रविवार, 11 जुलाई 2021

आज की शबरी

 *#कलयुग कि #शबरी #आज की #तस्वीर में जो बुजुर्ग महिला बैठी हुई है। इनके #दर्शन करना बड़े #सौभाग्य की बात है क्योंकि यह पिछले 46 सालों से राधा रमन जी के प्रांगण में ही बैठी रहती है। और कभी राधा रमन जी की गलियां और राधा रमन जी का मंदिर छोड़कर   इधर उधर वृंदावन में कहीं नहीं गई। इन   बुजुर्ग महिला की उमर 81 साल हो चुकी है। जब यह  35 बरस की थी । तब यह  जगन्नाथ पुरी से चलकर अकेली वृंदावन के लिए आई थी। वृंदावन पहुंचकर इन्होंने किसी बृजवासी से वृंदावन का रास्ता पूछा ।उस ब्रजवासी ने इनको राधा रमन जी का मंदिर दिखा दिया। आज से 46 साल पहले कल्पना कीजिए वृंदावन कैसा होगा। यह अकेली जवान औरत सब कुछ छोड़ कर केवल भगवान के भरोसे वृंदावन आ गई। और किसी बृजवासी ने जब इनको राधा रमन जी का मंदिर दिखा   कर यह कह दिया यही वृंदावन है। तब से लेकर आज तक इनको 46 बरस हो गए यह राधा रमन जी का मंदिर छोड़कर कहीं नहीं गई। यह मंदिर के प्रांगण में बैठकर 46 साल से भजन गाती है। मंगला आरती के दर्शन करती हैं। कभी-कभी गोपी गीत गाती हैं। जब इनको कोई भक्त यह कहता है। माताजी वृंदावन घुम  आओ। तो यह कहती है। मैं कैसे जाऊं? लोग बोलते हैं। बस से या ऑटो से चली जाओ। तो यह कहती है जब मुझे किसी बृजवासी ने यह बोल दिया  यही वृंदावन है। तो मेरे बिहारी जी तो मुझे यही मिलेंगे। मेरे लिए तो सारा वृंदावन इसी राधा रमन मंदिर में  ही है। देखिए प्रेम और समर्पण की कैसी प्रकाष्ठा है। आज   के दौर में संत हो या आम जन सब धन -दौलत, रिश्ते- नातों के पीछे भाग रहे है । तो आज भी संसार में ऐसे दुर्लभ भक्त हैं जो केवल और केवल भगवान के पीछे भागते हैं। यह देखने में   बहुत निर्धन   दिखते हैं। परंतु इनका परम धन इनके भगवान 🙏राधा रमन🙏 जी है।* *हम संसार के लोग थोड़ी सी भक्ति करते हैं। और अपने आप को भकत समझ बैठते हैं। और थोड़ी सी भी परेशानी आई   या तो भगवान को कोसने लगते हैं। या उस भगवान को छोड़कर किसी अन्य देवी- देवता की पूजा करने लग जाते हैं। हमारे अंदर समर्पण तो है ही नहीं। आज   संसार के अधिकतर लोग अपनी परेशानियों से परेशान होकर कभी एक बाबा से दूसरे बाबा पर दूसरे बाबा से तीसरे बाबा पर भाग रहे हैं। ओर तो ओर हमारा ना अपने गुरु पर विश्वास है। ना किसी एक देवता को अपना इषट मानते है।  अधिकतर लोग भगवान को अगर प्यार भी करते हैं। तो किसी ना किसी भौतिक जरूरत के लिए करते हैं। परंतु इन दुर्लभ संत  महिला को को देखिये।जो सब कुछ त्याग कर केवल भगवान के भरोसे 46 साल से राधा रमन जी के प्रांगण में बैठी lऐसे संतो के चरणों में मेरा कोटि-कोटि प्रणाम*🙏🙏🌹

*Զเधे कृष्ण जी*

🙏🌹🌹🙏

सीता की आग्नेय दृष्टि

 🌹आज का भगवद चिंतन - 864🌹

एक बार अयोध्या के राज भवन में भोजन परोसा जा रहा था।

माता कौशल्या बड़े प्रेम से भोजन खिला रही थी।


माँ सीता ने सभी को खीर परोसना शुरू किया और भोजन शुरू होने ही वाला था की ज़ोर से एक हवा का झोका आया सभी ने अपनी अपनी पत्तलें सम्भाली सीता जी बड़े गौर से सब देख रही थी...


ठीक उसी समय राजा दशरथ जी की खीर पर एक छोटा सा घास का तिनका गिर गया जिसे माँ सीता जी ने देख लिया... 


लेकिन अब खीर में हाथ कैसे डालें ये प्रश्न आ गया माँ सीता जी ने दूर से ही उस तिनके को घूर कर देखा वो जल कर राख की एक छोटी सी बिंदु बनकर रह गया सीता जी ने सोचा अच्छा हुआ किसी ने नहीं देखा...


लेकिन राजा दशरथ माँ सीता जी के इस चमत्कार को देख रहे थे फिर भी दशरथ जी चुप रहे और अपने कक्ष पहुँचकर माँ सीता जी को बुलवाया...


फिर उन्होंने सीताजी से कहा कि मैंने आज भोजन के समय आप के चमत्कार को देख लिया था...


आप साक्षात जगत जननी स्वरूपा हैं, लेकिन एक बात आप मेरी जरूर याद रखना...


आपने जिस नजर से आज उस तिनके को देखा था उस नजर से आप अपने शत्रु को भी कभी मत देखना...


इसीलिए माँ सीता जी के सामने जब भी रावण आता था तो वो उस घास के तिनके को उठाकर राजा दशरथ जी की बात याद कर लेती थीं...


तृण धर ओट कहत वैदेही...

सुमिरि अवधपति परम् सनेही...


यही है...उस तिनके का रहस्य...


इसलिये माता सीता जी चाहती तो रावण को उस जगह पर ही राख़ कर सकती थी लेकिन राजा दशरथ जी को दिये वचन एवं भगवान श्रीराम को रावण-वध का श्रेय दिलाने हेतु वो शांत रही...

ऐसी विशालहृदया थीं हमारी जानकी माता...


-प्रेरक / भक्ति कथायें

🙏❤️🌹जय श्री कृष्णा🌹❤️🙏

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बेटी बनकर घर पे रही लक्ष्मी

 ।। माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु के साथ मृत्यु लोक  की भ्रमण की कहानी  !!

