मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

आज आपकी और अधिक जरूरत है आलोक भैय्या

 
 
 
 

अनामी शरण बबल


(आलोक तोमर के जन्मदिन पर एक संस्मरण। आलोक तोमर भईया तुम मेरे जीवन में इस कद्दरशामिल से हो गए हो कि तुम्हें चाहकर भी भूला नहीं सकता। मेरी बेटी का जन्मदिन भी 27 दिसम्बर यानी आपके साथ ही है।. मैं जीवनभर आपकी बातों की तो अवहेलना करता रहा मगर यह एक दैवीय संयोग है भईया कि आपने कहा था कि मुझको ताऊ कहने वाले का जन्मदिन 27 दिसम्बरही होना चाहिए.और यह संयोग मैं किसी तरह पूरा कर सका। तुम सदा मेरे जीवन में बने रहोगे आलोक भैय्या पूरे आदर प्यार और सम्मान के साथ) हमेशा)


यादों में आलोक / अनामी शरण बबल

18 मार्च, 2011 की रात करीब साढ़े दस बजे मैं कम्प्यूटर के सामने बैठा कुछ काम कर रहा था कि एकाएक आलोक कुमार का फोन आया। आलोक भैय्या (तोमर) की खराब सेहत का हवाला देते हुए बताया कि सुप्रिया भाभी बात करना चाहती हैं। मैं एकदम हतप्रभ रह गया और भाभी से बातचीत में भी यह छिपा नहीं पाया कि भैय्या से मैं नाराज हूं। भाभी की शीतल बातों से मन शर्मसार सा हो गया। मेरी पत्नी ममता से भी भाभी ने बात की और फिर कैंसर से पीड़ित और खराब हालात में बत्रा में दाखिल आलोक तोमर को लेकर मेरे मन में संबधों के 28 साल पुरानी फिल्म घूमने लगी।

आलोक तोमर से मेरा रिश्ता एक लंबी नदी की तरह है। कभी हम दोनों में भरपूर प्यार लबालब रहा, तो कभी सूखी हुई नदी की तरह भावहीन से हो गए। मन में तमाम शिकायतों के बाद भी सामने नाराजगी प्रकट करने की हिम्मत कभी नहीं रही, तो सामने देखकर भैय्या ने भी कभी मेरी उपेक्षा नहीं की। अलबता पिछले करीब आठ साल से हम दोनों के बीच कोई वार्तालाप तक नहीं हुआ, फिर भी मन में आदर के साथ शिकायत भी बना रहा है। भड़ास4मीडिया से कैंसर की जानकारी मिलने के बाद भी बात करने की पहल हमने भी नहीं की (इस गलती का अहसास कल रात को हुआ, जब भाभी ने बताया कि अब तक अनामी क्यों नहीं आया? उससे कहो मैं मिलना चाहता हूं। )।

जनसता के प्रकाशन के साथ ही 1983-84 से मैं आलोक तोमर से पत्र पोस्टकॉर्ड के जरिए (तब तक तो मैं दिल्ली भी नहीं आया था) जुड़ गया। पहले पत्र में ही मैंने भैय्या का संबोधन दिया था। पहले पत्र में मैंने भाभी को भी प्रणाम लिखा था। लौटती डाक में भैय्या ने मुझे भाभी को कियाया भेजा हुआ प्रणाम यह कह कर लौटा दिया कि अभी तेरी कोई भाभी नहीं है। हमारे बीच पत्र का रिश्ता बना रहा और लगभग हर माह चार-पांच पत्र आते जाते ही रहते थे। (कुछ पत्र तो मेरे घर देव में आज भी सुरक्षित होंगे)।

आलोक भैय्या से पहली मुलाकात 1985 में हुई। वे चाहे जितने भी बड़े पत्रकार होंगे, मगर आलोक भैय्या के रूप में वे हमारे लिए ज्यादा बड़े थे। जनसत्ता दफ्तर में जाकर पहली बार मिलना कितना रोमांचक रहा, इसका बयान मैं नहीं कर सकता। उनसे मिलना वाकई मेरे लिए किसी कोहिनूर को पाने से कम नहीं था। आलोक भैय्या ने भी करीब एक घंटे तक अपने सामने बैठाए रखा और घर परिवार से लेकर बहुत सारी तमाम बाते पूछी। फिर बिहार लौटने से पहले दोबारा मिलकर जाने को भी (आदेश) कहा।

