सोमवार, 9 मई 2016

प्रेमनगर में सब कुछ है प्रेम के सिवा



Wednesday, March 16, 2011



अनामी शरण बबल

दिल्ली में गिर्यसन बॉब रोड कहां पर है? इसका जवाब शायद ही कोई दे पाए, मगर दिल्ली में जीबीरोड कहां पर है ? इसका जबाव लगभग हर दिल्लीवासी   के पास है। नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास जीबीरोड यानी गौतमबुद्धा रोड में जिस्म की मंडी है। जहां पर सरकारी और पुलिस के तमाम दावों के बावजूद पिछले कई सदियों से जिस्म का बाजार फल फूल रहा है। मगर दिल्ली के एक गांव में भी जिस्म का धंधा होता है। वेश्याओं के इस गांव या बस्ती के बारे में क्या आपको पता है? बाहरी दिल्ली के गांव रेवला खानपुर के पास प्रेमनगर एक ऐसा ही गांव है, जहां पर रोजाना शाम( वैसे यह मेला हर समय गुलजार होता है) ढलते ही यह बस्ती रंगीन हो जाती है। हालांकि पुलिस प्रशासन और कथित नेताओं द्वारा इसे उजाड़ने की यदा-कदा कोशिश भी होती रहती है, इसके बावजूद बदनाम प्रेमनगर की रंगीनी में कोई फर्क नहीं पड़ा है। अलबत्ता, महंगाई और आधुनिकता की मार से प्रेमनगर में क्षणिक प्यार का धंधा उदास जरूर होता जा रहा है।
आज से करीब 14 साल पहले अपने दोस्त और बाहरी दिल्ली के सबसे मजबूत संपर्क सूत्रों में एक थान सिंह यादव के साथ इस प्रेमगनर बस्ती के भीतर जाने का मौका मिला। ढांसा रोड की तरफ से एक चाय की दुकान के बगल से निकल कर हमलोग बस्ती के भीतर दाखिल हुए।  चाय की दुकान से ही एक बंदा हमारे साथ हो लिया। कुछ ही देर में हम उसके घर पर थे। उसने स्वीकार किया कि धंधा के नाम पर बस्ती में दो फाड़ हो चुका है। एक वर्ग इस पुश्तैनी धंधे को बरकरार रखना चाहता है, तो दूसरा वर्ग अब इस धंधे से बाहर निकलना चाहता है। हमलोग किसके घर में  बैठे थे, इसका नाम तो अब मुझे याद नहीं है, मगर (सुविधा  लिए उसका नाम राजू रख लेते हैं) राजू ने  बताया प्रेमनगर में पिछले 300 से भी ज्यादा समय से हमारे पूर्वज रह रहे है। अपनी बहूओं से धंधा कराने के साथ ही कुंवारी बेटियों से भी धंधा कराने में इन्हें कोई संकोच नहीं होता। आमतौर पर दिन में ज्यादातर मर्द खेती, मजदूरी या कोई भी काम से घर से बाहर निकल जाते है, तब यहां की औरते( लड़कियां भी) ग्राहक के आने पर निपट लेती है। इस मामले में पूरा लोकतंत्र है, कि एक मर्द(ग्राहक) द्वारा पसंद की गई वेश्या के अलावा और सारी धंधेवाली वहां से बिना कोई चूं-चपड़ किए फौरन चली जाती है। ग्राहक को लेकर घर में घुसता ही घर के और लोग दूसरे कमरे में या बाहर निकल जाते है। यानी घर में उसके परिजनों की मौजूदगी में ही धंधा होने के बावजूद ग्राहक को किसी प्रकार का कोई भय नहीं रहता है।
देखने में बेहद खूबसूरत करीब 30 साल की ( तीन बच्चों की मां) पानी लेकर आती है। एकदम सामान्य शिष्टाचार और एक अतिथि की तरह सत्कार कर रही धन्नो( नाम तो याद नहीं,मगर आसानी के लिए उसे धन्नो नाम मान लेते है) और उसके पति के अनुरोध पर हमलोग करीब एक घंटे तक वहां रहकर जानकारी लेते रहे। इस दौरान हमें विवश होकर राजू और धन्नों के यहां चाय पीनी पड़ी। राजू ने बताया कि रेवला खानपुर में कभी प्रेमबाबू नामक कोई ग्राम प्रधान हुआ करते थे, जिन्होंने इन कंजरों पर दया करके रेवला खानपुर ग्रामसभा की जमीन पर इन्हें आबाद कर दिया। ग्रामसभा की तरफ से पट्टा दिए जाने की वजह से यह बस्ती पुरी तरह वैधानिक और मान्य है। अपना पक्का मकान बना लेने वाले राजू से धंधे के विरोध के बाबत पूछे जाने पर वह कोई जवाब नहीं दे पाया। हालांकि उलने यह माना कि घर का खर्च चलाने में धन्नों की आय का भी एक बड़ा हिस्सा होता है। घर से बाहर निकलते समय थान सिंह ने धन्नों के छोटे बच्चे को एक सौ रूपए थमाया। रूपए को वापस करने के लिए धन्नो और राजू अड़ गए। खासकर धन्नो बोली, नहीं साब मुफ्त में तो हम एक पैसै नहीं लेते।
काफी देर तक ना नुकूर करने के बाद अंततः वे लोग किसी तरह नोट रखने को राजी हुए।
खासकर प्रेमनगर शाम को आबाद होता है, जब ढांसा रोड पर इस बस्ती के
आस पास दर्जनों ट्रकों का रेला लग जाता है। देर रात तक बस्ती में देह का व्यापार चलता रहता है। करीब एक साल के बाद प्रेमनगर में फिर दोबारा आने का मौका मिला। 1998 में दिल्ली विधानसभा चुनाव के मतदान के दिन बाहरी दिल्ली का चक्कर काटते हुए हमारी गाड़ी रेवलाखानपुर गांव के आसपास थी। हमारे साथ हरीश लखेड़ा(अभी अमर उजाला में) और कांचन आजाद ( अब मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पीआरओ) साथ थे। एकाएक चुनाव के प्रति वेश्याओं की रूचि को जानने के लिए गाड़ी को प्रेमनगर की तरफ मोड़ दिया। हमारे साथ आए दोनों पत्रकार मित्रों के संकोच के बावजूद धड़धड़ाते हुए मै वहां पर जा पहुंचा, जहां पर साक आठ वेश्याएं(महिलाएं) बैठी थी। मुझे देखते ही एक उम्रदराज महिला का चेहरा खिल उठा। मुझे संबोदित करती हुई एक ने कहा बहुत दिनों के बाद इधर कैसे आना हुआ ? मैं भी वहां पर बैठ सहज होने की कोशिश की। तभी महिला ने टोका ये सब बाबू (दूर कार से उतरकर हरीश और कांचन मेरा इंतजार कर रहे थे) भी क्या तुम्हारे साथ ही है ? एक दूसरी महिला ने चुटकी ली। आज तो तुम बाबू फौज के साथ आए हो। बात बदलते हुए मैंने कहा आज चुनाव है ना, इन बाबूओं को मतदान कहां कहां पर कैसे होता है, यहीं दिखाने निकला था। अपनी बात को जारी रखते हुए मैने सवाल किया क्या तुमलोग वोट डालकर आ गई ? मैने एकको टोका बड़ी मस्ती में बैठी हो, किसे वोट दी। मेरी बात सुनकर सारी महिलाएं (और लड़कियां भी) खिलखिला पड़ी। खिलखिलाते हुए किसी और ने टोका बड़ा चालू हो बाबू एक ही बार में सब जान लोगे या कुछ खर्चा-पानी भी करोगे। गलती का अहसास करने का नाटक करते हुए फट अपनी जेब से एक सौ रूपए का एक नोट निकालकर मैनें आगे कर दिया। नोट थामने से पहले उसने कहा बस्सस। मैने फौरन कहा, ये तो तुमलोग के चाय के लिए है, बाकी बाद में। मैंने उठने की चेष्टा की भी नहीं कि एक बहुत सुंदर सी महिला ने अपने शिशु को किसी और को थमाकर सामने के कमरे के दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गयी। उधर जाने की बजाय मैं वहीं पर खड़ा होकर दोनों हाथ ऊपर करके अपने पूरे बदन को खोलने की कोशिश की। इस पर एक साथ कई महिलाएं एक साथ सित्कार सी उठी, हाय यहां पर जान क्यों मार रहे हो। बदन और खाट अंदर जाकर तोड़ो ना। फिर भी मैं वहीं पर खड़ा रहा और चुनाव की चर्चा करते हुए यह पूछा कि किसे वोट दी ? मेरे सवाल और मेरी मौजूदगी को बड़े अनमने तरीके से लेती हुई सबों ने जवाब देने की बजाय अपना मुंह बिदकाने लगी।  तभी मैने देखा कि 18-20 साल के दो लडके न जाने किधर से आए और इतनी सारी झुंड़ में बैठी महिलाओं की परवाह किए बगैर ही दनदनाते हुए कमरे में घुस गए। दरवाजे पर मेरे  इंतजार में खड़ी वेश्या भी कमरे में चली गई। दरवाजा अभी बंद नहीं हुआ था, लिहाजा मैं फौरन कमरे की तरफ भागा तो एक साथ कई महिलाओं ने आपति की और जरा सख्त लहजे में अंदर जाने से रोका। सबों की अनसुनी करते हुए दूसरे ही पल मैं कमरे में था। जहां पर लड़कों से लेनदेन को लेकर मोलतोल हो रहा था। एकाएक कमरे में मुझे देखकर उसका लहजा बदल गया। उसने बाहर जाकर किसी और के लिए बात करने पर जोर देने लगी। फौरन 100 रूपए का नोट दिखाते हुए मैनें जिद की, जब मेरी बात हो गई है, तब दूसरे से मैं क्यों बात करूं ? सख्त लहजे में उसने कहा मैं किसी की रखैल नहीं हूं जो तुम भाव दिखा रहे हो। फिलहाल तेरी बारी खत्म अब बाहर जाओ। कमरे से बाहर निकलते ही तमाम वेश्याओं का चेहरा लाल था। बाबू धंधे का कोई लिहाज होता है। किसी एक ने मेरे उपर कटाक्ष किया क्या तुम्हें वोट डालना है? या किसे वोट डाली हो यह पूछते ही रहोगे ? इस पर सारी खिलखिला पड़ी। मैं भी ठिठाई से कहा यहां पर नहीं किसी को तीन चार घंटे के लिए भेजो गाड़ी में और पैसा बताओ ? इस पर सबों ने अपनी अंगूली को दांतों से दबाते हुए बोल पड़ी। हाय रे दईया पैसे वाला है। किसी ने पूरी सख्ती से कहा कोई और मेम को ले जाना अपने साथ गाड़ी में, प्रेमनगर की हम औरतें बाहर गाड़ी में नहीं जाती। इस बीच कहीं से चाय बनकर आ गई। फौरन नरम पड़ती हुई वेश्याओं ने चाय पीने का अनुरोध किया। मैनें नाराजगी दिखाते हुए फिर कभी आने का घिस्सा पीटा जवाब दोहराया। इस बीच अब तक खुला कमरा भीतर से बंद हो चुका था। लौटने के लिए मैं मुड़ा तो दो एक ने चीखकर कटाक्ष किया। वर्मा( साहब सिंह वर्मा) हो या सोलंकी( स्थानीय विधायक धर्मदेव सोलंकी) सब भीतर से खल्लास हैं ,बाबू।
प्रेमनगर के बारे में दो तीन खबरों के छपने के बाद तब पॉयनीयर में (बाद में इंडियन एक्सप्रेस) में काम करने वाली ऐश्वर्या(अभी कहां पर है, इसका पता नही) ने मुझसे प्रेमनगर पर एक रिपोर्ट कराने का आग्रह किया।  यह बात लगभग 2000 की थी। हमलोग एक बार फिर प्रेमनगर की उन्ही गलियों की ओर निकल पड़े। साथ में एक लड़की को लेकर इन गलियों में घूमते देख कर ज्यादातर वेश्याओं को बड़ी हैरानी हो रही थी। कई तरह की भद्दी और अश्लील टिप्पणियों से वे लोग हमें नवाजती रही। मैने कुछ उम्रदराज वेश्याओं को बताया कि ये एक एनजीओ से जुड़ी हैं और यहां पर वे आपलोग की सेहत और रहनसहन पर काम करने आई हैं। ये एक बड़ी अधिकारी है, और ये कई तरह से आपलोग को फायदा पहुंचाना चाहती है। मेरी बातों का इनपर कोई असर नहीं पड़ा। उल्टे टिप्पणी की कि ऐसी ऐसी बहुत सारी थूथनियों को मैं देख चूकी हूं। कईयों ने उपहास किया अपनी हेमा मालिनी को लेकर जल्दी यहां से फूटो अपना और मेरा समय बर्बाद ना करो। मैने बल देकर कहा कि चिंता ना करो हमलोग पूरा पैसा देकर जाएंगे। इतना सुनते ही कई वेश्याएं आग बबूला सी हो गई। एक ने कहा बाबू यहां पर रोजाना मेला लगता है, जहां पर तुम जैसे डेढ़ सौ बाबू आकर अपनी थैली दे जाते है। पैसे का रौब ना गांठों। यहां तो  हमारे मूतने से भी पैसे की बारिश होती है, अभी तुम बच्चे हो। हमलोगों की आंखें नागीन सी होती है, एक बार देखने पर चेहरा नहीं भूलती। तुम तो कई बार शो रूम देखने यहां आ चुके हो। दम है तो कमरे में चलकर बाते कर। मैनें फौरन क्षमा मांगते हुए किसी तरह वेश्याओं को शांत करने की गुजारिश में लग गया। एक ने कहा कि हमलोगों को तुम जितना उल्लू समझते हो, उतना हम होती नहीं है। बड़े बड़े फन्ने तीसमार खांन यहां मेमना बनकर जाते है। हम ईमानदारी से केवल अपना पैसा लेती है। एक वेश्या ने जोड़ा, हम रंड़ियों का अपना कानून होता है, मगर तुम एय्याश मर्दो का तो कोई ईमान ही नहीं होता। एकाएक वेश्याओं के इस बौछार से मैं लगभग निरूतर सा हो गया। महिला पत्रकार को लेकर फौरन खिसकना ही उचित लगा। एक उम्रदराज वेश्या से बिनती करते हुए पूछा कि क्या इसे पूरे गांव में घूमा दूं? सहमति मिलने पर हमलोग प्रेमनगर की गलियों को देखना शुरू किया। अब हमलोगों ने फैसला किया कि किसी से उलझने या सवाल जवाब करने की बजाय केवल माहौल को देखकर ही हालात का जायजा लेना ज्यादा ठीक है। हमलोग एक गली में प्रवेश ही किए थे कि गली के अंतिम छोर पर दो लड़कियां और दो लड़कों के बीच पैसे को लेकर मोलतोल हो रही थी। 