शनिवार, 18 सितंबर 2021

शनि पर्वत, मुरैना / कृष्ण मेहता

हनुमान जी ने लंका से फेंका तो यहां गिरे शनिदेव, मौजूद हैं गिरने के निशान


हनुमान जी ने लंका से फेंका तो यहां गिरे शनिदेव, मौजूद हैं गिरने के निशान – मध्य प्रदेश में ग्वालियर के नजदीकी एंती गांव में शनिदेव मंदिर का देश में विशेष महत्व है। देश के सबसे प्राचीन त्रेतायुगीन शनि मंदिर में प्रतिष्ठत शनिदेव की प्रतिमा भी विशेष है। 


माना जाता है कि ये प्रतिमा आसमान से टूट कर गिरे एक उल्कापिंड से निर्मित है। ज्योतिषी व खगोलविद मानते है कि शनि पर्वत पर निर्जन वन में स्थापित होने के कारण यह स्थान विशेष प्रभावशाली है। महाराष्ट्र के सिगनापुर शनि मंदिर में प्रतिष्ठित शनि शिला भी इसी शनि पर्वत से ले जाई गई है।


त्रेतायुग में आकर विराजे थे शनिदेव माना जाता है कि शनिश्चरा स्थित श्री शनि देव मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य ने करवाया था। सिंधिया शासकों द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया। रियातसकालीन दस्तावेजों के मुताबिक 1808 में ग्वालियर के तत्कालीन महाराज दौलतराव सिंधिया ने मंदिर की व्यवस्था के लिए जागीर लगवाई। 


तत्कालीन शासक जीवाजी राव सिंधिया ने 1945 में जागीर को जप्त कर यह देवस्थान औकाफ बोर्ड ऑफ़ ट्रस्टीज ग्वालियर के प्रबंधन में सौंप दिया तबसे इस देवस्थान का प्रबंधन औकाफ बोर्ड (मध्य प्रदेश सरकार के अंतर्गत) के प्रबंधन में है। वर्तमान में इसका प्रबंधन जिला प्रशासन मुरैना द्वारा किया जाता है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                  

                                                                                                                                                                 

महाबली हनुमान ने यहां भेजा था शनिदेव को


प्राचीन ग्रंथों में उल्लेख है कि कई दूसरे देवताओं के साथ रावण ने शनिदेव को भी कैद कर रखा था। जब हनुमान जी लंका जलाने की जुगत में थे तो शनि देव ने इशारा कर आग्रह किया कि उन्हें आजाद कर दें तो रावण का नाश करने में मददगार होंगे। 


बजरंगबली ने शनिदेव को रावण की कैद से छुड़ाया तो उस वक्त दुर्बल हो चुके शनिदेव ने उनसे दोबारा ताकत पाने के लिए सुरक्षित स्थान दिलाने का अनुरोध किया। हनुमान जी ने उन्हें लंका से प्रक्षेपित किया तो शनिदेव इस क्षेत्र में आकर प्रतिष्ठित हो गए। तब से यह क्षेत्र शनिक्षेत्र के नाम से विख्यात हो गया। 


देश भर से श्रद्धालु न्याय के देवता से इंसाफ की गुहार लगाने हर शनिश्चरी अमावस्या को यहां आते हैं। कहा जाता है कि लंका से प्रस्थान करते हुए शनिदेव की तिरछी नजरों के वार ने न सिर्फ सोने की लंका को हनुमान जी के द्वारा खाक में मिलवा दिया, साथ ही रावण का कुल के साथ विनाश करा कर शनि न्याय को प्रतिस्थापित किया।



शनिदेव के लंका से आकर गिरने से बना गड्ढा



आज भी मौजूद हैं उल्कापात के निशान जब हनुमान जी के प्रक्षेपित शनिदेव यहां आ कर गिरे तो उल्कापास सा हुआ। शिला के रूप में वहां शनिदेव के प्रतिष्ठत होने से एक बड़ा गड्ढा बन गया, जैसा कि उल्का गिरने से होता है। ये गड्ढा आज भी मौजूद है।


शनि मंदिर में उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़


शनिदेव के आगमन से क्षेत्र बन गया था लौह प्रधान शनि क्षेत्र के तौर पर मशहूर इस इलाके में उस वक्त लौह अयस्क प्रचुर मात्रा में पाया जाता था। इतिहास में प्रमाण मिले है कि ग्वालियर के आसपास लोहे का धातुकर्म बड़े पैमाने पर होता रहा था। आज भी यहां के भू-गर्भ में लौह-अयस्क की प्रधानता है।


भगवान शनिदेव के दस कल्याणकारी नामो का निरन्तर जाप करने से मनुष्य का कल्याण होता है .ज्सोतिष शास्त्रो के अनुसार शनि शुभ होने पर अपार सुख और समृद्धि देते है,


 शनि के पवित्र कल्याणकारी नाम :--

१- कोणस्थ

२- पिंगल

३- कृष्ण

४- बभ्रु

५- रौद्रान्तक

६- यम

७- सौरी

८- शनैश्चर

९- मन्द

१०- पिप्पलाश्रय.