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🙏 जय श्रीकृष्ण, जय माता लक्ष्मीi 🙏

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 भगवान् विष्णुजी और सौभाग्य और धन की देवी माँ लक्ष्मीजी के साथ मृत्युलोक भ्रमण की कथा का अमृत पान करेंगे, परमेश्वर के तीन मुख्य स्वरूपों में से एक भगवान विष्णुजी का नाम स्वयं ही धन की देवी माँ लक्ष्मीजी के साथ लिया जाता है, शास्त्रों में कथाओं के अनुसार माँ लक्ष्मीजी हिन्दू धर्म में धन, सम्पदा, शान्ति, सौभाग्य और समृद्धि की देवी मानी जाती हैं।


माता लक्ष्मीजी भगवान् श्री विष्णुजी की अर्धांगिनी हैं. सुख व समृद्धि की प्रतीक माँ लक्ष्मी व भगवान् विष्णुजी को युगों-युगों से एक साथ ही देखा गया है, यदि कोई व्यक्ति अपने जीवन में धन का वास चाहता है, तो हमेशा ही मां लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु की आराधना अवश्य करे. इन दोनों का रिश्ता काफी शुद्ध व सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।


परंतु ऐसा क्या हुआ था? जो लक्ष्मीजी के कारण भगवान् विष्णुजी की आंखें भर आईं? एक कथा के अनुसार लक्ष्मीजी की किस बात से विष्णु जी इतने निराश हो गयें, एक बार भगवान विष्णुजी शेषनाग पर बैठे-बैठे उदास हो गयें और धरती पर जाने का विचार बनाया, धरती पर जाने का मन बनाते ही विष्णुजी जाने की तैयारियों में लग गये।


अपने स्वामी को तैयार होता देख कर लक्ष्मीजी ने उनसे पूछा- स्वामी, आप कहां जाने की तैयारी में लगे हैं? जिसके उत्तर में विष्णुजी ने कहा, हे देवी! मैं धरती लोक पर घूमने जा रहा हूँ, यह सुन माता लक्ष्मीजी का भी धरती पर जाने का मन हुआ और उन्होंने श्रीहरि से इसकी आज्ञा माँगी।


लक्ष्मीजी द्वारा प्रार्थना करने पर भगवान् विष्णुजी बोले आप मेरे साथ चल सकती हो, लेकिन एक शर्त पर, तुम धरती पर पहुँच कर उत्तर दिशा की ओर बिलकुल मत देखना, तभी मैं तुम्हें अपने साथ लेकर जाऊंगा. यह सुनते ही माता लक्ष्मीजी ने तुरंत हाँ कह दिया और विष्णुजी के साथ धरती लोक जाने के लिए तैयार हो गयीं।


माता लक्ष्मीजी और भगवान् विष्णुजी सुबह-सुबह धरती पर पहुँच गए. जब वे पहुंचे तब सूर्य देवता उदय हो ही रहें थे, कुछ दिनों पहले ही बरसात हुयी थी, इसलिये धरती पर  चारों ओर हरियाली ही हरियाली थी, धरती बेहद सुन्दर दिख रही थी, अतः माँ लक्ष्मीजी मन्त्र मुग्ध हो कर धरती के चारों ओर देख रही थीं, माँ लक्ष्मीजी भूल गयीं कि पति को क्या वचन दे कर साथ आई हैं।


अपनी नजर घुमाते हुए उन्होंने कब उत्तर दिशा की ओर देखा उन्हें पता ही नहीं चला? मन ही मन में मुग्ध हुई माता लक्ष्मीजी ने जब उत्तर दिशा की ओर देखा तो उन्हें एक सुन्दर बागीचा नजर आया. उस ओर से भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी. बागीचे में बहुत ही सुन्दर-सुन्दर फूल खिले थे. फूलों को देखते ही मां लक्ष्मी बिना सोचे समझे उस खेत में चली गईं और एक सुंदर सा फूल तोड़ लायीं।


फूल तोड़ने के पश्चात जैसे ही माँ लक्ष्मीजी भगवान् विष्णुजी के पास वापस लौट कर आयीं तब भगवान् विष्णुजी की आँखों में आँसू थे. माँ लक्ष्मीजी के हाथ में फूल देख विष्णुजी बोले, कभी भी किसी से बिना पूछे उसका कुछ भी नहीं लेना चाहियें, और साथ ही माँ लक्ष्मीजी को विष्णुजी को दिया हुआ वचन भी याद दिलाया, और फिर भगवान् विष्णुजी जी ने दी माँ लक्ष्मीजी को सजा।


माँ लक्ष्मीजी को अपनी भूल का जब आभास हुआ तो उन्होंने भगवानक्ष विष्णुजी से इस भूल की क्षमा मांगी, विष्णुजी ने कहा कि आपने जो भूल की है उस की सजा तो आपको अवश्य मिलेगी? जिस माली के खेत से आपने बिना पूछे फूल तोड़ा है, यह एक प्रकार की चोरी है, इसीलिये अब आप तीन वर्षों तक माली के घर नौकर बन कर रहो, उस के बाद मैं आपको बैकुण्ठ में वापस बुलाऊँगा।


भगवान् विष्णुजी का आदेश माता लक्ष्मीजी ने चुपचाप सर झुका कर मान स्वीकार किया, जिसके बाद माँ लक्ष्मीजी ने एक गरीब औरत का रूप धारण किया और उस खेत के मालिक के घर गयीं, माधव नाम के उस माली का एक झोपड़ा था जहां माधव पत्नी, दो बेटे और तीन बेटियों के साथ रहता था, माता लक्ष्मीजी जब एक साधारण औरत बन कर माधव के झोपड़े पर पधारी,  तो माधव ने पूछा- बहन आप कौन हो........??


तब मां लक्ष्मी ने कहा- मैं एक गरीब औरत हूं, मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं, मैंने कई दिनों से खाना भी नहीं खाया, मुझे कोई भी काम दे दो. मैं तुम्हारे घर का काम कर लिया करूँगी और इसके बदले में आप मुझे अपने घर के एक कोने में आसरा दे देना, माधव बहुत ही अच्छे दिल का मालिक था, उसे दया आ गयीं, लेकिन उस ने कहा, बहन मैं तो बहुत ही गरीब हूं, मेरी कमाई से मेरे घर का खर्च काफी कठिनाई से चलता है।


लेकिन अगर मेरी तीन बेटियां है उसकी जगह अगर चार बेटियां होतीं तो भी मुझे गुजारा करना था, अगर तुम मेरी बेटी बन कर और जैसा रूखा-सूखा हम खाते हैं उसमें खुश रह सकती हो तो बेटी अन्दर आ जाओ।


माधव ने माँ लक्ष्मीजी को अपने झोपड़े में शरण दी,  और माँ लक्ष्मीजी तीन साल तक उस माधव के घर पर नौकरानी बन कर रहीं, कथा के अनुसार कहा जाता है कि जिस दिन माँ लक्ष्मीजी माधव के घर आईं थी, उसके दूसरे दिन ही माधव को फूलों से इतनी आमदनी हुई कि शाम को उसने एक गाय खरीद ली।


फिर धीरे-धीरे माधव ने जमीन खरीद ली और सबने अच्छे-अच्छे कपड़े भी बनवा लियें, कुछ समय बाद माधव ने एक बडा पक्का घर भी बनवा लिया, माधव हमेशा सोचता था कि मुझे यह सब इस महिला के आने के बाद मिला है, इस बेटी के रूप में मेरी किस्मत आ गई है...