18-19 साल के लड़के 17-18 साल का मासूम सी लड़कियों को 20 रूपए देना चाह रहे थे, जबकि लड़कियां 30 रूपए की मांग पर अड़ी थी। लगता है जब बात नहीं बनी होगी तो एक लड़की बौखला सी गई और बोलती है. साले जेब में पैसे रखोगे नहीं और अपना मुंह लेकर सीधे चले आओगे अपनी अम्मां के पास आम चूसने। चल भाग वरना एक झापड़ दूंगी तो साले तेरा केला कटकर यहीं पर रह जाएगा। शर्म से पानी पाना से हो गए दोनों लड़के हमलोगों के मौके पर आने से पहले ही फूट गए। मैं बीच में ही बोल पड़ा, क्या हुआ इतना गरम क्यों हो। इस पर लगभग पूरी बदतमीजी से एक बोली मंगलाचरण की बेला है, तेरा हंटर गरम है तो चल वरना तू भी फूट। मैने बड़े प्यार से कहा कि चिंता ना कर तू हमलोग से  बात तो कर तेरे को पैसे मिल जाएंगे। मैनें अपनी जेब से 50 रूपए का एक नोट निकाल कर आगे कर दिया। नोट  को देखकर हुड़की देती हुई एक ने कहा सिर पर पटाखा बांधकर क्या हमें दिखाने आया है, जा मरा ना उसी से। मैने झिड़की देते हुए टोका इतनी गरम क्यों हो रही है, हम बात ही तो कर रहे है। गंदी सी गाली देती हुई एक ने कहा हम बात करने की नहीं नहाने की चीज है। कुंए में तैरने की हिम्मत है तो चल बात भी करेंगे और बर्दाश्त भी करेंगे। दूसरी ने अपने साथी को उलाहना दी, तू भी कहां फंस रही है साले के पास डंड़ा रहेगा तभी तो गिल्ली से खेलेगा। दोनों जोरदार ठहाका लगाती हुई जाने लगी। मैं भी बुरा सा मुंह बनाते हुए तल्ख टिप्पणी की, तू लोग भी कम बदतमीज नहीं है। यह सुनते ही वे दोनों फिर हमलोगों के पास लौट आई। वेश्या के घर में इज्जत की बात करने वाला तू पहला मर्द है। यहां पर आने वाला मर्द हमारी नहीं हमलोगों के हाथों अपनी इज्जत उतार कर जाता है। मैने बात को मोड़ते हुए कहा कि ये बहुत बड़ी अधिकारी है और तुमलोग की सेहत और हालात पर बातचीत करके सरकार से मदद दिलाना चाहती है। इस पर वे लोग एकाएक नाराज हो गई। बिफरते हुए एक ने कहा हमारी सेहत को क्या हुआ है। तू समझ रहा है कि हमें एड(एड़स) हो गया है। तुम्हें पता ही नहीं है बाबू हमें कोई क्या चूसेगा , चूस तो हमलोग लेती है मर्दो को। तपाक से मैनें जोड़ा अभी लगती तो एकदम बच्ची सी हो, मगर बड़ी खेली खाई सी बाते  कर रही है। इस पर रूखे लहजे में एक ने कहा जाओ बाबू जाओ तेरे  बस की ये सब नहीं है तू केवल झुनझुना है। उनलोगों की बाते सुनकर जब मैं खिलखिला पड़ा, तो एक ने एक्शन के साथ कहा कि मैं चौड़ा कर दूंगी न तो तू पूरा की पूरा भीतर समा जाएगा। गंदी गंदी गालियों के साथ वे दोनों पलक झपकते गली पार करके हमलोगों की नजरों से ओझल हो गई। पूरा मूड उखड़ने के बाद भी भरी दोपहरी में हमलोग दो चार गलियों में चक्कर काटते हुए प्रेमनगर से बाहर निकल गए।
दो साल पहले 2009 में एक बार फिर थान सिंह यादव के साथ मैं प्रेमनगर  में था। करीब आठ साल के बाद यहां आने पर बहुत कुछ बदला बदला सा दिखा। ज्यादातर कच्चे मकान पक्के हो चुके थे। गलियों की रंगत भी बदल सी गयी थी। कई बार यहा आने के बाद भी यहां की घुमावदार गलियां मेरे लिए पहेली सी थी। गांव के मुहाने पर ही एक अधेड़ आदमी से मुलाकात हो गई। हमलोंगों ने यहां आने का मकसद बताते हुए किसी ऐसी महिला या लोगों से बात कराने का आग्रह किया, जिससे प्रेमनगर की पीड़ा को ठीक से सामने रखा जा सके। पत्रकार का परिचय देते हुए उसे भरोसे में लिया। हमने यह भी बता दिया कि इससे पहले भी कई बार आया हूं,मगर अपने परिचय को जाहिर नहीं किया था। अलबता पहले भी कई बार खबर छापने के बावजूद हमने हमेशा प्रेमनगर की पीड़ा को सनसनीखेज बनाने की बजाय इस अभिशाप की नियति को प्रस्तुत किया था।  
यह हमारा संयोग था कि बुजुर्ग को मेरी बातों पर यकीन आ गया, और वह हमें अपने साथ लेकर घर आ गया। घर में दो अधेड़ औरतों के सिवा दो जवान विवाहिता थी। कई छोटे बच्चों वाले इस घर में उस समय कोई मर्द नहीं था। घर में सामान्य तौर तरीके से पानी के साथ हमारी अगवानी की गई। दूसरे कमरे में जाकर मर्द ने पता नहीं क्या कहा होगा। थोड़ी देर में चेहरे पर मुस्कान लिए चारों महिलाएं हमारे सामने आकर बैठ गई। इस बीच थान सिंह ने अपने साथ लाए बिस्कुट, च़ाकलेट और टाफी को आस पास  खड़ें बच्चों के बीच बाट दिया। बच्चों के हाथों में ढेरो चीज देखकर एक ने जाकर गैस खोलते हुए चाय बनाने की घोषणा की। इस पर थान सिंह ने अपनी थैली से दो लिटर दूध की थैली निकालते हुए इसे ले जाने का आग्रह किया। इस पर शरमाती हुई चारों औरतों ने एक साथ कहा कि घर में तो दूध है। बाजी अपने हाथ में आते देखकर फिर थान सिंह ने एक महिला को अपने पास बुलाया और थैली से दो किलो चीनी के साथ चाय की 250 ग्राम का एक पैकेट और क्रीम बिस्कुट के कुछ पैकेट निकाल कर उसे थमा दिया। पास में खड़ी महिला इन सामानों को लेने से परहेज करती हुई शरमाती रही। सारी महिलाओं को यह सब एक अचंभा सा लग रहा था। एक ने शिकायती लहजे में कहा अजी सबकुछ तो आपलोगों ने लाया है तो फिर हमारी चाय क्या हुई। मैने कहा अरे घर तुम्हारा, किचेन से लेकर पानी, बर्तन, कप प्लेट से लेकर चाय बनाने और देने वाली तक तुम लोग हो तो चाय तो तुमलोग की ही हुई। अधेड़ महिला ने कहा बाबू तुमने तो हमलोगों को घर सा मान देकर तो एक तरीके से खरीद ही लिया। दूसरी अधेड़ महिला ने कहा बाबू उम्र पक गई. हमने सैकड़ों लोगों को देखा, मगर तुमलोग जैसा मान देने वाला कोई दूसरा नहीं देखा। यहां तो जल्दी से आकर फौरन भागने वाले मर्दो को ही देखते आ रहे है।
इस बीच हमने गौर किया कि बातचीत के दौरान ही घर में लाने वाले बुजुर्ग पता नहीं कब बगैर बताए घर से बाहर निकल गए। वजह पूछने पर एक अधेड़ ने बताया कि बातचीत में हमलोग को कोई दिक्कत ना हो इसी वजह से वे बाहर चले गए। हमने बुरा मानने का अभिनय करते हुए कहा कि यह तो गलत है मैंने तो उन्हें सबकुछ बता दिया था। खैर इस बीच चाय भी आ गई।
चारों ने लगभग अपने हथियार डालते हुए कहा अब जो पूछना है बाबू बात कर सकते हो। बातचीत का रूख बताते ही एक ने कहा बाबू तुम तो चले जाओगे, मगर हमें परिणाम भुगतना पड़ेगा। एक बार फिर इमोशनल ब्लैकमेलिंग करते हुए मैने साफ कहा कि यदि तुम्हें हमलोगों पर विश्वास नहीं है तो मैं भी बात करना नहीं चाहूंगा यह कहकर मैंने अपना बोरिया बिस्तर समेटना चालू कर दिया। जवान सी वेश्या तपाक से मेरे बगल में आकर बैठती हुई बोली अरे तुम तो नाराज ही हो गए। हमने तो केवल अपने मन का डर जाहिर किया था। शिकायती लहजे में मैंने भी तीर मारा कि जब मन में डर ही रह जाए तो फिर बात करने का क्या मतलब? इस पर दूसरी ने कहा बाबू हमलोगों को कोई खरीद नहीं सकता, मगर तुमने तो अपनी मीठी मीटी बातों में हमलोगों को खरीद ही लिया है। अब मन की सारी बाते बताऊंगी। फिर करीब एक घंटे तक अपने मन और अपनी जाति की नियति और सामाजिक पीड़ा को जाहिर करती रही।
बुजुर्ग सी महिला ने बताया कि हमारी जाति के मर्दो की कोई अहमियत नहीं होती। पहले तो केवल बेटियों से ही शादी से पहले तक धंधा कराने की परम्परा थी, मगर पिछले 50-60 साल से बहूओं से भी धंधा कराया जाने लगा। हमारे यहां औरतों के जीवन में माहवारी के साथ ही वेश्यावृति का धंधा चालू होता है, जो करीब 45 साल की उम्र तक यानी माहवारी खत्म(रजोनिवृति) तक चलता रहता है। इनका कहना है कि माहवारी चालू होते ही कन्या का धूमधाम से नथ उतारी जाती है। गुस्सा जाहिर करती हुई एक ने कहा कि नथ तो एक रस्म होता है, मगर अब तो पुलिस वाले ही हमारे यहां की कौमा्र्य्य को भंग करना अपनी शान मानते है। नाना प्रकार की दिक्कतों को रखते हुए सबों ने कहा कि शाम ढलते ही जो लोग यहां आने के लिए बेताब रहते हैं, वही लोग दिन के उजाले में हमें उजाड़ने घर से बाहर निकालने के लिए लोगों कों आंदोलित करते है। एक ने कहा कि सब कुछ गंवाकर भी इस लायक हमलोग नहीं होती कि बुढ़ापा चैन से कट सके। हमारे यहां के मर्द समाज में जलील होते रहते हैं। बच्चों को इस कदर अपमानित होना पड़ता है कि वे दूसरे बच्चों के कटाक्ष से बचने के लिए हमारे बच्चे स्कूल नहीं जाते और पढ़ाई में भी पीछे ही रह जाते है। नौकरी के नाम पर निठ्ठला घूमते रहना ही हमारे यहां के मर्दो की दिनचर्या होती है। अपनी घरवाली की कमाई पर ही ये आश्रित होते है।
 एक ने कहा कि जमाना बदल गया है। इस धंधे ने रंगरूप बदल लिया है,मगर हमलोग अभी पुराने ढर्रे पर ही चल रहे है। बस्ती में रहकर ही धंधा होने के चलते बहुत तरह की रूकावटों के साथ साथ समाज की भी परवाह करनी पड़ती है। एक ने बताया कि हम वेश्या होकर भी घर में रहकर अपने घर में रहते है। हम कोठा पर बैठने वाली से अलग है। बगैर बैलून (कंडोम) के हम किसी मर्द को पास तक नहीं फटकने देती। यही कारण है कि बस्ती की तमाम वेश्याएं सभी तरह से साफ और भली है।
यानी डेढ सौ से अधिक जवान वेश्याओ के अलावा, करीब एक सौ वेश्याओं की उम्र 40 पार कर गई है। एक अधेड़ वेश्या ने कहा कि लोगों की पसंद 16 से 25 के बीच वाली वेश्याओं की होती है। यह देखना हमारे लिए सबसे शर्मनाक लगता है कि एक 50 साल का मर्द जो 10-15 साल पहले कभी उसके साथ आता था , वही मर्द उम्रदराज होने के बाद भी आंखों के सामने बेटी या बहू के साथ हमबिस्तर होता है और हमलोग उसे बेबसी के साथ देखती रह जाती है। एक ने कहा कि उम्र बढ़ने के साथ ही वेश्या अपने ही घर में धोबी के घर में कुतिया जैसी हो जाती है। इस पर जवान वेश्याओं ने ठहाका लगाया, तो मंद मंद मुस्कुराती हुई अधेड़ वेश्याओं ने कहा कि हंमलोग भी कभी रानी थी, जैसे की तुमलोग अभी है। इस पर सबों ने फिर ठहाका लगाया। हमलोग भी ठहाका लगाकर उनका साथ दिया। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद फिर मैनें कहा कुछ और बोलो? किसी ने बेबसी झलकाती हुई बोली और क्या बोलू साहब ? बोलने का इतना कभी मौका कोई कहां देता है ? यहां तो खोलने का दौर चलता है। दूसरी जवान वेश्या ने कहा खोलने यानी बंद कमरे में कपड़ा खोलने का ? एक ने चुटकी लेते हुए कहा कि चलना है तो बोलो। एक अधेड़ ने समर्थन करती हुई बोली कोई बात नहीं साब मेहमान बनकर आए थे चाहों तो माल टेस्ट कर सकते हो। एक जवान ने तुरंत जोड़ा साब इसके लिए कोई पैसा भी नहीं लूंगी? हम दोनों एकाएक खड़े हो गए। थान सिंह ने जेब से दो सौ रूपए निकाल कर बच्चों को देते हुए कहा कि अब तुमलोग ही नही चाहती हो कि हमलोगबात करें। इस पर शर्मिंदा होती हुई अधेड़ों ने कहा कि माफ करना बाबू हमारी मंशा तुमलोगों को आहत करने की नहीं थी। हमलोग प्रेमनगर से बाहर हो गए, मगर इस बार इन वेश्याओं की पीड़ा काफी समय तक मन को विह्वल करता रहा। इस बस्ती की खबरें यदा-कदा पास तक आती रहती है। ग्लोवल मंदी मंदी से भले ही भारत समेत पूरा संसार उबर गया हो, मगर अपना सबकुछ गंवाकर भी प्रेमनगर की वेश्याए इस मंदी से कभी ना उबर पाई है और लगता है कि शायद ही कभी अर्थिक तंगी से उबर  पाएगी ?