उनसे मेरी दूसरी मुलाकात कितनी अद्भभुत रही, इसको याद करके मैं आज भी सोचता हूं कि वे वाकई (उस समय) रिश्तों को खासकर हम जैसे छोटे गांव से पहली बार दिल्ली आने वाले को कितना मान देते थे। उस समय तक तो हमलोग नौसीखिया पत्रकार भी ठीक से नहीं बन पाए थे। कभी-कभी तो अब शर्म भी आती है कि सामान्य शहरी शिष्टाचार के मामले में भी मैं कितन अनाड़ी था। आलोक भैय्या से मुलाकात हो गई। कैंटीन से चाय और समोसे भी खिलाए। थोड़ी देर के बाद वे उठे और बोले अनामी , तुम बैठो मैं अभी थोड़ी देर में आता हूं (यह आमतौर पर मुलाकात खत्म करने का एक अबोला सामान्य तरीका सा होता है कि मैं चला अब तू भी फूट )। मैं इस दांवपेंच को जानता नहीं था, लिहाजा उनके टेबुल के सामने ही करीब दो घंटे तक बैठा उनके टेबल पर रखी किताबों और कागजो का ऑपरेशन करता हुआ अपने आलोक भैय्या के आने की राह देखता रहा।

दो ढाई घंते के बाद वे आए और मुझे बैठा देखकर लगभग वे चौंक से गए। मुझसे बोले अभी तक गए नही? मैनें बड़ी मासूमियत से जवाब दिया आपने ही तो कहा था कि तुम बैठो, मैं अभी आता हूं? मेरी मासूमियत या यों कहें बेवकूफी को भांपते हुए फौरन मेरा मान रखने के लिए अपनी भूल का अहसास करते हुए कहा अरे हां, मैं एकदम भूल गया अनामी कि तुम बैठे हो। थोड़ी देर तक बातचीत की और एकबार फिर चाय पीलाकर मुझे बाकायदा बस रूट नंबर समझाते हुए रूखसत किया। इस घटना से उनके बड़प्पन का बोध आज भी मन को उनके प्रति आदर से भर देता है।

साल 1985 में ही मेरे संपादन में एक कविता की किताब संभावना के स्वर भी छपा, जिसकी प्रति भैय्या को दी। 1987 मे मैं भारतीय जनसंचार संस्थान में दाखिला लेकर दिल्ली आ गया। तब मेरे साथ आलोक भैय्या हमारे भैय्या है, इसका एक विश्वास हमेशा मन को बल देता रहा। 1990 में चौथी दुनिया (तबतक संतोष भारतीय एंड कंपनी अलग हो चुकी थी) की रिपोर्टिग के दौरान मैंने अपने लिए ढेरों लोगों से समय तक तय कराया। 1992 में समय सूत्रधार के लिए चंद्रास्वामी के इंटरव्यू के लिए भी समय तय कराया। पूरे इंटरव्यू के दौरान वे हमारे साथ ही मूक बने रहे रहे। यह इंटरव्यू काफी मजेदार और विवादास्पद सा ही रहा। मैने स्वामी से उन तमाम मुद्दो पर बात की जिससे एक स्वामी की छवि और गरिमा खंडित होती थी। इंटरव्यू के बाद उन्होने मेरे पीठ पर एक धौल जमाया मेरी शैली और आक्रामक अंदाज की सराहना की ।. मेरे मन में आलोक भैय्या के प्रति मेरे प्रेम को देखकर वे कई बार आगाह भी करते कि सब जगह मेरा नाम मत लिया कर वरना कभी-कभी घाटा भी उठाना पड़ सकता है। हालांकि जिदंगी में ऐसा मौका कभी नहीं आया।

