शुक्रवार, 18 मार्च 2016

गूगल ही जीवन है / गूगल द्वारा मांगे जाने पर देय एक सुझाव






अनामी शरण बबल / 19 मार्च 2016

गूगल प्लस एक फेसबुक सा फेस नहीं बना पाया है, मगर यह एक सबसे बेहतरीन सामग्री संरक्षण का स्लैब बन गया है, जहां पर हम गूगल प्लस में कोई मैटर पोस्ट कर एक संकलन की तरह सुशोभित कर देते है। यह हमारे लिए सबसे सेफ शानदार लाईब्रेली बनता जा रहा है। अपके इस संयोजन साज सज्जा को सुशोभित करने के लिए आभार मगर इस प्लस को एक डिजिटल लाईब्रेरी की तरह विकसित करने की बजाय हमारे संवाद का प्रभावी माध्यम बन सके इसकी हमें उम्मीद ौर इंतजार है। प्लस को हमारे जीवन के कार्यकलापों से जोडे तथा प्लस के मार्फत ही हम तमाम ई कार्यकलाप कर सके इस तरह की सुविधा प्रदान करे ताकि लोग फेसबुक की मस्ती को प्लस के साथ जीवनोपयोगी बना सके।प्लस के दर्सकों की बाके कमेंट्स को एक ऑटोमेटिक ब्लाग सा ग्लोबल डायरी का सेप देने पर विचार करे ताकि फेसबुक और ब्ह्राट्सअप के बगैर तो लोग रह सके मगर सौ तालों की एक चाबी प्लस बने कि इसके बगैर लोग अपने जीवन में कुछ प्लस 2 सामहसूस ना करेय़ । खुशियों की डोर  गूगलप्लस के संग । लोग सचमुच में प्लस के बिना हमेशा माईनस फिल करे। अनामी शरण बबल
( सर, मेरा कमेंट्स कुछ लंबा हो गया पर यह मुझे भी बडा अजीब लगता है कि गूगल के बगैर 99 फीसदी लोग इंटरनेट से जुड़ते है इसके बावजूद गूगल केवल एक ट्रांसपोर्टर क्यों है कि जिसको जहां जाना है तो एक रिक्शे की तरह गूगल सामने है। आप कल्पना करे कि यदि आज गूगल एक घंटे के लिए बंद हो जाे तो 95 % नेटर ( नेट यूजर का मेरे द्वारा दिया गया एक नाम) अपना काम नहीं कर सकते . अपनी इस ताकत को बुलेट रेल या जेट बनाइे कि गूगल है तो नेटर  का जीवन है। रोजाना पांच घंटा कोई नेटर नेट पर काम करता है पर गूगल का इस्तेमाल सच में चार या पांच मिनट ही करता है और वो भी किस्तों में 10 सेकेण्ट या 20 सेकेण्ट के लिए क्योंकि सेकेण्डो में ही गूगल से नाता बनता है और काम होते ही काम साईलेंट  हो जाता है। अपनी पहुंच के बाद भी क्षणों के रिलेशन को मजबूत करे। और अंत में मेरा मानना है कि प्लस के साथ मुशायरा नाटक लोक संगीत तथा परीक्षा के कुछ लाईव क्लास की सुविधा प्रदान करे कुछ यादगार गानों संगीत का फिल्म का प्रोमो .  की सुविधा प्लस के पाठको दर्शकों को प्रदान करे ताकि उनको यह फिल हो कि यह देखना है सुनना है नोट लेना है तो माध्यम केवल प्लस है. गूगल हमारे जीवनसे इस तरह जुडा है कि इसके बगैर कोई आज सोच नहीं सकता है मगर मेरा मानना है कि गूगल की कुछ सेवाओं को सीधे प्लस से लिंक करे ताकि प्लस भी तमाम नेटर के लिए भी सबसे उपयोगी हो सके।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2016

अपराध या दंडाभियोग


 

 