1 comment:

  1. बहुत अच्छा लिखा है सर

बुधवार, 4 मई 2016

मीठी मीठी यादों से भरे कॉलेज के वे मोहक दिन : अनामी शरण बबल

मीठी मीठी यादों से भरे कॉलेज के वे मोहक दिन (1986-87)



अनामी शरण बबल



अतीत की याद मनभावन लागे
ज्यों दूर के ढोल सुहावन लागे

(1987- 2017)

( कॉलेज में मेरे साथ मेरी मोहक यादों को ना भूलने योग्य बनाने में अपनी भूमिका निभाने वाले तमाम गुरूजनों, मेरे क्लास के सहपाठी पाठिन मित्रों समेत उस दौरान कॉलेज के विभिन्न कक्षाओं पाठ्यक्रमों में पढने वाले समस्त दोस्तों साथियों की याद में समर्पित है यह मादक और मीठा सा संस्मरण। आप सभी के कारण ही मैं 30 साल गुजर जाने के बाद भी इन मीठी मीठी यादों से भरे कॉलेज के वे मोहक दिनों को मैं भूल नहीं पाया। इस संस्मरण को लिख लेने के बाद मैं अपने सहपाठियों की तलाश में लगा, बहुतों को फोन भी किया सूत्र के सूत्र के सूत्रों को भी खंगाला मगर अंतत केवल एक सहपाठिन से दूरभाष पर बात हुई। एक स्कूल में शिक्षिका के रूप में काम कर रही सहपाठिन तो अब नानी बन गयी है। इनसे बात करने में मुझे अपनी शिक्षिका मौसी का सहारा लेना पड़ा। पटना में ही कहीं बतौर शिक्षिका शिक्षा की रौशनी बांट रही वीणा से अंतत कोई संपंर्क नहीं हो सका। अलबत्ता वहीं एक और सहपाठिन से फोन पर बात हुई तो संस्मरण को कुछ ज्यादा रसदार बनाने की कोशिश की आलोचना की, मगर ज्यादातरों की पहिचान को पर्दे में रखने की सराहना करती हुई बोली कि लेख जब जब मैं पढ़ती हूं तो 1986-87 के दिन जीवंत हो जाते है।
हालांकि इस दौरान मेरा औरंगाबाद जाना तो तीन बार हुआ मगर कब आकर लौट आया सका कोई अहसास ही नहीं हुआ, नहीं तो दो एक मित्रों की खोजबीन हो सकती थी। खैर कॉलेज छोड़ने के 30 साल में जमाना बदल गया। युवा से लेकर अधेडावस्था सिर पर है। मैंने क्या कॉलेज छोडा कॉलेज की शिक्षा तो मेरी बेटी की भी पूरी हो गयी। मगर यादें ही जीवन है, निधि है और जिंदा रहने की दवा है। यादें हमें प्रेरणा देती है। तो तमाम दोस्तों अपने कॉलेज में गए भी 10 साल से ज्यादा हो गए हैं, मगर मीठी मीठी चुभन और अपनी छात्रावस्था की मोहक खुश्बू आज भी कॉलेज में कहीं ना महसूसता हूं जो कभी जाने पर जीवंत हो जाएगी। तो मेरे कॉलेज के भूत से लेकर वर्तमान यानी सभी छात्रों छात्राओं को समर्पित है मेरा कॉलेजी संस्मरण जिसमें मैं भी कभी कभी खुद को संलग्न पाता हूं। नमस्कार )

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अपने अतीत में एक लंबे अंतराल के बाद झांकना मन को भावविभोर कर देता है। हालांकि बहुत सारी बातें तो मन की पटरी से उतर भी जाती हैं, मगर अतीत की तमाम मोहक यादें सदा पटरी पर ही बनी रहती है। 1981 में मैट्रिक पास करने के बाद पढ़ने के लिए दयालबाग आगरा में मेरा नाम लिखवाया गया मगर घर से बाहर निकलते ही मानों मैं  बेहय्या सा होकर बहक गया, और मेरी तंद्रा तब टूटी जब इंटरमीडिएट (कृषि) की परीक्षा में फेल हो गया।  कृषि में मेरी कोई दिलचस्पी पहले भी नहीं थी पर मेरे पापाजी का मन कृषि में ही नाम लिखवाने का था। मैं पहले से ही मना कर रहा था कि पापाजी इसमें ही मेरा नाम लिखवा कर माने।  पर पापाजी के नाक काटकर अभी घर लौटे एक माह भी नहीं हुआ था कि एक दिन सुबह सुबह मुझे फिट पडा और मैं एपिलेप्सी का मरीज हो गया। करीब छह माह में 30-32 बार फिट पड़े होंगे। इसका बेहतर ईलाज रांची के डॉक्टर के के सिन्हा ने किया। और 1983 में मैं स्वस्थ्य हुआ। ईलाज के बाद फिर  फिट पड़ने बंद हो गए। और मैं औरंगाबाद के एक इंटरमीडिएट कॉलेज से किसी तरह 1983 में पास हुआ । जिले के सबसे बडे कॉलेज के रूप में विख्यात सिन्हा कॉलेज में बीए में नाम लिखवाया। कॉलेज के तमाम गुरूओं से परिचित होते हुए 1986 में बीए जिसे स्नातक भी कहा जाता है पास हो गया। बीए ऑनर्स हिन्दी से मैने करने का फैसला किया। और सच में 30 साल के बाद यह कहने और स्वीकारने में कोई संकोच नहीं कि यह 9-10 माह मेरे शैक्षणिक जीवन का सबसे सुदंर मोहक और यादगार लम्हा रहा। बाद में भले ही भारतीय जनसंचार संस्थान नयी दिल्ली में भी हिन्दी पत्रकारिता के पहले बैच के पहले सत्र में छोटे शहरों से आए हम जैसे बहुत सारे दोस्तों ने जमकर कई तरह के धमाल मचाया। इसके बावजूद  1986-87 का हिन्दी ऑनर्स का साल मेरे लिए आज भी लाजवाब ही है। 
एक दिन मैंने अपने पापा से श्री झा जी से किस तरह के संबंध है के बारे में पूछा। पापा ने बताया कि झा जी के एक साले उनके साथ बिजली विभाग में ही काम करते थे। उनके साथ पापाजी भी कई बार श्री झा जी के यहां गए थे, लिहाजा मेरे पापा के साथ भी वे साले का मजाकिया रिश्ता ही रखते थे। जीजा साला का रिश्ता तो मेरे पापा के साथ था, मगर वे मजाक और उलाहने का रिश्ता मेरे संग ही निभाते थे। मुझे उलाहना देने में वे कभी नहीं चूकते। और आज जब इन रिश्तों के बीच मैं अपने गुस्ताखियों पर गौर करता हूं तो वाकई लगता है कि वे कितने महान थे जो मेरी तमाम उदंडताओं को किस सहजता के साथ माफ या नजरअंदाज कर देते थे। 
 बीए ऑनर्स में नामांकन के बाद जब मैं पहले दिन कमरे में घुसा ही था कि क्लास में लड़कियों की भीड़ देखकर मैं घबराकर उल्टी पांव वापस बाहर निकल भागा। मुझे लगा कि मै गलती से किसी दूसरे कमरे में घुस आया हूं। बाहर आकर देखा कि कमरे में तो अपने झा जी ही है। खैर किसी तरह मैं फिर कमरे में प्रवेश करने की हिम्मक की। अभी कमरे में ठीक से अंदर भी नहीं हुआ था कि झा जी ने मजाकिया लहजे में पूछा कहां भागे जा रहा था लाला। ( वे अमूमन मुझे इसी नाम से पुकारते थे) तब तक तो मैं थोडा संभल गया था।. भाग नहीं रहा था सर इतनी सारी लड़कियों को देखकर मुझे लगा कि मैं गलती से किसी और कमरे में चला गया हूं। मेरी बात पर कमरे में ठहाका लगा। मैं बैठने की बजाय खड़े होकर लड़कियों की गिनती करने लगा। इस पर फिर तपाक से झाजी बोले बैठो न लाला क्या कर रहे हो ?  मैं उनकी तरफ मुड़ते हुए कहा और ये 17 नहीं 18  है सर। मेरी बात को सर भी नहीं समझे और पलटते ही बोले कि क्या 18 ।  मैं अभी तक खड़ा ही था  मैने बड़ी मासूमियत से कहा सर क्लास में 18 लड़कियां और लड़के केवल आठ । इनको संभाला कैसे जाएगा । तो क्या तुम्हें कोई दिक्कत हो रही है ? नहीं सर दिक्कत तो आपको होगी मैं तो केवल गिनती बता रहा था। मेरी बकवास से श्री झा जी उबल पडे और उलाहना भरे अंदाज में बोले ठीक है ठीक है लाला चल तू बैठ मैं सब संभाल लूंगा। मैं फिर खडा होकर तपाक से कह ही डाला कि हां सर आपके बाद मैं भी सबको संभाल कर रखूंगा। इस पर अपनी कुर्सी से उठकर वे मेरे सामने आ गए और हिटलरी अंदाज में बोले  चल बता तू लाला कि कैसे इन लोगों को संभालकर रखेगा। तबतक मैं लगभग सभी लड़कियों को एक नजर देख चुका था। कमरे का पूरा माहौल एकदम खिलखिलाहट से भर गया था। तमाम लड़के लडकी मंद मंद तो कोई खुलकर हंस रहा था। पूरे हिम्मत के साथ मैने कहा कि सर इनमें दो तीन तो मेरी मौसी हैं दो तीन मेरी मौसियों की सहेली है और कईयों के पापा तो मेरे पापा के संग काम करते है। बाकी दो चार अनजानी सी हैं तो सब काबू में रहेगी। काबू सुनते ही श्री झा जी फिर बौखला गए तू लाला इन्हे काबू में रखेगा । मैने हाथ जोड़कर एकदम दंडवत मुद्रा में सबिनय कहा कि मेरी क्या बिसात है सर इन देवियों को काबू में रखने की। इनको देख देख कर तो हमलोग काबू में रहेंगे। इस पर श्री झा जी भी मुस्कुरा पडे, और क्लास के सभी छात्र छात्राएं भी हंसने लगे। वे सहज और सामान्य होते हुए बोले चल लाला सीट संभाल । हम सभी लड़के तो परिचित थे ही । अलबत्ता दो एक को छोड़कर और से बात नहीं हुई थी। सामान्य औपचारिक बातें कर क्लास खत्म हुआ। गुरूजी के कमरे में रहते ही सारी छात्राएं एक एक कर बाहर निकल गयी, तब कहीं जाकर हमारे झा जी भी कमरे से बाहर हुए। सबों के बाहर जाते ही कमर में सन्नाटे के साथ रह गए बाकी हम लड़के जो ठहाका मार कर हंस पड़े। मेरी हाजिर जवाबी पर मेरे दोस्तों ने कहा अनामी भाई गजब तुमने तो आज सबों से जमकर मस्ती की। तो यह था बीए ऑनर्स का मेरा पहला दिन ।