1991 के बाद आलोक भैय्या से हमारा रिश्ता ही और ज्यादा प्रगाढ़ हो गया। हर एक लेख या रिपोर्ट 300 रूपए के हिसाब से शब्दार्थ के लिए मैनें 50 से भी अधिक लेख या रिपोर्ट लिखे। तत्कालीन चुनाव आयुक्त टीएन शेषन से किया गया लंबा आक्रामक इंटरव्यू भी (जो बाद में सैकड़ों जगह प्रकाशित हुआ) शब्दार्थ के लिए किया। शब्दार्थ के लिए ही मैं गुमला झारखंड के जंगलों में जाकर आदिवासियों की समानांतर सरकार पर भी एक रिपोर्टिग की। और खाटीनक्सल इलाके मनें अपनी नवविवाहिता बीबी और साला राकेश को लेकर देर रात विशुनपुर जा पहुंचा। मैं उन लोगों के संग तीन दिन तक रहकर आस पास के दर्जनों गांवों और तथाकथित राष्ट्रपति ,अशोक भगत से लेकर प्रधानमंत्री आदि से मिला । आजमगढ के निवासी और पेशे से इंजीनियर अशोक भगत के अतिथिशाल पंचवटी में रहा और उनकी बेटियों के संग पत्नी ममता की भी दोस्ती हो गयी। और अंत में लौटते समय अशोक भगत जी ने ममता को बेटी की तरह स्नेहाशीष दिया। यह एक अलबत संयोग है कि रांची प्रवास के अंत में मैं इसी माह में करीब 23 साल के बाद अशोक जी से रांची में मिला । रीम्स के निकट विकास भारती का मुख्यालय तो अब एक विशाल एनजीओ का रूप धारण कर चुका था।

कई अखबारों को छोडने और बंद होने पर प्राप्त एक एक साल का एक मुश्त वेतन और अपने पास जमा कुछ पूंजी के अलावा पापा द्वारा दिए गए 40 हजार की राशि से 1993 में मयूर विहार फेज तीन में मैंने एक एलआईजी फ्लैट बिना किस्त भुगतान डेढ लाश रूपए में खरीद डाली। मकान तो खरीद लिया, मगर अंत में पांच हजार रूपए घट गए। जिसकी अदायगी नहीं होने पर प्रोपर्टी डीलर ने नए फ्लैट पर अपना ताला डाल दिया। तब तक मोबाइल तो दूर की बात लैंडलाईन फोन का किसी घर में होना भी स्टेटस सिंबल सा होता था। घर से पैसा मंगवाने में भी आठ-दस दिन तो लग ही जाते । मैंने अपनी समस्या आलोक भैय्या को बता दी , तो उन्होनें शब्दार्थ फीचर एजेंसी के लिए 20-25 रिपोर्ट लिखकर लाने की सलाह दी। और मैं दो दिन तक लक्ष्मीनगर वाले किराये के मकान में खुद को बंद करके तीसरे ही दिन करीब 30-32 रिपोर्ट कस्तूरबा गांधी मार्ग वाले पेट्रोल पंप के पीछे शब्दार्थ में दे दिया। आलोक भैय्या ने रिपोर्ट को देखे बगैर ही फौरन पांच हजार निकाल कर हमें दे दिए।

इस बीच अपने घर के प्रोपर्टी डीलर पुराण की गाथा मैं लक्ष्मीनगर में अपने सबसे गहरे और मीठे दोस्त पत्रकार संपादर राकेश थपलियाल के घर पर बैठकर बता ही रहा था कि राकेश के पापा खेल पत्रकार और हिन्दी हिन्दुस्तान में खेल संपादक के रूप में काम करने वाले कमलेश थपलियाल अंकल अपने कमरे में गए और पाच हजार रूपए लाकर मेरी और बढ़ाया। यह मेरे लिए एक चमत्कार से कम नहीं था। मैं एकदम चौंक सा गया। मैंने कहा कि अंकल पैसा तो मैं ले लूंगा मगर, इसे कब लौटाऊंगा यह मैं अभी नहीं कह सकता ? मेरे ऊपर पूरा विश्वास दिखाते हुए उन्होंने कहा तुम पैसे ले जाकर पहले घर को अपने कब्जे में तो करो। मेरा पैसा कहीं भाग नहीं जा रहा है,, मुझे पता है कि पैसा आने पर सबसे पहले तुम यहां पैसा देकर ही अपने घर जाओगे। आलोक भैय्या से पांच हजार लेते समय यह बताया कि मुझे कमलेश थपलियाल जी भी पैसा देने के लिए राजी है, जिसपर उन्होंने कहा कि पैसे तो मिल ही गए, फिर क्यों किसी का अहसान लोगे? खैर

