रक्षा

बुलेट बाबा का मंदिर - जहाँ कि जाती हैं बुलेट बाइक कि पूजा, माँगी जाती हैं सकुशल यात्रा कि मन्नत

महात्मा गांधी जी का मंदिर - उड़ीसा

जानिये भारत में स्तिथ यमराज (धर्मराज) के चार प्राचीन मंदिरों के बारे में

गंधेश्वर शिवलिंग - खुदाई में मिला 2000 साल पुराना शिवलिंग - आती है तुलसी की सुगंध

क्यों है ब्रह्मा जी का पुरे भारत में एक मंदिर ?

लादा महादेव टंगरा - यहां चट्टान पर हाथ फेरने से रिसता है पानी, दिखते हैं सीता-राम के पद-चिन्ह

रहस्यमयी और चमत्कारिक काल भैरव मंदिर - जहां भगवान काल भैरव करते है मदिरा पान

12 ज्योतिर्लिंग (12 Jyotirlinga)

7 धार्मिक स्थल जहाँ महिलाओं के प्रवेश पर है पाबंदी

लोहार्गल - यहां पानी में गल गए थे पांडवों के अस्त्र-शस्त्र, मिली थी परिजनों की हत्या के पाप से मुक्ति

टाइगर टेंपल- थाईलैंड- जहाँ सैकड़ों टाइगर रहते है बौद्ध भिक्षुओं के साथ

मलूटी- झारखंड - इसे कहते है मंदिरों का गाँव और गुप्त काशी

आदि केशव पेरुमल मंदिर - श्री पेरंबदूर - शिवजी के भूत गणों ने किया था इसका निर्माण

भारत के इन 10 मंदिरों में मिलता है अजब गजब प्रसाद

शृंग ऋषि और भगवान राम की बहन 'शांता' का मंदिर

आंजन धाम- मान्यता है की यही माँ अंजनी ने दिया था हनुमान को जन्म

कहानी भारत के 5 रहस्यमयी मंदिरों की

भगवान श्रीराम के 10 प्रमुख मंदिर

ये है भारत में वो स्थान जहाँ होती है रावण की पूजा

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मृत संत के अभी भी बढ़ते है बाल और नाखून



हिमाचल का गीयू गांव - यहाँ है 550 साल पुरानी एक संत कि प्राकर्तिक ममी - अभी भी बढ़ते है बाल और नाखून

किसी भी इंसान कि मौत के बाद उसके शव(Dead Body) को केमिकल्स से संरक्षित करके ममी(Mummy) बनाई जाती है, यह विधि प्राचीन मिस्र सभ्यता में बड़े पैमाने पर अपनाई जाती थी।  मिस्र के अलावा दूसरे देशो में भी शवो कि Mummy बनाई गयी है जैसे कि इटली का कापूचिन कैटाकॉम्ब जहा पर सदियो पुराने 8000 शवो को Mummy बनाकर रखा गया है। लेकिन विशव में अनेक जगह प्राकर्तिक ममी(Natural Mummy) भी पायी गयी है यानि कि बिना किसी केमिकल के संरक्षित किये सदियो पुराने ऐसे शव(Dead body) जो आज भी सामान्य अवस्था में है।  ऐसी ही कुछ Natural Mummy हमारे भारत(India) में भी है जिसमे से एक गोवा के बोम जीसस चर्च में रखी संत फ्रांसिस जेवियर कि ममी के बारे में हमने आपको बताया था।
आज हम आपको एक और  ऐसी ममी के बारे में बतायेंगे जो कि हिमाचल(Himachal Pradesh) में लाहुल स्पिती के गीयू गांव( Geu village) में है। यह Mummy लगभग  550 साल पुरानी है। इस Mummy के बाल और नाख़ून आज भी बढ़ रहे है।  एक खास बात और भी है कि ये ममी बैठी हुई अवस्था में है जबकि दुनिया में पायी गयी बाकी ममीज लेटी हुई अवस्था में मिली हैं । गीयू गांव साल में 6 से 8  महीने बर्फ की वजह से बाकी दुनिया से कटा रहता है । क्योकि यह गाँव काफी ऊँचाई पर स्तिथ है तथा ये  तिब्बत(Tibetan) से मात्र 2 किलोमीटर दूर है ।
Mummy at Geu Village
गीयू गांव में रखी ममी 