एक दिन माधव जब अपने खेतों से काम खत्म करके घर आया, तो उसने अपने घर के द्वार पर गहनों से लदी एक देवी स्वरूप औरत को देखा, जब निकट गया तो उसे आभास हुआ कि यह तो मेरी मुंहबोली चौथी बेटी यानि वही औरत है, कुछ समय के बाद वह समझ गया कि यह देवी कोई और नहीं बल्कि स्वयं माँ लक्ष्मीजी हैं, यह जानकर माधव बोला- हे माँ हमें क्षमा करें, हमने आपसे अनजाने में ही घर और खेत में काम करवाया, हे माँ यह हमसे कैसा अपराध हो गया, हे माँ हम सब को माफ़ कर दे।


यह सुन माँ लक्ष्मीजी मुस्कुराईं और बोलीं- हे माधव तुम बहुत ही अच्छे और दयालु व्यक्त्ति हो, तुमने मुझे अपनी बेटी की तरह रखा, अपने परिवार का सदस्य बनाया, इसके बदले मैं तुम्हें वरदान देती हूंँ, कि तुम्हारे पास कभी भी खुशियों की और धन की कमी नहीं रहेगी, तुम्हें सारे सुख मिलेंगे जिसके तुम हकदार हो. इसके पश्चात माँ लक्ष्मीजी अपने स्वामी श्री हरि के द्वारा भेजे रथ में बैठकर वैकुण्ठ चली गयीं, हे माँ मेरी नम्र विनंती है कि जैसे माधव पर कृपा दृष्टि रखी, वैसी ही कृपा दृष्टि हमारे समाज और देश पर रखना।


                 🌹जय श्री लक्ष्मी माँ!🌹

महाभारत की कहानी

 एक रात के लिए पुनर्जीवित हुए थे महाभारत युद्ध में मारे गए वीर=======


        आज  महाभारत से जुडी एक अदभुत घटना के बारे में बता रहे है जब महाभारत युद्ध में मारे गए समस्त शूरवीर जैसे की भीष्म, द्रोणाचार्य, दुर्योधन, अभिमन्यु, द्रौपदी के पुत्र, कर्ण, शिखंडी  आदि एक रात के लिए पुनर्जीवित हुए थे यह घटना महाभारत  युद्ध ख़त्म होने के 15 साल बाद घटित हुई थी। साथ ही हम आपको बताएँगे की धृतराष्ट्, गांधारी, कुन्ती और विदुर की मौत कैसे हुई ? 


आइए इन सब के बारे में विस्तार पूर्वक जानते है –

राजा बनने के पश्चात हस्तिनापुर में युधिष्ठिर धर्म व न्यायपूर्वक शासन करने लगे। युधिष्ठिर प्रतिदिन धृतराष्ट्र व गांधारी का आशीर्वाद लेने के बाद ही अन्य काम करते थे। इस प्रकार अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी आदि भी सदैव धृतराष्ट्र व गांधारी की सेवा में लगे रहते थे, लेकिन भीम के मन में धृतराष्ट्र के प्रति हमेशा द्वेष भाव ही रहता। भीम धृतराष्ट्र के सामने कभी ऐसी बातें भी कह देते जो कहने योग्य नहीं होती थी।


इस प्रकार धृतराष्ट्र, गांधारी को पांडवों के साथ रहते-रहते 15 साल गुजर गए। एक दिन भीम ने धृतराष्ट्र व गांधारी के सामने कुछ ऐसी बातें कह दी, जिसे सुनकर उनके मन में बहुत शोक हुआ। तब धृतराष्ट्र ने सोचा कि पांडवों के आश्रय में रहते अब बहुत समय हो चुका है। इसलिए अब वानप्रस्थ आश्रम (वन में रहना) ही उचित है। गांधारी ने भी धृतराष्ट्र के साथ वन जाने में सहमति दे दी। धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ विदुर व संजय ने वन जाने का निर्णय लिया।


वन जाने का विचार कर धृतराष्ट्र ने युधिष्ठिर को बुलाया और उनके सामने पूरी बात कह दी। पहले तो युधिष्ठिर को बहुत दुख हुआ, लेकिन बाद में महर्षि वेदव्यास के कहने पर युधिष्ठिर मान गए। जब युधिष्ठिर को पता चला कि धृतराष्ट्र व गांधारी के साथ विदुर व संजय भी वन जा रहे हैं तो उनके शोक की सीमा नहीं रही। धृतराष्ट्र ने बताया कि वे कार्तिक मास की पूर्णिमा को वन के लिए यात्रा करेंगे। वन जाने से पहले धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों व अन्य परिजनों के श्राद्ध के लिए युधिष्ठिर से धन मांगा।


भीम ने द्वेषतावश धृतराष्ट्र को धन देने के इनकार कर दिया, तब युधिष्ठिर ने उन्हें फटकार लगाई और धृतराष्ट्र को बहुत-सा धन देकर श्राद्ध कर्म संपूर्ण करवाया। तय समय पर धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर व संजय ने वन यात्रा प्रारंभ की। इन सभी को वन जाते देख पांडवों की माता कुंती ने भी वन में निवास करने का निश्चय किया। पांडवों ने उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन कुंती भी धृतराष्ट्र और गांधारी के साथ वन चलीं गईं।


धृतराष्ट्र आदि ने पहली रात गंगा नदी के तट पर व्यतीत की। कुछ दिन वहां रुकने के बाद धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती, विदुर व संजय कुरुक्षेत्र आ गए। यहां महर्षि वेदव्यास से वनवास की दीक्षा लेकर ये सभी महर्षि शतयूप के आश्रम में निवास करने लगे। वन में रहते हुए धृतराष्ट्र घोर तप करने लगे। तप से उनके शरीर का मांस सूख गया। सिर पर महर्षियों की तरह जटा धारण कर वे और भी कठोर तप करने लगे। तप से उनके मन का मोह दूर हो गया। गांधारी और कुंती भी तप में लीन हो गईं। विदुर और संजय इनकी सेवा में लगे रहते और  तपस्या किया करते थे।


इस प्रकार वन में रहते हुए धृतराष्ट्र आदि को लगभग 1 वर्ष बीत गया। इधर हस्तिनापुर में एक दिन राजा युधिष्ठिर के मन में वन में रह रहे अपने परिजनों को देखने की इच्छा हुई। तब युधिष्ठिर ने अपने सेना प्रमुखों को बुलाया और कहा कि वन जाने की तैयारी करो। 


मैं अपने भाइयों व परिजनों के साथ वन में रह रहे महाराज धृतराष्ट्र, माता गांधारी व कुंती आदि के दर्शन करूंगा। इस प्रकार पांडवों ने अपने पूरे परिवार के साथ वन जाने की यात्रा प्रारंभ की। पांडवों के साथ वे नगरवासी भी थे, जो धृतराष्ट्र आदि के दर्शन करना चाहते थे।


पांडव अपने सेना के साथ चलते-चलते उस स्थान पर आ गए, जहां धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती रहते थे। जब युधिष्ठिर ने उन्हें देखा तो वे बहुत प्रसन्न हुए और मुनियों के वेष में अपने परिजनों को देखकर उन्हें शोक भी हुआ। धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती भी अपने पुत्रों व परिजनों को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। 


जब युधिष्ठिर ने वहां विदुरजी को नहीं देखा तो धृतराष्ट्र से उनके बारे में पूछा। धृतराष्ट्र ने बताया कि वे कठोर तप कर रहे हैं। तभी युधिष्ठिर को विदुर उसी ओर आते हुए दिखाई दिए, लेकिन आश्रम में इतने सारे लोगों को देखकर विदुरजी पुन: लौट गए।


युधिष्ठिर उनसे मिलने के लिए पीछे-पीछे दौड़े। तब वन में एक पेड़ के नीचे उन्हें विदुरजी खड़े हुए दिखाई दिए। उसी समय विदुरजी के शरीर से प्राण निकले और युधिष्ठिर में समा गए। जब युधिष्ठिर ने देखा कि विदुरजी के शरीर में प्राण नहीं है तो उन्होंने उनका दाह संस्कार करने का निर्णय लिया। तभी आकाशवाणी हुई कि विदुरजी संन्यास धर्म का पालन करते थे।