1993 अक्टूबर में मां पापा और पत्नी ममता जब पहली बार दिल्ली आए तो आलोक भैय्या भाभी और छोटी मिष्ठी को लेकर मयूर विहार फेज तीन घर पे आए। सबों से मिलकर भैय्या और भाभी भावविभोर हो गए। भैय्या ने ममता को कहा भाई मेरा बर्थडे 27 दिसंबर को होता है, मैं चाहता हूं कि मुझे ताऊ बनाने वाले का जन्मदिन भी 27 दिसंबर ही हो, ताकि एक साथ ही जन्मदिन मनाया जा सके। यह एक अजीब संयोग रहा कि मेरी बेटी कृति का जन्म भी 27 दिसंबर 94 में हुआ।

भैय्या से भाभी को लेकर यदा- कदा बहुत सारी बातें हुई। यहां तक कि कैसे भैय्या ने भाभी को पटाया और प्यार और विवाह का प्रस्ताव रखा। उधर से हरी झंडी मिलते ही हमारे भैय्या इस कदर भाव विभोर हो गए और मारे खुशी के अपने स्कूटर को सीधे जाकर एक गाड़ी से भिड़ाकर सीधे अस्पताल में दाखिल हो गए। तब भाभी झंडेवालान दफ्तर जाने की बजाय भैय्या की देखभाल करती रही। भाभी को नवभारत टाइम्स में लगवाने से लेकर 1990 में जनसत्ता छोड़ने के तमाम कारणों पर भी आलोक भैय्या ने पूरी राम कहानी बताई।

इस बीच राष्ट्रीय सहारा से मैं 1993 दिसंबर में जुड़ गया। बात 1995 की है। डेटलाइन इंडिया के लिए भी मैंने 30-35 रिपोर्ट लिखी। काफी समय बाद फिर बात 2000 की थी, जब एक दिन भैय्या ने दीतब डेटलाइन फीचर एजेंसी देख रहे थे से फोन किया और रिपोर्ट लिखने के लिए कहा।। । भैय्या आपने फोन किया यही मेरे लिए काफी है। मगर, भैय्या बार-बार बोलते रहे नहीं अनामी, इस बार तुम्हें शिकायत नहीं होगी, बस जुट जाओ डेटलाइन को जमाना है। इसके बाद करीब दो माह तक यह रोजाना का सिलसिला सा बन गया कि सुबह 8-9 के बीच भैय्या का फोन आता और मैं दो एक रिपोर्ट का टिप्स भैय्या को पूरे विवरण के साथ लिखवाता, जिसे बाद में भैय्या अपनी तरफ से कभी मेरे नाम के साथ तो कभा अक्षय कुमार समेत अपने साथ मेरे नाम को संयुक्त तौर पर रोजाना डेटलाइन के लिए रपट जारी करने लगे।

भैय्या के घर में जाकर दो बार मिला। एक बार कालकाजी वाले मकान और दोबारा चितरंजन पार्क में। दोबारा जाने पर तो एकाएक भाभी को सामने देखकर मैं पहचान ही नहीं पाया। इस पर भाभी नाराज होकर बोली नालायक और मत आया करो, बाद में तो फिर पहचानोगे ही नहीं? भैय्या हमेशा मेरे लिए सुपर ब्रांड रहे, यही वजह है कि चाहे आलोक कुमार, अनिल शर्मा (छायाकार), नवीन कुमार, अशोक प्रियदर्शी आदि को मैंने ही भैय्या से मिलवाया। यह एक अजीब संयोग रहा कि सारे लोग किसी ना किसी तरह से आज भी संपर्क में हैं, मगर मैं ही कट सा गया।



इसी दौरान तीन नए राज्य बने, और मुझे झारखंड में रांची, हजारीबाग जाना पड़ा। भैय्या ने मुझसे कुछ रिपोर्ट लाने को कहा। नए राज्य के गठन के समय नए उत्साह और नए माहौल में भागते हुए करीब 15-16 रिपोर्ट के लिए मैटर जमा कर वापस दिल्ली लौटा। एक दिन रात में भैय्या फोन करके रिपोर्ट के बाबत पूछ रहे थे। मगर पत्ता नहीं कोई बात हम दोनों को बुरी लगी.। मगर उस दिन के बाद फिर आलोक भैय्या का फोन आना ही बंद हो गया। बहुत सारी रिपोर्ट होने के बाद भी मैं इस डर से फोन नहीं किया कि कहीं भैय्या को यह ना लगे कि मैं कुछ मांग रहा हूं.? बातचीत बंद होने का यह सिलसिला इस कदर गहराया कि रिश्तों पर ही विराम लग गया।