प्रस्तुति- सृष्टि शरण 


अपराध या दंडाभियोग (crime) की परिभाषा भिन्न-भिन्न रूपों में की गई है; यथा,
  • दंडाभियोग समाजविरोधी क्रिया है;
  • समाज द्वारा निर्धारित आचरण का उल्लंघन या उसकी अवहेलना दंडाभियोग है;
  • यह ऐसी क्रिया या क्रिया में त्रुटि है, जिसके लिये दोषी व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित दंड दिया जाता है।
इन परिभाषाओं के अनुसार किसी नगरपालिका के बनाए नियमों का उल्लंघन कर यदि कोई रात में बिना बत्ती जलाए साइकिल पर नगर की सड़क पर चले अथवा बिना पर्याप्त कारण के ट्रेन की जंजीर खींचकर गाड़ी खड़ी कर दे, तो वह भी उसी प्रकार दोषी माना जाएगा, जिस तरह कोई किसी की हत्या करने पर। किंतु साधारण अर्थ में लोग दंडाभियोग को हत्या, डकैती आदि जधन्य अपराधों के पर्याय के रूप में ही लेते हैं। लौकिक मत के अनुसार कोई चालक यदि तेजी एवं असावधानी से मोटर चलाते हुए किसी को अपनी गाड़ी से कुचल दे तो वह अपराधी नहीं कहा जा सकता, यदि उसके मन में अपराध करने की भावना न रही हो।

अनुक्रम

दण्डाभियोग के लिए आवश्यक शर्तें

परंपरागत मान्यताओं के अनुसार दंडाभियोग की पूर्णता के लिये दो चीजें अवश्य हैं -
यदि कोई चोरी करने के अभिप्राय से किसी के घर की खिड़की से घर के अंदर की चीजों को देखे तथा रात्रि में सेंध लगाकर चोरी करने की योजना बनाकर ही लौट जाय तो उसपर चोरी के अपराध का अभियोग नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि अपराधी मन की योजना का कार्यान्वयन नहीं हुआ, भले ही दूसरे के घर में अनधिकार प्रवेश करने के लिये वह दोषी क्यों न हो। चोरी के अपराध की पूर्णता के लिये दूसरे की चीजों को कम से कम स्पर्श करना आवश्यक है। अत: वह व्यक्ति यदि अपनी योजना के अनुसार रात्रि में सेंध लगाकर उस घर की चीजें उठा ले जाय तभी वह चोरी के लिये अपराधी होगा। किंतु आधुनिक सभ्यता के विकास के साथ साथ समाज में जटिलता आने के कारण नित्य नए नए कानून बन रहे हैं, जिनसे दंडाभियोग का दोषपूर्ण मन (mens rea) का सिद्धांत लुप्त होता जा रहा है।
साधारणत: जो स्वयं अपराध करे या दूसरों के द्वारा अपराध करावे, वही दंडित होगा। अत: स्वामी अपने सेवक के अनधिकार अपराध के लिये दायी नहीं हो सकता। किंतु एक सीमित वर्ग के मामलों में, जहाँ अपराध करने की मानसिक प्रवृत्ति (Mens rea) आवश्यक नहीं है, यदि कोई सेवक अपने साधारण कार्य के दौरान में कोई अपराध करे या कानून द्वारा निर्धारित किसी काम को न करने से अपराधी बने, तो उनका स्वामी अपराध के लिये उसके साथ साथ दोषी होगा; भले ही स्वामी को सेवक के काम की या निर्धारित काम में त्रुटि की खबर न रही हो, या सेवक ने स्वामी के आदेश के विरुद्ध की काम क्यों न किया हो अथवा निर्धारित काम करने से विरत हुआ हो।