गांव वालो के अनुसार ये ममी पहले गांव में ही रखी हुई थी और एक स्तूप में स्थापित थी पर 1974 में भूकम्प आया तो ये कहीं पर दब गयी । उसके बाद सन 1995 में आई टी बी पी (I.T.B.P.) के जवानो को सडक बनाते समय ये ममी मिली । कहा जाता है कि उस समय कुदाल सिर में लगी इस ममी के और कुदाल लगने के बाद ममी के सिर से खून भी निकला जिसका निशान आज भी मौजूद है । इसके बाद सन 2009 तक ये Mummyआई टी बी पी के कैम्पस में ही रखी रही । बाद में गांव वालो ने इस Mummy को गांव में  लाकर स्थापित कर दिया। Mummy को रखने के लिए शीशे का एक कैबिन बनाया गया जिसमें इसे रखा गया।इस Mummy की देखभाल गांव में रहने वाले परिवार बारी-बारी से करते हैं। यहां आने वाले पर्यटकों को वे Mummy के बारे में जाकारी देते है। सालाना यहां पर देश विदेश के हजारों पर्यटक इस मृत देह को देखने आते हैं।  
A monk mummy
काँच के केबिन में रखी ममी 
इस Mummy के बाल भी हैं । Mummy निकलने के बाद इसकी जांच की गयी थी जिसमें वैज्ञानिको ने बताया था कि ये 545 वर्ष पुरानी है । पर इतने साल तक बिना किसी लेप के और जमीन में दबी रहने के बावजूद ये Mummy कैसे इस अवस्था में है ये आश्चर्य का विषय है ।
Mummy
ममी का क्लोज अप 


ममी से जुडी किवदंती :- 
जैसा कि अधिकतर होता है कि हर प्राचीन चीज़ से कोई किवदंती जुड़ जाती है।  इस Mummy के साथ भी ऐसी ही एक किवदंती जुडी है। ऐसी मान्यता है कि करीब 550 वर्ष पूर्व  गीयू गांव  में एक संत थे।  गीयू गांव  में इस दौरान बिछुओं का बहुत प्रकोप हो गया। इस प्रकोप से गांव को बचाने के लिए इस संत ने ध्यान लगाने के लिए लोगों से उसे जमीन में दफन करने के लिए कहा। जब इस संत को जमीन में दफन किया गया तो इसके प्राण निकलते ही गांव में इंद्रधनुष निकला और गांव बिछुओं से मुक्त हो गया।  जबकि कुछ लोगो का कहना है कि ये ममी  बौद्ध भिक्षु सांगला तेनजिंग की है जो तिब्बत से भारत आये और यहां पर जो एक बार मेडिटेशन में बैठे तो फिर उठे ही नही ।
Himachal ke Geu gaanv me rakhi mummy
ममी 
मिश्र में Mummy को कोफिन में से निकाल कर उनकी सफाई की जाती है ताकि वे आने वाले सालों में सुरक्षित रहें लेकिन यहां ऐसा नहीं किया जाता। इस मृत देह की देख-भाल मिश्र में रखी गई ममीज़ की तर्ज पर होनी चाहिए यदि ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले समय में इस पर्यटन स्थल का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। अभी तक यही माना जाता था कि ममी के बाल और नाखुन निरंतर बढ़ते हैं लेकिन गीयू गांव के लोगों के मुताबिक अब Mummy के बाल और नाखुन बढऩे कम हो गए हैं। बाल कम होने के कारण Mummy का सिर गंजा होने लगा है। 

परम्परा और मान्यता

 

 

10 अनोखी परम्परा और मान्यता ( India's 10 Amazing Tradition and Ritual)

भारत परम्पराओं का देश है।  यहां के हर हिस्से से कोई ना कोई अनोखी परम्परा जुडी हुई है।  हमने इस लेख में भारत की 10 ऐसी ही अनोखी, अचरज भरी परम्पराओं और रीती रिवाज़ों का संकलन किया है।

दुनिया के 10 अनोखे रीती रिवाज़ जानने के लिए यहाँ क्लिक करे ------->

1. बच्चों का लिंग पता करने की अनोखी परम्परा (Unique tradition to know the sex of the children) :

Unique tradition to know the sex of the children
पहाड़ी पर बनी चाँद की आकर्ति   Image Credit bhaskar.com


झारखंड के बेड़ो प्रखंड के खुखरा गाँव में माँ के गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग पता करने की एक अनोखी परम्परा पिछले 400 सालो से चली आ रही है। खुखरा गाँव में एक पहाड़ है जिस पर एक चाँद की आकर्ति खुदी हुई है इसलिए इसे चाँद पहाड़ कहते है।  पहाड़ पर खुदी यही चाँद की आकर्ति बता देती है की माँ के गर्भ में पल रहा बच्चा बेटा है या बेटी।  गर्भस्थ शिशु का लिंग पता करने के लिए गांव की गर्भवती महिलाओं को इस पहाड़ की ओर चांद की आकृति पर निश्चित दूरी से बस एक पत्थर फेंकना होता है। अगर गर्भवती स्त्री के हाथ से छूटा पत्थर चांद के भीतर लगे तो यह संकेत है कि बालक शिशु होगा, चांद आकृति से बाहर पत्थर लगने पर बालिका शिशु होगी। इस परम्परा पर यहाँ के ग्रामवासियों का अटूट विश्वास उनके अनुसार यह हमेशा सही होता है।