अलबता कई साल के बाद एक दिन बंगाली मार्केट में बंगाली स्वीटस में मुझे देखकर भैय्या ने आवाज दी। अनामी सुनकर मैं भी चौंक पड़ा। उनसे मिला और हमेशा की तरह पैर छूआ। घऱ का हाल चाल पूछे। करीब पांच मिनट की इस मुलाकात के बाद यह मेरा दुर्भाग्य रहा कि 28 साल पुराने रिश्ते पर विराम लगे एक दशक गुजरने के बाद भी हम दोनों को (मेरी गलती अधिक है क्योंकि मैं छोटा भाई हूं) खत्म हो गए कि मैं अपने बीमार भाई से जाकर भी नहीं मिल पाया।

कल दोपहर में ही रायपुर से रमेश शर्मा का फोन आया और भैय्या की सेहत को लेकर काफी देर तक बातें होती रही। आलोक भैय्या से भाभी को पहली बार मिलाने वाले रमेश शर्मा कई साल तक एक साथ काम करते थे। एक बार हिन्दी की विख्यात लेखिका चित्रा मुदगल जी के यहां गया था। जहां पर चर्चा के दौरान भैय्या की मानस मां चित्रा आलोक तोमर को लेकर भावविभोर हो गईं।

कल रात भाभी से बात होने के साथ ही मेरे मन का सारा मैल धुल गया। आंखो से आंसू की तरह तमाम शिकवा गिला भी खत्म हो गए। अपने आप पर शर्म आ रही है कि क्या मैं वाकई इतना बड़ा हो गया हूं कि अपने उस भाई से भी नाराज हो सकता हूं ? यह सब मेरे जैसे छोटी सोच वालों से ही संभव है। वाकई भैय्या आपसे नाराज और दूर होकर मैने अपना कितना नुकसान किया? यह बता पानाअब मेरे लिए कठिन है। सचमुच भैय्या अपनी जिद्द और लगन से आपने अभी तक सबकुछ संभव साबित किया है। आपसे वह जिद्द और लगन कहां सीख पाया। कहां सीख पाया कि खुद पर यकीन करके कुछ भी पाया जा सकता है। वह आत्मविश्वास और भदेसपनभी कहां अर्जित कर पाया । ताकि एक बार फिर सब कुछ सामान्य हो सके।आज आपकी और अधिक जरूरत है। आज जब मीडिया के ही लोग दलाल बनकर सामने आ रहे है, तो उनको बेनकाब करने का साहस आपके सिवा और किसमें है? सचमुच आलोक भैय्या वाकई आपकी आज ज्यादा आवश्यकता है। पर शायद भगवान को यह मंजूर नहीं था।