 इसलिए उनका दाह संस्कार करना उचित नहीं है। यह बात युधिष्ठिर ने आकर महाराज धृतराष्ट्र को बताई। युधिष्ठिर के मुख से यह बात सुनकर सभी को आश्चर्य हुआ।


युधिष्ठिर आदि ने वह रात वन में ही बिताई। अगले दिन धृतराष्ट्र के आश्रम में महर्षि वेदव्यास आए। जब उन्हें पता चला कि विदुरजी ने शरीर त्याग दिया तब उन्होंने बताया कि विदुर धर्मराज (यमराज) के अवतार थे और युधिष्ठिर भी धर्मराज का ही अंश हैं। इसलिए विदुरजी के प्राण युधिष्ठिर के शरीर में समा गए।


 महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र, गांधारी और कुंती से कहा कि आज मैं तुम्हें अपनी तपस्या का प्रभाव दिखाऊंगा। तुम्हारी जो इच्छा हो वह मांग लो।


तब धृतराष्ट्र व गांधारी ने युद्ध में मृत अपने पुत्रों तथा कुंती ने कर्ण को देखने की इच्छा प्रकट की। द्रौपदी आदि ने कहा कि वह भी अपने परिजनों को देखना चाहते हैं। महर्षि वेदव्यास ने कहा कि ऐसा ही होगा। युद्ध में मारे गए जितने भी वीर हैं, उन्हें आज रात तुम सभी देख पाओगे। 


ऐसा कहकर महर्षि वेदव्यास ने सभी को गंगा तट पर चलने के लिए कहा। महर्षि वेदव्यास के कहने पर सभी गंगा तट पर एकत्रित हो गए और रात होने का इंतजार करने लगे।


रात होने पर महर्षि वेदव्यास ने गंगा नदी में प्रवेश किया और पांडव व कौरव पक्ष के सभी मृत योद्धाओं का आवाहन किया। थोड़ी ही देर में भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, दुर्योधन, दु:शासन, अभिमन्यु, धृतराष्ट्र के सभी पुत्र, घटोत्कच, द्रौपदी के पांचों पुत्र, राजा द्रुपद, धृष्टद्युम्न, शकुनि, शिखंडी आदि वीर जल से बाहर निकल आए। उन सभी के मन में किसी भी प्रकार का अंहकार व क्रोध नहीं था। महर्षि वेदव्यास ने धृतराष्ट्र व गांधारी को दिव्य नेत्र प्रदान किए। अपने मृत परिजनों को देख सभी के मन में हर्ष छा गया।


सारी रात अपने मृत परिजनों के साथ बिता कर सभी के मन में संतोष हुआ। अपने मृत पुत्रों, भाइयों, पतियों व अन्य संबंधियों से मिलकर सभी का संताप दूर हो गया। तब महर्षि वेदव्यास ने वहां उपस्थित विधवा स्त्रियों से कहा कि जो भी अपने पति के साथ जाना चाहती हैं, वे सभी गंगा नदी में डुबकी लगाएं।


 महर्षि वेदव्यास के कहने पर अपने पति से प्रेम करने वाली स्त्रियां गंगा में डुबकी लगाने लगी और शरीर छोड़कर पतिलोक में चली गईं। इस प्रकार वह अद्भुत रात समाप्त हुई।


इस प्रकार अपने मृत परिजनों से मिलकर धृतराष्ट्र, गांधारी, कुंती व पांडव बहुत प्रसन्न हुए। लगभग 1 महीना वन में रहने के बाद युधिष्ठिर आदि पुन: हस्तिनापुर लौट आए। इस घटना के करीब 2 वर्ष बाद एक दिन देवर्षि नारद युधिष्ठिर के पास आए। 


युधिष्ठिर ने उनका स्वागत किया। जब देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि वे गंगा नदी के आस-पास के तीर्थों के दर्शन करते हुए आए हैं तो युधिष्ठिर ने उनसे धृतराष्ट्र, गांधारी व माता कुंती के बारे में पूछा। तब देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि तुम्हारे वन से लौटने के बाद धृतराष्ट्र आदि हरिद्वार चले गए। वहां भी उन्होंने घोर तपस्या की।


एक दिन जब वे गंगा स्नान कर आश्रम आ रहे थे, तभी वन में भयंकर आग लग गई। दुर्बलता के कारण धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती भागने में असमर्थ थे। इसलिए उन्होंने उसी अग्नि में प्राण त्यागने का विचार किया और वहीं एकाग्रचित्त होकर बैठ गए। इस प्रकार धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती ने अपने प्राणों का त्याग कर दिया। 


संजय ने ये बात तपस्वियों को बताई और वे स्वयं हिमालय पर तपस्या करने चले गए। धृतराष्ट्र, गांधारी व कुंती की मृत्यु का समाचार जब महल में फैला तो हाहाकार मच गया। तब देवर्षि नारद ने उन्हें धैर्य बंधाया। युधिष्ठिर ने विधिपूर्वक सभी का श्राद्ध कर्म करवाया और दान-दक्षिणा देकर उनकी आत्मा की शांति के लिए संस्कार किए।...#जयश्रीकृष्णा..💐..

रविवार, 6 जून 2021

ऑपरेशन ब्लूस्टार की 37 वीं बरसी पर / रेहान फ़ज़ल

 कैसे थे जरनैल सिंह भिंडरावाले की ज़िदगी के आख़िरी पल / रेहान फ़ज़ल 


अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले भिंडरावाले ने तीन पत्रकारों से बात की थी. एक थे बीबीसी के मार्क टली. दूसरे टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सुभाष किरपेकर और तीसरे मशहूर फ़ोटोग्राफ़र रघु राय. सीआरपीएफ़ ने ऑप्रेशन ब्लूस्टार शुरू होने से चार दिन पहले यानि 1 जून को स्वर्ण मंदिर पर फ़ायरिंग शुरू कर दी थी. 2 जून को मार्क टली की भिंडरावाले से आखिरी मुलाकात हुई थी. वो अकाल तख़्त में बैठे हुए थे. मार्क टली और सतीश जैकब अपनी किताब ‘अम़ृतसर मिसेज़ गाँधीज़ लास्ट बैटिल’ में लिखते हैं, ‘जब मैंने भिडरावाले से फ़ायरिंग के बारे में पूछा तो उन्होंने जवाब दिया. फ़ायरिंग बताती है कि सरकार स्वर्ण मंदिर का अपमान करने पर तुली हुई है और सिखों और उनके रहने के तरीके को बर्दाश्त नहीं कर सकती है. अगर सरकार ने मंदिर में घुसने की कोशिश की तो उसका  माकूल जवाब दिया जाएगा. लेकिन उस दिन भिंडरावाले सहज नहीं दिख रहे थे. ज़ाहिर है वो तनाव में थे. आमतौर से वो अपनेआप को फ़िल्म किया जाना पसंद करते थे लेकिन उस दिन उन्होंने उख़ड़ कर कहा था, आप लोग जल्दी कीजिए. मुझे और भी ज़रूरी काम करने हैं.’