ऊँ शं शनैश्चराय नमः

गुरुवार, 16 सितंबर 2021

सुश्री राधा जन्म कथा / साक्षी भल्ला

 राधा अष्टमी..


आज से पांच हजार दो सौ वर्ष पूर्व मथुरा जिले के गोकुल-महावन कस्बे के निकट "रावल गांव" में वृषभानु एवं कीर्ति देवी की पुत्री के रूप में "राधा रानी " ने जन्म लिया था। राधा रानी के जन्म के संबंध में यह

कहा जाता है कि राधा जी माता के पेट से पैदा नहीं हुई थी, उनकी माता ने अपने गंर्भ में "वायु" को धारण कर रखा था। उसने योग माया कि प्रेरणा से वायु को ही जन्म दिया। परन्तु वहाँ स्वेच्छा से श्री राधा प्रकट हो गई।


श्री राधा रानी जी कलिंदजाकूलवर्ती

निकुंज प्रदेश के एक सुन्दर मंदिर में

अवतीर्ण हुई। उस समय भाद्रपद का महीना, शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि, अनुराधा नक्षत्र, मध्यान्ह काल १२ बजे और सोमवार का दिन था। उस समय राधा जी के जन्म पर

नदियों का जल पवित्र हो गया। सम्पूर्ण दिशाए प्रसन्न निर्मल हो उठी। वृषभानु और कीर्ति देवी ने पुत्री के कल्याण की कामना से आनंददायिनी दो लाख उत्तम गौए ब्राह्मणों को दान में दी।


 ऐसा भी कहा जाता है कि एक दिन जब वृषभानु जी जब एक सरोवर के पास से गुजर रहे थे, तब उन्हें एक बालिका "कमल के फूल" पर तैरती हुई मिली, जिसे उन्होंने पुत्री के रूप में अपना लिया।


श्री राधा रानी जी आयु में श्री कृष्ण जी से ग्यारह माह बडी थीं। लेकिन श्री वृषभानु जी और कीर्ति देवी को ये बात जल्द ही पता चल गई कि श्री किशोरी जी ने अपने प्राकट्य से ही अपनी आँखे नहीं खोली है। इस बात से उन्हें बड़ा दुःख हुआ।


कुछ समय पश्चात जब नन्द महाराज की पत्नी यशोदा जी गोकुल से अपने लाडले के साथ वृषभानु जी के घर आती है तब वृषभानु जी और कीर्ति जी उनका स्वागत करती है। यशोदा जी कान्हा को गोद में लिए

राधा जी के पास आती है और जैसे

ही श्री कृष्ण और राधा आमने-सामने आते है तब राधा जी पहली बार अपनी आँखे खोलती हैं। अपने प्राण प्रिय श्री कृष्ण को देखने के लिए वे एक टक कृष्ण जी को देखती है। अपनी प्राण प्रिय को अपने सामने एक सुन्दर-सी बालिका के रूप में देखकर श्री कृष्ण जी स्वयं बहुत आनंदित होते है।

जिनके दर्शन बड़े बड़े देवताओ के लिए भी दुर्लभ है। तत्वज्ञ मनुष्य सैकड़ो जन्मो तक तप करने पर भी जिनकी झाँकी नहीं पाते, वे

ही श्री राधिका जी जब वृषभानु के यहाँ साकार रूप से प्रकट हुई और गोप ललनाएँ जब उनका पालन करने लगी, स्वर्ण जडित और सुन्दर रत्नों से रचित चंदनचर्चित पालने में ।


जय जय श्री राधे ❤️🙏

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

एकअनोखा मुकदमा

🙏🏼🙏🏼न्यायालय  में एक मुकद्दमा आया ,जिसने सभी को झकझोर दिया अदालतों में प्रॉपर्टी विवाद व अन्य पारिवारिक विवाद के केस आते ही रहते हैं। मगर ये मामला बहुत ही अलग किस्म का था।