Shiv Ling at Chand Pahari - Ranchi - Jharkhand
चाँद पहाड़ी के ऊपर बना शिवलिंग     Image Credit bhaskar.com
चांद पहाड़ मूल रूप से नागवंशी राजाओं के मनोरंजन पार्क के रूप में विकसित किया गया था। पहाड़ के ऊपर शिवलिंग और कुंड जैसी आकृतियां गवाह हैं कि वहां नागवंशी राजा पूजा पाठ भी करते थे। इसके ठीक बगल में चांदनी पहाड़ है, जहां नागवंशी रानियां विहार करती थीं।
2. मनोकामना पूर्ति के लिये जमीन पर लेटे लोगों के ऊपर छोड़ दी जाती हैं गायें (Indian Men get trampled by cows in a ritual at Ujjain) :
Indian men trampled by cow at Ujjain
लेटे हुए लोगो को रौंदती हुई गाये  
भारत में मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के कुछ गावों में एक अजीब सी परम्परा का पालन सदियो से किया जा रहा है।  इसमें लोग जमीन पर लेट जाते हैं और उनके ऊपर से दौड़ती हुए गाये गुजारी जाती हैं। इस परंपरा का पालन दीवाली के अगले दिन किया जाता है जो कि एकादशी का पर्व कहलाता है। इस दिन उज्जैन जिले के Bhidawad और आस पास के गाँव के लोग पहले अपनी गायों को रंगों और मेहंदी से अलग-अलग पैटर्न से सजाते हैं। उसके
बाद लोग अपने गले में माला डालकर रास्ते में लेट जाते है और अंत में दौड़ती हुए गायें उन पर से गुजर जाती हैं।
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3. शाटन देवी मंदिर, छत्तीसगढ़ - यहाँ बच्चो के अच्छे स्वास्थ्य लिए देवी को चढ़ाते है लौकी :
Shatan Devi Temple - Chhatisgarh - Children Temple
शाटन देवी    Image Credit bhaskar.com
छत्तीसगढ़ के रतनपुर में स्थित शाटन देवी मंदिर(बच्चों का मंदिर) से एक अनोखी परंपरा जुड़ी है। मंदिरों में आमतौर पर फूल, प्रसाद, नारियल आदि भगवान को चढ़ाने का विधान है, लेकिन शाटन देवी मंदिर में देवी को लौकी और तेंदू की लकड़ियां चढ़ाई जाती हैं। इस मंदिर को बच्चों का मंदिर भी कहते हैं। श्रद्धालु यहां अपने बच्चों की तंदुरुस्ती के लिए प्रार्थना करते हैं और माता को लौकी और तेंदू की लकड़ी अर्पण करते हैं। इस मंदिर में यह परंपरा कैसे शुरू हुई यह कोई नहीं जानता, लेकिन ऐसी मान्यता है कि जो भी यहां लौकी और तेंदू की लकड़ी चढ़ाता है, उनकी मनोकामना पूरी होती है।
4. जंगमवाड़ी मठ, वाराणसी - यहाँ परिजनों की मृत्यु पर दान करते है शिवलिंग (JAngamwadi Math, Varanasi - Here families member donate Shiv Lings on the occasion of dead) :
JangaWadi Math
जंगमवाड़ी मठ में रखे शिवलिंग   Image Credit bhaskar.com
जंगमवाड़ी मठ वाराणसी (Jangamwadi Math, Varanasi)  के सारे मठो में सबसे पुराना है। इस मठ में शिवलिंगों की स्थापना को लेकर एक विचित्र परंपरा चली आ रही है। यहां आत्मा की शांति के लिए पिंडदान नहीं बल्कि शिवलिंग दान होता है। इस मठ में एक दो नहीं बल्कि कई लाख शिवलिंग एक साथ विराजते हैं। यहां मृत लोगों की मुक्ति और अकाल मौत की आत्मा की शांति के लिए शिवलिंग स्थापित किए जाते हैं। सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा के चलते एक ही छत के नीचे दस लाख से भी ज्यादा शिवलिंग स्थापित हो चुके हैं। 
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5. अनोखी परम्परा - पति कि सलामती के लिए जीती है विधवा का जीवन (Unique Tradition - For husband safety, wives lives as a widow) :
Taad,s Tree
ताड़ का वृक्ष 
हमारे देश भारत में आज भी कुछ ऐसी परम्पराय जीवित है जो हमे अचरज में डालती है। ऐसी ही एक परम्परा है पति कि सलामती के लिए पत्नी का विधवा का जीवन जीना।  यह परम्परा गछवाह समुदाय से जुडी है।  यह समुदाय पूर्वी उत्तरप्रदेश के गोरखपुर, देवरिया और इससे सटे बिहार के कुछ इलाकों में रहता है।  ये समुदाय ताड़ी के पेशे से जुड़ा है। इस समुदाय के लोग ताड़ के पेड़ों से ताड़ी निकालने का काम करते है।  ताड़ के पेड़ 50 फीट से ज्यादा ऊंचे होते है तथा एकदम सपाट होते है।  इन पेड़ों पर चढ़ कर ताड़ी निकालना बहुत ही जोखिम का काम होता है। ताड़ी निकलने का काम चैत मास से सावन मास तक, चार महीने किया जाता है। गछवाह महिलाये (जिन्हे कि तरकुलारिष्ट भी कहा जाता है ) इन चार महीनो में ना तो मांग में सिन्दूर भरती है और ना ही कोई श्रृंगार करती है। वे अपने सुहाग कि सभी निशानिया तरकुलहा देवी के पास रेहन रख कर अपने पति कि सलामती कि दुआ मांगती है।