भिंडरावाले को विश्वास था कि सेना अंदर नहीं आएगी

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सुभाष किरपेकर अकेले पत्रकार थे जो सेना द्वारा स्वर्ण मंदिर को घेर लिए जाने के बाद जरनैल सिंह भिंडरावाले से मिले थे. तब भी जरनैल सिंह का मानना था कि सेना मंदिर के अंदर नहीं घुसेगी. किरपेकर ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद छपी किताब ‘द पंजाब स्टोरी’ में लिखते हैं, ‘मैंने  भिंडरावाले से पूछा क्या सेना के सामने आपके लड़ाके कम नहीं पड़ जाएंगे ? उनके पास बेहतर हथियार भी हैं. भिंडरावाले ने तुरंत जवाब दिया था, ‘भेड़ें हमेशा शेरों से ज़्यादा संख्या में होती हैं. लेकिन एक शेर हज़ार भेड़ो का सामना कर सकता है. जब शेर सोता है तो चिड़ियाँ चहचहाती हैं. लेकिन जब वो उठता है तो चिडियाँ उड़ जाती हैं.’ जब मैंने उनसे पूछा कि आपको मौत से डर नहीं लगता तो उनका जवाब था ‘कोई सिख अगर मौत से डरे तो वो सच्चा सिख नहीं है.’  भिंडरावाले के बगल में स्वर्ण मंदिर की सुरक्षा की योजना बनाने वाले मेजर जनरल शहबेग सिंह भी खड़े थे. जब मैंने उनसे पूछा कि आपको क्या उम्मीद है, एक्शन कब शूरू होगा ? तो उन्होंने जवाब दिया शायद ‘आज रात ही.’’


मशहूर फ़ोटेग्राफ़र रघु राय ने मुझे बताया था कि वो भिडरावाले से उनकी मौत से एक दिन पहले मिले थे. ‘उन्होंने मुझसे पूछा तू यहाँ क्यों आया है ? मैंने कहा पाजी मैं आपसे मिलने आया हूँ. मैं तो आता ही रहता हूँ. उन्होंने फिर ‘पूछा  अब क्यों आया है तू ?’  मैंने जवाब दिया ‘देखने के लिए कि आप कैसे हैं.’ मैं देख सकता था कि उनकी आँखे लाल सुर्ख़ थीं.  मैं उनमें गुस्सा और डर दोनों पढ़ पा रहा था.’


6 जून को दोपहर चार बजे से लाउडस्पीकर से लगातार घोषणाएं की जा रही थीं कि जो चरमपंथी अभी भी कमरों या तयख़ानों में हैं, बाहर आकर आत्मसमर्पण कर सकते हैं.  लेकिन तब तक  भिडरावाले का कोई पता नहीं था. ऑप्रेशन ब्लूस्टार के कमाँडर लेफ़्टिनेंट जनरल बुलबुल बरार अपनी किताब  ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार द ट्रू स्टोरी’ में लिखते हैं, ‘जब 26 मद्रास के जवान अकालतख़्त में घुसे तो उन्होंने दो चरमपंथियों को भागने की कोशिश करते पाया. उन्होंने उनपर गोली चलाई. उनमें से एक व्यक्ति तो मारा गया लेकिन दूसरे शख़्स को उन्होंने पकड़ लिया. उससे जब सवाल किए गए तो उसने सबसे पहले बताया कि भिंडरावाले अब इस दुनिया में नहीं हैं. फिर वो हमारे सैनिकों को उस जगह ले गया जहाँ भिंडरावाले और उनके 40 अनुयायियों की लाशें पड़ी हुई थीं. थोड़ी देर बाद हमें तयख़ाने में जनरल शहबेग सिंह की भी लाश मिली. उनके हाथ में अभी भी उनकी कारबाइन थी और उनके शरीर के बगल में उनका वॉकीटॉकी पड़ा हुआ था.’ बाद में जब मैंने जनरल बरार से बात की तो उन्होंने मुझे बताया, ‘अचानक तीस चालीस लोगों बाहर निकलने के लिए ने दौड़ लगाई. तभी मुझे लग गया कि भिडरावाले नहीं रहे, क्योंकि तभी अंदर से फ़ायर आना भी बंद हो गया. तब हमने अपने जवानों से कहा कि अंदर जा कर तलाशी लो. तब जा कर हमें उनकी मृत्यु का पता लगा. उसके बाद उनके शव को  उत्तरी विंग के बरामदे में ला कर रखा गया जहाँ पुलिस, इंटेलिजेंस ब्यूरो और हमारी हिरासत में आए चरमपंथियों ने उनकी शिनाख़्त की.’


ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद प्रकाशित हुई किताब ‘द पंजाब स्टोरी’ में शेखर गुप्ता लिखते हैं, ‘अफ़सरों ने मुझे बताया कि जब वो लोग अकाल तख़्त के अंदर घुसे तो पूरे इलाके में बारूद की गंध भरी हुई थी और दो इंच तक फ़र्श इस्तेमाल हो चुके कारतूसों से अटा पड़ा था. कुछ अफ़सर तो इस बात को लेकर अंचंभे में थे कि चरमपंथी इतनी ज़्यादा फ़ायरिंग कैसे कर पाए. ऑटोमेटिक फ़ायरिंग आप लगातार नहीं कर सकते, क्योंकि आपके हथियार में समस्या उठ खड़ी होती है और अगर आप बीच में अंतराल न रखे तो कभी कभी तो उसकी नाल भी गर्म और कभी कभी पिघल भी जाती है. अगर भारतीय सेना के जवान इस तरह की भीषण फ़ायरिंग करते तो उन्हें कारतूस बरबाद करने के लिए अपने अफ़सरों की डाँट खानी पड़ सकती थी. भारतीय सेना के अफ़सरों ने मुझे बताया कि कई चरमपंथियों के कंधों पर नीले निशान थे जो बताता था कि उनमें तर्कसंगत होने की कमी भले ही हो लेकिन उनके जोश में कोई कमी नहीं निकाली जा सकती थी.’


भिडरावाले के आखिरी क्षणों का वर्णन दो जगह मिलता है. अकाल तख़्त के तत्कालीन जत्थेदार किरपाल सिंह ने अपनी किताब ‘आई विटनेस अकाउंट  ऑफ़ ऑपरेशन ब्लूस्टार’ में  अकाल तख़्त के प्रमुख ग्रंथी ज्ञानी प्रीतम सिंह को कहते हुए बताया हैं, ‘मैं तीन सेवादारों के साथ अकाल तख़्त के उत्तरी किनारे  में बैठा हुआ था. करीब 8 बजे फ़ायरिंग थोड़ी कम हुई तो मैंने संत जरनैल सिंह भिडरावाले को अपने कमरे के पास शौचालय की तरफ़ से आते देखा. उन्होंने नल में अपने हाथ धोए और वापस अकाल तख़्त की तरफ़ लौट गए. करीब साढ़े आठ बजे भाई अमरीक सिंह ने अपने हाथ धोए और हम सब को सलाह दी कि हम सब लोग निकल जाएं. जब हमने उनसे उनकी योजना के बारे में पूछा. उन्होंने मुझे बताया कि संत तयख़ाने में हैं. पहले उन्होंने 7 बजे शहीद होना तय किया था लेकिन फिर उन्होंने उसे साढ़े नौ बजे तक स्थगित कर दिया था. फिर मैंने संत के  लोगों से लोहे के दरवाज़े की चाबी ली और फिर मैं अपने 12 साथियों के साथ बोहार वाली गली में निकल आया और दरबार साहब के एक दूसरे सेवादार भाई बलबीर सिंह के घर में शरण ली.’