कारण

दंडाभियोग के भिन्न-भिन्न कारण हो सकते हैं; यथा, क्षणिक आवेग, भावुकता, पूर्वविचार, भावी विनाश से रक्षा, आदि। दृष्टांत के लिये राजनीतिक हत्याओं को ले सकते हैं। किसी राजनीतिक लक्ष्य की पूर्ति के निमित्त कुछ लोग षड्यंत्र कर राज्य के प्रमुख की हत्या कर डालते हैं। ऐसा पूर्व विचार से ही होता है, क्षणिक आवेग से नहीं। प्रत्यक्ष हत्यारा भावुकता से, पैसे के लोभ से या अपने दल के लक्ष्य की पूर्ति के कारण अपराध करता है। उसके गिरफ्तार होने पर इस आशंका से कि कहीं वह रहस्य का उद्घाटन कर अपने साथियों का विनाश न करवा दे, षडयंत्रकारी उसका वध कर देते हैं। इसी प्रकार डकैती करते हुए जब एक डाकू घायल होकर गिर पड़ता है तो उसके साथी उसे ढोकर ले जाने में अक्षम होने के कारण उसका सिर काट ले जाते हैं, ताकि उसके मृत शरीर के द्वारा उसकी पहचान न हो सके या जीवित रहने पर क्षमा पाने के आश्वासन से वह अपने दल का रहस्य न खोल दे।

अपराध और वातावरण

जन्म या आनुवंशिकता (heredity) का दंडाभियोग से क्या संबंध है, निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता; किंतु हम वातावरण के प्रभाव अस्वीकार नहीं कर सकते। यह साधारण अनुभव है कि कलुषित वातावरण अपराध करने की भावना को प्रोत्साहन देता है। चोरों की संगति में यदि किसी शिशु को रख दिया जाय तो क्रमश: उसकी मनोवृत्ति चोरी की ओर अग्रसर अवश्य होगी। इस प्रकार यदि कम अवस्था के शौकिया अपराधी को साधारण कैदियों के साथ जेल में रखा जाय तो इस स्थिति का प्रभाव उसे संभवत: कारावास से मुक्त होने पर अपराध करने को प्रेरित करे। अत: प्रगतिशील समाज में शौकिया अपराधियों को दंडाभियोग से विरत करने के अभिप्राय से अपराध को प्रोत्साहन देनेवाले वातावरण से पृथक् रखने की योजना की गई है। इंग्लैंड में प्रथम विश्वयुद्ध के पूर्व ही वोर्स्टल नामक संस्था खुली। शौकिया तथा कम अवस्था के अपराधियों का सुधार करना इनका उद्देश्य था। क्रमश: अन्यान्य प्रगतिशील देशों में यह संस्था खुली। प्रोबेशन ऐक्ट भी लागू हुआ। शिशु एवं युवक अपराधियों को अपराध के लिये दंडित होने पर उन्हें जेल में न रखकर उनके अभिभावकों द्वारा नेकचलनी का आश्वान मिलने पर उन्हें परिवीक्षा (probation) पर छोड़ दिया जाता है। यदि हत्या आदि गुरुतम अपराधों के लिये वे दंडित हुए हैं, तो उन्हें बोरस्टल संस्था के हवाले किया जाता है। इस संस्था में स्वस्थ वातावरण रहता है, जिससे अपराधियों के सुधार में सहायता मिलती है। उन्हें उपयोगी व्यवसाय की भी शिक्षा दी जाती है, ताकि दंड की निर्धारित अवधि पूरी कर घर लौटने पर वे सच्चाई से अपनी जीविका चला सकें।

अपराधियों की श्रेणी

कोई व्यक्ति या तो स्वयं अथवा निमित्त रूप में अपराधी हो सकता है या घटना से पूर्व अथवा पश्चात् सहायक हो सकता है। कोई या तो स्वयं अपराध करता है या अन्य किसी एजेंट से कराता है, जो कानूनन अपराध के लिये उत्तरदायी नहीं होता, यथा सात साल से कम अवस्था का शिशु, कोई पशु या कोई मशीन। ऐसा व्यक्ति प्रधान अपराधी कहलाता है। द्वितीय श्रेणी का प्रधान वह है जो घटनास्थल पर उपस्थित रहकर प्रधान को अपराध कर्म में सहायता देता है या उसे प्रोत्साहित करता है। घटना से पूर्व का सहायक वह है जो प्रधान को अपराध करने को प्रोत्साहित करता है किंतु अपराध के समय उपस्थित नहीं रहता। घटना से पश्चात् का सहायक वह है जो यह जानते हुए कि किसी ने गुरुतर अपराध किया है, उसे शरण देता है या उसे भागने में सहायता पहुँचाता है। इस प्रसंग में स्मरणीय है कि राजद्रोह में जितने लोग संमिलित होते हैं, सबके सब प्रधान अपराधी होते हैं। दंड की गुरुत्ता एवं लघुता की दृष्टि से उक्त श्रेणीकरण उपयोगी है।