मैं पढ़ने में कोई बडा उस्ताद कभी नहीं रहा हू। पर मेरी समझने की क्षमता लगभग ठीक ठाक है। एक बार गौर से सुन लेने के बाद बिषय सार की समझ हो जाती है और मैं उसको अपनी भाषा में लिखने का प्रयास करता था । मैं किताबें तो कई बार कई जगह से पार ( जिसे चुरा ली भी कह सकते है) कर दी है। मां और नानी के बक्से से और पापा की जेब से भी महीने में कई बार रुपए निकाल लेता था। उस समय तो दस पांच रूपए की ही बड़ी कीमत होती थी लिहाजा छोटी छोटी चोरियां लंबे समय तक चली मगर किसी की पकड़ में नहीं आयी। अलबत्ता हम सभी भाई इस पॉकेटमारी से परिचित थे ।  लिहाजा अपने त्रिदेव बंधुओं को मुंह बंद रखने का जुर्माना भी देना पड़ता था। इसके अलावा चोरी करने की न आदत्त है न प्रवृति। परीक्षा में लोग कैसे नकल या चोरी कर लेते हैं यह तो मैं आज तक भी नहीं समझ सका। और मेरी यह पक्की धरणा है कि जो लड़के नकल करके लखने में माहिर होते हैं यदि अपनी किताबों पर जरा गौर करें तो बगैर नकल के ही बढ़िया नंबरों से पास हो सकता है।

पढाई के दौरान मेरी बहुत सारी कविताएं भी छपती रहती थी और एक संपादित किताब भी दिल्ली से छपी थी। साहित्य पढने का नया चस्का लगा था, और उस पर पटना के एक वीकली पेपर स्पिलंटर के लिए मैं लगातार रिपोर्टिंग भी करता था। पटना के ज्यादातर पत्रकार उस समय मेरे मित्र तो नहीं मेरे आदरणीय थे ( बाद में दिल्ली में रहते हुए भले ही वे फिर मेरे दोस्त हो गए) और मैं किसी भी खबर को आज पाटलिपुत्र टाईम्स प्रदीप तथा आर्यावर्त में छपवा लेता था। (1984-87 ) के दौरान हिन्दुस्तान दैनिक जागरण आदि का पटना में आगमन नहीं हुआ था। यानी एक तरह से मैं कवि लेखक और पत्रकार बनने की प्रक्रिया में था। इसका कोई दंभ तो नहीं पर खुद को औरो से जरा अलग थलग मानकर जरूर चलता था।

हिन्दी पढाने वालों में श्री झा जी के अलावा परम आदरणीय उपाध्याय जी तथा आधुनिक साहित्य श्री गुप्तेश्वर सिंह पढ़ाते थे। मैं इन दोनों का भी स्नेह पात्रों में था। एक तरफ श्री उपाध्याय जी तुलसी सूरदास कबीर भूषण विद्यापति आदि के गीतों को जिस माधुर्य्यरस के साथ गाकर पढ़ाते थे, वह अतुलनीय होता था ।  बाद में दिल्ली मे रहते हुए श्री उपाध्याय जी की पढाई शैली को याद करके महसूस हुआ कि वाकई वे कितने सहज तरीके से बच्चों को अपनी बात समझाते थे। मगर उस समय मैं इतना परिपक्व और काव्य रसिक नहीं था, जो श्री उपाद्याय की शैली पर मुग्ध रहता। वहीं श्री गुप्तेश्वर जी की पकड़ आधुनिक साहित्य में काफी गहरी थी। बात बात पर धूमिल मुक्तिबोध सर्वश्रवर दयाल सक्सेना  रघुवीर सहाय राही मासूमं रजा काशीनाथ सिंह आदि इत्यादि लेखकों का जिक्र करते रहते थे और यह संयोग था कि ज्यादातर समकालीन साहित्यिक पत्रिकाएं मेरे पास होती थी लिहाजा मैं भी उल्लेखित लेखकों का जानकार निकलता था। नया नया साहित्य का मुल्ला होने के कारण अपने मित्रों से भी बहुत सारी बातें सुन चुका था, लिहाजा उनके ज्ञान धरातल पर मैं भले ही कम था पर आधुनिक समकालीन जानकारियों में तो एकदम बराबर ठहरता था। , इस कारण उनसे मेरी पटती भी थी। हिन्दी विभागाध्यक्ष श्री झा जी से तो मेरा प्यार मुहब्बत उलाहना कटाक्ष का रिश्ता जगजाहिर जारी ही था।

बीए ऑनर्स क्लास मे  मात्र 25 छात्रों में 18 लड़कियों का होना अमूमन कॉलेज में चर्चे का प्रसंग रहता था। चूंकि मेरा घर कॉलेज से 14 किलोमीटर दूर एक कस्बा देव में था, इस कारण सुबह वाली बस पकड़नी पड़ती थी । जिससे कॉलेज आने वाले बहुत सारे लड़कों में मैं भी समय से पहले ही आ जाता था। लिहाजा कॉलेज प्रांगण में बने एक चबूतरा ही हम तमाम लड़कों का अड्डा होता था। मेरा क्लास रूम भी सामने ही था।  और वहीं पर लड़कियां का कॉमन रूम भी था। यानी सभी लड़कियों का क्लास से पहले या बाद में कन्याओं का जमघट इसी एक कमरे के कॉमन रूम में ही होता था। सुबह सुबह दर्जनों रिकशे से थोडी थोडी देर के बाद रंग बिरंगे वेश भूषा साज सज्जा और महक चहक से रंगीन परियों फुलझड़ियों  और तितलियों सी चंचल कन्याओं का आगमन होता रहता था,।  कॉलेज प्रांगण में मौजूद मेरे सहित सैकड़ों लड़कों की निगाहें भी उधर ही लगी रहती थी, कि देखे अब इसमें कौन आई और अब तक कौन नहीं आई है। बहुत लोग तो बाकायदा कौन लड़की कब आ रही है इसका पूरा विवरण तक रखते थे।  बहुत सारे लड़कों द्वारा शिष्ट अशिष्ट कटाक्ष फब्तियो  समेत सामूहिक ठंडी आहों कराहों का भी सार्वजनिक प्रदर्शन किया जाता था। जिसके उपरांत मुस्कान और ठहाकों का बेशर्म सिलसिला भी चालू रहता।

क्लास की तमाम लड़कियों से तो मैं परिचित हो गया था( अलबत्ता चार पांच कन्याओं के अलावा आज केवल चार का ही नाम याद है। बाकी का तो सही मायने मे मुझे चेहरा भी अब ठीक से या एकदम याद नहीं है। पर लगभग एक माह के अंदर ही छात्र छात्राओं के बीच माहौल स्वस्थ्य सा हो गया था। बेझिझर किसी भी बिषय पर बात कर लेना अपने पाठ्यक्रम पर चर्चा कर लेना या गरमागरम बहस नुमा माहौल भी दूसरे क्लास के छात्रों के लिए कौतुहल से ज्यादा नमकीन न्यूज ही बनता दिखने लगा।

हमारे परम आदरणीय प्रोफेसरों के पीछे पूंछ की तरह आने और इनसे पहले निकल जाने की आदत या परम्परा पर मुझे बडी बैचेनी सी होती थी। अक्सर लगता था कि क्या हमलोग इतने अशिष्ट वनमानुष  से हैं क्या कि लडकियों का इतना बडा जत्था भी बगैर गुरूजन के हमलोग के साथ सहज होकर एक साथ नहीं बैठने का साहस नहीं करती। मगर हकीकत तो यह है कि लडकियों का क्लास में सामान्य तौर पर ना बैठना ही हम लडकों के लिए ज्यादा सुकून दायी होता था। मैने देखा कि किसी भी कन्या को लेकर कुछ भी बोल देने वाले किसी भी लड़के में लड़की के सामने मुंह खोलने की हिम्मत ही नहीं होती थी। मैने कई बार सीधे  अपनी वीणा     ( मौसी)  से प्रतिवाद करने के बाद भी उनलोगों को क्लास रूम में एक साथ बैठे रहने के लिए राजी नहीं कर पाया। दो एक दिन बाद ही नर नारी के समान अधिकारों पर कोई मामला उठा। मैं खडा होकर जोर शोर से बोलने लगा कि नारी को समानता का अधिकार एकदम नहीं मिलना चाहिए। किस बात की समानता। जिस नारी या लड़की में पुरूषों के साथ बैठने की हिम्मत ना हो उसके लिए समानता या बराबरी की बात करना भी बेमानी है।

मेरे ओजस्वी प्रवचन का जोरदार प्रभाव पड़ा और ज्यादातर छात्राओं ने काफी ना नुकूर करने के बाद सभी देवियां राजी हो गयी कि क्लास रूम में एक साथ बैठने मे कोई हर्ज नहीं है।  सबसे दबंग हमारी वीणा ने फिर आशंका प्रकट की तुम नहीं जानते अनामी लोग क्या कहेंगे। इस पर मैं खिलखिला पडा। मेरी खिलखिलाहट से अचंभित सारी लडकियों ने रोष जताया कि इसमें हंसने वाली क्या बात है कि तुम हंसने लगे। इस पर मैने कहा कि तुमलोग क्या समझती हो कि इससे पहले लोग तुमलोग के बारे में कुछ नहीं कहते है। अरे जितनी बाते और टीका टिप्पणियां तुमलोग पर होती है या की जाती है न उसे यदि एक बार भी तुमलोग सुन लो तो चेहरा शर्म से लाल हो जाए। मैने अपनी तरफ से जोडा कि जब तुमलोग पर कोई बोलता है, जिसे सुनकर मैं शर्मसार सा हो जाता हूं भला तो तुमलोग का क्या हाल होगा। दो चार लड़कियों ने जोर देकर पूछा कि क्या कहते हैं जरा बताओ न  बताओ तो सही। इस पर मैं फिर हंस पड़ा और दोनों हाथ कान पर ले जाकर पूरे अभिनय अंदाज में कहा कि तुम लोग मुझे क्या इतना बेशर्म समझ रखा है कि जिन बातों को मैं सुन नहीं सकता उसको तुमलोग को बता सकता हूं। तब दो चार लड़कियों ने अपना पैर पटकते हुए कहा कि सबसे बडा गुंडा तो तुम हो जिसके मन मे जो आए बोलने दो न इसका हम पर क्या असर पड़ता है। हिम्मत है किसी में तो सामने आकर तो कोई कहे।