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6. भाई दूज मनाने की अनोखी परम्परा - बहने भाई को देती है मर जाने का श्राप (Unique Tradition to celebrate Bhai Duj - Sisters gives dying curse) :
Unique Tradition to celebrate Bhai Duj - Sisters gives dying curse
Image credit Vikrant Pathak via webduniya.com 
कुछ उत्तर भारतीय समुदायों में भाई दूज बनाने की अनोखी प्रथा है।  इसमें बहने भाई दूज के दिन याम देवता की पूजा करती है।  पूजा के दौरान वो अपने भाइयों को कोसती है तथा उन्हें मर जाने तक का श्राप देती है। हालांकि वो श्राप देने के बाद अपनी जीभ पर काँटा चुभा कर इसका प्रायश्चित भी करती है। इसके पीछे यह मान्यता है की यम द्वितीया (भाई दूज)  भाइयों को गालियां व श्राप देने से उन्हें मृत्यु का भय नहीं रहता है। 
7. अजीबोगरीब परम्परा - भूतों का साया और अशुभ ग्रहों का प्रभाव हटाने के नाम पर करवाते हैं बच्चियों कि कुत्तों से शादी :
Baby girl marriage with Dog
इसे परम्परा ना कहकर कुरुति कहा जाए तो ज्यादा उपयुक्त होगा। इसमें भूतों का साया और अशुभ ग्रहों का प्रभाव हटाने के नाम पर बच्चियों की शादी कुत्तों से करवाई जाती है।  हालाकि ये शादी सांकेतिक होती हैं, पर होती हैं असली हिन्दू तरीके और रीती रिवाज़ से। लोगों को शादी में आने का निमंत्रण दिया जाता है। पंडित, हलवाई सब बुक किये जाते है। बाकायदा मंडप तैयार होता है और पुरे मन्त्र विधान से शादी सम्पन कराई जाती है। इस शादी में एक असली शादी जितना ही खर्चा बैठता है और उससे भी बड़ी बात कि समाज एवं रिश्तेदार भी इसमें बढ़ चढ़ के  हिस्सा लेते है। शायद आपको एक बार तो यकीन ही नहीं होगा कि ऐसा भी हो सकता है। लेकिन यह बिलकुल सत्य है। हमारे देश में झारखण्ड राज्य के कई इलाकों में परंपरा के नाम पर ऐसी शादियां सदियों से कराई  जा रही है।  
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8. नागपंचमी पर गुड़िया पीटने की अनोखी परम्परा :
नागपंचमी का त्योहार यूँ तो हर वर्ष देश के विभिन्न भागों में मनाया जाता है लेकिन उत्तरप्रदेश में इसे मनाने का ढंग कुछ अनूठा है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को इस त्योहार पर राज्य में गुडि़या को पीटने की अनोखी परम्परा है। 
नागपंचमी को महिलाएँ घर के पुराने कपडों से गुड़िया बनाकर चौराहे पर डालती हैं और बच्चे उन्हें कोड़ो और डंडों से पीटकर खुश होते हैं। इस परम्परा की शुरूआत के बारे में एक कथा प्रचलित है।
तक्षक नाग के काटने से राजा परीक्षित की मौत हो गई थी। समय बीतने पर तक्षक की चौथी पीढ़ी की कन्या राजा परीक्षित की चौथी पीढ़ी में ब्याही गई। उस कन्या ने ससुराल में एक महिला को यह रहस्य बताकर उससे इस बारे में किसी को भी नहीं बताने के लिए कहा लेकिन उस महिला ने दूसरी महिला को यह बात बता दी और उसने भी उससे यह राज किसी से नहीं बताने के लिए कहा। लेकिन धीरे-धीरे यह बात पूरे नगर में फैल गई।
तक्षक के तत्कालीन राजा ने इस रहस्य को उजागर करने पर नगर की सभी लड़कियों को चौराहे पर इकट्ठा करके कोड़ों से पिटवा कर मरवा दिया। वह इस बात से क्रुद्ध हो गया था कि औरतों के पेट में कोई बात नहीं पचती है। तभी से नागपंचमी पर गुड़िया को पीटने की परम्परा है।
9. बारिश के लिए कराई जाती है मेंढकों की शादी :
Frogs Marriage for Rain
  Image Credit bhaskar.com
महाराष्ट्र में अच्छी बारिश के लिए मेंढकों की शादी कराई जाती है। शादी के लिए मेंढकों को फूल-माला पहनाकर सजाया जाता है। इसके बाद धूमधाम से इनकी शादी रचाई जाती है। लोगों का मानना है कि इससे बारिश के देवता खुश होते हैं और बारिश कर देते हैं। मेंढकों की शादी में इंसानों की तरह पूरे विधि-विधान का पालन किया जाता है। उन्हें वरमाला पहनाई जाती है और सामान्य शादी की सारी रस्में निभाई जाती हैं। शादी के बाद दोनों को एक साथ गांव के तालाब या कोई अन्य जलाशय में छोड़ दिया जाता है।