एक बस्ती में गालिब, खुसरो और रहीम





एक बस्ती में गालिब, खुसरो और रहीम
मिर्जा गालिब, अमीर खुसरो और रहीम।

विवेक शुक्ल


तीनो कलम के धनी। संयोग देखिए कि राजधानी के निजामउद्दीन क्षेत्र के कोलाहल से दूर तीनों चिरनिद्रा में हैं बहुत कम दूरी पर। शायद ही किसी और स्थान पर आपको इस तरह से तीन लेखक मिलें।यूं मिर्जा गालिब((जन्म 27 दिसंबर 1797) का जीवन पुरानी दिल्ली की गलियों में ही गुजरा। पर 15 फरवरी 1869 को गालिब ने आखिरी सांस ली तो उन्हें दफनाया गया निजामुद्दीन बस्ती में। उर्दू शायरी गालिब के बिना अधूरी है। “उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़, वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है...” अब भी गालिब की शायरी के शैदाई उपर्युक्त शेर को बार-बार पढ़ते हैं। उनका एक और शेर पढ़ें।
“रोने से और इश्क़ में बे-बाक हो गए...धोए गए हम इतने कि बस पाक हो गए...”गालिब के कुल 11 हजार से अधिक शेर जमा किये जा सके हैं। उनके खतों की तादाद 800 के करीब थी। और दरबारी शायर गालिब का जब-जब जिक्र होगा तो उनके इस शेर को जरूर सुनाया जाएगा। “हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले...बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले...” वे फक्कड़ शायर थे। गालिब के हर शेर और शायरी में कुछ अपना सा दर्द उभरता है।“हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन... दिल के बहलाने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है...” इतने नामवर शायर की कब्र को कुछ दशक पहले तक कोई देखने वाला भी नहीं था। हाल-बेहाल पड़ी थी। फिर दिल्ली में जामिया हमदर्द यूनिवर्सिटी के संस्थापक हकीम अब्दुल हामिद साहब ने अजीम शायर की कब्र को नए सिरे से विकसित करवाया ताकि उनके चाहने वाले वहां पर जाकर कुछ देर उनकी शायरी के माध्यम से उनका स्मरण कर सकें।
ग़ालिब अपनी लेखनी से जो कमाल कर गये वो शायद ही इतिहास में कोई और शायर कर पाया हो, और शायद ही भविष्य में कोई शख्स ऐसी कालजयी कृतियों के निशां छोड़ पाये। ग़ालिब के लेखन की खास बात ये ही है कि उनके लिखे शेर अब भी ताजा-तरीन लगते हैं।दौर बदलते गये लेकिन ग़ालिब की शायरी समाज को वैसे ही आईना दिखाती रही। एकऔर शेर गालिब का जिसे हम रोज सुनते-सुनाते हैं, “इश्क ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।”
खुसरो और कठिन है डगर पनघट की
और चचा गालिब से ही सटी है हज़रत अमीर ख़ुसरो की मजार। बस चंदेक कदम की दूरी पर है। अमीर ख़ुसरो अनेक खूबियों के मालिक थे और उनकी शख़्सियत बहुत बहुआयमी थी। वो शायर, सियासतदां, सूफ़ी और न जाने क्या-क्या थे।
वो ख़ुदअपने बारे में लिखते हैं:" तुर्क़ हिंदुस्तानियम मन हिंदवीगोयम जबाब " यानी "मैं तुर्क हिंदुस्तानी हूं और हिंदीबोलता और जानता हूं।"
अमीर ख़ुसरो ने इस ज़ुबान को नया रंग-रूप दिया।एक तरफ़ जहाँ उन्होंने अपनी शायरी में फ़ारसी का इस्तेमाल करते हुए लिखा "ज़ेहाले मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराये नैना बनाये बतियां, सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूं अँधेरी रतियाँ।" वहीँ दूसरी तरफ उन्होंने अवधी और ब्रजभाषा का इस्तेमाल करते हुए लिखा "छाप तिलक सब ले ली री मोसे नैना मिलाई के" और "बहुत कठिन है डगर पनघट की" जैसी शायरी क़ी।
अमीर ख़ुसरो ने संगीत की दुनियाको दो ऐसे नायाब तोहफ़े दिएजिन्हें सितार और तबला के नाम से जाना जाता है।अमीर ख़ुसरो ने फ़ारसी और हिन्दी में शायरी की।
उन्होंने अनगिनत दोहे और गीत लिखे। हज़रत अमीर ख़ुसरो को "बाबा-ए-कव्वाली" भी कहा जाता है जिन्होंने मौसीक़ी के इस सूफ़ीफन को नया अंदाज़ दिया और भारत-पाकिस्तान की शायदही कोई ऐसी दरगाह हो जहां सालाना उर्स के दौरान अमीर ख़ुसरो का कलाम न पढ़ा जाता हो। उर्स के आख़िरी दिन यानी कुल के दिन अमीर ख़ुसरो का रंग तो लाज़िमी तौरपर गाया जाता है।