 एक 60 साल के व्यक्ति ने अपने 75 साल के बूढ़े भाई पर मुकद्दमा किया था।


मुकदमा कुछ यूं था कि "मेरा 75 साल का बड़ा भाई ,अब बूढ़ा हो चला है ,इसलिए वह खुद अपना ख्याल भी ठीक से नहीं रख सकता मगर मेरे मना करने पर भी वह हमारी 95 साल की मां की देखभाल कर रहा है।


     मैं अभी ठीक हूं, सक्षम हू इसलिए अब मुझे मां की सेवा करने का मौका दिया जाय और मां को मुझे सौंप दिया जाय"।

        

न्यायाधीश महोदय का दिमाग घूम गया और मुक़दमा भी चर्चा में आ गया। न्यायाधीश महोदय ने दोनों भाइयों को समझाने की कोशिश की कि आप लोग 15-15 दिन रख लो।


    मगर कोई टस से मस नहीं हुआ,बड़े भाई का कहना था कि मैं अपने  स्वर्ग को खुद से दूर क्यों होने दूँ अगर मां कह दे कि उसको मेरे पास कोई परेशानी  है या मैं  उसकी देखभाल ठीक से नहीं करता, तो अवश्य छोटे भाई को दे दो।


      छोटा भाई कहता कि पिछले 35 साल से,जब से मै नौकरी मे बाहर हू  अकेले ये सेवा किये जा रहा है, आखिर मैं अपना  कर्तव्य कब पूरा करूँगा।जबकि आज मै स्थायी हूं,बेटा बहू सब है,तो मां भी चाहिए।


          परेशान  न्यायाधीश महोदय ने  सभी प्रयास कर लिये ,मगर कोई हल नहीं निकला।


       आखिर उन्होंने मां की राय जानने के लिए उसको बुलवाया और पूंछा कि वह किसके साथ रहना चाहती है।


      मां कुल 30-35 किलो की बेहद कमजोर सी औरत थी उसने दुखी दिल से कहा कि मेरे लिए दोनों संतान बराबर हैं। मैं किसी एक के  पक्ष में फैसला सुनाकर दूसरे का दिल नहीं दुखा सकती।


 आप न्यायाधीश हैं निर्णय करना आपका काम है जो  आपका निर्णय होगा मैं उसको ही मान लूंगी।


             आखिर न्यायाधीश महोदय ने भारी मन से निर्णय दिया कि न्यायालय छोटे भाई की भावनाओं से सहमत है कि बड़ा भाई वाकई बूढ़ा और कमजोर है। ऐसे में मां की सेवा की जिम्मेदारी छोटे भाई को दी जाती है।

  

 फैसला सुनकर बड़े भाई ने छोटे को गले लगाकर रोने लगा यह सब देख अदालत में मौजूद  न्यायाधीश समेत सभी के आंसू छलक पडे।


        कहने का  तात्पर्य यह है कि अगर भाई बहनों में वाद विवाद हो ,तो इस स्तर का हो।


   ये क्या बात है कि 'माँ तेरी है' की लड़ाई हो,और पता चले कि माता पिता ओल्ड एज होम में रह रहे हैं यह पाप है।

   धन दौलत गाडी बंगला सब होकर भी यदि मा बाप सुखी नही तो आप से बडा कोई जीरो (0) नही।

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ABC To XYZ

*अंग्रेजी वर्ण हमें सिखाते हैं...*

*A B C....*

*Avoid Boring Company*

*मायूस संगत से दूर रहो*


*D E F...*

*Don't Entertain Fools*

*मूर्खों पर समय व्यर्थ मत करो*


*G H I....*

*Go For High Ideas*

*ऊंचे विचार रखो*


*J K L M....*

*Just Keep a friend like Me*

*मेरे जैसा मित्र रखो*


*N O P...*

*Never Overlook the Poor n Suffering*

*गरीबों व पीडितों को कभी अनदेखा मत करो*


*Q R S.*.

*Quit Reacting to Silly tales*

*मूर्खों की बातों पर प्रतिक्रिया मत दो*


*T U V....*

*Tune Urself for ur Victory*

*खुद की जीत सुनिश्चित करो*


*W X Y Z...*.