 इन फूलकुमारियों को एकाएक फूलन देवी बनते देखकर मेरा मन मयूर नाच उठा। पूरे उल्लास से कहा यही तो मैं बोल रहा हूं कि किसमें दम है हिम्मत है जो तुमलोग के सामने आकर बोल दे । मगर तुमलोग इस हिम्मत को अपनी ताकत बनाओगी तब न। बात को आगे बढाते हुए कहा कि एक कहावत है कि हाथी चले बाजार और कुत्ता भूंके हजार । मगर क्या कभी किसी हाथियों को भागते देखा है। मेरा यह जोशवर्द्धक प्रयास पूरी तरह सफल रहा। और अगले ही दिन हमारे क्लास की तमाम सुकोमलांगियॉ कॉमनरूम  की बजाय सीधे क्लास रूम में थी। मैं कमरे में घुसते ही ताली बजाकर सबो का स्वागत किया। पूरा दिन शानदार रहा। मगर और तो और हमारे पूज्य गुरूजनों को ही लड़कियों की यह आजादी कुछ रास नहीं आई और महिला आंदोलन और स्त्री स्वतंत्रता का यह परचम फिर अपने एक महिला कॉमन कमरे में ही सिमट गयी। और कन्या जागरण का मेरा यह पूरा प्रयास बुरी तरह फ्लॉप कर दिया गया। अलबत्ता लड़कियों की यह दो दिवसीय आजादी का यह मुहिम मुझ पर भारी पड़ा और तमाम लड़को मे मुझे महीन गुंडा का तगमा दे डाला। हंस हंस कर आग लगाने वाला महीन गुंडा।

मेरे पापाजी तक भी यह बात पहुंच गयी कि मैने तमाम लड़कियों को बहका करके कुछ गलत शलत कराया है। रात को दफ्तर से लौटते ही पापा एकदम गरम थे। तुम कॉलेज में पढने गए हो या गुंडई करने जाते हो। आजकल कॉलेज में तेरा बडा नाम हो रहा है। मैं एकदम निरीह और अबोध सा पापा के सामने जाकर अपनी सफाई में केवल यही कहा कि आपके ऑफिस में काम करने वाले तीन लोगों की बेटियां हमारे साथ पढती है। मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता। कल आप उन लड़कियों से यह जरूर पूछे कि क्या हो रहा है कॉलेज में। उसके बाद जो मन में आ आप कर सकते है। मैं क्यों अपनी सफाई दूं। मेरे तार्किक सफाई से पापा जी नरम तो पड़ गए पर काफी देर तक मां पर बौखलाते रहे। मैंने फिर कहा कि पापा इस बारे में आप कल बात करके तो देखिए पर जो बोल रहा है क्या वो इस लायक है कि उसकी बातों पर यकीन किया जाए ? मेरे पापा जी ने चिंता प्रकट की बेटा कौन यकीन करने लायक है या नहीं यह जरूरी नहीं है जरूरी यह देखना होता है कि आखिरकार बात कैसे फैल रही है। तेरे को कुछ नहीं होगा पर इसका क्या प्रभाव दूसरों पर पडता है इस पर कौन सोचेगा। कोई भी बात या काम करो तो यह जरूर देखो कि इसका दूसरे पर क्या असर पड़ रहा है। मुझे पापा की बातों में दम लगा और मैने कहा पापा मै बोल जरूर ज्यादा जाता हूं पर गलत शलत काम तो नहीं करता। मै भी  इस घटना पर शांत रहा और पापा की तरफ से ही इसका असर देखना चाह रहा था। दो एक दिन बाद ही पापा बड़े अच्चे मूड में घर लौटे और मेरी पढाई से लेकर मेरे संगी साथियों का भी हाल चाल पूछना चालू कर दिया। मैं फौरन भांप गया कि बढिया प्रतिक्रिया मिली है और यह सब उसी का असर है। मुंह हाथ धोकर पापा मेरे साथ पढने वाली लड़कियों के बहाने मेरी तारीफ में जुटे रहे। मैने पूछ लिया कि लगता है पापा कि आप आज अभिराम चाचा के घर गए थे। तो फिर पापा एकदम खुल गए और मेरे साथ पढने वाली तीन चार लड़कियों का नाम लेकर उनकी सकारात्मक प्रतिक्रियाओं समेत पढाई और हाजिर जवाबी की खुले मन से प्रशंसा की। पापा जी से अपनी तारीफ सुनना यह हमसब भाईयों के लिए चौदहवी का चांद सा था।  पर मै इस घटना को पचाकर अगले दो दिन तक थोडा खामोश और अनमना सा रहा.। मेरे इस तरह के व्यावहार से ज्यादातर लोगों को बडी हैरानी हो रही थी.। खासकर हमारी वीणा रुके न रूकी क्या बात है अनामी क्या हुआ। यूं ही मुंह बनाए हो या कोई बात है ?  इस पर मैने कहा अरे यार तुमलोग को जो कुछ भी मेरे से शिकायत हो तो सीधे कहो न । सीधे मेरे बाप के पास जाकर कहने की क्या जरूरत थी। फिर हमने किसके साथ क्या कुछ अईसा वईसा तो कुछ बोला तक नहीं है। फिर भी मैं साफ कर दूं कि भले ही मैं ज्यादा बोल देत हूं पर तुम सबलोग से भी ज्यादा सभ्य शालीन तमीजदार कमीजदार और शर्मदार हूं। वीणा मेरे साथ हो गयी और बोली क्या हुआ। मैं बौखलाते हुए कहा कि मुझे क्या पता कि क्लास रूम की बात घर तक ले जाना कहां सही है। फिर मैं तो कोई टेढी मेढी और दो अर्थी बाते भी करता ही नहीं। मेरे पापाजी ने तो मेरी इज्जत ही उतार दी है। इस पर पापा के साथ काम करने वाले कई लोगों की तीन चार लड़कियां सामने आ गयी। अरे चाचा जी से तो हमलोग ने तुम्हारी कोई शिकायत नहीं की थी। हमलोग तुम्हारे बारे में ही बात कर रहे थे पर शिकायत तो नहीं कि और शिकायत किस बात की करते ।  मैं भी खुद को पूरी तरह लाचार दिखाकर पूछा कि बस मेरी शिकायत करने के अलावा और कोई बात नहीं थी। मैने कहा कि तुमलोग को देखकर तो पहले ही दिन से मेरा ब्लडप्रेशर बढ गया था क्योंकि किसी को बोल दो वीणा मेरी मां और मौसियों से बोल देगी और किसी पर कटाक्ष कर दूं तो सीमा मेरी मौसी से बोल देगी। पापा के दफ्तर के कई जासूस मेरे साथ है ही.। मैं तो एकदम 32 दांतो के बीच जिह्रवा की तरह फंसा हूं भाई। मेरे इस नाटकीय प्रलाप का अच्छा खासा असर रहा। मेरे दुख से आहत होकर पापा के सीनियर श्री अभिराम सिंह की बेटी ( इसका नाम याद नहीं है मित्रों पर इस लेक के लिखने केबाद पता लग गया कि उषा नाम ता। उषा से फोन पर बात भी हुई थी) ने उसी दिन शाम को पापा को पकड़कर हमारे दुख पर विलाप की । पापा ने एकदम चकित होकर उसको शांत कराया। तो अगले दिन मेरी शामत थी। मेरे बनावटी विलाप पर ज्यादातर फूलनदेवियों ने अपना उग्र रूप दिखाया। मेरी लानत मलानत की और मुझे भी इनसे सार्वजनिक तौर पर क्षमा मांगनी पडी, तब कहीं जाकर बिन बुलाए आफत से राहत मिली।.

1987 मे संभवत मार्च का महीना होगा। पढाई लगभग खत्म हो रहे थे। एक दिन बडी सीरियस मूड में वीणा मेरे पास आई. अनामी मुझे तुमसे बहुत जरूरी बात करनी है। एकाएक इन उग्रवादियों के गंभीर हाव भाव को देखकर तो मैं भी थोडा संजीदा हो गया। फिर उसने एक लड़की का नाम लेकर पूछी कि वो तुम्हें कैसी लगती है ? मैं इस सवाल पर खिलखिला उठा। तभी खीजते हुए वह फिर सवाल दोहरायी। तब मैने फौरन कहा कि भई मुझे तो दुनिया की समस्त लड़कियां भोली भाली भली सुदंर अच्छी और प्यारी लगती है। खासकर तुमलोग तो और ज्यादा। मैं तो किसी लड़की को बुरा कह ही नहीं सकता। मैं जरा दर्शन बघारते हुए आगे बढा कि जिसने मुझे तुम्हे और उसको बनाया है उसके निर्माण पर भला मैं क्या कोई टीका टिप्पणी कर सकता हूं। मेरे भाषण से मेरी सब साथिने बोर सी हो उठी थी.. वीणा भी थोडी क्रोधित सी हो गयी. और जोर से बोली मजाक नहीं एकदम गंभीरता से बताओं न। इस पर मैं शांत होकर पूछा कि बात क्या है ? तो फिर वीणा ने बताया कि वो तुमसे प्यार करती है और शादी करना चाहती है। वीणा की बात सुनकर मैं एकदम हतप्रभ रह गया। तब तक वीणा के समर्थन में एक साथ चार पांच लड़कियों नें उसका पक्ष लेते हुए सिफारिश की। बात की गंभीरता को कम करने के लिए मैं एकदम से मुस्कुरा उठा। अरे भई मैं एक भला तुम कितनी लड़कियों से शादी करूंगा ? इस पर एक साथ उसकी सिफारिश करने को आतुर लड़कियों ने जोर देकर कहा हमलोग उसके बारे में कह रहे हैं अपने बारे में नहीं। मैंने फिर कटाक्ष किया मुझे तो लगा कि तुम सब एक साथ ही मेरे उपर टूट पडी हो। तभी किसी ने पीछे से मजाक उडाया आईने मे शक्ल देखी है अपनी। इस पर मैं पूरी तरह खिलखिला उठा। सब कुछ तो ठीक है बस तेरे से रंग में ही थोडा श्यामला हूं बस्स। बात कहां तो शादी की हो रही थी और देखते ही देखते पूरे प्रसंग की रासलीला हो गयी।. तब माहौल को संयमित करने के लिए वीणा ने अपने तोप को दोबारा दागा। इस पर मैं कहा कि लगता है कि तुम एकदम पागल हो इस तरह की बाते कहीं इस तरह की जाती है। तुम तो मेरी मां को जानती हो सीधे उनसे ही जाकर बात करो। तो उसको लगा कि दांव अभी हाथ में ही है।  तपाक से वीणा ने अपना तार झंकृत की तो तुम्हें तो पसंद है न ? इस पर मैने  सीधे कहा कि नहीं जिस लड़की में सामने और सीधे कहने की हिम्मत ना हो तो उसके साथ फिर कैसी शादी ? फिर वीणा झंकृत हुई. नहीं वो थोडा शरमा रही थी. तो फिर उसको शरमाने दो न। मेरे साथ शादी ना होकर ही उनका भला होगा । जानती हो यदि वह एकदम सामने आकर यही प्रपोजल देती न तो मैं तो हाथ पकड़कर उसको आज ही अपने घर ले जाता। यह तो मुझे नहीं पता कि मेरा क्या होगा पर अगले 6-7 साल तो मेरी शादी नहीं होगी, यदि उसकी भी शादी कहीं नहीं हुई तो तुम मुझे बताना फिर मैं उसके साथ शादी जरूर कर लूंगा।