दंडाभियोग का वर्गीकरण

दंडाभियोग के अपराध साधारणत: निम्नलिखित वर्गों में विभक्त होते हैं-
(1) राष्ट्र की आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा के विरुद्ध,
(2) न्याय के आलय में लाए जाने एवं जनता के अधिकारियों के विरुद्ध,
(3) साधारण जनता के विरुद्ध,
(4) सांपत्तिक अपहरण।

दंडाभियोग की प्रतिरक्षा

कानून का अज्ञान दंडाभियोग के बचाव में स्वीकार नहीं किया जाता। वह विदेशी, जिसे अन्य देश के कानून की जानकारी नहीं है, इस बचाव को पेश नहीं कर सकता, यद्यपि दंडादेश की कठोरता में प्राय: इससे कमी की जा सकती है।
जिन मामलों में दोषपूर्ण मन आवश्यक है, वहाँ दुर्घटना बचाव में ली जा सकती है। अभियुक्त अपने प्रति लाए हुए अभियोग को स्वीकार करते हुए कह सकता है कि वह कानूनी ढंग से काम कर रहा था, पर अन्यमनस्कता के कारण, सबोध (culpable) उपेक्षा के बिना, दुर्घटना हो गई।
यदि किसी व्यक्ति या उसकी संपत्ति का अनधिकार स्पर्श हो तो मामला चलानेवाले की स्वीकृति पूर्ण बचाव है। किंतु यह स्वीकृति कपट, धमकी या हिंसा से प्राप्त हुई हो तो इसकी मान्यता नहीं होगी।
यदि दो व्यक्ति अपनी आत्महत्या की योजना बनाएँ एवं उस योजना के अनुसार एक आत्मघात कर ले, कर दूसरा बच जाय तो दूसरा पहले की हत्या के लिये अभियुक्त होगा।
यह किसी की क्षमता के बाहर है कि वह स्वीकृति दे कि वह दंडाभियोग नहीं लाएगा।

दंडाभियोग की अवधि

कानून द्वारा निर्दिष्ट कुछ अपवादों को छोड़कर दंडाभियोग की कोई अवधि भारत या इंग्लैंड में नहीं है। अभियुक्त सदा अपने अपराध के लिये उत्तरदायी है, अपराध की तिथि से भले ही कितना भी समय क्यों न व्यतीत हो जाय। यूरोप के देशों में अपराध की तिथि से 20 साल के बाद कोई अभियोग नहीं लाया जा सकता।

अपराध विज्ञान

अपराध विज्ञान का दंडदायित्व से इतना ही संबंध है कि यह अपराधी को समझने की चेष्टा करता है। उसे पहचानना इसकी परिधि से बाहर है। इसका सिद्धांत इस तथ्य पर आधारित है कि कोई परिस्थिति से पराभूत होकर ही अपराध की ओर अग्रसर होता है। यथा, अर्थ या नैतिक संकट किसी को दूसरे की संपत्ति का अपहरण करने को प्रोत्साहित कर सकता है। विक्षिप्तता या मानसिक असंतुलन भी अपराध को प्रश्रय देते हैं। अत: वैज्ञानिक उपचारों के प्रयोग से तथा परिस्थिति को अनुकूल कर अपराधी को अपराध से विरत करना चाहिए। अन्य शब्दों में यह विज्ञान "दंड" के स्थान में "सुधार" का समर्थन करता है। अमरीका में इस सिद्धांत की मान्यता बढ़ रही है। भारत या इंग्लैंड में इसका बहुत कम प्रभाव जनता या न्यायालय पर पड़ा है।