10 . बेंत मार गांगुर - एक अनोखी परम्परा - जिसमे कुंवारे लड़के शादी के लिए औरतों से खाते है मार 

Tradition for Marriage
Image Credit samachar24


यह परम्परा राजस्थान के जोधपुर में निभाई जाती है। जहां देश भर में महिलाओं की आजादी की मुहिम छेड़ी गई है। वहीं जोधपुर की इस परंपरा के अनुसार एक रात औरतों की होती है और उसकी बादशाहत घर के अंदर नहीं, बल्कि बाहर होती है। रात में औरतें सजधजकर बाहर निकलती है। अलग-अलग रंगों के कपड़े और गहने से लदी महिलाओं के हाथ में एक डंडा भी होता है। लेकिन इस डंडे को लेकर घूम रही लड़कियों के लिए ये डंडा शादी की इलेजिबिलिटी नापने का पैमाना है। दरअसल, रात में महिलाएं इस डंडे से कुंवारे लड़कों की पिटाई करती हैं और लड़के चुपचाप मार खाते हैं। मान्यता है कि जो लड़का मार खाता है, उसकी एक साल में शादी हो जाती है। मतलब मार खाओ ब्याह रचाओ और खास बातें ये कि इसमें विधवाएं भी हिस्सा लेती है। ये परम्परा सदियों से चली आ रही है, जिसमें अब विदेशी महिलाए भी भाग लेती है। वैसे तो ये सब कुछ 16 दिन पहले से ही शुरू हो जाता है, यहां परम्परा के अनुसार औरते सुहाग की लंबी उम्र के लिए 16 दिन का उपवास रखती है और आखिरी दिन ये उत्सव मनाया जाता है, जिसमें शादी-शुदा महिलाओं के साथ कुंवारी लड़किया भी भाग लेती हैं। वैसे तो कई परंपराएं महिलाओं को बेडियों में जकड़ती भी है, पर ये परंपरा खास इसलिए है कि ये महिलाओं की आजादी का जश्न मनाने की इजाजत देती है