*We Xpect You to Zoom ahead in life*

*हम आपसे जीवन मे आगे देखने की आशा करते हैं !!*


*यदि आपने चाँद को देखा, तो आपने ईश्वर की सुन्दरता देखी। यदि आपने सूर्य को देखा, तो आपने ईश्वर का बल देखा,और यदि आपने आइना देखा तो आपने ईश्वर की सबसे सुंदर रचना देखी। इसलिए आप सभी स्वयं पर विश्वास रखो !!*

जय श्री कृष्णा राधे राधे ||

आप सभी का दिन शुभ रहे। 🙏🏻🙏

बुधवार, 8 सितंबर 2021

सरकारी स्कूलों की छवि बदलने की पहल

 सरकारी नहीं, ‘असर-कारी’ होंगे सीएम राइज स्कूल/ मनोज कुमार


राज्य के आखिरी छोर पर बसे किसी गांव के बच्चे के लिए किसी महंगे प्रायवेट स्कूल में पढऩे की लालसा एक अधूरे सपने की तरह है. दिल्ली दूर है कि तर्ज पर वह अपनी शिक्षा उस खंडहरनुमा भवन में पूरा करने के लिए मजबूर था जिसे सरकारी स्कूल कह कर बुलाया जाता था. बच्चों के इन सपनों की बुनियाद पर प्रायवेट स्कूलों का मकडज़ाल बुना गया और सुनियोजित ढंग से सरकारी स्कूलों के खिलाफ माहौल बनाया गया. शिक्षा की गुणवत्ता को ताक पर रखकर भौतिक सुविधाओं के मोहपाश में बांध कर ऊंची बड़ी इमारतों को पब्लिक स्कूल कहा गया. सरकारें भी आती-जाती रही लेकिन सरकारी स्कूल उनकी प्राथमिकता में नहीं रहा. परिवर्तन के इस दौर में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने राज्य में ऐसे स्कूलों की कल्पना की जो प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से कमतर ना हों. मुख्यमंत्री चौहान की इस सोच में प्रायवेट पब्लिक स्कूलों से अलग अपने बच्चों के सपनों को जमीन पर उतारने के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना है. इसी सोच और भरोसे की बांहें थामे मध्यप्रदेश के सुदूर गांवों से लेकर जनपदीय क्षेत्र में ‘सीएम राइज स्कूल’ की कल्पना साकार होने जा रही है. अनादिकाल से गुरुकुल भारतीय शिक्षा का आधार रहा है लेकिन समय के साथ परिवर्तन भी प्रकृति का नियम है. इन दिनों शिक्षा की गुणवत्ता पर चिंता करते हुए गुरुकुल शिक्षा पद्धति का हवाला दिया जाता है लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में गुरुकुल नए संदर्भ और नयी दृष्टि के साथ आकार ले रहा है. सरकारी शब्द के साथ ही हमारी सोच बदल जाती है और हम निजी व्यवस्था पर भरोसा करते हैं. हमें लगता है कि सरकारी कभी असर-कारी नहीं होता है. इस धारणा को तोड़ते हुए मध्यप्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता के साथ नवाचार करने के लिए ‘सीएम राइज स्कूल’ सरकारी से ‘असरकारी’ होने की कल्पना के जल्द ही वास्तविकता की जमीन पर खड़ा होगा.

वर्तमान में राज्य के स्कूलों पर नजर डालें तो एक बात स्पष्ट होती है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने असंतोष को दूर करने के लिए स्कूलों की भीड़ लगा दी. किसी स्कूल में दो बच्चे तो किसी स्कूल में पांच और कहीं-कहीं तो महीनों से ताला डला है. कागज पर स्कूल चल रहे हैं लेकिन हकीकत में इन स्कूलों पर केवल बजट खर्च हो रहा है. ऐसे में एक बड़ी सोच के साथ शिवराजसिंह सरकार ने एक सर्वे करा कर यह तय किया कि फिलहाल एक लाख से ऊपर ऐसे स्कूलों को एकजाई कर ‘सीएम राइज स्कूल’ शुरू किया जाए. योजना के मुताबिक अभी 9200 ‘सीएम राइज स्कूल’ शुरू होंगे. 15 से 20 किलोमीटर की परिधि में संचालित होने वाले इन स्कूलों में शिक्षा का माध्यम हिन्दी और अंग्रेजी दोनों होगा. आवागमन की सुविधा के लिए सरकार बस और वैन की सुविधा भी दे रही है. बच्चों, खासतौर पर ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को अकल्पनीय सुविधायें इस स्कूल में होगी. मसलन स्वीमिंग पूल, बैंकिंग काउंटर, डिजिटल स्टूडियो, कैफेटेरिया, जिम, थिंकिंग एरिया होगी जो अभी तक प्रायवेट पब्लिक स्कूल में भी ठीक से नहीं है.  प्री-नर्सरी से हायर सेकंडरी की कक्षा वाले ‘सीएम राइज स्कूल’ आने वाले 2023 तक पूरे राज्य में शुरू हो चुके होंगे.