इन्हें भी देखें

बाहरी कड़ियाँ

बुधवार, 27 जनवरी 2016

16 दिसंबर, निर्भया और बाल अपराध




सोलह दिसम्बर की घटना और उसमें एक किशोर की भूमिका ने भारत के बाल न्याय कानून पर गंभीर प्रश्न खड़े किये हैं। अगर बच्चे अपराध करते हैं और अगर ये अपराध गंभीर हैं तो उन्हें वयस्क अपराधियों की तरह ही दंडित किया जाए।18 साल की उम्र को घटा कर 16 या 14 या 12 साल कर दिया जाये। बाल अपराधियों को भी वयस्क अपराधियों की तरह ही जेलों में बंद किया जाये,फांसी दी जाए, इस तरह की मांगें हो रही हैं और एक राष्ट्रव्यापी बहस जारी है, जिसके केंद्र में है-कानून को बदले जाने की मांग।
जिस तरह से इस पूरे मामले को मीडिया के एक वर्ग ने बेहद उत्तेजक, एकतरफा, अधकचरे और सनसनीखेज तरीके से प्रस्तुत किया है, उससे एक ऐसा माहौल बन गया है, जिसमें हर कोई यह मानकर चल रहा है कि कानून गलत है और इसके बनाने के समय ठीक से विचार नहीं किया गया। भय का वातावरण इस तरह से निर्मिंत किया गया है कि जैसे देश में सारा अपराध, सारे बलात्कार सिर्फ बच्चे ही कर रहे हैं। आपकी जानकारी के लिए बताते चलें की 124 करोड़ की आबादी वाले अपने देश में बाल अपराध नगण्य है। भारत में समूचे अपराध में बाल अपराध महज 1 प्रतिशत के आसपास है जबकि बच्चों की आबादी देश की कुल आबादी का 3 3 प्रतिशत है। जिस तरह की मांगें निकल कर आ रही हैं, अगर उस दिशा में कानून बदला जाता है तो उसके गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं, जिनके बारे में अभी कोई सोच ही नहीं रहा है।
अमेरिका के पश्चाताप से सीखिये
आज जो भारत में हो रहा है वह अमेरिका में घटित हो चुका है। 1990 के आसपास बिल्कुल ऐसा ही माहौल वहां भी बना और उसमें भी मीडिया और प्रबुद्ध वर्ग ने बढ़-चढ़ कर भूमिका निभाई। बाल अपराध की रोकथाम के लिए बने प्रभावी कानूनों की बलि चढ़ा दी गई। कम उम्र के नौजवान जेलों में भरे जाने लगे और उन पर बेहद सख्त कानून लागू कर दिए गये। आज वहां के हालात बद से बदतर हैं। अपराध में फंसे बच्चों को जेलों में ठूंस-ठूंस कर बाल अपराध को रोकने का ये नुस्खा असफल रहा और उस समय की जनता की मांग का खमियाजा पूरे अमेरिका ने भोगा।
आज अमेरिका की जेलें बच्चों और नौजवानों से पटी पड़ी हैं और बाल अपराध थमने का नाम नहीं ले रहा। अब फिर से वहां बच्चों और नौजवानों को जेलों में न भरे जाने की बात चल रही है। भारत का बाल न्याय कानून एक बेहतरीन कानून है, जो बच्चों के हालात, उनकी परेशानियां, उनके अपराध में फंसने की वजहों को बखूबी समझता है और ये बाल अपराध की रोकथाम के सबसे कारगर सिद्धांतों और प्रक्रियाओं को लागू करता है। ये भी बताते चलें की भारत का बाल न्याय कानून पश्चिमी देशों की नक़ल नहीं है। ये विशुद्ध रूप से भारत की जमीन में जन्मा और पनपा कानून है। 163 वर्षो का इतिहास समेटे भारत का बाल न्याय कानून एक प्रगतिशील और मानवीय सोच रखता है और बच्चों को अपराध की अंधेरी गलियों से निकाल कर एक सुंदर और सफल जीवन की ओर ले जाता है।