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बुधवार, 13 मई 2015

ना ना ना ना ना नाना (प्रकार) के ना ना संपादक






अनामी शरण बबल


दोस्तों पत्रकारिता मे आजकल नाना प्रकार के संपादकों का भारी जलवा है।  अपने 25 साल के उठापटक खींचतान उतार चढाव बेकारी और बेगारी के तमाम अनुभवों के साथ कई संपादकों  से सामना (पाला) पडा, जिन्हें जिनके साथ काम करने देखने मिलने और आदर देने का महासुख के साथ तकरार करने का भी संयोग प्राप्त हुआ। अपने अनुभवो को फिर कभी लिखूंगा मगर दिल्ली मे किस किस तरह के संपादक आकर अपनी धौंस जमाते हुए पत्रकारिताकी नयी परिभाषा लिखते है अथवा गढ़ते है । अपने आप को सबसे अच्छा सबसे बढ़िया सबसे काबिल और एकदम अनोखे लाल साबित करने की फिराक में लग जाते है।
  दिल्ली से प्रकाशित एक समाचारपत्र के भूत (पूर्व) संपादक   तो एकदम लिखाड थे। संपादक को मय चित्र रोजाना संपादकीय पेज परसुशोभित देखता। संपादक जी ने बाईलाईन  संपादकीय  में  सचित्र आलेख की तरह रोजाना प्रकट होते थे. पेपर में संपादकीय की इस प्रस्तुति को एक नये प्रयोग की तरह देखाौर माना जा रहाथा। उसी प्रजातांत्रिक अखबार के लोकतात्रिक संपादक के बारे में अपने दो चार पत्रकारों से सराहना की। तो, कई मित्र फट पडे। अरे का लिखेंगे उपर से लेकर नीचे तक तलवा चाटने और मीठी भाषा में हडकाने से मौका मिलेगा तो न। संपादकीय आलेख लिखता कोई और हैं, मगर मयफोटो बतौर लेखकावतार के रूप में संपादक जी सुशोभित होते थे।
 कुछ दिनों तक मैंने भी (करीब ढाई माह) इस प्रजातांत्रिक अखबारका पाठन किया, मगर कितने अखबार को पढा जाए।  लिहाजा बहुत सारे मामलों में यह पेपर कसौटा पर खरा (इसका मतलब यह ना माना जाए कि और भी जो पेपर यहां से रोजाना छप रहे हैं वो एकदम सुपर है। यह कतई ना माने मगर एक आदत्त में शुमार होने की वजह से कई अखबार केवल दर्शनार्थ ही घर में मंगाना पड़ता है। बेटी के लिए हिंदू और मिंट बीबी के लिए नभाटा  और घर भर के लिए एचटी और मेरे लिए कोई नही । यही उपरोक्त्त पेपर बतौर खुरचन।  (अखबारों के पसंद के मामले में अपनी पसंद एकदम बदचलन चरित्रहीन सी है। किसी से मन भरता ही नहीं। ( यहां पर तथाकथित संपादकों से ज्यादा अपने मन को पापी मानता हूं कि वो एक से रह नहीं पाता। कभी जागरण तो कभी हिन्दुस्तान कभी भास्कर कभी सहारा कभी किसी दिन जनसत्ता तो कभी नवोदय तो किसी दिन  नेशनल दुनियां तो हर शनिवार कभी सहारा तो कभी कभार अमर उजाला । यानी एक नवभारत टाईम्स का तो हिन्दी पेपरों में जलवा है, मगर मुझसे  ज्यादा श्रीमती जी को यह पसंद है। हालांकि बेहतर सुंदर प्रस्तुति और खबरों के चयन और पेश करने में यह औरों पर भारी रहता है। , मगर इसमें सबसे कम खबरें रहती है। .मतलब खबरों की लिहाज से तो यह सबसे दरिद्र है। ( तमाम अखबारों पर अपन एक लेख चल रहा है जिसमें तमाम पेपर को पाठकीय नजरिए से टीआरपी  दी जाएगी।
,मगर बहरहाल मैं बार बार एकदम रास्ता ही खो दे रहा हूं। यहां मैं नाना प्रकार के नहीं बल्कि एक अखबार के  नानानाना प्रकारेण संपादक पर चर्चा कर रहा था। मुझे ज्ञात हुआ कि  इसी  अखबार में अब कोई नए संपादक जी पधारे है। यह मेरी  अज्ञानता और अल्पज्ञानी होने का प्रमाण है कि नए संपादक जी से मैं अनजान सा था। कभी न नाम से न कभी कोई रपट लेख आदि से भी साबका अथवा पाला  नहीं पडा था। पता लगा कि आजकल संपादक जी तमाम लेखको पत्रकारों उपसंपादकों और खुंर्राट पत्रकारों को भी खबर कैसे लिखी जाती है,इसका ज्ञान  बॉटते फिर रहे है। बकौल संपादक जी ने फरमाया कि जब अपने अखबार को मैं किसी गार्ड चायवाला रिक्शावाला या ले मैन को पढ़ते देखता हूं तो शर्मसार सा हो जाता हूं। संपादकजी ने अपने सहकर्मियों को बताया कि इस तरह के पाठकों वाला अखबार मानक और गुणवत्ता में भी ले मैन सा ही मेनस्ट्रीम से बाहर रहता है। अपनी हांक लगाते हुए तथाकथित महान संपादक जी ने हूंकारा कि मैं इस अखबार को एक क्लास के लिए बनाउंगा। जिसका मासिक वेतन डेढ़लाख यानी 18 लाख सालाना वेतन से कम वेतन पाने वाला वर्ग समाज या लोग हमारे इस पेपर के पाठक नहीं होंगे। इस प्रजातांत्रिक समाज में अपने अखबार को 18 लाखी बनाने में महान संपादक लीन है. तमाम लेखकों को लिखने का कौशल औरगूर बताते हुए तमाम रिपोर्टरों से उनकी बेस्ट रपट लाने और दिखाने का फरमान भी दे रहे हैं।
बहरहाल जबसे मैं इस 18लाखी पाठक समुदाय  वाले महान संपादक के महान विचारों से रूबरू हुआहूं तब से हिन्दी के अल्पज्ञानी मगर ग्लोबल स्टैण्डर्ड वाले जीव जंतुओं के प्रति मन में दया उपजने लगी है। मेरा तो यह साफ मानना है कि  कम पढा लिखा समाज भी यदि आपके अखबार पर अपना समय देता है पढता है तो सही मायने में उसका विश्वास ही किसी अखबार की सबसे बड़ी पूंजी है। इस तरह के पाठकों को देखकर तो किसी भी संपादक का सीना 56 इंची हो सकता है। और रही बात18 लाखी क्लास परिवार समुदाय की  तो यह वर्ग कितना बडा समाज है? अपने आप में मशगूल सा रहने वाला यह तथाकथित समाज या वर्ग तो किसी भी अखबार का पाठक नहीं केवल खरीददार होता है, और मेरे ख्याल से खरीददार सबसे बेईमान होता है, वो केवल लाभ देखता है। इस वर्ग की आस्था इमोशनल जुड़ाव किसी से नहीं होता। जब उन्हें अपनों से कोई लगाव नहीं होता तो अखबार किस खेत की उसके लिए गाजर मूलीहै ?
बहरहाल आजकल संपादक जी अपनी  धौंस जमाने दिखाने के लिए दफ्तर में श्रीलंका कांड का गेमप्लान कर रहे है। इस पेपरके मालिक कितने लाइव चालू पूर्जा या स्मार्ट हैं यह तो आने वाला समय ही बताए। मगर एक साल के भीतर ही कई संपादकों को चलता करने वाला यह चौथा खंभा पेपर इस संपादक को अपने सिर पर कब तक  नाचने देता है,यही देखना दिलचस्प है। .मगर संपादकों की जुबानी शेर पीढी में इस तरह के संपादक ही सर्वत्र दिख रहे है। मीडिया के मानक का क्या होगा यहतो राम जाने मगर अपने महान संपादकजी के बारे में विचार करना एक शोकगीत के गायन सा प्रतीत होता है।