उल्लेखनीय है कि प्रदेश के बच्चे पढ़ाई के मामले में सीबीएसई और आईसीएसई बोर्ड के बच्चों से मुकाबला कर सकें, इसलिए सरकार प्रत्येक स्कूल पर 20 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करेगी. योजना के अनुरूप स्कूल चार स्तर (संकुल से नीचे, संकुल, ब्लॉक और जिला) पर तैयार होंगे। इन स्कूलों में बच्चों को ड्रेस कोड भी निजी स्कूलों जैसा रखने की योजना है.मध्यप्रदेश में अक्टूबर से अस्तित्व में आ रहे सीएम राइज स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को लिखित और मौखिक परीक्षा देनी होगी। इसमें पढ़ाने के प्रति उनकी रुचि, पढ़ाने का तरीका और विषय पर पकड़ देखी जाएगी। वर्तमान में सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों में से ही सीएम राइज स्कूलों के लिए शिक्षकों का चयन होगा, पर उन्हें लंबी चयन परीक्षा से गुजरना पड़ेगा. लिखित और मौखिक परीक्षा के अलावा जिस कक्षा के लिए उनका चयन होना है, उसमें पढ़ाकर भी दिखाना होगा ताकिसुनिश्चित किया जा सके कि योग्य शिक्षक का चयन हुआ है. उन्हें विधिवत नियुक्ति दी जाएगी. इन स्कूलों में पढ़ाने के लिए शिक्षकों को परीक्षा देनी होगी और उन्हें नियमित शिक्षकों की तुलना में ज्यादा वेतन दिया जाएगा. शिक्षकों को स्कूल परिसर में ही मकान भी मिलेगा, ताकि उनके अप-डाउन में उलझने से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो. सीएम राइज योजना के लिए चयनित स्कूलों में अक्टूबर से पढ़ाई का तरीका बदल जाएगा। जैसे ही ये स्कूल खुलेंगे, सरकारी स्कूलों की परंपरागत पढ़ाई से इतर नए तरीके से पढ़ाई कराई जाएगी.

स्कूल शिक्षा विभाग के मानक के अनुरूप निजी स्कूलों की तरह व्यवस्थित भवन और अन्य जरूरी सुविधाएं, हर विद्यार्थी के लिए परिवहन सुविधा, नर्सरी एवं केजी कक्षाएं, शिक्षकों एवं अन्य स्टाफ के सौ फीसद पद भरे जाएंगे, स्मार्ट क्लास एवं डिजिटल लर्निंग, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, व्यावसायिक शिक्षा के साथ नए भवनों में स्वीमिंग पूल, खेल सुविधाएं, संगीत कक्षाएं भी रहेंगी. सीएम राइस स्कूल योजना के प्रथम चरण में 259 स्कूल खोले जाएंगे. इनमें से 253 स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा और 96 स्कूल आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा खोले जाएंगे. सी.एम. राइज स्कूल की संरचना के अनुरूप जिला स्तर पर प्रत्येक जिले में एक अर्थात कुल 52 सी.एम. राइज स्कूल होंगे, जिसमें प्रति स्कूल 2000 से 3000 विद्यार्थी होंगे. विकास खंड स्तरीय 261 स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 1500 से 2000 विद्यार्थी होंगे. इसी प्रकार संकुल स्तरीय 3200 स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 100 से 1500 विद्यार्थी होंगे. ग्रामों के समूह स्तर पर 5687 सी.एम.राइस स्कूल होंगे, जिनमें प्रति स्कूल 800 से 1000 विद्यार्थी होंगे. कैबिनेट ने इस योजना के प्रथम चरण के लिए 6952 करोड़ की मंजूरी दे दी है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के मानक के अनुरूप सीएम राइज स्कूल में कौशल विकास को प्राथमिकता दी जाएगी. डिग्री के स्थान पर बच्चों को रोजगारपरक शिक्षा देेने पर जोर होगा. नैतिक मूल्यों की शिक्षा देकर उन्हें भारतीयता से जोड़ा जाएगा. स्वयं मुख्यमंत्री शिवराजसिंह के अनुसार इन स्कूलों का मुख्य उद्देश्य बच्चों को ज्ञान, कौशल और नागरिकता के संस्कार देना है। साथ ही, भारतीय संस्कृति और संस्कारों की शिक्षा देना है। स्कूली शिक्षा में बहुविध गतिविधियों के सूर्योदय की उम्मीद के साथ सीएम राइज स्कूल जमीनी तौर पर जल्द ही काम करने लगेंगे.