बच्चों के लिए काम करने वाले वकील के तौर पर मैंने हजारों ऐसे बच्चों के जीवन को देखा है। ये बच्चे कभी मीडिया की नज़र में नहीं आएंगे और न ही बाल न्याय कानून के पक्ष में बोलते दिखाई देंगे। लेकिन ये बाल न्याय कानून की सफलता के प्रमाण हैं, जो आज भीड़ में गुम हैं किंतु अपराध मुक्त जीवन जी रहे हैं। इनमें कई आज वयस्क हैं। कोई वकील बन गया है, कोई इंजीनियर है तो कोई पुलिस और सेना में है। कई खेती कर रहे हैं तो कई कारोबार या नौकरी। बाल न्याय कानून न होता तो इनमें से कई अपने जीवन के शुरु आती दिनों में हुई गलतियों और हालातों के चलते जेल की काल कोठरी में सड़ रहे होते और अपराधी का जीवन जीने को अभिशप्त होते। बाल न्याय कानून के चलते लाखों लोग समाज की मुख्य धारा में लौटे हैं।
कानून ने सुधारे हजारों बच्चों
एक नक्सल पीड़ित राज्य की कुछ बच्चियों का एक मामला मुझे याद आता है। आज वह बच्चियां पुलिस में काम करती हैं। उन्हें नक्सल गतिविधियों में शामिल होने की वजह से पकड़ा गया था और उस वक्त भी मीडिया के एक वर्ग ने उन्हें खतरनाक आतंकी कहते हुए वयस्कों जैसी सख्त सजा की मुखालफत की थी। आज वह बाल कानून के चलते नक्सलवाद के चंगुल से बाहर है और पुलिस में भर्ती होकर देश और समाज की सेवा कर रही है। एक 1 7 साल का नवयुवक जिस पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने खतरनाक गैंगस्टर होने का मुक़दमा दर्ज किया हुआ है, असल में भगत सिंह और विवेकानंद का साहित्य पढ़ता है और एक विलक्षण रंगकार है। उसका पूरा परिवार संभ्रांत है, पिता एक पारंगत चित्रकार हैं और भाई खुद रंगकर्मी है। बाल कानून न होता तो ये बच्चा और उसका सौम्य कलाकार जेल की सलाखों के पीछे चीत्कार कर रहा होता। एक और बच्चा जिस पर दहेज़ हत्या का मुक़दमा दर्ज है जबकि वह मात्र 15 वर्ष का था और गलती सिर्फ इतनी कि वह घटना के वक्त घर में मौजूद था। बाल न्याय कानून न होता तो वह आज जेल में होता। कानून के चलते वह आज एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम कर रहा है। एक और बच्चा जो जब मेरे पास लाया गया था , नशे की हालत में था और मुझे गालियां और धमकी दे रहा था; आज नशे के शिकार बच्चों के पुनर्वास पर काम करता है। एक और बच्चा, जो दाऊद इब्राहिम बनने का सपना देखता था और मुझे उसका वकील होने के बावजूद उसकी जमानत न होने देने के लिए गलियां देता था, आज देवी जागरण में ढोल बजाने का काम करता है। ऐसे अनिगनत प्रसंग समाज में बिखरे हुए हैं।
मीडिया को संयम और जिम्मेदारी के साथ इस विषय के उजले पक्ष को भी जनता के सामने रखना चाहिए ताकि पूरे मामले पर परिपक्व और सही राय बन सके। आज भारत के बाल न्याय कानून को मिटाने पर तुले मीडिया और प्रबुद्ध वर्ग की चली तो जल्दी ही हम वह दिन देखेंगे जब हमारे अपने घरों के नौजवान और बच्चे अपनी एक गलती के चलते जेल जाएंगे। अपनी गलती को समझने और सुधरने का एक मौका जो सिर्फ 18 साल का होने तक मिलता है, नहीं मिलेगा।
आज घर-घर में बच्चे जरूरत से पहले वह कर रहे हैं, जो उन्हें नहीं करना चाहिए। प्यार के चक्कर में घर से भागना, शारीरिक सम्बन्ध बनाना, नशा करना, तमंचा-बंदूक रखना, ये सब आज लगभग हर घर में हो रहा है और अभिभावक जमीन- आसमान के प्रयास कर रहे हैं कि उनके बच्चे सुधर जाएं। बाल न्याय कानून इस तरह के हालातों में हमारा साथ देता है और हमें मौका देता है कि हम अपने बच्चों का जीवन तबाह होने से बचा सकें। जरूरत इस बात की है कि हम इस कानून को और प्रभावी तरीके से लागू करें, न कि इस कानून को उखाड़ फेंकने की मुहिम में शामिल हों।