प्रस्तुति-- रिद्धि सिन्हा नुपूर  ।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

प्रदीप कुमार माथुर की यादों में चन्द्र कुमार

पुराने कागजों में दबी यह धुंधली होती हुई फोटो जब मिली तो मन अतीत की स्मृतियों में खो गया। पुरानी बातों को याद कर आंखे भर आयी। कैसे थे वह दिन और वह लोग। फोटो सम्पादकाचार्य चन्द्र कुमार जी की है जिनके साथ वाराणसी की गौरवशाली पत्रकारिता के स्वर्णिम युग का इतिहास जुड़ा है। विष्णु राव पराड़कर की परम्परा के वाहक चन्द्रकुमार जी उस युग में दैनिक आज के सम्पादक थे जब वह स्वतंत्रता संग्राम में अपने अनूठे योगदान के लिये जाना जाता था।
बात 20-22 साल पुरानी है। मुझे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में एक संगोष्ठी में आमंत्रित किया गया था। जैसा सामान्यत होता है मैं अपना सामान लेकर विश्वविद्यालय के अतिथि गृह पहुँचा। वहाँ क्षमा याचना के साथ मुझे बताया गया कि एक दिन पहले यकायक कुछ विदेशी मेहमानों के आने के कारण अतिथि गृह में कमरा खाली नहीं है इसलिये मेरी व्यवस्था लंका (विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के पास) के एक होटल में कर दी गई है।
होटल मामूली सा था। देर हो रही थी इसलिये मैं जल्दी से अपना सामान पटक कर तैयार होकर संगोष्ठी में चला गया। शाम को आया तो होटल वाले ने बताया कि आपको अब होटल में नहीं ठहरना है क्योंकि चन्द्र कुमार जी ने कहा है कि आप उनके साथ ठहरेंगे और आपका सामान अपने घर मंगवा लिया है।
चन्द्र कुमार जी के साथ उनके घर, उनके और उनकी धर्मपत्नी प्रभा जी के साथ बिताये तीन-चार दिन मेरे जीवन की सबसे सुखद अनुभूतियों में से एक है। माँ बड़ी बहन और भाभी तीनों मिलकर जैसा किसी का ध्यान रख सकती हैं वैसा आतिथ्य प्रेम उन्होंने मुझे दिया।
अब न जाने क्या हो गया है। या तो भगवान ने इतने अच्छे लोग बनाने बंद कर दिये हैं या उनकी परिभाषा बदल गई है जो अपने अज्ञान के कारण मेरे जैसे लोग नहीं समझ पाते हैं।
प्रस्तुति-- राहुल मानव

शनिवार, 21 मार्च 2015

भविष्य की मीडिया ? / अनामी शरण बबल



 