“आज रंग है ऐ मां रंग है री,मेरे महबूब के घर रंग है री।सजन मिलावरा, सजन मिलावरा, मोरे आंगन को...”
पंडित जवाहर लाल नेहरू अपनी किताब डिस्कवरी आफ इंडिया में लिखते हैं: " अमीर ख़ुसरो फ़ारसी के अव्वल दर्जे के शायर थे और संस्कृत भी बख़ूबी जानते थे। वे महान संगीतज्ञ थे जिन्होंने हिंदुस्तानी संगीत में कई प्रयोग किए और सितार ईजाद किया। अमीर ख़ुसरो ने हिंदुस्तान की तारीफ़ में क़सीदे पढ़े। उन्होंने भारत के अलजबरा के बारे में, साइंस के बारे में, और फलों केबादशाह आम और ख़रबूज़े के बारे में खूब लिखा।”
अमीर ख़ुसरो की पैदाइश उत्तर प्रदेश के एटा ज़िलेके पटियाली गांव में गंगा किनारे सन् 1253 ईस्वी को हुई थी। अमीरखुसरो 4 बरस की उम्र में दिल्ली आ गए और 8 बरस कीउम्र में मशहूर सूफ़ी हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया केमुरीद बन गए। कहा जाता है 16-17 बरस की उम्र मेंअमीर खुसरो मशहूर शायर हो चुके थे और दिल्ली केमुशायरों में अपनी धाक जमाने लगे थे।
देनहार कोउ और है
और अब चलते हैं रहीम के मकबरे में उन्हें नमन करने। ये स्थान उन जगहों से सटा है जहां पर गालिब और खुसरो भी हैं।क्या आपको ये बताने की आवश्यकता है कि निम्नलिखित दोहे के रचयिता कौन हैं? “एकै साधे सब सधै, सब साधे सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अगाय॥”
“देनहार कोउ और है, भेजत सो दिन रैन।
लोग भरम हम पै धरैं, याते नीचे नैन॥”रहीम(जन्म 17 दिसम्बर 1556) का पूरा नाम अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना था। उनके पिता बैरम ख़ाँ मुगल बादशाह अकबर के संरक्षक थे। रहीम जब पैदा हुए तो बैरम ख़ाँ की आयु 60 वर्ष हो चुकी थी। कहा जाता है कि रहीम का नामकरण अकबर ने ही किया था। वे अकबर के नव रत्नों में थे। वीरता के साथ-साथ रहीम में कविता लिखने की अदभुत क्षमता थी।
रहीम पर गहन अध्ययन कर रहे डा. मोहसिन खान कहते हैं कि रहीम ने अपनी काव्य रचना द्वारा हिन्दी साहित्य की जो सेवा की वह अद्भुत है। रहीम की कई रचनाएँ प्रसिद्ध हैं जिन्हें उन्होंने दोहों के रूप में लिखा।रहीम का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था। वे मुसलमान होकर भी कृष्ण भक्त थे। रहीम ने अपने काव्य में रामायण, महाभारत, पुराण तथा गीता जैसे ग्रंथों के कथानकों को लिया है। वे अपने को को "रहिमन" कहकर भी सम्बोधित किया है। इनके काव्य में नीति, भक्ति, प्रेम और श्रृंगार का सुन्दर समावेश मिलता है। पूरे हिन्दी साहित्य में रहीम के जैसा विलक्षण व्यक्तित्त्व किसी भी कवि का दिखाई नहीं देता है, उनमें एक साथ कई अद्भुत गुणों का समागम बड़ी सहजता के साथ देखा जा सकता है। एक ओर वे तलवार के धनी हैं, तो दूसरी ओर कलम के धनी हैं, एक हाथ में तलवार को थामे रखा है, तो दूसरे हाथ में कलम को साधे हुए हैं। वे साम्राज्य के विस्तारकर्ता हैं। एक ओर अपनी मूल भाषा अरबी, फ़ारसी और तुर्की में रचना करते हैं, तो दूसरी ओर अन्य भारतीय भाषाओं को भी आत्मसात किए हुए हैं और श्रेष्ठ रचनाएँ देते हैं। एक ओर अपार धन-संपदा के मालिक हैं, तो दूसरी ओर उनके समय में उनसे बड़ा कोई दानी नहीं है। एक ओर वे मुस्लिम संस्कृति से बंधे हुए हैं, तो दूसरी ओर हिन्दू धर्म और संस्कृति के प्रति अगाध श्रद्धा और आस्था भीतर सँजोए हुए हैं। एक ओर वे कुशल नीतिकार हैं तो दूसरी कूटनीति भी उनमें मौजूद है।
रहीम ने अपने अनुभवों को जिस सरल शैली में अभिव्यक्त किया है वह वास्तव में अदभुत है। उनकी कविताओं, छंदों, दोहों में पूर्वी अवधी, ब्रज भाषा तथा खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।
तो अब आप जब राजधानी के निजामउद्दीन क्षेत्र से गुजरें तो गालिब, खुसरो और रहीम को नमन करना नहीं भूलें।
Ps- i AM INSPIRED BY Dr. Mohsin Khan ( डा मोहसिन खान) and Vidhyut Maurya to write this piece. Both are like my younger brothers. And can i forget the name of Gillian Wright ?