सती सुलोचना की कथा!!!!!!

 प्रस्तुति -  रेणु दत्ता / आशा सिन्हा 


सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उसके कटे हुए शीश को भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया था।


 अपने पती की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जाकर पति का शीश लाने की प्रार्थना की। किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये। क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।


रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं- "लक्ष्मण, रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदह नहीं है।


 परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एकनारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है।


 ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सेना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।


मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यक्ति की हो।


 ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा- "यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृत्तांत लिख दे। भुजा में दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया- "प्राणप्रिये, यह भुजा मेरी ही है।


 युद्ध भूमि में श्रीराम के भाई लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कई वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वे तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।


पति की भुजा-लिखित पंक्तियां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावणने आकर कहा- 'शोक न कर पुत्री। 


प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा। करुण चीत्कार करती हुई बोली- "पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के आभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे। सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।'


 किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- "देवी ! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो। 


जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एकपत्नीव्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"


सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले- "देवी, तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे; किंतु विधी की लिखी को कौन बदल सकता है ?आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी। 


श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा- "देवी, मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतीत्व से तो विश्व भी थर्राता है। अपने स्वयं यहाँ आने का कारण बताओ, बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ? 


सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली- "राघवेन्द्र, मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आई हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।


पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा- "सुमित्रानन्दन, तुम भूलकर भी गर्व मत करना की मेघनाथ का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी। 


यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ति रखने वाली उनकी अनन्य उपासिका हूँ। पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।


सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वे यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है। 


जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुई कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है। सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया- "मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुई मेरे पास चली गयी थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया। 


व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे- "निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा- "व्यर्थ बातें मत करो मित्र। पतिव्रता के महात्म्य को तुम नहीं जानते। यदि वह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।


श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा- "यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा। 


यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- "भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ। 


अत: आज युद्ध बंद रहे। श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गयी । लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई।


     🌼🥀!जय सियाराम जय जय हनुमान!🥀🌼


🌼🥀🌼🥀🌼🥀🌼🥀🌼🥀🌼🥀🌼🥀

प्रेम*

 एक बार एक पुत्र अपने पिता से रूठ कर घर छोड़ कर दूर चला गया और फिर इधर उधर यूँही भटकता रहा। दिन बीते, महीने बीते और साल बीत गए | 

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एक दिन वह बीमार पड़ गया | *अपनी झोपडी में अकेले पड़े उसे अपने पिता के प्रेम की याद आई कि कैसे उसके पिता उसके बीमार होने पर उसकी सेवा किया करते थे |* उसे बीमारी में इतना प्रेम मिलता था कि वो स्वयं ही शीघ्र अति शीघ्र ठीक हो जाता था | उसे फिर एहसास हुआ कि उसने घर छोड़ कर बहुत बड़ी गलती की है, वो रात के अँधेरे में ही घर की और हो लिया।

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जब घर के नजदीक गया तो उसने देखा आधी रात के बाद भी दरवाज़ा खुला हुआ है | अनहोनी के डर से वो तुरंत भाग कर अंदर गया तो उसने पाया की आंगन में उसके पिता लेटे हुए हैं | उसे देखते ही उन्होंने उसका बांहे फैला कर स्वागत किया | पुत्र की आँखों में आंसू आ गए | 

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उसने पिता से पूछा "ये घर का दरवाज़ा खुला है, क्या आपको आभास था कि मैं आऊंगा?" पिता ने उत्तर दिया *"अरे पगले ये दरवाजा उस दिन से बंद ही नहीं हुआ जिस दिन से तू गया है, मैं सोचता था कि पता नहीं तू कब आ जाये और कंही ऐसा न हो कि दरवाज़ा बंद देख कर तू वापिस लौट जाये |"*

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ठीक यही स्थिति उस परमपिता परमात्मा की है | उसने भी प्रेमवश अपने भक्तो के लिए द्वार खुले रख छोड़े हैं कि पता नहीं कब भटकी हुई कोई संतान उसकी और लौट आए।i

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हमेंभी आवश्यकता है सिर्फ इतनी कि उसके प्रेम को समझे और उसकी और बढ़ चलें।