हमारे कॉलेज में नए प्रिसिपल श्री सिद्धेश्वर सिंह का आगमन हुआ। अनुशासन प्रिय और सख्त प्रशासक के रूप में विख्यात श्री सिंह के आते ही चौपाली  मजनूओं पर सबसे पहले लगाम लगा दी गयी। चबूतरे वाली रोजाना की चौपाल होनी बंद हो गयी तो एक ही साथ दीवानापन के भी बहुत सारे मामले रूक गए। जाड़े में दूप सेंकने पर भी रोक सी लगी रही। उधऱ प्रिसिपल साहब ने अपने कमरे को भी चमका डाला। गेट पर पर्दा टंग गया और पहले की तरह बेधड़क अंदर घुसने पर रोक लग गयी। श्री सिंह साहब को भी कॉलेज में आए अभी दो माह भी नहीं हुए थे कि  कॉलेज की फुटबॉल टीम और जिले की बिहार पुलिस  के बीच मैच खेला गया। जिसमें हमारे कॉलेज के रणबांकुरों ने पुलिस पर तीन गोल की बढ़त ले ली। अपनी हार से बौखलाए पुलिस टीम के खिलाडियों ने गेंद की बजाय कॉलेजी खिलाडियों पर निशाना साधना चालू कर दिया और देखते ही देखते हमारे पांच खिलाड़ी खून से तर ब तर घायल होकर मैदान से बाहर हो गए। पुलिस टीम द्वारा खिलाडियों की मदद करने की बजाय बूट पहने ही कईयों के हाथ और छाती पर भी पुलिसिया खिलाडी सवार हो गए। तब तक पुलिस टीम दो गोल करके कॉलेज की बढत को भी कम कर दी। लगातार अपने खिलाडियों को जानबूझकर घायल करते देख सैकड़ो छात्रों ने हो हल्ला हंगामा करके विरोध जताया तो पुलिस ने जमकर छात्रों पर ही  लाठियां भांज दी। और इस तरह फुटबॉल का यह खूनी मैच अधूरा ही रहा। पुलिस से चोटिल खिलाडियों को उपचार के लिए प्रशासन से पटना भेजने की मांग की गयी, मगर तत्कालीन युवा और तेजतर्रार एडीएम सुनील कुमार सिंह ने इस मांग को सिरे से नकार दिया। अगले दिन सुबह कॉलेज आते ही इस घटना की जानकारी हम जैसे दूर से आने वाले तमाम छात्रों को मिली तो हमारे प्रिंसिपल श्री सिंह की अगुवाई में सैकडों छात्रों ने एडीएम के दफ्तर का घेराव कर डाला। श्री सिंह के साथ मुश्किल से हम 10-12 छात्र ही अंदर गए थे। पर एडीएम का तेवर काफी सख्त था और वो किसी भी हालात में चोटिल छात्रों को पटना भेजने तथा पुलिसिया खिलाडियों के खिलाफ एक्शन लेने को राजी नहीं था। हमारे प्रिंसिपल साहब को भी वे मि. सिंह मि. सिंह कहकर ही संबोधित कर रहा था। बात बनते ना देखकर मैं फौरन बाहर भागा और पुलिस प्रशासन तथा एडीएम के खिलाफ जमकर नारेबाजी करने के लिए अपने छात्रों को उकसाया। और देखते ही देखते चारो तरफ नारे गूंजने लगे और पूरा माहौल तनावग्रस्त हो गया।
जब मैं अंदर आया तो एडीएम मेरे उपर बौखला गया और तुरंत नारे को बंद कराने पर जोर दिया। मैने कमान अपने हाथ में ली और एडीएम को आगाह किया कि मि, सिंह अभी आप हमारे प्रिंसिपल साहेब को नहीं जानते। ये तुम जैसे सैकड़ो आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को पैदा करने वाली फैक्टरी है। अभी चार फोन पटना घूमा देंगे न तो दर्जनों तुमसे सीनियर अधिकारी इनके पांव छूने के लिए लाईन लगा देंगे। और आप इनसे बदतमीजी से बात कर रहे हो। हम सबके सम्मान के ये प्रतीक है और इनके साथ ही इस तरह का बर्ताव। आप क्या पटना भेजोगे अब पटना से फोन आएगा कि क्या कर रहे हो। प्रिंसिपल साहब के पीछे आकर मैने कहा कि यदि ये एक आवाज बुलंद कर दे न तो आपके दफ्तर का हाल मटियामेट हो जाएगा। इतना कहकर मैं अपने प्रिसिपल को लेकर कमरे से बाहर निकलने लगा तो एडीएम एकदम हाथ जोडकर माफी मांगी और 10 मिनट के अंदर ही पटना भेजने के लिए दो एम्बुंलेंस  सहित सारी व्यवस्था करने का इधर उधर निर्देश देने लगा। हमारे प्रिंसिपल साहेब को फिर से कमरे मैं बैठाकर एडीएम ने अपने सहायकों को चाय और समोसे लाने का आदेश फरमाय।  जब तक समोसे का स्वाद लिया जाता तब तक सारी व्यवस्था हो गयी। देख रेख के लिए तीन चार लोगों के साथ तीन गाडियों से आठ छात्र खिलाडियों को दो अधिकारी के साथ पटना भेजा गया। उधऱ गाडी पटना की तरफ गयी और इधर जमकर हंगामा हुआ। नारेबाजी के साथ विजयी मुद्रा में हमलोग प्रिंसिपल के साथ कॉलेज लौटे,। तो उन्होने फौरन मुझे बुलवाया। नाम आदि पूछा और जमकर तारीफ की और यह भी कह डाला कि तुम्हारा जब भी मन करे बिना पूछे मेरे दफ्तर में आ जाया करो।  और जब मैं बाहर निकला तो लड़कों ने मुझे अपनी गोद में उठा लिया। कईयो ने कहा कि आज तुमने कॉलेज की लाज रख ली अनामी। इस पर सबों के समक्ष झुककर मैने इस तरह की बाते न करने की सलाह दी कि कॉलेज हम सबसे बडा और गौरव क् प्रतीक है मित्र। मैं तो केवल एक अदना सा छात्र हूं. छात्रों की भीड़ ने जमकर तालियां बजाते हे मेरी बात का समर्थन किया।

यूं तो रोजाना कॉलेज का दिन बड़ा मन भावन सा ही होता था, पर एक दिन हमारे झाजी ने सभी लड़कियों समेत मुझे भी हिदायत दी कि कल मैं सबका नोट्स चेक करूंगा सो कल सब नोट्स लेकर आना।  इस पर वीणा समेत कई लड़कियों ने मेरी खिल्ली सी उडाई। अब कल तो तुम्हें भी नोट्स लाना ही पड़ेगा। हमारी सहपाठिने हमेशा मुझे नोट्स बनाने और दिखाने के लिए कहती थी औरे मैं हमेशा यही कहता था कि मैं किसी पेपर का नोट्स नहीं बनाता। मेरी बातों पर किसी को भी यकीन नहीं था। सबो का आरोप था कि तुम नोट्स दिखाना ही नहीं चाहते। इस कारण वे लोग इस मामले में मुझसे नाराज सी रहती थी। अगले दिन सारे छात्रों ने तरह तरह के जिल्द और रंगीन आवरण में नोट्स ला लाकर श्री झा जी को दिखाना चालू किया। और मजे की तो यह बात कि नोट्स को देखते हुए हमारे सर श्री झा जी ने सबों को डीविजन भी बॉटना शुरू कर दिया। मसलन, वीणा तू एकदम फस्ट आएगी और तू सीमा जरा इसको ठीक कर लो तो तेरा भी नंबर वन पक्का है। सर द्वारा रेवड़ी के भाव दिए जा रहे डीविजन से अभिभूत होकर हमारी तमाम संगी साथिनों का दिल बाग बाग हो रहा था। वहीं श्री झा जी भी अपने छात्रों की तैयारी से अभिभूत थे।

नोट्स दिखाने की अब मेरी बारी थी, तो मैं अपना चेहरा लिए खाली हाथ बिना नोट्स के उनके सामने खड़ा था। खाली हाथ मुझे देखकर वे फिर भड़क उठे, अपना नोट्स निकालो न । मैं भी तो देखू कि तेरी क्या तैयारी है। इस पर मैने कहा कि सर मैने तो कोई नोट्स ही नहीं बनाया है। यह सुनते ही मानो कोई भूचाल आ गया हो, वे एकदम खड़े हो गए और नाराजगी के साथ बोले कि लाला तू इस बार फेल हो जाएगा। मैने तुरंत उनकी बातों को काटते हुए कहा कि सर जिस तरह से आप नोट्स देखकर इन्हें डीविजन से नवाज रहे हैं, क्या यह हो जाएगा।  मेरी बातों को अनसुना करते हुए श्री झा जी ने नाटकीय अंदाज में सभी छात्रों को संबोधित किया कि एक थे हमारे राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद जिनको देखकर ही सबकुछ याद हो जाता था और ये है देव के राजेन्द्र बाबू के सुपुत्र अनामी शरण जिनको भी सब कुछ याद है। इनको नोट्स बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ती। श्री झा जी ने क्लास रूम में ही यह सार्वजनिक तौर पर घोषणा कर दी कि लाला तू इस बार जरूर फेल होगा। मैने तुरंत उनकी बातों को काटा और मैंने भी सबके सामने ही कह डाला कि सर फेल तो दूर क्लास में सबों से ज्यादा नंबर केवल मेरा ही होगा। मेरी बातों पर पूरा क्लास खिलखिला पडा। श्री झा जी के गुस्से के दौर में भी पूरा क्लास मेरी लानत मलानत पर मंद मंद मुस्कुरा रहा था। और क्लास में श्री झा जी के संग नोक झोंक में मेरी खाल नुचाई समारोह का मेरे समस्त संगी साथी मजा ले रहे थे।
 परीक्षा के दिन करीब आ रहे थे तो एक दिन अकेले में श्री झा जी ने कहा कि कल हाफ फीस माफी का इंटरव्यू है , समय पर आ जाना। मैने उनसे कहा कि मेरा तो फीस आप माफ करवा ही देंगे। इस पर फिर वे झुंझला उठे हां हां क्यों नहीं मैं क्या तेरे बाप का नौकर हूं। मैने अपने कान पकडते हुए कहा कि सर यह तो मैने नहीं कहा। तो वे मुस्कुरा उठे और मेरे सिर पर प्यार से एक धौल जमा दिया।

अगले दिन इंटरव्यू होना था । सबों को मेरे इंटरव्यू पर उत्कंठा थी। अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष श्री बामनदास जी इंटरव्यू ले रहे थे। मेरी बारी आते ही उन्होने राम चरित्र मानस के रचयिता समेत तीन सामान्य से सवाल पूछे, और मैने तीनो सवाल के प्रति अनभिज्ञता प्रकट की तो वे बौखला गए। अंत में आजिज होकर मुझसे पूछा कि आपको पता क्या है ? मैने तुरंत कहा कि सर मैं बीए ऑनर्स का छात्र हूं और आप सवाल तो मेरे स्टैणडर्ड का पूछे। इससे पहले कि श्री बामन दास जी कुछ बोलते श्री झा जी ही बीच में उबल पड़े चल चल चल भाग यहां से हमें स्टैण्टर्ट का उपदेश देने लगा।  मैं बाहर निकला तो कई दोस्तों  ने मुझसे पूछा कि क्या क्या सवाल पूछ रहे है यार? तो मैने अपने इंटरव्यू का हाल बयान कर दिया और साथ ही यह भी कहा कि देखना मेरा तो माफ हो ही जाएगा। और सच में अगले दिन जब फीस माफी की जो लिस्ट लगी तो उसमें मेरा भी नाम था।

लगभग पढाई खत्म होने ही वाली थी कि एक दिन तमाम लड़कियों ने मुझे टोका कि कल जरा ठीक ठाक कपड़े पहनकर आना। मैं इस सवाल पर चौंका कि अभी तक मैं खराब कपड़े पहनता था क्या ? सलीके की साज सज्जा से ज्यादा मुझे रफ टफ कपड़ो का पहनावा ही सहज सरल और आरामदेह लगता था और आज भी लगता है। मैने वीणा से पूछा कि किस तरह के कपड़े पहन कर आंऊ कुछ तो बताओ। किसी ने इस पर कुछ कहा पर मैं संभवत कुछ कम पुराने कपड़े ही पहनकर कॉलेज आया तो सबों ने मुझे उलाहना दे डाला कि आज फोटोग्राफी है इसलिए तो बन ठन कर आए हो। हमारे क्लास की तमाम लड़कियों ने तो अपने साथ दूसरे ड्रेश भी लाए थे और क्लासरूम के पीछे वाले कमरे में साज ऋंगार करने में सब बिजी थी। मैं लडकियों के ड्रेशिंग रूम मे गया और फौरन बाहर निकल आया। किसी से आईना मांगा तो एक साथ हमारी साथिनों ने उपहास किया कि तैयार हो लो ठीक से फोटू को तो अपने दिल से चिपकाकर रखोगे। मैने तुरंत पूछा किसके लिए यह तो बताओ। तब कईयो ने कहा कि एक साथ 18 लड़कियों के संग की फोटो को तो रखोगे ही। मैने भी पूछा कि क्या तुमलोग रखोगी तो कईयों ने कहा कि तुम जैसा मजेदार लड़का साथ में पढा है तो फोटो तो रखनी ही पड़ेगी। मै मुंहफट और मूर्ख की तरह कह डाला कि मगर मैं फोटो नहीं रखूंगा। और आज भी यह सामूहिक फोटो मेरे पास नहीं है। और इसका मुझे आज बहुत दुख और मलाल भी है कि मेरी एक मिनट की वाचालता जिसे मूर्खता ही कहना ज्यादा बेहतर होगा ने मुझे एक सुदंर यादगार फोटो से वंचित कर दिया। हालांकि फोटोग्राफी के लिए मेरे मित्र समान अखैरी प्रमोद आए थे मगर मैं उनसे यह दुर्लभ फोटो ले न सका। सच तो यह है कि आज मैं इस फोटो के लिए श्री अखौरी प्रमोद जी से भी कहा तथा साथ में पढ़ने वाली सुश्री सीमा के भाई किशोर प्रियदर्शी समेत उषा और वीणा से भी कहा मगर यह समूह फोटो प्राप्त नहीं हो सक।     