एक और किताब ‘द गैलेंट डिफ़ेडर’ में ए आर दरशी अकाल तख़्त के सेवादार हरि सिंह को कहते बताते हैं, ‘मैं 30 लोगों के साथ कोठा साहब में छिपा हुआ था.  6 जून को करीब साढ़े सात बजे  भाई अमरीक सिंह वहाँ आए और हमसे कहा कि हम कोठा साहब छोड़ दें क्योंकि अब सेना द्वारा लाए गए टैंकों का मुकाबला नहीं किया जा सकता. कुछ मिनटों बाद संत भिडरावाले अपने 40 समर्थकों के साथ कमरे में दाखिल हुए. उन्होंने गुरुग्रंथ साहब के सामने बैठ कर प्रार्थना की और अपने समर्थकों को संबोधित करते हुए कहा जो लोग शहादत लेना चाहते हैं, मेरे साथ रुक सकते हैं. बाकी लोग अकालतख़्त छोड़ दें.’


जब भिंडरावाले मलबे पर पैर रखते हुए अकाल तख़्त के सामने की तरफ़ गए तो उनके पीछे उनके 30 अनुयायी भी थे. जैसे ही वो आँगन में निकले उनका स्वागत गोलियों से किया गया. मार्क टली और सतीश जैकब अपनी किताब ‘अमृतसर मिसेज़ गाँधीज़ लास्ट बैटिल’ में लिखते हैं, ‘बाहर निकलते ही अमरीक सिंह को गोली लगी लेकिन कुछ लोग आगे दौड़ते ही चले गए. फिर फ़ायर का एक और बर्स्ट आया जिससे भिंडरावाले के 12 या 13 साथी धराशाई हो गए. मुख्य ग्रंथी प्रीतम सिंह भी उस कमरे में छिपे हुए थे. अचानक कुछ लोगों ने अंदर आ कर कहा कि  अमरीक सिंह शहीद हो गए हैं. जब उनसे संत के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्होंने उन्हें मरते हुए नहीं देखा है. मार्क टली और सतीश जैकब लिखते हैं,  ‘राष्ट्पति ज्ञानी ज़ैल सिंह के सलाहकार रहे त्रिलोचन सिंह को अकाल तख़्त के एक ग्रंथी ने बताया था कि जब भिंडरावाले बाहर आए थे तो उनकी जाँघ में गोली लगी थी. फिर उनको दोबारा भवन के अंदर ले जाया गया. लेकिन किसी ने भी भिंडरावाले को अपनी आँखों के सामने मरते हुए नहीं देखा.’


एक और ग्रंथी ज्ञानी पूरन सिंह को सैनिकों ने बताया था कि  उन्हें भिडरावाले और अमरीक  सिंह के शव सात तारीख की सुबह अकाल तख़्त के आँगन में मिले थे. स्वर्ण मंदिर के बरामदे में इन तीनों के शव की तस्वीरे हैं. लेकिन एक तस्वीर में ये साफ़ दिखाई देता है कि शहबेग  सिंह  की बाँह में रस्सी बँधी हुई है जिससे पता चलता है कि उनके शव को अकाल तख़्त से खींच कर बाहर लाया गया था. ये भी हो सकता है कि  वो सैनिक सिर्फ़ ये बताना चाह रहे हों कि उन्होंने शवों को अकाल तख़्त के सामने देखा था और उनको ये पता ही न हो कि शव पहले कहाँ पाए गए थे.


 भिंडरावाले की मौत 6 जून को ही हो गई थी. मार्क टली और सतीश जैकब अपनी किताब ‘अमृतसर मिसेज़ गाँधीज़ लास्ट बैटिल’ में लिखते हैं, ‘जब एक अफ़सर ने बरार को सूचना दी कि भिंडरावाले का किला ढ़ह गया है तो उन्होंने एक गार्ड की ड्यूटी वहाँ लगा दी. उन्होंने प्राँगड़ की तलाशी लेने के लिए सुबह होने का इंतेज़ार किया. 7 जून की सुबह तलाशी के दौरान भिंडरावाले, शहबेग सिंग और अमरीक सिंह के शव तयखाने में पाए गए.  ब्रिगेडियर ओंकार एस गोराया भी अपनी किताब  ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार एंड आफ़्टर एन आईविटनेस अकाउंट’ में लिखा हैं,  ‘भिंडरावाले के शव की सबसे पहले शिनाख़्त डीएसपी अपर सिंह बाजवा की. मैं भी बर्फ़ की सिल्ली पर लेटे हुए जरनैल सिंह भंडरावाले के शव को पहचान सकता था, हाँलाकि पहले मैंने उन्हें कभी जीवित नहीं देखा था. उनका जूड़ा खुला हुआ था और उनके एक पैर की हड्डी टूटी हुई थी. उनके जिस्म पर गोली के कई निशान थे.’


भिडरावाले के शव का अंतिम संस्कार 7 जून की शाम को साढ़े सात बजे किया गया. मार्क टली लिखते हैं, ‘उस समय मंदिर के आसपास करीब दस हज़ार लोग जमा हो गए थे लेकिन सेना ने उनको आगे नहीं बढ़ने दिया. भिंडरावाले, अमरीक सिंह और दमदमी टकसाल के उप प्रमुख थारा सिंह के शव को  मंदिर के पास चिता पर रखा गया. चार पुलिस अधिकारियों ने भिंडरावाले के शव को लॉरी से उठाया और सम्मानपूर्वक चिता तक लाए. एक अधिकारी ने मुझे बताया कि वहाँ मौजूद बहुत से पुलिसकर्मियों की आँखों में आँसू थे.’


जनरल शहबेग सिंह का शव भी अकाल तख्त के तहख़ाने में पाया गया था.  संभव है कि वो 5 या 6 जून की रात को ही घायल हो गए हों. जब शहबेग सिंह के बेटे प्रबपाल सिंह  ने पंजाब के राज्यपाल को फ़ोन कर  अपने पिता के अतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति माँगी तो राज्यपाल ने कहा हज़ारों और लोग भी अंतिम संस्कार में शामिल होने का अनुरोध कर रहे हैं. अगर उन्होंने शहबेग सिंह के बेटे को ये अनुमति दी तो उन्हें अन्य लोगों को भी अनुमति देनी पड़ेगी. जब प्रबपाल सिंह ने कहा कि क्या उन्हें उनकी अस्थियाँ मिल सकती हैं तो राज्यपाल का जवाब था, उन्हें भारत की पवित्र नदियों में प्रवाहित कर दिया जाएगा.  शहबेग सिंह के अंतिम संस्कार का कोई आधिकारिक रिकार्ड नहीं मिलता.