शनिवार, 7 नवंबर 2015

चट्टानों पर ये मूर्तियाँ किसने बनाई






सैकड़ों साल पहले इन चट्टानों पर ये मूर्तियाँ किसने बनाई



लहरदार पगडंडियां, घने जंगल और घाटियां और संकरी नदियां और सोतों के मनोरम दृश्‍य, अनोखी वनस्‍पतियां और वन्‍य जीवों के आसपास होने का अहसास, और अपनी शहरी जिंदगी की रेलमपेल से भागे हुए जंगल के अभयारण्‍यक। ऐसा ही है उनाकोटि का प्राकृतिक भंडार, जो इतिहास, पुरातत्‍व और धार्मिक खूबियों के रंग, गंध से पर्यटकों को अपनी ओर इशारे से बुलाता है। यह एक औसत ऊंचाई वाली पहाड़ी श्रृंखला है, जो उत्‍तरी त्रिपुरा के हरे-भरे शांत और शीतल वातावरण में स्थित है।
त्रिपुरा की राजधानी से 170 किलोमीटर की दूरी पर स्थित उनाकोटि की पहाड़ी पर हिन्दू देवी-देवताओं की चट्टानों पर उकेरी गई अनगिनत मूर्तियां और शिल्‍प मौजूद हैं। बड़ी-बड़ी चट्टानों पर ये विशाल नक्‍काशियों की तरह दिखते हैं, और ये शिल्‍प छोटे-बड़े आकार में और यहां-वहां चारों तरफ फैले हैं। पौराणिक कथाओं में इसके बारे में दिलचस्प कथा मिलती है, जिसके अनुसार यहां देवी-देवताओं की एक सभा हुई थी। भगवान शिव, बनारस जाते समय यहां रुके थे, तभी से इसका नाम उनाकोटि पड़ा है।
उनाकोटि में चट्टानों पर उकेरे गए नक्‍का‍शी के शिल्‍प और पत्‍थर की मूर्तियां हैं। इन शिल्‍पों का केंद्र शिव और गणेश हैं। 30 फुट ऊंचे शिव की विशालतम छवि खड़ी चट्टान पर उकेरी हुई है, जिसे ‘उनाकोटिस्‍वर काल भैरव’ कहा जाता है। इसके सिर को 10 फीट तक के लंबे बालों के रूप में उकेरा गया है। इसी के पास शेर पर सवार देवी दुर्गा का शिल्‍प चट्टान पर उकेरी हुई है, वहां दूसरी तरफ मकर पर सवार देवी गंगा का शिल्‍प भी है। यहां नंदी बैल की जमीन पर आधी उकेरे हुए शिल्‍प भी हैं।
image (74)शिव के शिल्‍पों से कुछ ही मीटर दूर भगवान गणेश की तीन शानदार मूर्तियां हैं। चार-भुजाओं वाले गणेश की दुर्लभ नक्‍काशी के एक तरफ तीन दांत वाले साराभुजा गणेश और चार दांत वाले अष्‍टभुजा गणेश की दो मूर्तियां स्थित हैं।इसके अलावा तीन आंखों वाला एक शिल्‍प भी है, जिसके बारे में माना जाता है कि वह सूर्य या विष्णु भगवान का है। चतुर्मुख शिवलिंग, नांदी, नरसिम्‍हा, श्रीराम, रावण, हनुमान, और अन्‍य अनेक देवी-देवताओं के शिल्‍प और मूर्तियों यहां हैं। एक किंवदंती है कि अभी भी वहां कोई चट्टानों को उकेर रहा है, इसीलिए इस उनाकोटि-बेल्‍कुम पहाड़ी को देवस्‍थल के रूप में जाना जाता है, आप कहीं से भी, किधर से भी गुजर जाइए आपको शिव या किसी देव की चट्टान पर उकेरी हुई मूर्ति या शिल्‍प मिलेगा। पहाडों से गिरते हुए सुंदर सोते उनाकोटि के तल में एक कुंड को भरते हैं, जिसे ‘’सीता कुंड’’ कहते हैं। इसमें स्‍नान करना पवित्र माना जाता है। हर साल यहां अप्रैल के महीने में ‘अशोकाष्‍टमी मेला’ लगता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु आते हैं और ‘सीता कुंड’ में स्‍नान करते हैं।
इसे एक आदर्श पर्यटन स्‍थल के रूप में विकसित करने के लिए केंद्रीय पर्यटन मंत्री ने 2009-10 में उनाकोटि डेस्टिनेशन डेवलेपमेंट प्रोजेक्‍ट के तहत यहां 5 किलोमीटर के दायरे में पर्यटक सूचना केंद्र, कैफेटेरिया, सार्वजनिक सुविधाएं, प्राकृतिक दृष्‍यों के लिए व्‍यूप्‍वाइंट आदि के निर्माण के लिए 1.13 करोड़ रुपए मंजूर किए हैं। त्रिपुरा पर्यटन विकास के योजना अधिकारियों के अनुसार, यह योजना एएसआई को सौंप दी गई है, और जल्‍दी ही इस पर काम शुरू होने की संभावना है।
माना जाता है कि उनाकोटि पर भारतीय इतिहास के मध्यकाल के पाला-युग के शिव पंथ का प्रभाव है। इस पुरातात्विक महत्‍व के स्‍थल के आसपास तांत्रिक, शक्ति, और हठ योगी जैसे कई अन्य संप्रदायों का प्रभाव भी पाया जाता है। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (एएसआई) के अनुसार उनाकोटि का काल 8वीं या 9वीं शताब्दी का है। हालांकि, इसके शिल्‍पों के बारे में, उनके समय-काल के बारे अनेक मत हैं।
देखा जाए तो ऐतिहासिक रूप से और उनकोटि की कथाएं अभी भी एएसआई और ऐसी ही अन्‍य संस्‍थाओं से इस पर समन्वित अनुसंधान की मांग कर रही हैं, ताकि भारतीय सभ्‍यता के लुप्‍त अध्‍याय के रहस्‍य को उजागर किया जा सके।
(*सुभाशिष चंद्रा पीआईबी, अगरतला में मीडिया एवं संचार अधिकारी हैं)