कॉलेज के सुनहरे दिनों के बीच में ही संभवत फरवरी 1987 में किसी दिन एक अखबार में भारतीय जनसंचार संस्थान नयी दिल्ली का एक विज्ञापन छपा था। जिसमें हिन्दी पत्रकारिता के पाठ्यक्रम को शुरू करने की सूचना थी। पहले पाठ्यक्रम में प्रवेश के लिखित परीक्षा के लिए आवेदन मांगे गए थे। मैने भी प्रवेश के लिए त्तत्काल फॉर्म भर दिए अप्रैल में लिखित परीक्षा भी पटना में जाकर दे आया। एक तरफ मैं बीए ऑनर्स की तैयारी में था तभी पत्रकारिता के लिए भी एक दिमागी शैतानी हरकत शुरू हो गयी। लिखित परीक्षा में पास होने के बाद मई में इंटरव्यू होना था। जिसके लिए मैं दिल्ली गया और मेरा चयन भी हो गया। इधर एक जुलाई से पहला सत्र 1987-88 आरंभ हो रहा था और  उधर ऑनर्स की भी परीक्षाएं उसी समय में हो रही थी। मेरा आखिरी पेपर 26 जुलाई को था और तब तक उधर की पढाई का एक माह खत्म होने वाला था। पर क्या करता ऑनर्स की परीक्षा तो देनी ही थी। पत्रकारिता के पाठ्यक्रम के शुरू में दिल्ली में जाकर दो चार क्लास की और छात्रावास के एक कमरें में ताला जड़ कर 20 दिन के लिए वापस बिहार आ गया।
इस बीच दिल्ली का पत्ता लिखा दो पोस्टकार्ड लेकर जुलाई के किसी दिन  चिलचिलाती धूप में मैं श्री झा जी के घर पहुंचा। वे एकाएक मुझे देखकर चौक पडे। मैने दोनो पोस्टकार्ड उनके घर में टंगे एक कैलेण्डर में स्टेप्लर से टांक दिया। और विनय स्वर में कहा कि सर मैं फेल तो नहीं करूंगा पर मेरा चाहे जो परिणाम हो उसकी सूचना केवल आप देंगे। गौरतलब है कि 1986-87 में मोबाईल नामक खिलौने का ईजाद नहीं हुआ था, लिहाजा डाकघरों के महत्व तो था पर आदमी का आदमी से सूचना और संचार बडा दुर्लभ था। मैं झा जी के यहां बैठा ही था कि उनकी धर्मपत्नी एक प्लेट में मिठाई लेकर आई। मैने उनके चरण स्पर्श किए। उन्होने मिठाई खाने पर जोर दिया तो मैने कहा कि आंटी जी आज और अभी तो मिठाई किसी भी सूरत में नहीं खाउंगा, क्योंकि मेरे और सर के बीच पास और फेल होने की बाजी लगी हुई है। वैसे तो मैं सर को पराजित कर रहा हूं मगर मेरा परीक्षा परिणाम क्या रहा इसकी जानकारी के लिए ही पोस्टकार्ड देने आय़ा हूं। उनके जोर देने पर भी मैंने मिठाई नहीं ली।

अलबत्ता बीए आनर्स की आखिरी परीक्षा के दिन मैने अपने समस्त साथियों से हाथ जोडकर तमाम गुस्ताखियों बदतमीजियों ज्यादा बोलने से दिल दुखाने या कभी लक्ष्मण रेखा पार कर जाने की तमाम उदंडताओं के लिए क्षमा मांगी । मैने कहा कि यार कॉलेज का मेरा यह 10-11 माह की मधुर याद जीवन भर तुम लोगों की याद दिलाएगी। मेरे तमाम संगी साथिनों ने भी भावुक होकर अपनी शुभकामनाएं दी और मैं उसी रात गया से ही दिल्ली चला गया।

परीक्षा परिणाम आने पर श्री झा जी ने दोनों पोस्टकार्ड पर अपनी तमाम शुभकामनाओं के साथ यह बताया कि कॉलेज में सबसे ज्यादा नंबर तुमको ही आया है। उन्होने बिहार लौटने पर मिलने का आदेश दिया।  बिहार लौटने पर जब मैं उनके घर गया तो वे मुझे अपनी छाती से लगाते हुए कहा कि मैं तुमको समझ नहीं सका अनामी। यह सुनकर मैं उनके चरणों पर जा गिरा और अपनी तमाम उदंडताओं के लिए माफी मांगी। श्री झा जी ने बताया कि परीक्षाफल आने पर हमारे प्रिंसिपल श्री सिंह ने भी उनसे मेरे परिणाम की जानकारी मांगी थी। उन्होने भी कभी कॉलेज में आकर मिलने को कहा था। पर मेरा यह दुर्भाग्य रहा कि यह हो नहीं सका और मैं एक छात्र से पत्रकार बनकर कहीं सुबह और कहीं शाम  खबरों के आगे तो कभी खबरों के पीछे घूमता रहा। और शुरू के कई साल तक पत्रकरिता लोक में ही विचरण करते हुए इसी मायावी तिलिस्मी और छद्म संसार का अभिन्न हिस्सा बन गया। जहां पर एक सपनों का संसार है. सपनों का मायालोक है। सपनों का जादूई और संबंधों का एक मोहक प्रभावी जहांन है। जहां पर आदमी को अपनी हकीकत का अहसास नहीं होता। मगर लंबे समय तक प्रभावों के इस नकली संसार में रहते हुए यह अहसास हो जाता है कि एक पत्रकार बतौर पत्रकार किसी का नहीं होता, तो एक पत्रकार का भी कोई अपना नहीं होता। केवल होता है तो एक दिलकश संसार की बहुत सारी यादें जिसको ना कोई सुनने वाला होता है और समय  बीत जाने पर ना ही कोई मतलब ही रह जाता है। कलम के कब्रिस्तान में बैठा एक पत्रकार अतीतजीवी सा हो जाने के ले अभिशप्तसा हो जाता है। 