भिंडरावाले का अंतिम संस्कार हो जाने के बावजूद कई दिनों तक ये अफवाह फैली रही कि वो जीवित हैं. जनरल बरार ने मुझे बताया, ‘अगले ही दिन कहानियाँ शुरू हो गई कि भिंडरावाले उस दिन सुरक्षित निकल गए थे और पाकिस्तान पहुंच गए थे. पाकिस्तान का टेलिविजन अनाउंस कर रहा था कि भिंडरावाले हमारे पास हैं और 30 जून को हम उन्हें टेलिविजन पर दिखाएंगे. मेरे पास सूचना और प्रसारण मंत्री मंत्री एच के एल भगत और विदेश सचिव एमके रस्गोत्रा के फ़ोन आये कि आप तो कह रहे हैं कि भिंडरावाले की मौत हो गई है लेकिन पाकिस्तान कह रहा है कि वो उनके यहाँ हैं. मैंने उन्हें बताया उनके शव की पहचान हो गई है. उनका शव उनके परिवार को दे दिया गया है और उनके समर्थकों ने आ कर उनके पैर छुए हैं.’ पंजाब के गाँवों में रहने वाले लोगों ने 30 जून का बहुत बेसब्री से इंतेज़ार किया.  उन्हें उम्मीद थी कि वो अपने हीरो को टीवी पर साक्षात देख पाएंगे लेकिन उनकी ये मुराद पूरी नहीं हुई.  जनरल बरार अपनी किताब ‘ऑपरेशन ब्लूस्टार द ट्रू स्टोरी’ में स्वीकार करते हैं, ‘मैंने भी कौतुहलवश उस रात अपना टेलिविजन सेट खोला क्योंकि इस तरह की अफवाहें थीं भिंडरावाले की शक्ल से मिलते जुलते किसी शख़्स को प्लास्टिक सर्जरी कर पाकिस्तानी टीवी पर दिखाया जाएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.’

बुधवार, 19 मई 2021

अपनी निरख परख करते रहें / कृष्ण मेहता

 "वही उन्नति करता है जो स्वयं अपने को उपदेश देता है।"/ कृष्ण  मेहता 

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हम दो भागों में बंटे हैं एक वह जो सुखीदुखी होता है,दूसरा वह जो सुखद दुखद है।इसमें हमारी भूमिका सुखीदुखी की है।हम यह तो भूल ही जाते हैं कि जो सुखद दुखद है वह हमारा ही हिस्सा है।इसे हम पहचानें और ठीक करें यह जरूरत हमेशा बनी रहती है।यह पहचान नहीं है तो हम बाहरी जगत को सुखद दुखद मानेंगे और उसे ठीक करने में लगेंगे।सारा संघर्ष इसी बात का है।वास्तविकता भिन्न है-

"व्यक्ति को हानि,पीडा और चिंताएं उसकी किसी आंतरिक दुर्बलता के कारण होती है।उस दुर्बलता को दूर करके कामयाबी मिल सकती है।"

हम ही हैं हानिकारक, पीडादायक,चिंताजनक।अपने इस रुप को उपदेश देने से काम नहीं चलता।यह चित्त है और हमही चित्त हैं।इसे दुश्मन की तरह देखना भी बाधक है।हमें जानना होगा किस तरह हम कष्टप्रद हैं बिना स्वयं से दूर भागे। आत्मपलायन और आत्मबल विपरीत बातें हैं यद्यपि सीधे आत्मबल आता नहीं।आत्मपलायन को समाप्त करना होता है।इसके लिये हम कष्टप्रद हैं तो अपने इस रुप के साथ रहना और उसे सहना पडता है।सारी समस्या स्वयं को न सह पाने के कारण ही हैं।लगता है बाहर हैं व्यक्ति, घटना,परिस्थिति उन्हें हम सह नहीं पाते।

एक बात अच्छी तरह से समझ लेनी चाहिये कि बाहर असहनीय कुछ भी नहीं है,हम ही हैं असहनीय और जीना तो अपने आपमें है।जिसे अपने आपमें जीना आगया उसे सब आगया।

यह बडा किमती सूत्र है।

यह है स्वयं के साथ घुलमिलकर रहना ताकि उसके साथ एक हुआ जा सके,वही हुआ जा सके।हम "स्वयं" हो जाएं(सेल्फ)।

"Be yourself,and nothing more."

स्व में रहना,स्व से घुलमिलकर रहना एक ही बात है।अभी हम "पर" से घुलेमिले हैं रागद्वेष पूर्वक।

प्रेम से भी सबके साथ घुलमिलकर रह सकते हैं।सेवा भी यही है।

आज समाचार सुने बिहार सरकार सामूदायिक रसोईघर खोल रही है सभी जिलों में।अच्छा लगा।सवाल यह नहीं कि सरकार किस पार्टी की है।यह बडी बचकानी बात है।अभी यह राजनीति करने का समय नहीं।

अभी जरूरत है इस बात की कि सरकार और प्रजा मिलकर काम करे।होता यह है कि कुछ काम सरकार के भरोसे छोड दिये जाते हैं,कुछ प्रजा के भरोसे।प्रजा हर चीज सरकार पर छोड देती है।ऐसे में सरकार अपना ध्यान महामारी पर लगाती है,भोजन व्यवस्था प्रजा पर छोड देती है लेकिन जब सरकार इसकी भी जिम्मेदारी लेती है तो जनता में नयी चेतना का संचार होता है।जनता को तो सुखदुख में अनुकूल सरकार ही चाहिये।

अभी यह स्थिति है कि भोजनसमस्या कहीं भी आ सकती है।इस समस्या का हल सरकार और प्रजा दोनों को साथ मिलकर निकालना चाहिये।एक काम सरकार करे,दूसरा काम लोग करें या दोनों काम दोनों मिलकर करें।

कुछ लोग और संस्थाएं हैं जो अपने स्तर पर यह पुनीत कार्य कर रहे हैं फिर भी उनके और सरकार के मिलकर कार्य करने से बहुत फर्क पडता है।बहुत बल मिलता है एक दूसरे से एक दूसरे को।

सरकार यदि महामारी में ही लगी रहे,भोजनव्यवस्था से ध्यान हटा ले तो जनता अकेली पड जाती है।

अभी किसीको भी जरासा भी अकेला नहीं पडना चाहिये न सरकार को,न जनता को।दोनों एक दूसरे की मांगों को देखें,समझें और एक दूसरे को पूरा सहयोग करें इसकी अनिवार्यता है।

यह आध्यात्मिक आवश्यकता है कि आदमी स्वयं अपने आपके साथ घुलमिलकर रहे।

इसमें दोनों बातें हैं।आदमी अपने सुखरुप के साथ मिलकर रह सकता है,दुखरुप के साथ नहीं।अपने कष्टप्रद रुप के साथ रहने के लिये बडा धैर्य, बडी गहरी समझ चाहिये वर्ना खुद के साथ मिलकर रहना आसान नहीं।

दूसरी बात बाहरी व्यक्ति, घटना,परिस्थिति को मूल कारण न समझे अपनी समस्या का इसीलिए कहा-खोजें तो अपनी हर समस्या के मूल में अपनी ही कोई आंतरिक दुर्बलता मिल जायेगी।

इसी संसार में ऐसी महान आत्माएं हुई हैं जिन्होंने अपनी कोई फिक्र नहीं करके दुखी,पीडित लोगों की मदद की है।परहित सरिस धर्म नहीं भाई।कहा भी है-जो दृढ राखे धर्म को तेहीं राखे करतार।

ऐसा व्यक्ति आश्चर्यजनक रुप से निर्भय,निश्चिंत हो जाता है।

जिसे चिंता सताती हो उसके लिये तो सेवाधर्म महान औषधि की तरह है चिंतारोग से मुक्ति पाने की।

यह करतार की तरह है जो उसे संभाल लेती है।मूल बात तो यही है क्योंकि सब उसीका है।इस की अवज्ञा करके हम केवल अपने ही स्वार्थ को महत्व दें तो कर्तापन के अभिमान के साथ चिंताभय की पीडा आ ही जाती है।जो सबके साथ मिलकर रहता है,सामूहिक समाधान खोजता है वह सकारात्मक होता है।