पत्थरों से पानी निकालते हैं रितेश आर्य

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29 अक्टूबर, 1915 को अफगानिस्तान में बनी थी आजाद हिन्द सरकार, राजा महेंद्र प्रताप थे पहले राष्ट्रपति

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रंग बिरंगे त्यौहार





PICS: ऐसे त्योहार जिनके बारे में आप शायद ही जानते होंगे
Posted by: Neeti Sudha Published: Wednesday, October 8, 2014, 15:24 [IST] Share this on your social network: Facebook Twitter Google+ Comments Mail बेंगलौर। भारत विभिन्न रंगों, त्योहारों, धर्म एवं जातियों का संगम है। यहां लोग सैकड़ों परंपराओं और संस्कृति के साथ मिलकर रहते हैं। सभी संस्कृतियों की अपनी अपनी अलग पहचान और रीति रिवाज होते हैं। ठीक उसी तरह हर राज्य, हर जातियों का भिन्न त्योहार होता है, जिसे पूरे धूमधाम के साथ मनाया जाता है। कई त्योहार काफी लोकप्रिय हैं, जो पूरे देश में मनाया जाता है, जैसे कि होली, दिवाली, दशहरा, ईद आदि। लेकिन कई पर्व ऐसे भी हैं जो किसी विशेष समुदाय द्वारा ही मनाया जाता है। जिसमें सिर्फ स्थानीय लोग ही हिस्सा लेते हैं। लेकिन इन पर्व- त्योहारों का भी अलग जोश और उत्साह होता है। यहां हम आपको ऐसे ही त्योहारों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसकी जानकारी से शायद ही आप कभी रूबरू हुए होगें। तो फिर, बढ़ाइए स्लाइडर और देखिए ऐसे त्योहार जिनके बारे में आप शायद ही जानते होंगे: Auto Play

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