प्रस्तुति- रिद्धि सिन्हा नुपूर
कल आलोक तोमर (20 मार्च) की चौथी पुण्यतिथि में शामिल होने का मौका मिला । आलोक तोमर   औरअखिल अनूप दिल्ली के मेरे सब से पहले मित्र थे. आलोक से मेरा परिचय तब हुआ था जब में सही मायने में पत्रकार भी नहीं बन पाया था। जनसत्ता की खबरों का अईसा जादू था कि में आलोक जी को पहला पोस्टकार्ड डाला, जिसमें बगैर जाने ही भाभी को भी प्रणाम लिखा, मगर. लौटती डाक से उनका पत्र मिला, जिसमें यह कहकर भाभी को भेजा गया प्रणाम लौटा दिया कि अभी तेरी कोई भाभी नहीं है । यादों में आलोक के इस कार्यक्रम में संगोष्ठी का विषय था भविष्य की मीडिया की चुनौतियां.।   हालांकि इसपर कोई जोरदार हंगामा सा तो नहीं बरपा। मगर मुझे लग रहा है किमीडिया के सामने तो कोई चुनौती है ही नहीं। चुनौती तो तब होती है, जब संघर्ष हो रस्सा कस्सी हो चुनौती से बचने के लिए दम लगाया जा रहा हो। मीडिया तो पहले ही बाजारू धनकुबेरों के सामने घुटने टेक दी है। बाजार और मनी पावर के सामने तो मीडिया ने अपना रंग रूप चेहरा मोहरा आकार प्रकार शक्ल तक बदल सा लिया है। एड के सामने तो पेपर का पहला पेज कितना भीतर घुस गया है यह अब तलाशना पडता है।  कुछ दिन पहले ही हाथी निशान पर बाहरी दिल्ली से एकाएक एक कुबेरपति चुनावी मैदान में उतरा। बसपा मुखिया मायावती  द्वारा टिकट दिए जाने के बाद राजधानी की हर तरह की मीडिया पेपर टीवी वेबसाईट से लेकर लोकल चैनल तक के पत्रकार और एड मैनेजरों ने मानों बसपाई नेता के घर पर डेरा डालकर विज्ञापन के लिए चाकरी करने लगे। . भविष्य की मीडिया का कल क्या होगा यह मीडिया मालिकों और चाकर संपादकों पर निर्भर नहीं है।
सबकुछ मनी पावक धन दस्युओं की हैसियत और इच्छा पर संभव है कि वो मीडिया को रखैल की तरह रखे या सखा की तरह या औजार की तरह अपने हित में रखकर यूज करे  /  24 घंटे तक चीखने चिल्लाने वाले भोंपू चैनलों को देखकर तो अब शर्म आने लगी है। खबरिया चैनलों में खबक किधर है यह खोजी पत्रकारिता का एक शोधपत्र सा बन गया है। खबरिया चैनलों में तो अपना देश हंसता खेलता मुस्कुराता खुशहाल देश दिखता है। . जब तक सौ पचास निर्बल निर्धन लोगों की मौत नहीं होती या आपदा न आ जाए तब तक तो वे इस इडियट बॉक्स के भीतर बतौर एक समाचार घुस नहीं पाते। . मीडिया के भविष्य या भविष्य की मीडिया पर चिंता करने का समय नहीं रह गया है। करोड़ों रूपए लगाकर कोई काला पीला धंधा करके अखबार निकालने वाला कुबेर में इतना कहां जिगरा होता है कि वो घाटे के साथ साथ अपने रिश्तों को भी खराब करे। . पेपर या दिन रात बजने वाला भोंपू निकाल कर तो वह रातो रात अरबपति बनने या राज्यसभा में घुसने का सपना देखता है,  जिसमें अमूमन ज्यादातर कुबेर राज्यसभा में आ ही जाते है। एक समय था कि अपने काले धंधे का सफेद बनाने के लिए माफिया बिल्डर जैसे लोग मीडिया को एक कवच की तरह अपनाते थे, मगर अब दौर बदल सा गया है अब तो तेजी से बढते हुए मीडिया के धंधे से होने वाली काली कमाई को गति और दिशा देने के लिए मीडिया मालिक बिल्डर प्रोपर्टी डीलर का धंधा बडे पैमाने परअपनाकर  फैला रहे है।  तो भविष्य की पत्रकारिता या मीडिया पर चिंता करके अपना रक्तचाप बढाना बेकार है, क्योंकि तमाम धंधेबाज मीडिया मालिक तो खुद को बाजार के सामने नतमस्तक हो गए है। यह साधारण बिषय नहीं है इस पर अभी बहुत काम होना बाकी है , मगर मैं भाजपा के शिखर नेता लाल कृष्ण आडवाणी  की आपातकाल के समय मीडिया पर एक की गयी टिप्पणी के साथअपनी बात समाप्त करूंगा कि   मीडिया की क्यों चिंता करते हो इसे अगर झुकने के लिए कहोगे तो यह नतमस्तक होकर रेंगने लगेगा।  . शायद 40 साल पहले लालजी कि यह बात सुनकर ज्यादातर पत्रकार लाल हो गए हो , मगर आज के माहौल को देखकर तो ज्यादातर पत्रकार मारे शर्म के पानी पानी हो जाएंगे,।  क्योंकि पत्रकारिता का कोई फ्यूचर नहीं रह गया है बस बाजार के लिहाज से जो भला होगा वही पत्रकारिता होगी .  . 

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