स्वयं के साथ मिलकर रहना आध्यात्मिक आवश्यकता है।इसे स्वार्थी नहीं कहा जा सकता।सच बात यह है कि अपने हृदय में अपने आपके साथ घुलमिलकर रहने से अपने सभी मानसिक विभाजन,अपने पराये की मान्यताएं लुप्त हो जाती हैं।ऐसा व्यक्ति जो व्यक्तिगत रुप से अखंड है सामूहिक दृष्टि से सबके साथ रह सकता है,सबको सहयोग कर सकता है।

भीतर भेद हो बाहर समूह को लेकर विचार हो तो उसकी कृति परोपदेश तक सीमित रह जाती है।इस वजह से आत्मोपदेश की महत्ता बताई।पहले स्वयं समझे ,स्वयं करता हो और ऐसा हर एक आदमी हो अर्थात् हर आदमी स्वयं अपनी जिम्मेदारी का अहसास करे फिर सब ठीक है।फिर जो भी समस्या आये सामूहिक रुप से मिलकर उसका मुकाबला किया जा सकता है।आदमी अकेला नहीं पडता।

अभी भी सरकार और जनता का भेद बना हुआ है।जनता,सरकार की ओर देख रही है।कर्फ्यू, लोकडाउन की बाध्यता झेल रही है।यह भेद समाप्त हो सकता है अगर दोनों मिलकर कार्य करें।

सरकार भी अलग कहां है?प्रजातंत्र में सरकार,प्रजा का ही तो हिस्सा है प्रजा की देखभाल के लिये,उसकी सेवा,सुरक्षा के लिये।

शुक्रवार, 9 अप्रैल 2021

हिन्दी उपन्यास का विकास

हिंदी उपन्यास का आरम्भ श्रीनिवासदास के "परीक्षागुरु' (१८४३ ई.) से माना जाता है। हिंदी के आरम्भिक उपन्यास अधिकतर ऐयारी और तिलस्मी किस्म के थे। अनूदित उपन्यासों में पहला सामाजिक उपन्यास भारतेंदु हरिश्चंद्र का "पूर्णप्रकाश' और चंद्रप्रभा नामक मराठी उपन्यास का अनुवाद था। आरम्भ में हिंदी में कई उपन्यास बँगला, मराठी आदि से अनुवादित किए गए।

हिंदी में सामाजिक उपन्यासों का आधुनिक अर्थ में सूत्रपात प्रेमचंद (१८८०-१९३६) से हुआ। प्रेमचंद पहले उर्दू में लिखते थे, बाद में हिंदी की ओर मुड़े। आपके "सेवासदन', "रंगभूमि', "कायाकल्प', "गबन', "निर्मला', "गोदान', आदि प्रसिद्ध उपन्यास हैं, जिनमें ग्रामीण वातावरण का उत्तम चित्रण है। चरित्रचित्रण में प्रेमचंद गांधी जी के "हृदयपरिवर्तन' के सिद्धांत को मानते थे। बाद में उनकी रुझान समाजवाद की ओर भी हुई, ऐसा जान पड़ता है। कुल मिलाकर उनके उपन्यास हिंदी में आधुनिक सामाजिक सुधारवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जयशंकर प्रसाद के "कंकाल' और "तितली' उपन्यासों में भिन्न प्रकार के समाजों का चित्रण है, परंतु शैली अधिक काव्यात्मक है। प्रेमचंद की ही शैली में, उनके अनुकरण से विश्वंभरनाथ शर्मा कौशिक, सुदर्शन, प्रतापनारायण श्रीवास्तव, भगवतीप्रसाद वाजपेयी आदि अनेक लेखकों ने सामाजिक उपन्यास लिखे, जिनमें एक प्रकार का आदर्शोन्मुख यथार्थवाद अधिक था। परंतु पांडेय बेचन शर्मा "उग्र', ऋषभचरण जैन, चतुरसेन शास्त्री आदि ने फरांसीसी ढंग का यथार्थवाद और प्रकृतवाद (नैचुरॉलिज़्म) अपनाया और समाज की बुराइयों का दंभस्फोट किया। इस शेली के उपन्यासकारों में सबसे सफल रहे "चित्रलेखा' के लेखक भगवतीचरण वर्मा, जिनके "टेढ़े मेढ़े रास्ते' और "भूले बिसरे चित्र' बहुत प्रसिद्ध हैं। उपेन्द्रनाथ अश्क की "गिरती दीवारें' का भी इस समाज की बुराइयों के चित्रणवाली रचनाओं में महत्वपूर्ण स्थान है। अमृतलाल नागर की "बूँद और समुद्र' इसी यथार्थवादी शैली में आगे बढ़कर आंचलिकता मिलानेवाला एक श्रेष्ठ उपन्यास है। सियारामशरण गुप्त की नारी' की अपनी अलग विशेषता है।

मनोवैज्ञानिक उपन्यास जैनेंद्रकुमार से शुरू हुए। "परख', "सुनीता', "कल्याणी' आदि से भी अधिक आप के "त्यागपत्र' ने हिंदी में बड़ा महत्वपूर्ण योगदान दिया। जैनेंद्र जी दार्शनिक शब्दावली में अधिक उलझ गए। मनोविश्लेषण में स. ही. वात्स्यायन "अज्ञेय' ने अपने "शेखर : एक जीवनी', "नदी के द्वीप', "अपने अपने अजनबी' में उत्तरोत्तर गहराई और सूक्ष्मता उपन्यासकला में दिखाई। इस शैली में लिखनेवाली बहुत कम मिलते हैं। सामाजिक विकृतियों पर इलाचंद्र जोशी के "संन्यासी', "प्रेत और छाया', "जहाज का पंछी' आदि में अच्छा प्रकाश डाला गया है। इस शैली के उपन्यासकारों में धर्मवीर भारती का "सूरज का सातवाँ घोड़ा' और नरेश मेहता का "वह पथबंधु था' उत्तम उपलब्धियाँ हैं।

ऐतिहासिक उपन्यासों में हजारीप्रसाद द्विवेदी का "बाणभट्ट की आत्मकथा' एक बहुत मनोरंजक कथाप्रयोग है जिसमें प्राचीन काल के भारत को मूर्त किया गया है। वृंदावनलाल वर्मा के "महारानी लक्ष्मी बाई', "मृगनयनी' आदि में ऐतिहासिकता तो बहुत है, रोचकता भी है, परंतु काव्यमयता द्विवेदी जी जैसी नहीं है। राहुल सांकृत्यायन (१८९५-१९६३), रांगेय राघव (१९२२-१९६३) आदि ने भी कुछ संस्मरणीय ऐतिहासिक उपन्यास दिए हैं।

यथार्थवादी शैली सामाजिक यथार्थवाद की ओर मुड़ी और "दिव्या' और "झूठा सच' के लेखक भूतपूर्व क्रांतिकारी यशपाल और "बलचनमा' के लेखक नागार्जुन इस धारा के उत्तम प्रतिनिधि हैं। कहीं कहीं इनकी रचनाओं में प्रचार का आग्रह बढ़ गया है। हिंदी की नवीनतम विधा आंचलिक उपन्यासों की है, जो शुरु होती है फणीश्वरनाथ "रेणु' के "मैला आँचल' से और उसमें अब कई लेखक हाथ आजमा रहे हैं, जैसे राजेंद्र यादव, मोहन राकेश, शैलेश मटियानी, राजेंद्र अवस्थी, मनहर चौहान, शिवानी इत्यादि।