मंगलवार, 3 मई 2016

आगरा में रेल वाली होली बहिन से मुलाकात-2








अनामी शरण बबल


आगरा से मेरा एक अनकहा सा नाता है कि जब जहां जैसे और जिस तरह भी मौका मिला नहीं कि खुद को आगरा मे ही पाता हूं। एक साल में 20-25 दफा तो आगरा जाना सामान्य तौर पर हो ही जाता है। पहले तो मैं आगरा बस से जाता था पर पिछले पांच सात साल से रेल ही मेरे सफर का साधन है। यदि ताज से जाना संभव नहीं हो पाता है तो अमूमन मैं जेनरल टिकट पर ही सफर करता हूं और रेल में गुजारे गए तीन घंटे का सफर भारतीय जनता के मूड को परखने समझने का सबसे सरल और नायाब साधन होता है। तीन घंटे तक कहीं पर राजनीति तो कहीं खेल कहीं सिनेमा कहीं गंदगी कहीं मोदी की सफाई तो कही लालू मोदी मुलायम अखिलेश या आजम खान ही लोगों की जुबांन पर होते है। रेल यात्रा के दौरान ही मुझे एक छक्की से मुलाकात हुई थी, और संयोग इस तरह का रहा कि उसकी बात उसकी मासूमियत और उसकी निश्छलता का मुझ पर इस तरह का प्रभाव पडा कि अपनी जेब में हाथ डालकर सारे रूपए उसके आगे कर दिए। मगर कमाल कि वो केवल 10 या 20 रूपए से कभी ज्यादा हाथ नहीं लगाई। पहली मुलाकात के बाद वह दो बार और मिली। हर बार मुझे देखते ही वो तमाम सवारियों को छोड़कर मेरे पास दौडी आती है। रेल का यह स्नेहिल याराना मुझे हमेशा उसको तलाशने के लिए बाध्य करता था। पिछले काफी समय से मैं ट्रेन से आगरा नहीं जा सका था और इस बार 24 अप्रैल 2016 को आगरा ताज से गया। जाते समय मैं मथुरा स्टेशन पर उतर कर भी इधर उधर निगाह डाली और आगरा राजा की मंडी में भी देखा मगर वो अनाम छक्की नहीं दिखी। एक मई 2016 को आगरा से दिल्ली लौटते समय हम पांच सात लोग थे। किसी ने यमुना एक्सप्रेस वे वाली बस पकड़ने की सलाह दी तो किसी ने राजा मंडी रेलवे स्टेशन से ही ट्रेन पकड़ने पर जोर दिया, मगर मैं आगरा कैंट जाने के लिए अडा रहा। मेरे साथ दो लोग और थे। हमलोग पौने 11 बजे स्टेशन पर आकर टिकट ले लिए। मगर कांगो एक्सप्रेश हीराकुंड़ एक्सप्रेस  केरल एक्सप्रेस समता एक्सप्रेस आदि सारी ट्रेने दो से लेकर चार घंटे लेट चल रही थी। मेरे साथ यात्रा कर रहे दोनो लड़के मुझपर बिफर पड़े अंकल आपके कारण ही हमलोग फंस गए । इसी वाद विवाद के बीच मैं ज्योंहि स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर एक में घुसा ही था कि सामने ही तीन छक्की लड़कियों पर मेरी नजर पडी। दो तो बैठी थी, मगर एक लेटी हुई थी। इनको देखकर मेरा मन खिल गया। मैने अपने साथियों से कहा कि तुमलोग प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर चलकर बैठो मैं जरा इन से मिलकर आता हूं। ट्रेन के बारे में कोई सूचना हो तो फोन कर देना , नहीं तो मैं बस्स आ ही रहा हूं। मेरे साथियों को बड़ी हैरानी हुई। मैने अपने दोस्तों से कहा तू दूर जाकर देख ये लोग भी मेरे दोस्त ही हैं यार। टिकट और 20-25 रूपए हाथ में लेकर मैं उनकी तरफ बढा और उसी चौकोर सिमेंट के बैठने वाले चबूतरे पर जा बैठा। मुझे देखते ही एक ने टोका कहां जाना है राजा। मैने तुरंत पलटवार किया कौन राजा कौन रानी कौन राज है यार राजा खाजा के अलावा कुछ और नहीं बोल सकती क्या। खामोश बैठी दूसरी छक्की हाथ हिलाते हुए बोल पड़ी, कुछ खिलाएगा पिलाएगा भी कि बाते ही करेगा। मैने तुरंत 30 रूपए आगे कर दिए मैं जानता था कि तू खाने पीने की ही बात करेगी, इसी लिए पैसे निकाल कर ही इधर बैठने आया था। पैसे लेकर पहली खडी होती हुई बोली बस्स तीस रूपए। मैने कहा क्यों 15 में तीन चाय और बाकी के कुछ ले लेना। इस पर दूसरी ने टोका बडा महाजन है साला हिसाब लगाकर पईसा दे रहा है। उसकी बातें सुनकर मैं खिलखिला उठा, और खड़े होकर 20 रूपए और दिए साथ ही मैंने कहा कि मैं केवल चाय पीउंगा तेरे साथ तुमलोग खाना। तभी एक ने जोडा कि और जो सोई हुई है उसके लिए कुछ नहीं। इस पर मैने कहा कि यार सफर में हूं और कितना दूं तू ही बता न। दोनों आंखो में आंखे डालकर सांकेतिक बात की। मैने बात को आगे बढाते हुए कहा कि मैं भी तो तुम्हारी ही एक सहेली की तलाश में हूं अगर मिल गयी तो उसको एक सौ रूपए देना है, और नहीं मिली तो तुमलोग को वो सौ रूपईया दे  दूंगा। सहेली की बात सुनते ही दोनों चहक उठी। बता न तेरी रानी कैसी है। तू यार है क्या उसका?  मैने तुरंत विरोध जताया तुमलोग भी अजीब हो राजा रानी सैंय्या के अलावा कोई और नाता नहीं होता क्या ? इस पर दोनों ने कहा कि हम कौन सी घरेलू है कि नातेदारी जाने । रोजाना हरामखोर बहिन...मादर,,,, मर्दो से ही तो पाला पड़ता है जो खाने के लिए पईसा उछालते है। इस तेवर पर मैं खामोश रहा। मैने उन दोनों को इस अनाम छक्की लड़की से हुई तीन मुलाकात का हाल बयान किया।  तुमलोग ही बताओं न क्या यह कोई नाता नहीं है। मैं तो बहुत दिनों से इधर ट्रेन से नहीं आया था मगर इस बार आया हूं तो उसको ही देख रहा हूं कि शायद हमारी रेल वाली बहिनजी मिल ही जाए कहीं। दोनों के चेहरे पर गंभीरता आ गयी। कौन है रे अनारकली जिसको इतना सुंदर भाई मिला है रे बाबा। एक ने बेताबी से कहा कि चलो नहीं मिलेगी तो हमलोग ही तेरी बहिन सी है। इस पर मैं जोर से खिलखिला पडा। मेरी हंसी से दोनों अवाक हो गयी। एक ने पूछा कोई नाम पहिचान रंग रूप उम्र बताओं न ताकि तेरा संदेशा तेरी अनारकली तक तो पहुंचाया जा सके। मैने कहा यही कोई 24- 25 की होगी। इस पर अब तक सो रही तीसरी छक्की कराहते हुए उठी और बेताबी से बोली नहीं भैय्या 28 की हूं।  अरे सो रही तीसरी छक्की वही थी जिसको खोजने के लिए मैं कैंट स्टेशन तक आया था। वह एकदम काली और कमजोर सी दिख रही थी। उसको देखते ही मैं बेताब सा हो उठा और झट से उसके पास पहुंचा और हाथों को थामकर पूछा क्या हुआ? इस पर अपना दाहिना पांव दिखाते हुए बोली कि ट्रेन से गिर गयी थी भईया। पांवो में घुटने के नीचे सूखते जख्म को देखकर लग रहा था कि घाव 15 से 20 दिन पहले का है। अब तक दोनो इसके संगी साथी एकदम खामोश खड़े थे तो 50 का एक नोट देते हुए मैने कहा अरे यार कुछ तो लाओं ताकि यह भी हमारे संग चाय पी ले। ज्योंहि एक छक्की जाने के लिए मुडी कि आवाज देकर मैने रोका और जेब से फिर सौ रूपए का एक नोट देते हुए कहा कि इसके लिए कुछ बिस्कुट भी ले लेना।
मैने उसको घाव दिखाने को कहा तो वह धीरे धीरे अपने सलवार को उपर कर कराहते हुए सूखते घाव को दिखाई। मेरे पास दर्द हर मलहम था मैने अपने बैग से उसे निकाला और उसके पैरो में लगा दिया। पांच मिनट के अंदर वो राहत महसूस की होगी, बहुत अच्छा लग रहा है भईया। मैने इस उपदेश के साथ कि दिन में दो तीन बार लगाओगी तो  तुम्हें राहत मिलेगी के साथ ही मलहम की डिबिया उसे थमा दिया। उसके चेहरे को गौर से देखा तो वो बोली क्या देख रहे हो भैय्या ?  हंसकर मैने कहा कि तू अब काफी मोटी तगडी और सुदंर सी दिख रही है। इस पर तुनकते हुए बोली मेरा मजाक उडा रहे हो। इस पर मैं भी पीटने का नाटक करते हुए कहा कि अगली दफा भी तू इसी तरह दिखी न तो तेरी पिटाई करूंगा। इस पर वो खिलखिला पडी। 
जब मैं इस सेवा और मनुहार  और प्यार दुलार से बाहर निकला तो  देखा कि रेलवे स्टेशन पर तो हमलोगों के इर्दगिर्द मजमा सा लगा हुआ है। मुझे थोडी लज्जा भी आई। मैने पास में ही खडी छक्की को कहा कि यहां तो पूरा मेला लग गया है। लोग अजीब तरह से हमलोगों को देख रहे थे। उसके पांव में मलहम लगाने के लिए मैं प्लेटफॉर्म के फर्श पर ही घुटना टेक बैठा था। तब तक चाय नास्ता आदि लेकर दूसरी छक्की बिफरते हुए आ गयी। अरे तेरी अंम्मा की सगाई हो रही है जो यहां पर खडा है साले, चल भाग । चाय पानी नास्ता आ जाने के बाद वे लोग खाने में बिजी हो गए। मैने भी दो चार बिस्कुट निकालकर उसको दिए, तो चाय पीकर वो कुछ भली सी लगी। मैने उससे पूछा कि तेरा नाम क्या है? इस पर मुस्कान बिखेरती हुई बोली भईया हमलोग के कई नाम होते है। आगरा में कुछ झांसी में कुछ तो ग्वालियर में कोई और नाम। पर तू मेरे को होली कहना इस नाम को सब जानते है। मैने फोटो के लिए कहा तो चारा डालते हुए बोली कि तुमको मना करते ठीक नहीं लगता है भईया पर फोटू खींचने से तेरी गरीब बहिन को ही बडी जलालत झेलनी पड़ेगी, बाकी तुम जो ठीक समझो कर सकते हो। हां उसने मेरा नंबर जरूर ली और पूछी भी  जब कभी भी तेरी जरूरत पड़ेगी तो क्या तू आएगा ? इस सवाल पर मैं भी परास्त सा ही हो गया। फिर भी साफ कहा कि यदि बदमाशी से कभी मेरा टेस्ट ली तो फिर कभी नहीं आउंगा, मगर दिल से और सहीं में जरूरत पर बुलाओगी तो कोशिश जरूर करूंगा। पर यह बता कि मैं अकेला आकर तो तेरा क्या बचाव कर सकता हूं। इस पर वो मेरे गाल या चेहरे को छूते हुए  बोली नहीं भईया तुमसे शैतानी करूंगी तो सामने मगर इस तरह का मजाक कभी नहीं । फिर बोली कि तुंम आगरा तक ही आते हो? मेरे हां कहने पर मायूष होकर होली बोली अब मैं आगरा कम आती हूं भईया कई महीनो के बाद कल ही आगरा आई हूं। अब ज्यादातर झांसी में रहती हूं। इस पर मैंने उसके दोनों हाथ पकड लिए सच होली इस बार मैं भी तुमको बहुत याद कर रहा था, लगता है कि हमलोग इसी कारण इस बार मिल भी गए। मेरी बात सुनते ही होली समेत तीनों जोर से खिलखिला उठी। उनलोगों को हंसते देखकर मैं थोडा झेंप सा गया। तब एक ने कहा यार तू सिनेमा में चला जा एकदम राजकपूर की तरह अपनी होली से प्यार जता रहा था। मैं भी हंसता मुस्कुराता फर्श से खडा होकर अपने पैंट और टी शर्ट ठीक करने में लग गया। मोबाईल निकाल कर समय देखा तो एक बज रहे थे। कब और किस तरह दो घंटे निकल गए इसका अंदाजा ही नहीं लगा। मैने चौकीदार छक्कियों से नाम पूछा तो एक ने अपना नाम बुलबुल और दूसरे ने चंदा बताया। मैने दोनों से पूछा कि क्या फिर कुछ चाय पानी? मेरी बात सुनते ही चंदा ने 30-40 रूपए निकालकर मुझे पकडाने लगी। तुम तो अपने निकल गए तुमसे क्या पैसे लेना। मैने चंदा को प्यार से कहा कि अपने का मतलब क्या होता है जानी और चाय लाने को है का। खाना पीना तो चलेगा ही। मैने एक सौ रूपए का एक नोट पकडाते हुए चाय के लिए कहा। साथ ही अपना बैग खोलकर उसमें रखा पेठा का एक डिब्बा निकालकर होली को थमाया। यह तुमलोग के लिए है। पेठा
का डिब्बा देखकर होली बहुत खुश हुई मगर दूसरे ही पल वापस करती हुई बोली नहीं भैय्या घर के लिए ले जा रहे हो इसे मैं नहीं रखूंगी। इस पर पेठे का दूसरा डिब्बा दिखाते हुए मैने कहा कि देखो घर के लिए यह है। दूसरा डिब्बा तेरे लिए ही खरीदा था कि अगर तू मिल गयी तो कुछ मीठा तो होना ही चाहिए था न। पेठा निकालने पर बुलबुल बोली तुम तो काफी धनवान लग रहे हो भाई। इस पर मैने  कहा नहीं बुलबुल तेरा भाई दिल से तो बहुत अमीर है, पर धन से कोई खास नहीं। ये तो होली के नाम पर इतने रूपए जमा थे सो वहीं खर्च कर रहा हूं, नहीं तो फिर तेरे ही जेब पर डाका डाला जाता। बुलबुल फिर बोली तुम करते क्या हो
भाई ? मैं उसकी उत्कंठा पर हंस पडा कुछ नहीं यार बस्स इधर उधर लिखना और भाषण देता हूं कॉलेज में । वो सहज होकर बोली तुम नेता हो ? मैंने पलटते ही कहा मैं तुम्हें नेता लग रहा हूं। मैं तो पैंट टीशर्ट पहनता हूं जबकि नेता तो खद्दर पहनता है। इस पर वो फिर वोली नहीं भाई जमाना बदल गया है कपड़ो से अब कोई नहीं पहचाना जाता। तब तक चंदा कुछ सामान के साथ आ चुकी थी। तीनों खाने पर टूट पडी थी और मैं चाय ले रहा था। बुलबुल और चंदा ने कहा कि वैसे तो हमलोग का यहां स्टेशन पर उधार चलता है पर आज हमलोग के पास एकदम पैसे नहीं थे यह तो तुम टकरा गए कि तेरा भी काम हो गया और होली के चलते हमलोग भी पार्टी कर रहे है। दोनों ने कहा हमलोग भाई दिल की इतनी बुरी नहीं होती है पर रोजाना सैकड़ो मर्दो से टकराना होता है, लिहाजा जरा गरम वाचाल और उदंड स्वभाव रखना पड़ता है ताकि लोग हमलोगों से डरे.और दूर ही रहे।
खान पान के बाद मैने होली से चलने की इजाजत मांगी। अपने बैग से दो नया तौलिया और चार पांच सफेद रूमाल निकालकर होली के सामने रख दिया कि यह सब रखो और आपस में बांट लेना। मेरे पास नया केवल दो ही तौलिया था। साथ ही प्रसाद का एक पैकेट भी निकालकर होली को थमाया। इन सामान को देखकर वे लोग एकदम चकित थी। एक साथ बोली अरे भाई इसको तुम ही रखो घर ले जाओ। तब मैने लाचारी जाहिर की। यार मेरे पास कोई यादगार चीज ही नहीं है कि तुमलोग को दे सकूं। इस तरह ढाई घंटे बीत गए यह पता ही नहीं लगा। सबो ने थोडी देर और रूकने का मनुहार किया। रूकने की बजाय मैने होली के सिर पर हाथ फेरा और कहा कि ढाई बजे तक दिल्ली के लिए तीन ट्रेन है अगर यह छूट गयी तो घर पहुंचने में काफी रात हो जाएगी। जेब से सौ रूपए का नोट निकाल कर होली के हाथों में रख दिया, तो वह रोने लगी। बैठी ही बैठी वो मुझसे लिपट गई।  भईया मैने जरूर अच्छे कोई कर्म किए होगें तभी मेरे को भगवान ने छक्की बनाकर भी तुम जैसा भाई सौंप दिया है। अमूमन मैं जरा कठोर सा हूं आंखों में आंसू नहीं आते पर मेरा गला भी भर्रा उठा। मैने भी उससे कहा कि होली तुमको पाकर मैं भी बडा सौभाग्यशाली ही मान रहा हूं। रेलवे स्टेशन पर बडा अजीब सा ड्रामा हो रहा ता। मेरे आस पास 100 से ज्यादा लोग खड़े थे। और नयी नयी बहिन बनी चंदा और बुलबुल भी रो रही थी। मैने चुटकी ली जानती है जब मैने होली को पहली बार भाई कहा था तो वो बोली थी कि भईया सारे मेरे भाई ही बन जाओगे तो पैसा कौन देगा। और अब मैं कह रहा हूं चंदा बुलबुल रानी कि तुम सब मेरी बहिन ही बन जाएगी तो तेरा भईया किस पर लाईन मारेगा जी। मेरी बात सुनकर तीनों ठहाका मारकर हंसने लगी। मैं भी जरा माहौल के तनाव को खुशनुमा बनाते हुए फिऱ अपनी होली बहिन को दवा समय पर खाने और बाम लगाने और दो एक दिन में झांसी जाकर आराम करने की सलाह दी। तब तक मेरे दोनों  मित्र भी पास में आकर बताया कि दो बजकर 10 मिनट में मैसूर निजामुद्दीन सुपर फास्ट आ रही है सो बस चला जाए। मैं भी सामान उठाने लगा। तीनो से फिर मुलाकात होने की उम्मीद के साथ मैं अपने मित्रों के साथ चल पडा। तभी होली ने आवाज दी एक मिनट इधर आना। मैं उसके पास पहुंचा ही था कि वह बडे अदब से मेरा पैर छूकर प्रणाम की और बोली कि मैं चलने लायक नहीं हूं भैय्या, नहीं तो तेरे संग दिल्ली तक जाकर ही लौटती। तेरे को जाने देने का तो मन नहीं कर रहा है पर क्या करे। मैने भी होली के हाथ को पकड़कर कहा कि मेरा भी जाने का मन एकदम नहीं कर रहा है पर जाना भी जरूरी है होली। वो बस्स हां भईया बोली और मैं अपना सामान उठाकर तेजी से आगे बढ़ गया। मेरे साथ ही साथ वहां पर जमा भीड भी इधर उधर हो गयी। मगर पीछे मुड़कर उन तीनों को देखने की मेरी हिम्मत नहीं हुई और मैं तेजी से स्टेशन के फूटओवर ब्रिज पर चढने लगा।